भगवा ध्वज व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ | RSS@100

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दुनिया में प्रति वर्ष लाखों सामाजिक संस्थाएं बनती हैं। इनका जीवन दो-चार से लेकर दो-चार सौ वर्ष तक हो सकता है। अधिकांश संस्थाएं अपने संस्थापकों के बच्चों में विभाजित हो जाती है। कुछ भवन और कोष के अदालती विषयों में पड़कर चलती जैसी दिखाई देती हैं, पर काम के नाम पर वहां कुछ नहीं होता। कुछ संस्थाएं केवल देशी-विदेशी चंदे के लिए ही बनती हैं। ऐसी संस्थाएं, संगठन, न्याय, फाउंडेशन आदि हर शहर में छपने मात्र से उनके जीवित होने का पता लगता है। इसके विपरीत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम और कार्य लगातार बढ़ता रहा है। संघ अपने जन्मशताब्दी वर्ष में पूरे वर्ष कुछ विशेष कार्यक्रम करेगा। ये विशेष कार्यक्रम व आयोजन एक ध्वज को साक्षी मानकर होगे ओर संघ में यह होता आ रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा ध्वज ही प्रमुख है। भगवा ध्वज सभी स्वयंसेवकों के लिए गुरु के समान है। प्रति वर्ष संघ के प्रमुख छः उत्सवों में गुरूपूर्णिमा के दिन भगवा ध्वज का पूजन व गुरु दक्षिणा के रूप में समर्पण राशि का सहयोग प्रमुख उत्सव रहता है। यहां भगवा ध्वज को संघ का प्रमुख होना सनातन धर्म का प्रतिक है। क्योंकि सनातन धर्म में भगवा ध्वज ही प्रमुख ध्वज के रूप में  मान्य रहा है और सनातन धर्म व संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीन प्रमुख स्तम्भ है- विचार, कार्यक्रम और कार्यकर्ता। ये तीनों स्तम्भ भगवा ध्वज को अपना गुरु मानकर सभी कार्यों व सिद्धांतों को पूर्ण करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय भगवा ध्वज को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसके पीछे मूल भाव यह था कि व्यक्ति पतित हो सकता है पर विचार और पावन प्रतीक नहीं। विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन गुरु रूप में इसी भगवा ध्वज को नमन करता है। पर्वों, त्योहारों और संस्कारों की भारतभूमि पर गुरु का परम महत्व माना गया है। गुरु शिष्य की ऊर्जा को पहचानकर उसके संपूर्ण सामर्थ्य को विकसित करने में सहायक होता है।उल्लेखनीय है कि इस भगवा ध्वज को गुरु की मान्यता यूं ही नहीं मिली है। यह ध्वज तपोमय व ज्ञाननिष्ठ भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक सशक्त व पुरातन प्रतीक है। उगते हुये सूर्य के समान इसका भगवा रंग भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक ऊर्जा, पराक्रमी परंपरा एवं विजय भाव का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है। संघ ने उसी परम पवित्र भगवा ध्वज को गुरु के प्रतीक रूप में स्वीकार किया है जो कि हजारों वर्षों से राष्ट्र और धर्म का ध्वज था। इसलिए संघ ने अपने गुरु स्थान पर भगवा ध्वज को स्थापित किया है। भगवा ध्वज त्याग, समर्पण का प्रतीक है। स्वयं जलते हुए सारे विश्व को प्रकाश देने वाले सूर्य के रंग का प्रतीक है। संपूर्ण जीवों के शाश्वत सुख के लिए समर्पण करने वाले साधु, संत भगवा वस्त्र ही पहनते हैं, इसलिए भगवा, केसरिया त्याग का प्रतीक है। अपने राष्ट्र जीवन के, मानव जीवन के इतिहास का साक्षी यह ध्वज है। यह शाश्वत है, अनंत है, चिरंतन है।

भगवा ध्वज को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यूहीं नहीं अपना गुरु प्रतिक बनाया था। इसके पीछे भगवा ध्वज की सनातन परंपरा व कालजयी प्रासंगिकता है। सनातन धर्म में भगवा ध्वज का बहुत महत्व है। यह त्याग, बलिदान, साहस, और धार्मिकता का प्रतीक है। यह न केवल एक रंग है, बल्कि यह एक गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता का भी प्रतीक है। भगवा ध्वज, हिन्दू संस्कृति और बौद्ध संस्कृती एवं धर्म का शाश्वत प्रतीक है। यही ध्वज सभी मंदिरो, आश्रमों में लगाया जाता है।छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना का यही ध्वज था।प्रभु श्री राम, भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के रथों पर यही ध्वज लहराता था। छत्रपति शिवाजी के अनुसार ध्वज का भगवा रंग उगते हुए सूर्य का रंग है; अग्नि की ज्वालाओ का रंग है। उगते सूर्य का रंग और उसे ज्ञान, वीरता का प्रतीक माना गया और इसीलिए हमारे पूर्वजों ने इसे सबका प्रेरणा स्वरूप माना। 19वीं और 20वीं शताब्दी में, भगवा ध्वज को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में आत्मसात किया गया था। यह ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता की लड़ाई में लोगों को प्रेरित करने और एकजुट करने का काम करता था।

