Dr. Sameer Shekhar https://visionviksitbharat.com/author/dr-sameer-shekhar/ Policy & Research Center Wed, 03 Sep 2025 20:06:07 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 https://visionviksitbharat.com/wp-content/uploads/2025/02/cropped-VVB-200x200-1-32x32.jpg Dr. Sameer Shekhar https://visionviksitbharat.com/author/dr-sameer-shekhar/ 32 32 ट्रंप के टैरिफ धमकियों के बीच अडिग और आत्मविश्वासी भारत https://visionviksitbharat.com/india-firm-and-confident-amid-trumps-tariff-threats/ https://visionviksitbharat.com/india-firm-and-confident-amid-trumps-tariff-threats/#respond Thu, 28 Aug 2025 09:54:12 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1936   ट्रम्प का विश्व-राजनीती से प्रेरित यह कदम रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में किये गए सामूहिक प्रयासों को भी हानि पहुंचाएगा। उसकी घातक व्यापार नीति और भारत को “डेड इकॉनमी” कहना दोनों…

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ट्रम्प का विश्व-राजनीती से प्रेरित यह कदम रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में किये गए सामूहिक प्रयासों को भी हानि पहुंचाएगा। उसकी घातक व्यापार नीति और भारत को “डेड इकॉनमी” कहना दोनों देशों द्वारा क्वाड (Quad) मंच के माध्यम से चीन के बढ़ते प्रभुत्व को नियंत्रित करने के लिए विकसित किए गए हिंद-प्रशांत रणनीति के मूलभूत उद्देश्यों और रणनीतिक सहयोग की भावना के विरुद्ध है।

 

अमेरिका में ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) अभियान के सहारे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा सत्ता में आने के साथ ही पुरानी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का पुनः अनुशरण करते हुए वैश्विक व्यापार विमर्श में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया था। इस क्रम में एकतरफा निर्णय,उच्च शुल्क,और आर्थिक राष्ट्रवाद सिद्धांत को अपनाते हुए ट्रम्प ने भारत द्वारा अमेरिका को किये जाने वाले निर्यात पर 25% का व्यापक टैरिफ लगाने की घोषणा किया, जो भारत-अमेरिका संबंधों की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। अपने पहले कार्यकाल (2017-2021) के दौरान आक्रामक संरक्षणवादी रुख के लिए जाने जाने वाले ट्रंप ने एक बार फिर टैरिफ कूटनीति को अमेरिकी विदेश और आर्थिक नीति के केंद्र में ला दिया है। 1 अगस्त, 2025 को भारत सहित कई देशों पर टैरिफ और जुर्माने की एक नई लहर का प्रस्ताव रखने वाली घोषणा ने व्यापार युद्धों, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और बहुपक्षवाद की कमज़ोरी जैसे प्रमुख मुद्दे आधारित वैश्विक चिंताओं को फिर से हवा दे दी है।

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था को “डेड इकॉनमी” कहना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़ों के विरुद्ध भी है। IMF और विश्व बैंक के अनुसार, भारत वर्ष 2025 में 6.8% की दर से बढ़ रही दुनिया की सबसे तेज़ी से विकसित होती बड़ी अर्थव्यवस्था है, भारत की जीडीपी $4.2 ट्रिलियन को पार कर चुकी है, जबकि तकनीक, विनिर्माण, और डिजिटल अर्थव्यवस्था में उसका प्रदर्शन सराहनीय है। वहीं अमेरिका, मंदी की आहट, उच्च ब्याज दरों और चीन के साथ व्यापार युद्ध की पुनरावृत्ति के बीच फंसा हुआ है। ट्रंप की आर्थिक नीतियों के कारण अमेरिका में महंगाई और वैश्विक निवेश की अनिश्चितता बढ़ी है। यही कारण है कि वह हाल ही में नए निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से खाड़ी देशों की यात्रा पर गए। भारत जहां आत्मनिर्भरता और वैश्विक साझेदारी की नीति पर काम कर रहा है, वहीं अमेरिका संरक्षणवाद, आर्थिक राष्ट्रवाद की के रुख को अपनाया हुआ है।   भारत और रूस को डेड इकॉनमी कहना महज राजनीति व भारत रूस के संबंधों के प्रति रोष से प्रेरित है, न कि आर्थिक तथ्यों पर आधारित।

