आज बांग्लादेश में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसे समझने के लिए हमें इतिहास को टटोलना होगा। 14 और 15 अगस्त 1947 की दरमियानी रात, जब भारत गणराज्य अस्तित्व में आया, तो पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान नाम के दो हिस्से उससे अलग हो चुके थे। इनमें से पूर्वी पाकिस्तान ही आज का बांग्लादेश कहलाता है। उत्पत्ति के वक्त पूर्वी पाकिस्तान में मुसलमान अक्सरियत में तो थे, परंतु लगभग 25 फ़ीसदी हिंदू भी वहाँ अल्पसंख्यक होने की भूमिका निभा रहे थे। इन हिंदुओं को पाकिस्तानी हुक्मरानों द्वारा हमेशा शक और घृणा की दृष्टि से देखा गया। इस घृणा का चरम तब देखने को मिला, जब शेख मुजीब की 1970 राष्ट्रीय चुनाव की जीत के पश्चात् पूर्वी पाकिस्तान में रह रहे हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा दिया गया। यह वह वक्त भी था, जब बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन तूल पकड़ चुका था। पश्चिमी पाकिस्तान में बैठे लोगों को लगता था कि पूर्वी पाकिस्तान के हिंदू बुद्धिजीवी भारत के साथ मिलकर बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन की साज़िश रच रहे हैं। अंततः मार्च 1971 में पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया, जिसमें लाखों की संख्या में बंगाली हिंदुओं का कत्लेआम हुआ और इतनी ही संख्या में महिलाओं के साथ दुष्कर्म को अंजाम दिया गया। इन सभी घटनाओं ने पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं के भीतर इस कदर डर का माहौल उत्पन्न किया कि वे भारी संख्या में सीमा पार कर भारत के सीमावर्ती राज्यों में घुसने को मजबूर हो गए। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम जैसे राज्य इस दबाव को सहने में विफल हो रहे थे। अंत में सैन्य कार्रवाई करना भारत की मजबूरी थी, क्योंकि 1 करोड़ से अधिक लोगों का यूं भारत में घुस आना अनेक प्रकार के संकटों को जन्म देने वाला था। भारत ने पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध जीता और विश्व पटल पर बांग्लादेश नाम के नए देश का उदय हुआ।
आम मान्यता के विपरीत, पूर्वी पाकिस्तान के सभी लोग बांग्लादेश नहीं चाहते थे। वहाँ कुछ ऐसी शक्तियाँ भी थीं जो सदा से पाकिस्तान समर्थक थीं और पाकिस्तान को अस्तित्व में लाने में भी उनकी भूमिका अहम रही। इन रजाकारों को बांग्लादेश का बनना कभी पसंद नहीं आया। शेख मुजीबुर्रहमान भी इनकी आँखों में खटकते थे, क्योंकि पाकिस्तान परस्त लोगों को यह लगता था कि शेख मुजीब ने भारत के साथ मिलकर पाकिस्तान को खंडित किया। इस नफरत की बानगी तब देखने को मिली, जब 15 अगस्त 1975 को बंगबंधु शेख मुजीब की हत्या कर दी गई। यह भी एक अलग इत्तेफाक है कि भारत की आज़ादी के दिन को शेख मुजीब की हत्या के लिए चुना गया। उनकी पार्टी आवामी लीग को भी सदा हिंदू समर्थक होने की दृष्टि से देखा गया।
दो राष्ट्रों का सिद्धांत :
यह बात हर एक को पता है कि पाकिस्तान का जन्म मोहम्मद अली जिन्ना के ‘टू नेशन थ्योरी’ की देन है, जिसके अनुसार हिंदू और मुसलमान दो अलग कौमें हैं, जो कभी एक साथ शांति और भाईचारे से नहीं रह सकते। भारत शुरुआत से ही इस सिद्धांत का विरोध करता आया है। भारत की नीति ‘सर्व धर्म समभाव’ की रही है, जहाँ हर मत और मज़हब का पूरा सम्मान होता है। 