भगवा ध्वज के इन्हीं ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व को ध्यान में रखकर व संपूर्ण रूप से विचार कर संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने भगवा ध्वज को स्वयंसेवकों का गुरु मान्य किया-प्रेरणापुंज के रूप में स्थापित किया।

इस वर्ष जब संघ अपने सौ वर्ष पूर्ण करने जा रहा है तो यह भगवा ध्वज ना सिर्फ स्वयंसेवकों के लिए अपितु संपूर्ण सनातन धर्म व संस्कृति के मानने वालों के लिए गर्व व हर्ष का विषय है। यह पूरे विश्व के लिए संदेश व प्रेरणा का प्रतीक बन गया है कि कैसे एक ध्वज इतने बड़े संगठन के लिए सबसे बड़े व मजबूत स्तम्भ का कार्य कर रहा है। इसे लेकर अब तक कोई विवाद नहीं। सबके लिए प्रेरणा व मार्गदर्शन का प्रतीक। प्राचीन काल से लेकर अब तक कितने ही साम्राज्यों, राज्यों, रियासतों, संगठनों, संस्थाओं आदि ने भगवा ध्वज को अपना प्रमुख प्रतीक व प्रेरणा स्त्रोत माना है। संघ के महाराष्ट्र प्रांत के कार्यवाह नारायण हरि पालकर ने मराठी में एक पुस्तक लिखी-‘भगवा ध्वज’ जो 1958 में प्रकाशित हुई थी। पालकर के अनुसार, सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह ने जब हिंदू धर्म की रक्षा के लिए हजारों सिख योद्धाओं की फौज का नेतृत्व किया, तब उन्होंने केसरिया झंडे का इस्तेमाल किया। यह ध्वज हिंदुत्व के पुनर्जागरण का प्रतीक है। इस झंडे से प्रेरणा लेते हुए महाराजा रणजीत सिंह के शासन काल में सिख सैनिकों ने अफगानिस्तान के काबुल-कंधार तक को जीत लिया था। उस समय सेनापति हरि सिंह नलवा ने सैनिकों का नेतृत्व किया था। पालकर ने लिखा है कि जब राजस्थान पर मुगलों का हमला हुआ, तब राणा सांगा और महाराणा प्रताप के सेनापतित्व में राजपूत योद्धाओं ने भी भगवा ध्वज से वीरता की प्रेरणा लेकर आक्रमणकारियों को रोकने के लिए ऐतिहासिक युद्ध किए। छत्रपति शिवाजी और उनके साथियों ने मुगल शासन से मुक्ति और हिंदू राज्य की स्थापना के लिए भगवा ध्वज की छत्रछाया में ही निर्णायक लड़ाइयां लड़ीं।

जहां शताब्दी वर्ष में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के गांव-गांव में पहुंच गया है और विदेशों में संघ संगठन अपने सामाजिक व मानव कल्याण के कार्य कर रहा है, इसके पीछे भगवा ध्वज स्वयंसेवकों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरणा है। वर्तमान में भारत में ही संघ की लगभग 75 हजार से ज्यादा शाखाएं, लाखों की संख्या में स्वयंसेवक व अन्य महत्वपूर्ण संगठन जो समाज कल्याण व राष्ट्र निर्माण में दिन-रात लगे रहते है। संघ के शताब्दी वर्ष आते-आते करीब तीन पीढ़ियों ने भगवा ध्वज को गुरु मानकर कार्य किया है। हजारों स्वयंसेवकों ने आजीवन अविवाहित रहकर समाज व मानव कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। सनातन धर्म व संस्कृति के सबसे बड़े प्रतीक भगवा(केसरिया) ध्वज  त्याग, तपस्या, ज्ञान, समर्पण, शौर्य व साहस की भावना ही संघ व स्वयंसेवकों के लिए सर्वोपरि है। ये ही तत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्वर्णिम सौ वर्ष की यात्रा के मुख्य मंत्र है व भगवा ध्वज का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रगाढ़ संबंध।


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Bhupendra Bhartiya

Bhupendra Bhartiya is an accomplished advocate and law faculty member from Dewas, Madhya Pradesh, with an impressive academic background in law (LL.B (Hons.), LL.M, M.Phil). A prolific writer, he has a deep interest in contemporary issues, poetry, and satire, with over 200 satirical pieces published in leading national and international publications like Nai Dunia, Dainik Jagran, and Amar Ujala. Additionally, his contributions include over two dozen published poems and book reviews, reflecting his versatile literary talent.

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