Krishna Murari Tripathi 'Atal' https://visionviksitbharat.com/author/krishna-murari-tripathi/ Policy & Research Center Wed, 01 Apr 2026 11:39:20 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 https://visionviksitbharat.com/wp-content/uploads/2025/02/cropped-VVB-200x200-1-32x32.jpg Krishna Murari Tripathi 'Atal' https://visionviksitbharat.com/author/krishna-murari-tripathi/ 32 32 माओवादी आतंक का खात्मा : अर्बन नक्सलियों पर अमित शाह का प्रहार  ! https://visionviksitbharat.com/end-of-maoist-terror-amit-shahs-crackdown-on-urban-naxals/ https://visionviksitbharat.com/end-of-maoist-terror-amit-shahs-crackdown-on-urban-naxals/#respond Wed, 01 Apr 2026 11:37:51 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=2057 देश नक्सलवाद-माओवाद के आतंक से मुक्त हो गया। माओवादी आतंक से मुक्ति एक बड़ी विजय के रूप में देखी जानी चाहिए। ये विजय दृढ़ संकल्प, दृढ़ इच्छाशक्ति और ध्येय निष्ठा…

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देश नक्सलवाद-माओवाद के आतंक से मुक्त हो गया। माओवादी आतंक से मुक्ति एक बड़ी विजय के रूप में देखी जानी चाहिए। ये विजय दृढ़ संकल्प, दृढ़ इच्छाशक्ति और ध्येय निष्ठा की है। 1970 के दशक से चले आ रहे ख़ूनी आतंक, हथियारबंद माओवादियों का तय समय पर खात्मा सुनिश्चित हुआ। लेकिन जितना कह देना आसान है । उतना आसान नहीं था इस माओवादी आतंक का समूलनाश कर देना। इसके लिए केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की स्पष्टता और ज़ीरो टॉलरेंस की नीति है। इस अभियान की सफलता के नायक वो सुरक्षाबल हैं। जो अपने प्राण हथेली पर रखकर — माओवादियों के अभेद्य कहे जाने वाले ठिकानों तक पहुंचे। पूरे नक्सल माड्यूल का खात्मा किया। सरकार की ‘पहले बोली फिर गोली’ वाली नीति अत्यंत कारगर सिद्ध हुई। साथ ही सरेंडर करने वाले नक्सलियों के लिए पुनर्वास नीति महत्वपूर्ण मानवीय पहलू है। जो उन्हें गरिमापूर्ण जीवन देती है।  सत्य ये है कि

माओवादी आतंक का सबसे बड़ा दंश अगर किसी ने झेला तो वो छत्तीसगढ़ रहा। लेकिन 31 मार्च 2026 की तारीख़ — नक्सलवाद के खात्मे के तौर पर दर्ज हो गई। छत्तीसगढ़ का बस्तर जहां कभी गोलियां और निर्दोषों की चीखें गूंजती थीं। अब वहां शांति, प्रगति और लोकतंत्र की नई किरणें चमकती हुई दिखाई दे रही हैं।छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के समाप्त होने में केंद्र सरकार, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और गृहमंत्री विजय शर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका है। डबल इंजन की सरकार के क्रांतिकारी निर्णयों के चलते ही माओवादी आतंक के ताबूत में अंतिम कील ठोंकी जा सकी। राजनीतिक नेतृत्व की सुस्पष्टता,

लक्ष्य के लिए समर्पण और जवानों की प्रतिबद्धता, निष्ठा ने नए युग का शुभारंभ किया है। छत्तीसगढ़ का नक्सलवाद से मुक्त होना लोकतंत्र के सूर्योदय जैसा है।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 30 मार्च2026 को लोकसभा में नक्सल उन्मूलन से जुड़े  महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर ध्यानाकर्षित किया। उन तमाम आरोपों के सिलसिलेवार तरीके से जवाब दिए। जो माओवादियों के रहनुमाओं द्वारा लगाए जाते हैं। साथ ही गृहमंत्री शाह ने ऐसे-ऐसे तथ्य देश के सामने रखे। जो हर किसी को जानना चाहिए।शाह के मुताबिक — “साल 2024, 2025 और 2026 का संयुक्त आंकड़ा इस प्रकार है — 4,839 नक्सलियों ने सरेंडर किया, 2,218 जेल गए और 706 नक्सलियों को मुठभेड़ में मार गिराया गया, जो दूसरों को बंधक बनाकर सरेंडर होने ही नहीं देते थे। यही शासन का अप्रोच होना चाहिए, जो वार्ता करना चाहता है, उसके साथ संवाद; और जो हमारे जवानों, किसानों, आदिवासियों और बच्चों पर गोली चलाता है, उसका जवाब गोली से देना चाहिए। यही शासन का नियम और यही शासन का मुद्दा है।”