1947 से ही भारत और पाकिस्तान में एक प्रतिस्पर्धा चल रही है, जहाँ पाकिस्तान सदा दो राष्ट्रों के सिद्धांत को सिद्ध करने में लगा होता है, तो वहीं दूसरी तरफ भारत यह बताना चाहता है कि उसका समावेशी विचार उचित है। ऐसे में बांग्लादेश की मुक्ति को भी इसी चश्मे से देखा गया, जब इंदिरा गांधी द्वारा यह घोषणा की गई कि भारत ने दो राष्ट्रों के सिद्धांत को बंगाल की खाड़ी में प्रवाहित कर दिया है। गहन विश्लेषण और समकालीन घटनाओं को देखते हुए यह पता लगता है कि यह संपूर्ण सत्य साबित नहीं हुआ। हिंदुओं से घृणा ही पाकिस्तान की नींव है, और बांग्लादेश बनने के बाद भी उस हिस्से में यह घृणा समाप्त होते नहीं दिखती। बांग्लादेश की कुल जनसंख्या में हिंदुओं का 25% से 8% पर आ जाना, उनके ख़िलाफ़ हो रहे दैनिक अत्याचार, बहु-बेटियों की आबरू के साथ खिलवाड़ इस बात की तस्दीक हैं कि बांग्लादेश अल्पसंख्यकों के लिए एक नर्क बनता जा रहा है। नया देश बनने के बावजूद उन हिंदू विरोधी तत्वों का कभी संपूर्ण नाश हुआ ही नहीं, जिन्होंने पाकिस्तान बनवाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टर संस्थान वहाँ फल-फूल रहे हैं, जिनके द्वारा युवाओं को अल्पसंख्यकों के विरुद्ध बरगलाया जाता है।
भारत पर प्रभाव :
बांग्लादेश के अस्तित्व से आज भारत के समक्ष बहुतेरे खतरे दिखाई पड़ते हैं। सीमा पार कर अवैध रूप से भारत में घुस आना, गौ-तस्करी और मानव तस्करी तो दशकों से एक बड़ी समस्या है ही, परंतु वर्तमान बांग्लादेश प्रशासन द्वारा सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) जैसे विषय पर विवादास्पद बयान देना भारत की चिंताओं को और बढ़ाने वाला है। हिंदुओं के विरुद्ध होने वाला हर अत्याचार एक तरीके से दक्षिण एशिया में भारत के प्रभुत्व को एक चुनौती है, क्योंकि बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा भारत की नैतिक जिम्मेदारी है, जिससे हम मुँह नहीं मोड़ सकते। घरेलू राजनीतिक आंदोलन की आड़ में अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार को एक सभ्य समाज कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता। केवल सरकार से उम्मीद करना एक बेइमानी होगी, क्योंकि नागरिक समाज और बुद्धिजीवी वर्ग का भी उतना ही दायित्व है कि वे इस हिंसा और अन्याय के खिलाफ निरंतर आवाज़ उठाएं। बांग्लादेश में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों के विरुद्ध भारतीयों को जिस रूप से विरोध प्रकट करना चाहिए था, वह आज भी देखने को नहीं मिल रहा है। हमें इस ख्याल से निकलना होगा कि वहाँ हो रहे सभी अत्याचार उनके व्यक्तिगत मसले हैं, क्योंकि देर-सबेर इसका भारत पर प्रभाव पड़ना निश्चित है। वैश्विक रूप से भी यदि हम उन मंचों पर मानवाधिकार और शांति की बात करते हैं, तो यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि हम अपने पड़ोस में हो रहे उन अत्याचारों के विरुद्ध निर्णायक कदम उठाएं।
बांग्लादेश में आज जो समस्या दिख रही है, वह नयी नहीं है, क्योंकि उसका एक लंबा इतिहास रहा है, और इस समस्या को हल करने से पहले इसके इतिहास को खंगाल कर जाँचने की आवश्यकता है, क्योंकि बिना जड़ को जाने हम जो भी उपचार करने की कोशिश करेंगे, उसमें विफलता ही हाथ लगेगी। राजनीतिक कारणों से भारतीय उपमहाद्वीप का मानचित्र अवश्य बदल गया हो, परंतु इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि भारत उन देशों में अल्पसंख्यकों के विरुद्ध होने वाले अत्याचार पर चुप रहे। इन विषयों का भारतीय नागरिकों के बीच एक मुद्दा बनना आवश्यक है, ताकि वे अपनी सरकार का इस मसले पर निरंतर मूल्यांकन करते रहें।