टैरिफ रणनीति ट्रम्प की संरक्षणवादी नीति का हिस्सा रही

ट्रम्प की टैरिफ रणनीति का विकास पहले कार्यकाल के दौरान से ही उसके संरक्षणवादी नीति का हिस्सा रहा है। जिस दौरान उसने कट्टर एवं एकतरफा उलटफेर करने वाले आर्थिक निर्णय लिए जिसने भारत सहित दुनियाँ के कई महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था के साथ व्यापारिक समीकरण को नए सिरे से परिभाषित किया। ट्रम्प प्रशासन ने 2017 में जहां एक तरफ ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप (TPP) से खुद को अलग कर लिया, वहीं NAFTA को नए नियमों व शर्तों के साथ एक आधुनिक संस्करण ‘संयुक्त राज्य अमेरिका-मेक्सिको-कनाडा समझौते’ (USMCA) के रूप में प्रतिस्थापित किया था जो उसके प्रशासन की आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ अधिक संरेखित है। ट्रम्प का मानना था कि NAFTA अमेरिकी श्रमिकों और उद्योग के लिए अनुचित था। इसके अलावे ट्रम्प के संरक्षणवादी नीति व अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत कई देशों पर स्टील (25%) और एल्युमीनियम (10%) पर टैरिफ लगान, चीन के साथ व्यापार युद्ध (360 अरब डॉलर से ज़्यादा मूल्य के चीनी सामानों पर टैरिफ लगाने) से लेकर 2019 में भारत की सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (GSP) को समाप्त करना भी शामिल था, जिससे 5.6 अरब डॉलर का भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ था।

अमेरिकी टैरिफ नीति का कारण भारत रूस सम्बन्ध या भारत की व्यापर नीति

एक तरफ यह प्रतीत होता है की भारत के प्रति ट्रम्प के इस निर्णय का प्रमुख कारण रूस के साथ भारत की स्थायी रक्षा और ऊर्जा साझेदारी है, जिस पर अमेरिका लंबे समय से नज़र रख रहा है। खासकर यूक्रेन और अन्य क्षेत्रों में मास्को की कार्रवाइयों के बाद रूस को अलग-थलग करने के पश्चिमी देशों के निरंतर प्रयासों के बीच भारत का व्यापारिक सम्बन्ध के कारण व्यापारिक तनाव एवं उसमे अंतर्निहित कूटनीतिक चिंता के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि अमेरिका का यह रवैय्या उसके प्रति भारतीय व्यापार नीति को भी एक प्रमुख वजह के रूप में देखा जा सकता है। चुकि अमेरिका द्वारा जुर्माने की नीति के तहत वैसे भारतीय कंपनियों के उत्पादों को जो रूसी रक्षा या ऊर्जा क्षेत्रों से वित्तीय रूप से जुड़े हैं उन्हें बाज़ार पहुँच से वंचित होने, लाइसेंस में देरी, द्वितीयक शुल्क (25 % के व्यापक टैरिफ के अलावा अतिरिक्त 100 % तक के टैरिफ), निर्यात प्रतिबंध आदि जैसे परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।

दोनों देशों के बीच व्यापारपरक रणनीतिक टकराव के अन्य कारणों में डेटा संग्रहण नीति, GSP से भारत का निष्कासन, बायोमेडिकल व पेटेंट नीति एवं भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों के निर्यात पर उच्च शुल्क दर शामिल हैं।  भारत की नीति है कि उपभोक्ता डेटा भारत में ही स्टोर हो। अमेरिका की कंपनियां (जैसे अमेज़न, गूगल, वालमार्ट) इस नियम का विरोध करती हैं क्योंकि इससे उनकी संचालन लागत और नियंत्रण पर असर पड़ता है। अमेरिका ने 2019 में भारत को GSP से बाहर कर दिया था, जिससे भारत को कई उत्पादों पर शून्य शुल्क का लाभ नहीं मिल रहा। भारत चाहता है कि पुनः स्पेशल ट्रेड स्टेटस (GSP) का दर्जा बहाल हो, लेकिन अमेरिका इसके लिए भारत में अधिक बाजार पहुंच की मांग कर रहा है। अमेरिका भारत की बायोमेडिकल और पेटेंट नीति पर भी आपत्ति जताते आया है। खासतौर पर जेनेरिक दवाइयों को लेकर अमेरिका भारत की मुनाफा-आधारित पेटेंट प्रणाली के बजाय जन-स्वास्थ्य आधारित प्रणाली को प्राथमिकता देने से नाखुश रहा है। दरअसल अमेरिका चाहता है कि भारत अमेरिकी आईटी उत्पादों, कृषि वस्तुओं, और चिकित्सा उपकरणों पर टैरिफ (शुल्क) को कम करे, जबकि भारत घरेलू उद्योगों की रक्षा के लिए इन उत्पादों पर मौजूदा आयात शुल्क बनाए रखना चाहता है। ट्रंप ने भारत द्वारा कृषि उत्पादों पर 39%, और वनस्पति तेलों और सेब जैसी चुनिंदा वस्तुओं पर 45-50% औसत टैरिफ स्तरों को अनुचित करार दिया था। अगर दोनों देशों के रवैय्ये पर गौर करें तो यह मूल्यों और हितों का टकराव जैसा दिखाई देता है। ऐसे में आगे चलकर भारत को अंतरराष्ट्रीय दबाव और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन बनाना होगा।

