बीते महीने देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन किया। तकरीबन 36,230 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित 594 किलोमीटर लम्बे इस छह-लेन एक्सप्रेसवे से मेरठ से प्रयागराज की यात्रा, जो कभी 10-12 घंटे में पूरी होती थी अब घटकर लगभग 6 घंटे हो गयी है। लेकिन यह परियोजना केवल यात्रा समय कम करने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक महत्व इससे कहीं अधिक व्यापक है। इससे माल परिवहन की लागत घटेगी, आपूर्ति शृंखला तेज होगी, और इससे जुड़े इलाकों में औद्योगिक कॉरिडोर निर्माण से स्थानीय विकास और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। एक फायदा यह भी होगा कि किसानों को अपने उत्पाद बड़े शहरों और निर्यात बाजारों तक शीघ्र पहुंचाने का अवसर मिलेगा। अर्थात, यूपी जैसे विशाल राज्य के लिए यह एक महत्वपूर्ण ‘सप्लाई-साइड ट्रांसफॉर्मेशन’ है। लेकिन इसके बावजूद ऐसी बड़ी परियोजनाओं को लेकर कई स्वाभाविक और गंभीर प्रश्न उठते रहते हैं। पहला सवाल इसकी बड़ी लागत और उससे मिलने वाले संभावित आर्थिक प्रतिफल का है। दूसरा प्रश्न यह है कि आखिर एक्सप्रेसवे अर्थव्यवस्था में बदलता क्या है? और तीसरा प्रश्न कि राज्यों को इसकी आवश्यकता क्यों है?

इन सवालों के जवाब के जवाब के लिए हमें अमेरिका की हाईवे निति को समझना होगा। जब 1956 में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ने ‘इंटरस्टेट हाईवे एक्ट’ पर हस्ताक्षर किए, तब कई आलोचकों ने इसे ‘कंक्रीट पर फिजूलखर्ची’ कहकर खारिज कर दिया था। लेकिन महज एक दशक के भीतर तकरीबन 65,000 किमी लंबे उस राजमार्ग नेटवर्क ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल दी। इस परियोजना ने अपने निवेश की लागत से दोगुना अधिक आर्थिक योगदान दिया था। आज भी यह बात कही जाती है कि अमेरिका महाशक्ति इसलिए नहीं बना कि उसके पास विशाल उद्योग थे, बल्कि इसलिए बना क्योंकि उसके पास उन उद्योगों, शहरों और बाजारों को जोड़ने वाला विश्वस्तरीय हाईवे नेटवर्क था।
क्यों जरुरी है ‘तेज आपूर्ति शृंखला’?
आर्थिकी के अध्यन में धीमी सड़कों को एक अदृश्य टैक्स (फ्रिक्शन कॉस्ट) की तरह देखा जाता है। यह वह लागत है, जो उत्पादन और उपभोग के बीच की दूरी तय करने में लगती है; यानी किसी वस्तु को कारखाने, खेत या गोदाम से उपभोक्ता तक पहुंचाने की कीमत। दशकों तक भारत इसी फ्रिक्शन के महंगे बोझ तले दबा रहा। एक समय में देश की लॉजिस्टिक्स कॉस्ट जीडीपी के 13-14 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जो अमेरिका और यूरोप की तुलना में लगभग दोगुनी थी। इसका सीधा अर्थ था कि हर 100 रुपये के माल में 13-14 रुपये केवल परिवहन, भंडारण और सप्लाई चेन की अक्षमताओं में खर्च हो रहे थे।
लेकिन मोदी सरकार ने इस स्थिति को बदल दिया है। कभी भारत में राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण की रफ्तार बेहद धीमी थी। वर्ष 2013-14 में राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण औसतन करीब 12 किलोमीटर प्रतिदिन हो रहा था। आज यह गति बढ़कर लगभग 34-37 किलोमीटर प्रतिदिन के स्तर तक पहुंच चुकी है। इस परिवर्तन के केंद्र में ‘भारतमला’ जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना है। वर्ष 2017 में शुरू की गई लगभग 5.35 लाख करोड़ रुपये की इस महायोजना के तहत 34,800 किलोमीटर लंबे सड़क नेटवर्क का निर्माण हो रहा है जो देश के प्रमुख आर्थिक गलियारों, औद्योगिक केंद्रों, सीमावर्ती क्षेत्रों और बंदरगाहों को जोड़ रहा है।
