भारत की व्यापार नीति का मूल स्वर ‘विनियमित उदारीकरण’ है, यानी एक ऐसी रणनीति जिसमें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंच को बढ़ावा देते हुए घरेलू उद्योगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। इसका सबसे स्पष्ट और सशक्त उदाहरण क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी से भारत का पीछे हटना है, जहाँ वह चीन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों से आने वाले सस्ते उत्पादों की बाढ़ से अपने घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना चाहता था। भारत मानता है कि वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक भागीदारी से निर्यात, निवेश और रोज़गार को बल मिलेगा, लेकिन यह तभी संभव है जब घरेलू उद्योग प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम हों। यही कारण है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में भारत सतर्कता बरत रहा है।
भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच हुआ ‘व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता’ आज वैश्विक चर्चा का केंद्र है। इसका कारण है कि यह समझौता दो अलग-अलग आर्थिक संरचनाओं, एक विकसित (यूके) और एक विकासशील (भारत) अर्थव्यवस्था के बीच हुआ है। इस समझौते के तहत भारत करीब 90% ब्रिटिश वस्तुओं पर टैरिफ़ घटाएगा या समाप्त करेगा, जबकि ब्रिटेन 99% भारतीय उत्पादों को शुल्क मुक्त पहुंच देगा। लेकिन इस आपसी लाभ के आगे यह समझौता उस व्यापक परिवर्तन को भी दर्शाता है जो आज की बदलती वैश्विक व्यापार व्यवस्था का परिचायक है। इस समझौते ने वैश्विक समुदाय को स्पष्ट संदेश दिया है कि वैश्वीकरण अब अपने पारंपरिक रूप से हटकर एक नए स्वरूप की ओर अग्रसर है। बहुपक्षीय व्यापार समझौते, जो कभी विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) जैसे मंचों पर आधारित हुआ करते थे, अब तेजी से क्षेत्रीय और द्विपक्षीय समझौतों में बदलते जा रहे हैं।
असल में इस नव-उदारीकरण की लहर को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक स्तर पर आर्थिक सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से एक बहुपक्षीय व्यापार संगठन की स्थापना का विचार आया। यद्यपि वह प्रस्तावित संगठन मूर्त रूप नहीं ले सका, परंतु 23 देशों ने ‘टैरिफ़ एवं व्यापार पर सामान्य समझौते’ पर हस्ताक्षर किए। इसके अंतर्गत 1994 तक आठ व्यापारिक दौर आयोजित हुए, जिनमें शुल्कों में कटौती और व्यापार नियमों पर आम सहमति बनी। इन सभी दौरों में सबसे निर्णायक रहा उरुग्वे राउंड (1986–94), जिसके तहत न केवल औद्योगिक उत्पादों पर औसत शुल्क दरों में कटौती हुई, बल्कि कृषि सब्सिडी, सेवाओं का व्यापार, कपड़ा-परिधान कोटा और बौद्धिक संपदा जैसे नए क्षेत्रों पर भी वैश्विक नियम तय किए गए। इसके परिणामस्वरूप 1995 में डब्ल्यूटीओ की स्थापना हुई, जिसने वैश्विक व्यापार संचालन को औपचारिक रूप दिया।
हालाँकि 21वीं सदी में विश्व व्यापार संगठन की व्यवस्था आंतरिक मतभेदों, वैश्विक असंतुलनों और धीमी प्रगति के चलते दबाव में आने लगी। वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी, 2015 में विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को केंद्र में रखकर प्रारंभ हुआ ‘दोहा विकास एजेंडा’ का असफल समापन, और फिर कोविड-19 महामारी जैसे झटकों ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को क्षेत्रीय व्यापार समझौतों (आरटीए) की ओर मोड़ दिया। इस बदलाव की पुष्टि आँकड़ों से भी होती है, जहाँ वर्ष 1990 में 50 से भी कम आरटीए प्रभावी थे, वहीं मई 2025 के अंत तक यह संख्या बढ़कर 375 हो चुकी है। यह स्पष्ट संकेत है कि डब्ल्यूटीओ वैश्विक व्यापार में एकीकरण के अपने उद्देश्य में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका। परिणामस्वरूप, आज अधिकांश राष्ट्र आपसी हितों के आधार पर क्षेत्रीय या द्विपक्षीय आधारित उदारीकरण की राह पर है।
