Chandan Kumar https://visionviksitbharat.com/author/chandankumar/ Policy & Research Center Sat, 23 Aug 2025 05:28:56 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://visionviksitbharat.com/wp-content/uploads/2025/02/cropped-VVB-200x200-1-32x32.jpg Chandan Kumar https://visionviksitbharat.com/author/chandankumar/ 32 32 भ्रष्टाचारी मंत्रियों को पद से हटाने संबंधित कानून का विरोध क्यों? https://visionviksitbharat.com/why-oppose-a-law-that-removes-corrupt-ministers-from-office/ https://visionviksitbharat.com/why-oppose-a-law-that-removes-corrupt-ministers-from-office/#respond Sat, 23 Aug 2025 05:28:56 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1920 इन दिनों देश मे संविधान का 130 वां संशोधन विधेयक 2025 काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। इस विधेयक मे यह प्रस्ताव है कि भ्रष्टाचार्य या गंभीर अपराधों के…

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इन दिनों देश मे संविधान का 130 वां संशोधन विधेयक 2025 काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। इस विधेयक मे यह प्रस्ताव है कि भ्रष्टाचार्य या गंभीर अपराधों के आरोप का सामना कर रहे और कम से कम 30 दिनों तक हिरासत मे लिए गए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या राज्यमंत्री को पद से हटाने का प्रावधान है। इस विधेयक मे 30 दिनों के अंदर आरोपी मंत्री को जमानत लेने का भी प्रावधान रखा गया है । इस्तीफा नहीं देने की स्थिति में 31वें दिन उसका पद स्वत: रिक्त माना जाएगा। ऐसे आरोप जिसमें कम से कम पांच साल की सजा का प्रावधान है उसमें लगातार 30 दिन जेल रहने पर या बेल नहीं मिलने पर यह कार्रवाई होगी। बेल मिलने पर दोबारा मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बन सकता है। पूरे देश में इसे एक साथ लागू करने के लिए केंद्र शासित प्रदेश अधिनियम 1963 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 में भी जरूरी संशोधन किये जाएंगे। इन दोनों अधिनियम में संशोधन से संबंधित विधेयक भी पेश किया गया है।

इन विधेयक का एक मात्र उदेश्य बताया जा रहा है कि कोई भी व्यक्ति गिरफ्तार होकर जेल से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री , केन्द्र या राज्य सरकार के मंत्री के रूप में शासन नहीं चला सकता है। यह विधेयक जैसे ही लोकसभा मे गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 19 अगस्त को लाया गया। विपक्ष ने इस विधेयक का पुरजोर तरीके से विरोध किया। विधेयक के खिलाफ आक्रोश जताते हुए विपक्षी सांसदों ने अमित शाह की तरफ बिल की कॉपी फाड़ कर फेंक दी। वहीं, कागज के टुकड़े भी अमित शाह की ओर उछाले। अमित शाह ने ये भी कहा कि सरकार इस बिल को जेपीसी को भेजने का प्रस्ताव रखती है। उसके बाद इस विधेयक को जॉइन्ट पार्लियामेंट कामेटी के पास भेज दिया।

अब इस विधेयक को पारित कराने की प्रक्रिया में तीन बड़ी अचड़नें हैं। नियमानुसार इसे संसद के दोनों सदनों से विशेष बहुमत के साथ पारित कराया जाना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन बिल को संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में दो स्तरों पर बहुमत चाहिए। पहला, कुल सदस्यों का बहुमत और दूसरा, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत। तीसरी अड़चन आधे से अधिक राज्यों की विधानसभाओं से भी इस बिल को पारित कराना होगा। एक संभावना यह भी बन रही है कि अगर विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति में शामिल होता है और उसके सुझावों को सरकार मान लेती है, जिसमें यह कहा जा सकता है कि न्यायिक हिरासत की वजाय सजा होने पर ही इस्तीफे को अनिवार्य बनाया जाए, तब संभावना बन सकती है कि विपक्षी दल उसका समर्थन करें। अन्यथा इस संशोधन बिल के पारित होने की संभावना कम ही है।

अब ऐसे मे सवाल बनता है कि हर कोई भारत को भ्रष्टाचार्य से मुक्त करने की बात करता है, लेकिन जैसे ही भ्रष्टाचार्य से संबंधित कोई पहल की जाती है तो उसका विरोध क्यों? ऐसा भी तो हो सकता है कि इसपर चर्चा के लिए समय मांगा जाय। एक संतोष जनक चर्चा करने के पश्चात या अपने सुझाव देने के पश्चात इसको सर्व सहमति से स्वीकृत किया जाए।

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भाषा विवाद पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का दृष्टिकोण https://visionviksitbharat.com/language-issue-and-deendayal-upadhyaya/ https://visionviksitbharat.com/language-issue-and-deendayal-upadhyaya/#respond Sun, 20 Jul 2025 13:30:31 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1843 भारत मे भाषा विवाद कोई नई बात नहीं है। आजादी के उपरांत भी यह एक बहुत बड़ा मुद्दा बनकर उभरा था। पर इसके मायने उस समय कुछ और था। उस…

