तीसरे विश्व युद्ध की नींव रखतीं अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियां

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अब तो अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने खुले तौर पर घोषणा कर दी है कि ब्रिक्स संगठन के सक्रिय सदस्य देशों – भारत, रूस, ब्राजील एवं चीन – एवं कुछ अन्य देशों पर 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाया जा सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने एक प्रस्ताव पर अपने हस्ताक्षर करते हुए इसे अमेरिकी संसद में पारित कराने हेतु भेज दिया है। दरअसल अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में कुछ याचिकाएं लम्बित हैं जिनमें डॉनल्ड ट्रम्प द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका में होने वाले उत्पादों के आयात पर लागू किए गए टैरिफ को चुनौती दी गई है। संभवत: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपना निर्णय दिनांक 9 जनवरी 2025 को दिया जा सकता है। यदि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ट्रम्प के खिलाफ आता है तो ट्रम्प अपने पास टैरिफ को लागू करने सम्बंधी अधिकार को सुरक्षित रखना चाहते हैं इसीलिए उन्होंने 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाए जाने सम्बंधी प्रस्ताव अमेरिकी संसद में पेश किया है। घोषित तौर पर तो ट्रम्प द्वारा भारत और चीन द्वारा अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले उत्पादों पर टैरिफ इसलिए लगाया जा रहा है क्योंकि यह दोनों देश रूस से भारी मात्रा में कच्चे तेल का आयात कर रहे हैं और इस संदर्भ में ट्रम्प द्वारा दी जा रही चेतावनियों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। परंतु, वास्तव में ट्रम्प ब्रिक्स संगठन के सदस्य देशों, विशेष रूप से भारत, रूस, ब्राजील एवं चीन से बहुत परेशान है, क्योंकि यह देश अमेरिकी डॉलर को चुनौती देते हुए नजर आ रहे हैं। साथ ही, यह देश अपने विदेशी व्यापार के भुगतान को अमेरिकी डॉलर के स्थान पर अपनी अपनी मुद्राओं में करने को प्रोत्साहन दे रहे हैं। ब्रिक्स संगठन के सदस्य देशों के बीच होने वाले व्यापार के भुगतान का निपटान करने हेतु ब्रिक्स मुद्रा को लाने का प्रयास भी इन देशों द्वारा किया जा रहा है। इससे निश्चित ही वैश्विक स्तर पर डीडोलराईजेशन की प्रक्रिया तेज होगी। इससे अमेरिका की चौधराहट पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। अतः ट्रम्प उक्त चारों देशों से बहुत अधिक नाराज है एवं इन चारों देशों को सबक सिखाना चाहते है।

परंतु, अब ट्रम्प को वैश्विक स्तर पर हो रहे विभिन्न घटनाक्रमों को गम्भीरता से लेने की आवश्यकता है। भारत, रूस, ब्राजील एवं चीन आज विश्व के शक्तिशाली देशों की सूची में शामिल हैं। यह देश वेनेजुएला जैसे छोटे देश नहीं हैं जिन पर ट्रम्प अपना अधिकार एवं अपनी चौधराहट जता पाए। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उनकी पत्नी सहित ट्रम्प की सेना द्वारा रात्रि को सोते समय गिरफ्तार कर अमेरिका में ले जाया गया है। इसके बाद से ट्रम्प द्वारा यह बयान दिया जा रहा है कि वेनेजुएला स्थित तेल के कुओं से कच्चे तेल के भंडार को अब अमेरिकी कम्पनियों द्वारा निकाला जाएगा एवं इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचा जाएगा और इस व्यवहार से होने वाले लाभ पर अमेरिका एवं वेनेजुएला का अधिकार होगा। यह तो संप्रुभता सम्पन्न राष्ट्र के अधिकारों का सीधा सीधा हनन है। वास्तव में अमेरिका की वेनेजुएला में कच्चे तेल एवं मूल्यवान खनिज पदार्थों के भंडार पर नजर है एवं इन्हें वह अपने कब्जे में लेना चाहता है इसीलिए वेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर अमेरिका में लाया गया है और उन पर मुकदमा चलाया जा रहा है। इसी प्रकार, अब ग्रीनलैंड नामक द्वीप जिस पर इस समय डेनमार्क का अधिकार है, को भी अमेरिका अपने कब्जे में लेना चाहता है। अमेरिका के पास पहिले से ही ग्रीनलैंड में एक सैन्य अड्डा “पिटुफिक स्पेस बेस” है। परंतु, ट्रम्प यह पूरा द्वीप ही अमेरिकी कब्जे में लाना चाहते हैं क्योंकि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इस द्वीप की उन्हें जरूरत है। वेनेजुएला को हथियाने के तुरंत बाद ट्रम्प ने वेनेजुएला के पश्चिमी पड़ौसी देश कोलम्बिया जहां तेल के विशाल भंडार है तथा सोना, चांदी, पन्ना प्लेटिनम और कोयले की भारी मात्रा में खदाने हैं, को भी चेतावनी दे दी है कि सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर इतनी सख्ती नहीं की जानी चाहिए कि प्रदर्शन करने वाले नागरिकों की मौत ही हो जाए। अन्यथा, अमेरिका को इस स्थिति से निपटने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। ईरान भी इस समय बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों का सामना कर रहा है और ट्रम्प ने ईरान को भी चेतावनी दे डाली है कि ईरान में अगर और अधिक प्रदर्शनकारियों की मौत हुई तो अमेरिका को कठोर जवाब देना होगा।