अमेरिकी टैरिफ और पेनाल्टी घोषणा भारत के प्रति दोहरे मापदंड हैं 

हालांकि देखा जाए तो अमेरिका भारत के साथ दोहरे मापदंड अपना रहा है। तुर्की और मिस्र का रूस के साथ रक्षा संबंध, व जर्मनी का रूसी गैस अवसंरचना के साथ जुड़े होने के बावजूद भी अमेरिका का रवैय्या उनके प्रति सहयोगात्मक है। ट्रंप की घोषणा एक लेन-देन संबंधी कूटनीति का संकेत देती है, जहाँ आपसी सम्मान के माध्यम से सहयोग को बढ़ावा देने के बजाय, व्यापार के लाभ का इस्तेमाल राजनीतिक गुटबाज़ी हासिल करने के लिए किया जा रहा है। भारत के विपरीत, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान और आसियान सदस्य देशों ने अंतरिम समझौते किए हैं, जिनमें टैरिफ दरें 10% (ब्रिटेन), 15% (यूरोपीय संघ, जापान) या 19-20% (वियतनाम, इंडोनेशिया) तक सीमित हैं। इसके विपरीत, भारत को सबसे अधिक दरों में से एक 25% का सामना तो करना पड़ ही रहा है, साथ में रूस से सम्बद्ध भारतीय उद्द्योगों के सन्दर्भ में 100 प्रतिशत तक के अतिरिक्त जुर्माना की भी घोषणा की गयी है।

अमेरिकी टैरिफ नीति प्रभाव

वित्त वर्ष 2024-25 में, अमेरिका को भारत का निर्यात 110 अरब डॉलर को पार कर गया, जिसमें आईटी सेवाएँ, फार्मास्यूटिकल्स, परिधान, रत्न एवं आभूषण, और ऑटो पार्ट्स जैसे क्षेत्रों का दबदबा रहा। इस टैरिफ नीति से लगभग सभी भारतीय निर्यात श्रेणियाँ प्रभावित होने की संभावना है, जिनमें वस्त्र, रत्न एवं आभूषण (लगभग 10 अरब डॉलर का निर्यात), फार्मास्युटिकल्स और जेनेरिक दवाएँ, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो कंपोनेंट्स, समुद्री खाद्य पदार्थ आदि शामिल हैं। वैसे भारतीय उत्पाद जो अमेरिकी बाज़ार पर अत्यधिक निर्भर हैं उनके निर्यात लागत में वृद्धि होगी, जिससे वियतनाम, इंडोनेशिया एवं चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हमारी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है। ऐसे में अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता वाले उद्योगों को विविध बाज़ारों जैसे यूरोप, आसियान, लैटिन अमेरिका आदि की ओर रुख करना चाहिए जो भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती देगी।