सड़कों के साथ-साथ रेल आधारित माल परिवहन में भी भारत ने बड़ा कदम उठाया है। ‘डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर’ ने देश की सप्लाई चेन को नई ताकत दी है। इन कॉरिडोरों पर मालगाड़ियों की यात्रा अवधि में भारी कमी आई है, जहां पहले माल ढुलाई में 60 घंटे या उससे अधिक लगते थे, वहीं अब यह समय घटकर लगभग 35-38 घंटे तक आ गया है। इसके साथ पीएम गतिशक्ति और सागरमाला जैसी पहलें बंदरगाहों, औद्योगिक केंद्रों और आंतरिक बाजारों के बीच बेहतर तालमेल बना रही हैं। नतीजतन वर्तमान में भारत की लॉजिस्टिक्स कॉस्ट घटकर लगभग 7.97 प्रतिशत तक आ गई है। यह निश्चित रूप से एक बड़ा सुधार है।
सड़क और उद्योग का सम्बन्ध
‘इन्फ्रास्ट्रक्चर इकोनॉमिक्स’ में व्यापक रूप से स्थापित सिद्धांत है कि जहां उच्च गुणवत्ता वाला परिवहन गलियारा बनता है, उसके आसपास आर्थिक गतिविधयां स्वतः आकार लेने लगती हैं। आमतौर पर देखा गया है कि किसी बड़े हाई-क्वालिटी कॉरिडोर के 30 से 50 किलोमीटर के दायरे में धीरे-धीरे इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स विकसित होने लगते हैं, जिनमें विभिन्न तरह के उपक्रम स्थापित होते हैं। इस प्रक्रिया को अर्थशास्त्र में ‘एग्लोमरेशन इकोनॉमीज’ कहा जाता है। यह सिद्धांत कहता है कि जब कई फर्म्स एक-दूसरे के निकट स्थापित होते हैं, तो वे साझा संसाधनों, प्रशिक्षित श्रमबल और ज्ञान के आदान-प्रदान से सामूहिक लाभ पाते हैं। इससे उत्पादन लागत घटती है, दक्षता बढ़ती है और नवाचार की गति तेज होती है। यही कारण है कि एक उद्योग के आने के बाद दूसरा उद्योग आता है, फिर तीसरा और देखते ही देखते एक पूरा इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम विकसित हो जाता है।
इसके अतिरिक्त आधुनिक अर्थव्यवस्था में माल का प्रवाह ही पूंजी का प्रवाह है। किसी वस्तु का एक स्थान से दूसरे स्थान तक तेजी से पहुंचाना केवल व्यापारिक सुविधा नहीं, बल्कि आर्थिक दक्षता का मूल आधार है। उदाहरण के लिए, वाराणसी का एक उद्यमी जो बनारसी साड़ी बनाकर कोलकाता के बाजार में बेचना चाहता है, उसके लिए परिवहन में लगने वाला हर अतिरिक्त दिन उसकी वर्किंग कैपिटल पर पड़ने वाला अनचाहा ब्याज है। माल रास्ते में जितना अधिक समय बिताएगा, पूंजी उतने ही लंबे समय तक फंसी रहेगी। लेकिन यदि वही डिलीवरी साइकिल कम हो जाए तो तस्वीर बदल जाती है। इसका सीधा अर्थ है कि वही उद्यमी एक अतिरिक्त खेप बाजार तक पहुंचा सकता है। अब सोचिए जब यह लाभ हजारों उद्यमों और लाखों कारोबारियों तक पहुंचता है, तब यह केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं रहता बल्कि एक पूरे क्षेत्र की रीजनल प्रोडक्टिविटी को नई उंचाई देता है। उदाहरण के लिए वर्ष 1999 में स्वर्ण चतुर्भुज परियोजना शुरू हुई थी, जिसने दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को आधुनिक राजमार्ग नेटवर्क से जोड़ा था। आज इस नेटवर्क से जुड़े जिलों में औद्योगिक उत्पादन में लगभग 49 प्रतिशत की वृद्धि और नए उद्यमों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है।
दुनिया के अनुभव भी इसी दिशा की पुष्टि करते हैं। चीन ने जब अपना विशाल एक्सप्रेसवे नेटवर्क विकसित किया, तो उसका सबसे बड़ा लाभ उन क्षेत्रों को मिला, जो पहले मुख्य आर्थिक धारा से कटे हुए थे। उदाहरण के लिए, हेनान, आनहुई, हुबेई और सिचुआन जैसे प्रांत जो कभी चीन के तटीय औद्योगिक क्षेत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत पिछड़े माने जाते थे, बेहतर कनेक्टिविटी मिलने के बाद तेजी से उभरे। आर्थिक शोध बताते हैं कि इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निवेश का