हालाँकि, क्षेत्रीय समझौतों के विस्तार में एक जटिल समस्या ‘स्पैगेटी बाउल प्रभाव’ की रही है। क्योंकि, आरटीए के अपने-अपने नियम, रूल्स ऑफ ओरिजिन, और शुल्क संरचनाएं होती हैं जिसके कारण सदस्य देशों के लिए सामंजस्य बैठाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। एक ही उत्पाद पर अलग-अलग समझौतों के तहत विभिन्न नियम लागू होते हैं, जिससे प्रशासनिक जटिलताएं बढ़ती है। इस समस्या से निपटने के लिए बड़े बहुपक्षीय ब्लॉकों की अवधारणा शुरू हुई, जैसे: क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी, समग्र एवं प्रगतिशील ट्रांस-प्रशांत साझेदारी और अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र, जिनका उद्देश्य व्यापार नियमों को एकरूप बनाकर बाधाएं घटाना रहा। लेकिन यह प्रयोग व्यापक परिवर्तन लाता उससे पहले ही अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, यूक्रेन संकट और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में विघटन ने विश्व व्यापर के नियम फिर बदल दिए। इन झटकों ने वैश्विक व्यापार की रफ्तार धीमी कर दी और दुनिया ‘धीमी वैश्वीकरण’ का शिकार हो गयी। ट्रेड ब्लाक की जगह विश्व व्यापार व्यवस्था छोटे और ‘मॉड्यूलर’ द्विपक्षीय सौदों की तरफ बढ़ गयी। आज अमेरिका से लेकर एशिया और यूरोप तक, ऐसे लचीले व्यापार समझौते तेजी से हो रहे हैं। इनकी विशेषता यह है कि ये केवल शुल्क कटौती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रौद्योगिकी, निवेश, रक्षा आपूर्ति, और नीति समन्वय जैसे अहम क्षेत्रों को भी समाहित कर रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प कि भाषा में इसे ‘डील-आधारित’ व्यापार नीति के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है, जहाँ देश प्रत्येक साझेदार के साथ अलग-अलग और लचीली रणनीति के तहत समझौते हो रहे हैं।
नए दौर का वैश्वीकरण
आज के वैश्विक व्यापार समझौते पारंपरिक वैश्वीकरण लहर से काफी भिन्न हैं। जहाँ पहले मुक्त व्यापार ‘तुलनात्मक लाभ के सिद्धांत’ पर आधारित था, वह आज रणनीतिक हितों, आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा, तकनीकी नियमों और पर्यावरणीय मानकों पर ज्यादा आधारित है। तुलनात्मक लाभ का सिद्धांत कहता है कि प्रत्येक देश को उन उत्पादों में विशेषज्ञता लेनी चाहिए, जिनमें वह अपेक्षाकृत दक्ष है, और अन्य वस्तुएँ आयात करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, भारत के संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए समझौतों से तेल, कोयला जैसे कच्चे माल का आयात सस्ता हुआ और भारत के दक्ष कपड़ा, रत्न, फार्मा जैसे क्षेत्रों का निर्यात बढ़ा। हालाँकि इस सिद्धांत के अनुपालन से कुछ घरेलू उद्योग प्रतिस्पर्धा में पिछड़ते हैं, जिससे दबाव बढ़ता है, नौकरियाँ जाती हैं, और सामाजिक-आर्थिक असंतुलन उत्पन्न होता है। इसे ऐसे समझिए कि भारत ने किसी देश के साथ ऐसा व्यापार समझौता किया जो स्टील उतपादन में दक्ष था। इससे हुआ ये कि उस देश से सस्ते स्टील का आयात बड़ी मात्रा में भारत आने लगा। अब चूंकि वह स्टील सस्ता है, तो भारतीय कंपनियाँ और उपभोक्ता उसी का उपयोग करने लगे। इससे भारत के छोटे और मध्यम स्तर के घरेलू स्टील निर्माता प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएं। उनका उत्पादन घटा, यूनिट बंद हो गई, और बड़ी संख्या में नौकरियाँ चली गयीं। इसलिए आज अधिकांश व्यापार समझौतों में सभी पक्षों की ताकत और कमज़ोरी को संतुलित करने की कोशिश की जाती है, ताकि ऐसा असंतुलन सीमित हो और समझौते टिकाऊ बन सकें। उदाहरण के लिए, भारत-यूके समझौते में भारत ने ऑटो क्षेत्र में सीमित रियायतें दीं, जबकि ब्रिटेन ने वस्त्र और परिधान क्षेत्र में।