ट्रम्प का विश्व-राजनीती से प्रेरित यह कदम रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में किये गए सामूहिक प्रयासों को भी हानि पहुंचाएगा। उसकी घातक व्यापार नीति और भारत को “डेड इकॉनमी” कहना दोनों देशों द्वारा क्वाड (Quad) मंच के माध्यम से चीन के बढ़ते प्रभुत्व को नियंत्रित करने के लिए विकसित किए गए हिंद-प्रशांत रणनीति के मूलभूत उद्देश्यों और रणनीतिक सहयोग की भावना के विरुद्ध है, जो अमेरिका और भारत के बीच लॉजिस्टिक्स सहायता सम्बंधित LEMOA, भू-स्थितिक एवं सैटेलाइट डाटा सम्बंधित BECA  और तकनीक और सुरक्षित संचार प्रणाली व साझा सैन्य कार्यक्रम सम्बंधित COMCASA जैसे रसद, तकनिकी एवं रक्षा सौदों के साथ यह चीन को घेरने की क्वाड रणनीति को भी निश्चित रूप से कमजोर करेगा। इन समझौतों का प्रभावित होना भारत के लिए कई दृष्टिकोण से नुकसानदायी हो सकता है, जैसे अमेरिका जहां LEMOA के तहत मिलने वाली लॉजिस्टिक सपोर्ट की लागत बढ़ा सकता है जिससे अमेरिकी रक्षा आपूर्ति (ईंधन, स्पेयर पार्ट्स) महंगे हो सकते हैं, वहीं ट्रम्प की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर कड़ी शर्तें और “Buy American” नीति COMCASA के अंतर्गत भारत को किये जाने वाले रक्षा उपकरणों की आपूर्ति को सीमित करने के साथ साथ रक्षा उपकरणों से सम्बंधित लाइसेंस शर्तें कठोर कर सकता है। यही नहीं बल्कि BECA के तहत भारत को अमेरिका द्वारा दिए जाने वाले सैटेलाइट एवं भूस्थितिक डाटा सहायता भी सीमित हो सकते हैं।

 

 

LEMOA इसके तहत भारत और अमेरिका की सेनाएँ एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों पर ईंधन, मरम्मत और रसद सहायता ले सकती हैं। दोनों सेनाएँ एक-दूसरे के ठिकानों पर ईंधन, मरम्मत और रसद सुविधा ले सकती हैं। यह समझौता साझा सैन्य अभियानों और मानवीय राहत में बहुत कारगर है।

 

 

COMCASA भारतऔर अमेरिका के बीचसुरक्षित सैन्य संचार प्रणालीसाझा करने का समझौताहै। इससेभारत को अमेरिकी रक्षाउपकरणों (जैसे पनडुब्बी, जहाज, विमान) मेंउपयोग की जाने वालीसुरक्षित संचार तकनीक काउपयोग करने की अनुमतिमिलती है।

 

BECA भारत और अमेरिका के बीच भू-स्थानिक जानकारी (geospatial intelligence) के आदान-प्रदान से संबंधित एक समझौता है। अमेरिका भारत को सैटेलाइट डेटा, समुद्री जानकारी और रियल-टाइम सैन्य नक्शे मुहैया कराता है। इससे सर्जिकल स्ट्राइक, मिसाइल टारगेटिंग, और ड्रोन ऑपरेशन जैसी सैन्य क्षमताओं में भारत को लाभ होता है। ECA भारत की सैन्य-संचालन सटीकता और निगरानी क्षमताओं को बढ़ाता है।

 

अमेरिका द्वारा टैरिफ लगाए जाने भारतीय व्यापार नीति में बदलाव तो तय है ही, साथ ही विश्व व्यापार सतह पर तनाव भी बढ़ेंगे। प्रमुख क्षेत्रों में भारतीय आपूर्तिकर्ताओं की लागत बढ़ेगी और जीडीपी वृद्धि दर में संभावित रूप से कमी आने की प्रबल संभावना है । टैरिफ व्यवस्थाओं में संरचनात्मक अंतर, गहराते भू-राजनीतिक विवाद और रुके हुए सौदे भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों की नाज़ुक प्रकृति को उजागर करते हैं। भारतीय निर्यातकों के लिए, आगे का रास्ता बाज़ार विविधीकरण, नीतिगत लचीलेपन और एक निष्पक्ष द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर निर्भर करता है। यह कदम कूटनीतिक सफलता का संकेत देता है या नहीं, यह देखना अभी बाकी है।

टैरिफ सुधारों की आड़ में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए व्यापार प्रतिबंध और ठीक उसी के एक दिन बाद पाकिस्तान के साथ व्यापारिक समझौते में विस्तार, भारत के भू-राजनीतिक संरेखण पर दबाव डालने के उद्देश्य से लिए गए निर्णय प्रतीत होते हैं। व्यापार विवादों को भारत के रूस संबंधों से जोड़कर, अमेरिका एशिया में एक महत्वपूर्ण साझेदार को अलग-थलग करने का जोखिम उठा रहा है। अमेरिका को दंडात्मक कार्रवाई के बजाय, आपसी हितों पर आधारित रचनात्मक कूटनीति, रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति सम्मान और रक्षा विविधीकरण पर संवाद दोनों देशों के लिए बेहतर होगा। भारत की बात करें तो इस व्यापार निर्भरताओं को पुनर्निर्धारित करने, बहुपक्षीय मंचों पर नेतृत्व स्थापित करने और एक अधिक आत्मनिर्भर, लचीला आर्थिक मॉडल गढ़ने का अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। इस विकसित होती व्यापारिक बिसात में भारत झुकता है, संतुलन बनाता है या संघर्ष करता है, यह देखना अभी बाकी है। एक बात स्पष्ट है: वैश्विक व्यापार के नियम एक बार फिर से लिखे जा रहे हैं और भारत को चतुराई से खेलने के लिए तैयार रहना होगा।