प्रतिफल, विशेषकर पिछड़े क्षेत्रों में, कहीं अधिक बड़ा और व्यापक होता है। अर्थशास्त्री अल्फ्रेड मार्शल कहते थे कि अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति ‘फ्रिक्शन’ को कम करने में है। आज यूपी के तर्ज पर अन्य राज्यों को भी तेज कनेक्टिविटी पर काम करना चाहिए। क्योंकि भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह में सिर्फ यूपी ही नहीं बल्कि हर राज्य कि भूमिका निर्णायक है। केंद्र के साथ समनव्य में राज्यों को ऐसे प्रोजेक्ट पर काम करना चाहिए जो देश में आर्थिक गतिविधियों को तेज करें।
राज्य बनाएं एक्सप्रेस इकोनॉमी का मॉडल
गंगा एक्सप्रेसवे पर लगभग 36,230 करोड़ रुपये का निवेश केवल एक सड़क परियोजना पर हुआ खर्च नहीं है, बल्कि यह राज्य की आर्थिक दिशा तय करने वाली एक बड़ी वित्तीय प्रतिबद्धता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या इतने बड़े निवेश का प्रतिफल भी उतना ही बड़ा होगा। इसका उत्तर केवल सड़क की लंबाई, लेन की चौड़ाई या यात्रा समय में कमी से नहीं मिलता; इसका उत्तर इस बात में छिपा है कि राज्य इस इन्फ्रास्ट्रक्चर को किस हद तक आर्थिक गतिविधियों में बदल पाता है। आर्थिक इतिहास बताता है कि सड़कें अपने आप विकास नहीं लातीं, बल्कि वे विकास के लिए मंच तैयार करती हैं। अमेरिका में इंटरस्टेट हाईवे सिस्टम के बाद जो आर्थिक उछाल आया, उसके पीछे केवल चौड़ी सड़कें नहीं थीं; उसके साथ अर्बन जोनिंग रिफॉर्म्स, मजबूत इंडस्ट्रियल पॉलिसी और निजी निवेश को प्रोत्साहित करने वाला सक्षम इन्वेस्टमेंट इकोसिस्टम भी था। इसी तरह चीन के एक्सप्रेसवे नेटवर्क ने इसलिए असाधारण परिणाम दिए, क्योंकि वहां एक मजबूत मैन्युफैक्चरिंग बेस पहले से मौजूद था।
इसलिए किसी भी बड़ी परियोजना की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना ‘स्टेट कैपेसिटी’ है, यानी राज्य की वह क्षमता, जो किसी बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश को उद्योग, निवेश और रोजगार में बदल सके। उदाहरण के लिए यूपी में सरकार पूर्वांचल, बुंदेलखंड और गंगा एक्सप्रेसवे के किनारे इंडस्ट्रियल टाउनशिप्स, लॉजिस्टिक्स पार्क्स, वेयरहाउसिंग क्लस्टर्स और लिंक हाईवे नेटवर्क पर तेजी से काम कर रही है। राज्य का लक्ष्य इसे केवल सड़क बनाना नहीं, बल्कि आर्थिक गलियारे में बदलना है।
इसलिए अन्य राज्यों को भी यदि सचमुच परिवर्तनकारी मॉडल बनाना है, तो कुछ स्पष्ट नीतिगत कदम उठाने होंगे। पहली जरूरत लैंड एक्विजिशन रिफॉर्म की है। भूमि अधिग्रहण को केवल मुआवजे का विषय न मानकर ‘प्री-एम्प्टिव लैंड बैंकिंग’ और किसानों को दीर्घकालिक लाभ में हिस्सेदारी देने वाले मॉडल से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि वे विकास के साझेदार बनें। दूसरी जरूरत इंडस्ट्रियल कॉरिडोर प्लानिंग की है। एक्सप्रेसवे के किनारे उद्योग अपने आप नहीं आते; उनके लिए स्पष्ट इन्वेस्टमेंट रोडमैप, बिजली-पानी जैसी आधारभूत सुविधाएं , नियामकीय सरलता और तेज प्रशासनिक मंजूरियां सुनिश्चित करनी होंगी। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम ‘मल्टीमॉडल इंटीग्रेशन’ का है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में सड़क, रेल, जलमार्ग और वायु परिवहन का एकीकृत नेटवर्क ही वास्तविक लॉजिस्टिक्स एफिशिएंसी पैदा करता है। देशभर में बन रहे मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क्स इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हैं, जिन्हें राज्यों की आर्थिक रणनीति का केंद्र बनाना चाहिए। तभी सड़कें सचमुच समृद्धि की राह बन सकेंगी।