इसलिए आज व्यापार समझौतों में केवल आर्थिक दक्षता नहीं, बल्कि सामरिक हित, औद्योगिक संरक्षण और आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा भी केंद्रीय भूमिका में हैं। यही ‘सामरिक व्यापार सिद्धांत’ है जो कहता है कि समझौतों के बीच देशों को रणनीतिक क्षेत्रों, उच्च तकनीक या पूंजी गहन उद्योगों में सब्सिडी और टैरिफ़ के ज़रिए अपने उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बनाये रखना चाहिए। उदहारण के लिए भारत सभी मुक्त व्यापार समझौतों में रणनीतिक उद्योगों को समायोजन समय देने के लिए चरणबद्ध शुल्क कटौती, सेफ़गार्ड प्रावधान, और सख्त मूल-उत्पाद नियमों को शामिल कर रहा है। कोविड-19, यूक्रेन संकट और रेयर अर्थ मटेरियल संकट जैसे अनुभवों ने दुनिया को सिखाया है कि व्यापार में सिर्फ न्यूनतम लागत नहीं बल्कि आपूर्ति की विश्वसनीयता भी उतना ही आवश्यक है। यही कारण है कि अब देशों के बीच ‘सप्लाई चेन रेजिलिएंस’ और ‘डिजिटल संप्रभुता’ जैसे शब्द व्यापार वार्ताओं के मुख्य विषय बन गए हैं।
बदलते वैश्विक व्यापार में भारत की स्थिति
भारत की व्यापार नीति का मूल स्वर ‘विनियमित उदारीकरण’ है, यानी एक ऐसी रणनीति जिसमें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंच को बढ़ावा देते हुए घरेलू उद्योगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। इसका सबसे स्पष्ट और सशक्त उदाहरण क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी से भारत का पीछे हटना है, जहाँ वह चीन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों से आने वाले सस्ते उत्पादों की बाढ़ से अपने घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना चाहता था। भारत मानता है कि वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक भागीदारी से निर्यात, निवेश और रोज़गार को बल मिलेगा, लेकिन यह तभी संभव है जब घरेलू उद्योग प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम हों। यही कारण है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में भारत सतर्कता बरत रहा है। वह कृषि, डेयरी और छोटे उद्योगों के हितों से समझौता करने को तैयार नहीं है। भारत का यह दृष्टिकोण न तो पूर्ण संरक्षणवाद है और न ही अंध उदारीकरण, बल्कि यह एक परिपक्व, संतुलित और भारत-केंद्रित मुक्त व्यापार नीति का परिचायक है। वर्तमान में भारत यूरोपीय संघ, अमेरिका, कनाडा, ओमान, कतर और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों के साथ वार्ताओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है, जो इस रणनीति की व्यावहारिकता पर ही आगे बढ़ रहा है।
आज वैश्विक व्यापार संरचना में परिवर्तन के इस दौर में भारत के सामने एक ऐतिहासिक अवसर है कि वह वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन का लाभ उठाकर एक नई विनिर्माण शक्ति के रूप में उभरे। इसके लिए आवश्यक है कि भारत बहुपक्षीय, लचीली और संतुलित नीति को अपनाए, जिसमें दीर्घकालिक रणनीति और अल्पकालिक व्यावहारिकता का समन्वय हो। हालाँकि, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित न रहे, बल्कि छोटे और मझोले उद्यमी भी उन्हें समझें और उनका उपयोग कर सकें। साथ ही, भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में चरणबद्ध उदारीकरण की दिशा में बढ़ना होगा। वर्तमान में ऐसे क्षेत्र ऊँचे टैरिफ़ से घरेलू बाजार में तो सुरक्षित हैं, पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा और नवाचार से दूर हैं। भारत की नीति अब ‘गतिशील संरक्षणवाद’ की होनी चाहिए, अर्थात् जब तक घरेलू उद्योग तैयार न हो जाएं, तब तक उन्हें संरक्षण देना और जैसे-जैसे वे सक्षम हों, वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए उन्हें आगे बढ़ाना। भारत आज उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ वह अपने संतुलित दृष्टिकोण और दूरदर्शिता से न केवल स्वयं को, बल्कि वैश्विक व्यापार को भी एक नई दिशा देने में सक्षम हो सकता है।