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प्रधानमंत्री मोदी के ब्रिटेन एवं मालदीव यात्रा के निहितार्थ https://visionviksitbharat.com/implications-of-prime-minister-modis-visit-to-the-united-kingdom-and-maldives/ https://visionviksitbharat.com/implications-of-prime-minister-modis-visit-to-the-united-kingdom-and-maldives/#respond Thu, 07 Aug 2025 08:14:51 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1890   प्रधानमंत्री की ब्रिटेन यात्रा के  दौरान हुए समझौते जहाँ मुख्य रूप से आर्थिक-व्यापारिक सम्बन्ध को उदार बनाने, सुरक्षा मामलों को सुदृढ़ करने, एवं सामाजिक मूल्यों के आदान-प्रदान को सुनिश्चित…

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प्रधानमंत्री की ब्रिटेन यात्रा के  दौरान हुए समझौते जहाँ मुख्य रूप से आर्थिक-व्यापारिक सम्बन्ध को उदार बनाने, सुरक्षा मामलों को सुदृढ़ करने, एवं सामाजिक मूल्यों के आदान-प्रदान को सुनिश्चित करती है, वहीं उनकी मालदीव की यात्रा व्यापारिक आर्थिक से ज्यादा रणनीतिक यात्रा सिद्ध हुई।

 

जुलाई 2025 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो महत्वपूर्ण विदेश यात्राओं रहे जिनके दौरान हुए महत्वपूर्ण बहुआयामी समझौते निश्चित रूप से भारत के कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों को नया रूप एवं विश्व-पटल पर मजबूती प्रदान करेगा। 23 से 26 जुलाई के बीच यूनाइटेड किंगडम और मालदीव की उनकी आधिकारिक यात्राएँ वैश्विक साझेदारी, क्षेत्रीय संबंधों में सुधार व मजबूती और आर्थिक नीति के प्रति भारत के दृष्टिकोण में एक रणनीतिक बदलाव का संकेत देती हैं। जहाँ ब्रिटेन की उनकी यात्रा भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापारिक समझौते (CETA) पर ऐतिहासिक हस्ताक्षर के साथ संपन्न हुई, वहीं मालदीव की यात्रा ने पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे तनावों में एक महत्वपूर्ण कमी लाकर नए सिरे से क्षेत्रीय सहयोग का मार्ग प्रशस्त किया। इसलिए प्रधानमंत्री की दो देशों की यात्रा विश्व-भूगोल में पूरब एवं पश्चिम की तरफ व्यापारिक प्रभुत्व, क्षेत्रीय प्रभाव और वैश्विक कूटनीतिक दिशा में मजबूती प्रदान करता है।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के निमंत्रण पर प्रधानमंत्री मोदी 23 से 24 जुलाई तक ब्रिटेन के दौरे पर रहे। मोदी की इस यात्रा का मुख्य आकर्षण दोनों देशों के बीच भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर रहा । लगभग चार वर्षों के निरंतर प्रयासों के फलस्वरूप मुक्त व्यापार समझौता की यह रूपरेखा मई 2025 में सैद्धांतिक रूप से बनकर तैयार हुई थी और यह माना जा रहा था कि यह समझौता मील का पत्थर साबित होगा। जुलाई के अंत में प्रधानमंत्री की अगुआई में स्टारमर के साथ समझौते पर हस्ताक्षर को भारत और किसी भी जी-7 देश के बीच अब तक का सबसे व्यापक समझौता माना जा रहा है। व्यापारिक समझौते के अलावे दोनों देशों ने बहुआयामी प्रगति के उद्देश्य से विज़न 2035 दस्तावेज पर भी हस्ताक्षर किये।

भारत-यूके व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते की मुख्य विशेषताएँ

