आपातकाल पर सरसरी नजर

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लेखक- अचिरतोष ‘विधु

 

25 जून 1975, एक सत्ता मद में अंधी भ्रष्ट महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा भारत पर आपातकाल थोपा गया और सभी संवैधानिक अधिकार निरस्त कर राजनैतिक/ सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में ठूंस दिया, अखबारों पर सेंसरशिप लागू की और सारे भारत को एक जेल में परिवर्तित कर दिया। और यह सब किया गया इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा अपना चुनाव रद्द घोषित कर देने के बाद प्रधानमंत्री के पद को कब्जाये रखने के लिए? क्योंकि कानूनन उनका चुनाव रद्द हो जाने पर उन्होंने प्रधानमंत्री का पद छोड़ देना चाहिए था, और इसके लिए इंदिरा गांधी ने भारतीय लोकतंत्र का गला घोंट दिया । उस समय भारतीय सर्वोच्च न्यायपालिका भी रीढ़ हीन हो गयी थी और पूर्णतः सत्ता की चेरी बन गयी थी।

इसी आपातकाल के समय मदांध इन्दिरा गांधी ने भारतीय संविधान की मूल आत्मा पर आघात किया और उसके मूल स्वरूप को बदलकर उसमें समाजवादी जैसे असंगत शब्द को जोड़ दिया। कांग्रेस पार्टी भी इंदिरा गांधी की ताल पर डांस कर रही थी। कांग्रेस के तत्कालीन विवेक शून्य अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने तो नारा ही दे दिया था कि ” इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा” । इस सन्दर्भ में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की भूमिका एक रीढ़ हीन व्यक्ति की सी रही जिन्होंने सोते से जाग कर आपातकाल के अध्यादेश पर हस्ताक्षर किए।

3-4 जुलाई 1975 की रात में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध की घोषणा कर दी गई। संघ के सरसंघचालक बालासाहेब देवरस को तथा अनेकों प्रचारकों और कार्यकर्ताओं को पकड़ कर जेल में डाल दिया गया था, क्योंकि इंदिरा गांधी को संघ से ही आपातकाल के विरोध की आशा थी। देश भर में संघ स्वयंसेवकों की सूचियां तैयार कर उनके खिलाफ गिरफ्तारी के वारंट जारी किए गए। स्वयंसेवकों को असह्य प्रताड़ना दी गई। उनके नाखून प्लायर से खींच कर निकाले गए, उन पर रोलर चढ़ाया, डंडे पर तेल लगाकर उसपर मिर्च पाउडर लपेट कर कार्यकर्ताओं की गुदा स्थान में डालकर उनसे प्रचारकों और अन्य कार्यकर्ताओं के बारे में जानकारी मांगी, इस प्रताड़ना वश अनेक स्वयंसेवक बाद में नपुंसकता से ग्रस्त हो गये। संघ कार्यालयों पर सील लगा दी और वहां से मिली उस समय शस्त्र प्रशिक्षण में प्रयोग होने वाली लकड़ी की छुरिकाओं को लेकर अखबारों में दुष्प्रचार भी कराया गया था कि संघ कार्यालयों में भारी मात्रा में शस्त्र भी मिले हैं। देश भर में जनता ने इसका विरोध शुरू किया, और धीरे-धीरे एक जन आंदोलन का स्वरूप ले गया।

आपातकाल में पुरुष नसबंदी पर बहुत बल दिया गया। सरकारी स्वास्थ्य कर्मियों ने भी आयु , वर्ग देखे बिना पकड़ -पकड़ कर नसबंदी शुरू कर दी। हालात ये थे कि नाबालिग, अविवाहित, विदुर, सत्तर- अस्सी वर्ष की आयु के तथा कहीं तो भिक्षाटन करते साधुओं की भी नसबंदी कर दी गई। उस समय एक नारा बहुत प्रचलित हुआ था – नसबन्दी के तीन दलाल इंदिरा, संजय, बंशीलाल। बंशीलाल उस समय हरियाणा के मुख्यमंत्री थे और अत्याचार करने वालों में अग्रणी थे।