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भारत मे भाषा विवाद कोई नई बात नहीं है। आजादी के उपरांत भी यह एक बहुत बड़ा मुद्दा बनकर उभरा था। पर इसके मायने उस समय कुछ और था। उस समय हाल ही भारत अंग्रेजी शासन से आजाद हुआ था जिसके कारण राष्ट्र की एकता अखंता और संप्रभुता को लेकर कौन सी भाषा राष्ट्र की राष्ट्रीय भाषा हो यह विषय बना हुआ था। जबकि आज देश के कुछ गिने- चुने तथाकथित राजनीतक लोग अपनी सियासी जमीन तलासने के लिए भाषा को जबरदस्ती का मुद्दा बना रहे है। हाल के दिनों की बात करें तो महाराष्ट्र मे ठाकरे बंधुओ ने जिस प्रकार भाषाई आधार पर अपनी राजनीति चमकाने की एक नाकाम कोशिश की है, गैरजरूरी ही नहीं बेतुकी भी है । ऐसे लोगों के प्रति यदि प्रसाशन गंभीरता नहीं दिखाती है तो अन्य राज्यों मे भी ऐसी घटनाए देखने को मिल सकती है।

17 मार्च 1958 को आर्गनाइजर  समाचार पत्र में प्रकाशित पं. दीनदयाल उपाध्याय जी का लेख इसी भाषा विवाद पर केंद्रित है। जिसमें दीनदयाल जी ने बताया है कि – देश की आधिकारिक भाषा क्या होनी चाहिए, यह निर्णय करने से पहले हमें यह तय कर लेना होगा कि क्या हम संगठित रहना चाहते हैं। राष्ट्र की एकता एक ऐसा तथ्य है, जिस पर कोई भी प्रश्न नहीं उठना चाहिए तथा न ही इसे प्रमाणित करने या इसका खंडन करने के लिए कोई बहस होनी चाहिए। राष्ट्रीय एकता प्रतिबंधात्मक, संवैधानिक, संस्थागत अथवा संविदात्मक नहीं होती है। यह वास्तविक, यथार्थपरक और स्वतः सिद्ध होती है। यह इस आधार पर होती है कि हम एक साथ रहने का संकल्प लें, एक साथ चलने का निश्चय करें- कि आओ, हम अलग नहीं होंगे, कोई हमें अलग नहीं कर सकता। हम एक भाषा चाहते हैं, क्योंकि हम एक हैं। हम भाषा की वजह से एक नहीं हैं और न ही हम इसलिए एक रहेंगे कि हमारी एक भाषा है। स्विट्ज़रलैंड में बहुभाषी लोग एक साथ रहते हैं, और हम सदियों से एक साथ रहते चले आ रहे हैं। कोई भी विभाजन की बात न करे। यदि कोई करता है तो वह विचार-विमर्श में भागीदारी का अधिकार खो देगा। यह केवल भाषा का प्रश्न नहीं है, जिसका हमें निर्णय करना है।

हमें अपनी जीवनयात्रा में सैकड़ों प्रश्नों का निर्णय करने की आवश्यकता है। और यदि हम प्रत्येक प्रश्न का निर्णय हंगामे से डरते हुए करेंगे तो हम कभी सही निर्णय नहीं कर सकते। जो कोई राष्ट्र के साथ एक होने के भाव को नहीं मानता, उसके आगे झुक जाना हमेशा लज्जाजनक होगा। राष्ट्रों के, संगठनों के और परिवारों के इतिहास में इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि एकता जैसे आधारभूत प्रश्न पर उदंड लोगों को छूट देना हमेशा ही विभाजन का मार्ग प्रशस्त करता है। मूल सिद्धांतों पर कोई समझौता नहीं हो सकता। ऐसे लोगों को छूट देना केवल समझौता करना भर नहीं है। यह तुष्टीकरण है। जिसने अलग रहना तय कर लिया हो, उसे कभी भी तुष्टीकरण से मनाया नहीं जा सकता। इसलिए इस बिंदु पर कभी भी कमजोरी न आने दें, कमजोरियाँ पृथकतावादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती हैं। हंगामा कमजोरी का परिणाम होता है और जब तक आप दृढ इच्छाशक्ति और निर्याणक कार्रवाइयों के अभाव का प्रदर्शन करते रहेंगे, आप कभी भी संगठित नहीं हो सकते।

दीनदयाल जी का भाषा को लेकर दूसरा लेख “हिंदी का विरोध निराधार” शीर्षक के साथ ऑर्गनाइज़र में 16 जुलाई 1956, को प्रकाशित हुआ था। जिसका सार इस प्रकार है की संविधान ने हिंदी को सार्वदेशिक कामकाज के लिए प्रशासकीय भाषा के रूप में स्वीकार किया है।’ उसे यह स्थान उसकी व्यापकता के कारण ही प्राप्त हुआ है। हिंदी साहित्य का जिन्हें ज्ञान नहीं अथवा जो उसकी महत्ता को मानने के लिए तैयार नहीं, ऐसे भारतीयों द्वारा भी उसे बहुत बल मिला और जब संविधान में भाषा संबंधी अनुच्छेद रखे गए, सब हिंदी के कट्टरपंथी लोगों को चाहे संतोष न हुआ हो, भारत की सभी भाषाओं के प्रतिनिधियों के एकमत से निर्णय लिये गए। किंतु आज छह वर्ष बाद जो स्थिति है. वह कोई संतोषजनक नहीं। राष्ट्र के विकास के अन्य क्षेत्रों में जैसे हम आतुरता दिखाते हैं, वैसे ही यदि कुछ लोग राष्ट्र की सामान्य भाषा हिंदी के प्रचार के लिए अनुरोध करें तो कोई अस्वाभाविक नहीं। किंतु उनके इस अनुरोध का लोग ग़लत अर्थ लगा रहे हैं।

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