व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते के तहत ब्रिटेन द्वारा 90% से अधिक निर्यात उत्पादों पर टैरिफ को अगले एक दशक के दौरान 150% से घटाकर 75% तक अर्थात 40 % कम किये जाने पर सहमति बनी जिससे ब्रिटिश उत्पाद भारतीय बाजार में ज्यादा आसानी (कम मूल्य पर) से उपलब्ध होंगे। टैरिफ उन्मूलन प्रावधान के तहत जिन उत्पादों को दायरे में रखा गया है उनमे स्कॉच व्हिस्की (10 वर्षों में 150% से घटाकर 40%), ऑटोमोबाइल (कोटा के तहत शुल्क घटाकर 10%), समुद्री खाद्य पदार्थ (सैल्मन) और दवाओं (फार्मास्यूटिकल्स) आदि जैसे ब्रिटिश निर्यात पर शुल्क समाप्त या कम करेगा। इसके अतिरिक्त भारतीय निर्यात को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कपड़ा, चमड़ा, इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रिक वाहन और फार्मास्यूटिकल्स जैसे भारतीय सामानों को ब्रिटेन में टैरिफ में कटौती की सुविधा मिलेगी, जिससे भारत की निर्यात क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। वस्तु बाजार में व्यापर विस्तार के निमित्त शुल्क एवं में उदारीकरण के अलावे समझौते के अनुरूप सेवा एवं निवेश क्षेत्र को मजबूती देने के उद्देश्य से सेवा बाजारों, सार्वजनिक खरीद प्रणालियों और नियामक ढाँचों को मजबूत और सुगम बनाने के प्रावधान शामिल हैं। ब्रिटेन के निवेशकों द्वारा भारत की नई परियोजनाओं में लगभग 6 बिलियन पाउंड का निवेश करने की उम्मीद है। यही नहीं बल्कि इस व्यापक समझौते के माध्यम से भारत ने गतिशीलता प्रावधान को भी एक मुख्य विषय के रूप में सामने रखा।  भारत के इस सामाजिक सुरक्षा छूट प्रस्ताव पर ब्रिटेन की सहमति भारतीय नौकरी-पेशेवर समुदाय के लिए बहुत बड़ी रहत है जो ब्रिटेन में कम कर रहे हैं।   इसकी वजह से भारतीय पेशेवरों को तीन वर्षों तक दोहरे योगदान से छूट मिलेगी अर्थात अगर कोई भारतीय नागरिक ब्रिटेन में स्थित भारतीय व्यावसायिक संगठन में काम कर रहा है तो उसे प्रथम तीन वर्षों तक सिर्फ भारत को ही सामाजिक सुरक्षा मूल्य (बीमा मूल्य) चुकाने होंगे जो इससे पहले दोनों ही देशो में चुकाने होते थे। इस छूट प्रावधान के परिणामस्वरूप लगभग 75,000 भारतीय पेशेवर और 900 भारतीय नियोक्ता, विशेष रूप से आईटी और परामर्श क्षेत्र में, संभावित रूप से 4,000 करोड़ रुपये (लगभग 40 बिलियन रुपये) की बचत कर सकेंगे, जिससे उन्हें विदेश में अधिक कुशलतापूर्वक, किफायती तरीके से और सामाजिक सुरक्षा संबंधी परेशानियों के बिना काम करने में मदद मिलेगी।

इस समझौते के परिणामों का अनुमान लगाया जाये तो यह वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भारत के एकीकरण में एक महत्वपूर्ण मोड़ है और इसकी वार्ता संबंधी विश्वसनीयता को मज़बूत करता है। इसके अलावा, ब्रेक्सिट के बाद के ब्रिटेन भारत को आर्थिक साझेदार के रूप में देखता है, जिससे भारत एक नए यूरेशियन व्यापार गलियारे के केंद्र में आ जाता है। और इसी लिए प्रद्यानमंत्री के इस दौरे पर भारत-ब्रिटेन विजन 2035 को भी दोनों राष्ट्र प्रमुखों द्वारा अपनाया गया। विजन 2035 दस्तावेज, अर्थव्यवस्था और विकास, प्रौद्योगिकी, नवाचार, अनुसंधान और शिक्षा, रक्षा और सुरक्षा, जलवायु कार्रवाई, स्वास्थ्य और लोगों से लोगों के बीच संबंधों के प्रमुख क्षेत्रों में अगले दस वर्षों के लिए संबंधों को आगे बढ़ाते हुए व्यापक रणनीतिक साझेदारी में अधिक महत्वाकांक्षा और नई गति का संचार करेगा। दोनों देशों ने रक्षा औद्योगिक रोडमैप, प्रौद्योगिकी और सुरक्षा पहल पर वक्तव्य, भारत के केंद्रीय जांच ब्यूरो और ब्रिटेन की राष्ट्रीय अपराध एजेंसी के बीच समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किए, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि दोनों देश रक्षा, आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरणीय और सर्वांगीण संबंध सुनिश्चित करने के लिए मजबूत रणनीतिक सहयोग के लिए प्रतिबद्ध हैं। भारत ब्रिटेन के बीच हुए विभिन्न करार के कारण प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो के अनुसार द्विपक्षीय व्यापार 55 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक लगभग 112-120 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।