धीरे -धीरे राजनैतिक दलों ने भी अपने विरोधी स्वर उठाने शुरू कर दिए। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक लोकसंघर्ष समिति बनाई गई जिसके तत्वावधान में देश भर में सत्याग्रह शुरू किया गया। संघ कार्यकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर सत्याग्रह में सहभागिता की और बहुत बड़ी संख्या में सत्याग्रह कर जेल यात्रा की। संघ स्वयंसेवकों की सत्याग्रह कर जेल जाने वालों की संख्या राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं से कयी गुणा अधिक थी। आपातकाल लगने पर अधिकांश परिवार आधारित दल चेतना शून्य स्थिति में पहुंच गए थे। मुलायम सिंह यादव जी को जब उस क्षेत्र के जिला प्रचारक जी ने सत्याग्रह कर विरोध शुरू करने का आग्रह किया तो उनका चेहरा पीला पड़ गया ।
संघ की शाखाओं पर पार्क में लगाने पर प्रतिबंध था किन्तु जेलों में स्वयंसेवकों ने नियमित शाखा लगाकर मातृभूमि की वन्दना का क्रम जारी रखा।

एक बार एक सत्याग्रही टोली में 60-65 वर्ष के एक बाबा जिनकी कमर झुकी हुई थी आये थे, दिसम्बर का महीना था मां बोली कि अरे इन्हें कहां भेज रहे हो जेल में मर-मरा गये तो हत्या गले पड़ेगी पर वह बोले माताजी आप चिन्ता न करें मुझे कुछ नहीं होगा और इमरजेंसी हटवाए बिना तो मैं मरने वाला ही नहीं हूं। और वास्तव में जब छः महीने बाद वह जेल से रिहा होकर आये तो कमर सीधी और चेहरे पर ओज था आकर बोले माताजी देखो इंदिरा से लड़ने के लिए मैं तगड़ा हो गया हूं ।
आपातकाल के विरोध में सारे विश्व में भारतीयों ने काम किया। बहुत से लोगों को इस काम के लिए विदेश भेजा गया ताकि वह आपातकाल के बारे में विश्व में सही जानकारी पहुंचा सकें। डा सुब्रमण्यम स्वामी भी एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे। पुलिस से बचने के लिए कयी प्रचारक बन्धुओं के साथ समाज की बहिनें भी प्रवास पर जाने लगीं ताकि पुलिस वाले उनके वाहन चैक नहीं करें क्योंकि सबको पता था कि प्रचारक तो अविवाहित होते हैं।

हमारे माता-पिता भी 1976 में मथुरा-वृंदावन की श्रावण मास में यात्रा करने के लिए गये थे। मथुरा में उनके एक मित्र बाबूलाल जी “गुजराती हिन्दू लाॅज” चलाते थे। माताजी- पिताजी वहां भोजन करने गए और भोजन करके जैसे ही वहां से निकल कर गये उनके यहां पुलिस पहुंच गई और उन्हें थाना ले गई और बार-बार रज्जू भैया ( संघ के वरिष्ठ प्रचारक जो बाद में सरसंघचालक बने) के बारे में पूछताछ की कि वह तुम्हारे यहां आये थे उनके साथ एक महिला भी थी। तब बाबूलाल ने बताया कि वह रज्जू भैया नहीं एक डाक्टर साहब अपनी पत्नी के साथ आये थे ( असल में पिताजी की कद-काठी का रज्जू भैया से बहुत साम्य था) किन्तु पुलिस मानी नहीं। पन्द्रह दिन बाद जब पिताजी फिर उनके यहां भोजन करने गए तब बाबूलाल जी ने यह प्रसंग उन्हें बताया।

देश में चले सतत् आंदोलन के परिणाम स्वरूप तानाशाह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को संसद के चुनाव कराने पर विवश होना पड़ा और चुनाव की घोषणा हुई। राजनैतिक दलों ने एकत्रित हो कर एक दल “जनता पार्टी” के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस और उसके बड़े-बड़े नेताओं को धूल चटाई। इंदिरा गांधी, संजय गांधी जैसे नेता भी चुनाव हार गए । आपातकाल हटा , अखबारों से सेंसरशिप ख़त्म हुई, राजनैतिक/ सामाजिक कार्यकर्ताओं की जेल से रिहाई हुई, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रतिबंध हटा देश में पुनः लोकतंत्र की स्थापना हुई और एक काले अध्याय का समापन हुआ। हम जैसे स्वयंसेवक पुनः पार्कों में एकत्रित होकर मस्ती में झूमकर गाने लगे . नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे …..

लोकतंत्र अमर रहे। भारत माता की जय।


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