मेक्सिको पर भी अमेरिका की टेड़ी दृष्टि पड़ रही है और अमेरिका का सोचना है कि मेक्सिको से अमरीका में ड्रग्स एवं अवैध अप्रवासियों का आना जारी है। अमेरिका का कहना है कि इसे यदि मेक्सिको प्रशासन द्वारा रोका नहीं गया तो अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। ज्ञातव्य हो कि वर्ष 2025 में अपने दूसरे कार्यकाल के पहिले दिन ही ट्रम्प ने “गल्फ आफ मेक्सिको” का नाम बदलकर “गल्फ आफ अमेरिका” करने के लिए एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। वर्ष 2016 में अपने पहिले कार्यकाल के दौरान भी ट्रम्प ने मेक्सिको के साथ दक्षिणी सीमा पर एक दीवार बनाने का बयान दिया था।

क्यूबा के वेनेजुएला के साथ घनिष्ठ सम्बंध रहे हैं। वेनेजुएला द्वारा कथित तौर पर क्यूबा को लगभग 30 प्रतिशत तेल की आपूर्ति की जाती रही है, इसके बदले में क्यूबा, वेनेजुएला को डॉक्टर एवं चिकित्साकर्मी उपलब्ध कराता रहा है। क्यूबा, फ्लोरिडा (अमेरिका) से केवल 90 मील दक्षिण स्थित द्वीप है और 1960 के दशक की शुरुआत से ही अमेरिकी प्रतिबंधों को झेल रहा है। परंतु, अब क्यूबा, वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के पश्चात, तेल की आपूर्ति ठप्प होने के चलते मुश्किलों से घिर गया है और इसे अब अमेरिका पर निर्भर रहना ही होगा।

संयुक्त राज्य अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियां लम्बे समय से चली आ रही है एवं अमेरिका अभी तक के अपने इतिहास में अन्य देशों पर हस्तक्षेप जैसे सैकड़ों मामलों में शामिल रहा है। वर्ष 1776 से वर्ष 2026 के बीच अमेरिका लगभग 400 हस्तक्षेपों में शामिल रहा है। इसमें से लगभग 200 हस्तक्षेप वर्ष 1950 के बाद के खंडकाल में हुए हैं। वर्तमान समय में भी अमेरिका 5 अलग अलग युद्धों में सार्वजनिक रूप से ज्ञात सैन्य अभियानों में शामिल है। सोमालिया, सीरिया और यमन में हो रहे युद्धों में अमेरिका अपने आप को, आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में शामिल होना बताता है और वेनेजुएला में मादक पदार्थों के खिलाफ युद्ध में शामिल होना बताता है। इसी प्रकार अमेरिका रूस यूक्रेन के बीच हो रहे युद्ध, इजराईल हम्मास के बीच चल रहे युद्ध एवं कम्बोडिया थाईलैंड के बीच हुए युद्ध में भी अपनी चौधराहट दिखाता रहता है। अमेरिका द्वारा अन्य देशों के मामलों में हस्तक्षेप किया जाना सामान्य सी बात है। अभी हाल ही में नेपाल, बांग्लादेश एवं श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन कराने में भी अमेरिका का हाथ बताया जाता है। अमेरिका द्वारा इन हस्तक्षेपों को जिन कारणों से उचित ठहराया जाता है, उनमें शामिल हैं – आतंकवाद विरोधी अभियान, शासन परिवर्तन, क्षेत्रीय विस्तार, अमेरिकी नागरिकों और राजनयिकों की सुरक्षा, आर्थिक अवसर, राष्ट्र निर्माण को बढ़ावा देना, लोकतंत्र को बढ़ावा देना और अंतरराष्ट्रीय कानून को लागू करना, आदि है। अमेरिका की विदेश नीति की हस्तक्षेपवाद मुख्य विचारधारा रही है। इसी नीति के तहत अमेरिका की नजर वेनेजुएला, ग्रीनलैंड, कोलम्बिया, ईरान, क्यूबा, मेक्सिको एवं नाईजेरिया में भी हस्तक्षेप करने की नजर आती है।