मालदीव यात्रा (25-26 जुलाई, 2025)

ब्रिटेन के साथ बातचीत के बाद, प्रधानमंत्री मोदी की मालदीव की दो दिवसीय राजकीय यात्रा, एक रणनीतिक पड़ोसी के साथ कूटनीतिक संबंधों के पुनर्निर्धारण का प्रतीक थी। वर्ष 2018 के बाद से विपक्षी दल द्वारा ‘इंडिया आउट’ नारा एवं 2023 में सत्ता में आने बाद राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू द्वारा इस दिशा में भारतीय सैन्य बल को बाहर किये जाने की मुहीम से दोनों देशों के बीच संबंधों में नरमी आ गई थी। मालदीव के 60वें स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय प्रधानमंत्री को मुइज़्ज़ू द्वारा मुख्य अतिथि को रूप में आमंत्रण एवं मोदी की उपस्थिति ने सुलह और संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए जरुरी बदलाव को मजबूती प्रदान किया। मालदीव यात्रा के दौरान आठ द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें मालदीव के ऋण दायित्वों का पुनर्गठन, बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए ₹4,850 करोड़ (लगभग 565 मिलियन डॉलर) की एक नई ऋण सीमा, मालदीव के भुगतान प्लेटफार्मों के साथ भारत की यूपीआई प्रणाली का एकीकरण, समुद्री व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों के सहयोग से ढांचागत (इन्फ्रास्ट्रक्टरल) निर्माण, द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के लिए बातचीत शुरू करने पर सहमति आदि शामिल रहे। प्रधानमंत्री मोदी की मालदीव यात्रा हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते गतिविधियों के बीच भारत की विजन सागर/महासागर के समुद्री रणनीति को मजबूती प्रदान करती है, जो निश्चित तौर पर एक कूटनीतिक जीत की घोषणा भी करती है। भारत ऐतिहासिक रूप से मालदीव का प्रमुख विकास साझेदार रहा है। लेकिन पिछले एक दशक से मालदीव का रुख भारत को लेकर बहुत सकारात्मक नहीं रहे थे, और ऐसे में यह यात्रा उस भूमिका को पुनः स्थापित करने की दिशा में सफल प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। दोनों देशों के बीच हुए समझौते बुनियादी ढाँचा, रक्षा और क्षमता निर्माण सहयोग द्विपक्षीय संबंधों को और गहरा करेगा, जिससे भारत की पड़ोस-प्रथम (नेबरहुड फर्स्ट) नीति के सफलता की पुष्टि करते हैं। चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई)के तहत कई बुनियादी ढांचे और समुद्री अर्थव्यवस्था जैसे समझौतों में मालदीव का प्रवेश के बीच, भारत एवं मालदीव के बीच तटीय बुनियादी ढाँचे, जल-स्वच्छता और उपकरण समर्थन पर समझौते जहाँ एक तरफ मालदीव की प्रगति क्षमता को मजबूत करने के साथ-साथ क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री सुरक्षा के प्रति दोनों देशों की प्रतिबद्धता का मज़बूत संदेश देती है।

भारत के व्यापार और कूटनीति पर संयुक्त प्रभाव

प्रधानमंत्री की ब्रिटेन यात्रा के  दौरान हुए समझौते जहाँ मुख्य रूप से आर्थिक-व्यापारिक सम्बन्ध को उदार बनाने, सुरक्षा मामलों को सुदृढ़ करने, एवं सामाजिक मूल्यों के आदान-प्रदान को सुनिश्चित करती है, वहीं उनकी मालदीव की यात्रा व्यापारिक आर्थिक से ज्यादा रणनीतिक यात्रा सिद्ध हुई। जुलाई में प्रधानमंत्री का इन दो देशों का दौरा इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्यूंकि यह दोहरी कूटनीति के अंतर्गत एक और नेबरहुड फर्स्ट नीति को अपनाते हुए पड़ोस के साथ सम्बन्ध को पुनर्स्थापित करते हुए दक्षिण-पूर्वी एशिया में चीन के समक्ष मजबूत प्रतिद्वंदिता पेश करने को मजबूती दे रही, वहीं दूसरी तरफ ब्रिटेन के साथ व्यापक आर्थिक व्यापारिक समझौता वैश्विक शक्तियों के साथ संबंधों को गहरा करना इन यात्राओं से स्पष्ट होती है। ब्रिटेन के साथ व्यापार समझौता भारत के निर्यात के लिए जहां आसानी से बाजार उपलब्ध करा रहा है वहीं ब्रिटेन द्वारा भारत को निर्यात किये जाने वाले उत्पादों के मूल्य में टैरिफ-कटौती के कारण होने वाली कमी, भारतीय बाजार में उत्पादों की विविधता लाने के साथ-साथ इसे उच्च-उपभोग को सुगम बनाएगा और आयातित उच्च-तकनीकी भारतीय बाजार को पश्चिमी बाज़ार के साथ एकीकृत करेगा।

दरअसल देखा जाये तो भारतीय प्रधानमंत्री की ये आधिकारिक यात्राएं रणनीतिक कूटनीति को आगे बढ़ाने, व्यापार प्रभुत्व को विस्तार देने और नीतिगत नवाचार को अपनाने के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण कदम हैं। ब्रिटेन के साथ कई सारे क्षेत्रों में समझौते पर हस्ताक्षर जी-7 की एक शक्ति के साथ संबंधों को मज़बूत करना और भारत की अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडिंग को मजबूती से पेश करता है। वहीं, मालदीव की यात्रा के दौरान हुए सभी समझौते हिंद महासागर क्षेत्र में भारत को रणनीतिक स्थान पुनः प्राप्त करने और भारत को एक सौम्य एवं प्रतिबद्ध क्षेत्रीय नेतृत्व राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है। ब्रिटेन की यात्रा और बहुआयामी समझौते जहाँ मजबूत राष्ट्र के रूप में ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ, कनाडा और खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के साथ बाज़ार पहुँच वार्ता के लिए एक नया मानदंड प्रस्तुत करता है, वही दूसरी तरफ मालदीव की यात्रा और व्यापार समझौते हिंद महासागर व्यापार एकीकरण के लिए एक आधार तैयार कर रहा है।

हालांकि इन यात्राओं के दौरान हुए समझौते के सकारात्मक परिणाम की आशा के बावजूद, कई तरह के जोखिम से इंकार नहीं किया जा सकता।  ऐसे अनुसमर्थन में देरी, संरक्षणवादी प्रतिरोध, चीनी जवाबी कार्रवाई, कार्यान्वयन क्षमता आदि। चुकि ब्रिटेन को मुक्त व्यापार समझौते के क्रियान्वयन के लिए संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता है, जिसके लिए श्रम और पर्यावरण मानकों पर जाँच की आवश्यकता हो सकती है, एवं इसके कई सारे पहलु के हमारे पक्ष में नहीं होना की भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। दोनों ही देशों के घरेलु व्यावसायिक संगठनों द्वारा संरक्षणवाद (प्रोटेशनिज़्म) की नीति के अनुरूप समझौते का विरोध इसके ससामयिक एवं सुगम क्रियान्वयन में अवरोध पैदा कर सकता है। समझौता ज्ञापनों और समझौतों को ठोस परिणामों में बदलने के लिए प्रभावी क्रियान्वयन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रिटेन और मालदीव की यात्राएँ केवल उच्च-स्तरीय कूटनीतिक यात्राओं से कहीं अधिक हैं; ये भारत की आर्थिक आकांक्षाओं को रणनीतिक कूटनीति के साथ जोड़ने के एक सुनियोजित प्रयास का प्रतिनिधित्व करती हैं। भारत-यूके व्यापार समझौता अगले एक दशक के लिए व्यापार और सेवाओं को आकार देने की दिशा में एक आधारशिला है, साथ ही मालदीव के साथ बहुआयामी समझौते पडोसी देशों के साथ सम्बन्धो को सुधारने एवं सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण उपकरण साबित हो सकते हैं। जैसे-जैसे वैश्विक व्यवस्था बहुध्रुवीय होती जा रही है, व्यापार उदारीकरण एवं रणनीतिक क्चतुरता के कारण भारत विश्व मंच पर एक निर्णायक भूमिका निभाने वाले देश के रूप में अपनी स्थिति और भी सुनिश्चित कर रहा है।

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