यूरोप के 7 देशों (फ्रान्स, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन, ब्रिटेन एवं डेनमार्क) ने अमेरिका को गम्भीर चेतावनी दी है कि यदि ग्रीनलैंड पर अमेरिका द्वारा कोई सैनिक कार्यवाही की गई तो इसके गम्भीर परिणाम अमेरिका को भुगतने होंगे और बहुत सम्भव है कि इस कार्यवाही के बाद यूरोपीय देशों एवं अमेरिका का संयुक्त नाटो संगठन ही बिखर जाए। नाटो संगठन के सदस्य देशों के बीच यह समझौता है कि इस संगठन के किसी भी एक सदस्य पर यदि सैन्य हमला होता है तो यह सैन्य हमला समस्त सदस्य देशों पर माना जाएगा और समस्त सदस्य देश मिलकर इस सैन्य हमले का जवाब देंगे।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने दिनांक 7 जनवरी 2026 को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को अलग करने की जानकारी प्रदान की है। इसमें 35 गैर संयुक्त राष्ट्र संगठन और 31 संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं शामिल हैं। ट्रम्प का सोचना है कि इन संगठनों की सदस्यता के चलते अमेरिकी हितों के अनदेखी हो रही है और इससे अमेरिकी पैसे की बर्बादी हो रही है। अमेरिका का यह कदम “अमेरिका फर्स्ट” नीति का हिस्सा माना जा रहा है और वैश्विक संस्थाओं से अमेरिका को दूर ले जाने का प्रयास है।

वैश्विक स्तर पर अब आर्थिक सत्ता का केंद्र पश्चिम से निकलकर पूर्व की ओर स्थानांतरित होता हुआ दिखाई दे रहा है और ट्रम्प अपने क्रियाकलापों से इसे गति देते हुए दिखाई दे रहे हैं। आज ब्रिक्स के सदस्य देशों में 325 करोड़ नागरिक निवास करते हैं और यह विश्व की कुल जनसंख्या का 40 प्रतिशत है। साथ ही, इन देशों की वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगभग 39 प्रतिशत की भागीदारी है, जबकि जी-7 देशों का वैश्विक अर्थव्यवस्था में योगदान लगभग 29 प्रतिशत ही है। अतः आज विश्व के किसी भी शक्तिशाली देश के लिए ब्रिक्स के सदस्य देशों की अनदेखी करना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के समान है। अमेरिका केवल अपने दम पर कितने दिन चल सकता है, वह आज भी कई उत्पादों के लिए अन्य देशों पर पूर्णत: निर्भर है। आज की वैश्विक व्यवस्था में जब विभिन्न देश विभिन्न कारणों से एक दूसरे पर निर्भर हैं, ऐसे में अमेरिका द्वारा विश्व के कई शक्तिशाली देशों के साथ अपने सम्बन्धों को खराब करना, अमेरिका के हितों के विपरीत तो है ही, साथ ही, वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी विपरीत रूप से प्रभावित कर सकता है। अमेरिकी एवं वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए इसे अमेरिकी नागरिकों को तो समझना ही होगा।


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Prahlad Sabnani

Shri Prahlad Sabanani is a distinguished and experienced personality in the Indian banking sector, having served in various significant positions at the State Bank of India for 40 years. He retired as Deputy General Manager from the Corporate Centre of the State Bank of India in Mumbai. His three books—World Trade Organization: Impact on Indian Banking and Industry, Banking Today, and Banking Update—are highly acclaimed. He is also a prolific writer on economic and social issues of national importance.

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