वैसे हथियारबंद नक्सलवाद तो ख़त्म हो गया और जहां भी पनपता दिखाई देगा, सुरक्षाबल वहीं ठिकाने लगा देंगे। लेकिन ‘अर्बन नक्सल’ का ख़तरा अब भी मौजूद है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में 30 मार्च 2026 को जिन तथ्यों की ओर ध्यान दिलाया। उन पर चर्चा करना अत्यन्त आवश्यक है। वस्तुत: अर्बन नक्सल और हथियार बंद नक्सलियों में कोई विशेष अंतर नहीं है। अंतर सिर्फ़ इतना है कि—हथियारबंद माओवादी — हथियार से लोगों की हत्या करते थे।  अर्बन नक्सली — अपने एसी केबिनों, यूनिवर्सिटीज, एनजीओ, एक्टिविस्ट, कलम घिस्सू, चीखती-चिल्लाती आवाज़ों, नाटक मंडलियों, किताबों की शक्ल में — रक्तपात का प्रोपेगैंडा फैलाते हैं। रक्तपात के लिए हथियारबंद माओवादियों को तैयार करते हैं। जब हथियार बंद माओवादी कमजोर पड़ते हैं, तो अर्बन नक्सली मदद भेजते हैं। जब अर्बन नक्सली कमज़ोर पड़ते हैं तो हथियार बंद माओवादी मदद के लिए आगे आते हैं। ये सिलसिला 70 के दशक से चलता आ रहा है। देश से हथियारबंद नक्सलवाद के ख़त्म होने के बाद अर्बन नक्सली नई रणनीति पर जुट गए होंगे। ऐसे में उस पूरे माड्यूल को समझना और तथ्यों को सार्वजनिक प्रकाश में लाना समय की मांग है।

अर्बन नक्सली कैसे काम करते हैं? उसे ऐसे समझें कि —  जब से मोदी सरकार ने नक्सलवाद को ख़त्म करने की 31 मार्च 2026 की डेडलाइन दे दी थी। उसके बाद से लगातार —माओवादी आतंकियों के पक्ष में नैरेटिव तैयार किया जा रहा था। माओवादियों के ख़िलाफ़ की जाने वाली कार्रवाइयों को ग़लत बताया जा रहा था। बातचीत न करने के आरोप लगाए जा रहे थे।

ऐसे में गृहमंत्री अमित शाह सदन में जब चर्चा करने आए तो वो फैक्टशीट के साथ आए। उन्होंने इसी संदर्भ में कहा —“मैंने छह दिनों में ‘अर्बन नक्सलस’ के लगभग 2,000 आर्टिकल निकाले हैं, सभी इनके समर्थक बुद्धिजीवियों के लिखे हुए। इनके सारे आर्टिकल यही कहते हैं कि हथियार उठाकर घूम रहे माओवादियों के साथ चर्चा करो, ये अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं, इन्हें मारना नहीं चाहिए, उनके प्रति सहानुभूति होनी चाहिए। लेकिन कोई भी आर्टिकल, 8 साल के अबोध बच्चे के लिए नहीं है, जिसे उठाकर हथियार पकड़ा दिया गया। कोई भी आर्टिकल उस किसान के लिए नहीं है, जिसका पैर खेत में जाते हुए उड़ गया और जो आज जीवनभर दिव्यांग है। 5,000 से ज़्यादा सिक्योरिटी फोर्सेस शहीद हुए, उनकी विधवाओं के लिए एक भी आर्टिकल नहीं है, उनके अनाथ बच्चों के लिए कोई लेख नहीं है। उनकी मानवता केवल संविधान तोड़कर हथियार उठाने वालों के लिए है?”

बात केवल इतनी ही नहीं है।जब साल 2005 में माओवादी आतंक के ख़िलाफ़ जन आंदोलन खड़ा हुआ। बस्तर टाइगर के नाम से सुप्रसिद्ध राजनेता महेंद्र कर्मा इसके योजनाकार थे।‌

‘सलवा जूडूम’ के ज़रिए स्थानीय जनजातीय युवाओं को SPO बनाया गया। उन्हें माओवादियों से लड़ने के लिए प्रशिक्षण और शस्त्र दिए गए। इसके चलते माओवादी आतंक पर नकेल कसनी शुरू हो गई थी। लेकिन अर्बन नक्सलियों को ये पहल रास नहीं आई। उसके बाद ‘सलवा जुडूम’ को वापस लेने के लिए एक सुनियोजित रणनीति शुरू हुई। 5 जुलाई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया।  ‘नन्दिनी सुन्दर और अन्य’ द्वारा दायर विवाद पर जस्टिस सुदर्शन रेड्डी की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह आदेश दिया कि नक्सलियों के खिलाफ राज्य की लड़ाई गैर-कानूनी है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत सलवा जुडूम से जुड़े लोगों से हथियार वापस लेने का आदेश जारी किया।

किंतु इसका परिणाम क्या हुआ? सलवा जुडूम बैन होने से  माओवादी आतंकियों को एक कवच मिला।  सलवा जुडूम के SPO ‘कोया कमांडोज’ से उनके हथियार वापस ले लिए गए। इस बीच माओवादियों ने चुन-चुनकर उन लोगों की हत्याएं की। जो सलवा जुडूम से जुड़े हुए थे‌।मई 2013 में सुकमा-जगदलपुर मार्ग से गुज़र रहे महेंद्र कर्मा के काफिले पर — झीरम घाटी में घात लगाए नक्सलियों ने हमला कर दिया। महेंद्र कर्मा समेत 30 से अधिक नेता और सुरक्षा जवानों को माओवादियों ने मौत के घाट उतार दिया। इस हमले का भी मास्टरमाइंड वही ‘माडवी हिड़मा’ था जिसे अर्बन नक्सली ‘हीरो’ की तरह ग्लैमराइज कर रहे हैं। जबकि ‘माडवी हिड़मा’ को

दुर्दांत अपराधी बनाने के पीछे अर्बन नक्सली ही थे। जिन्होंने हिड़मा के ज़रिए — रक्तपात किया। निर्दोषों का ख़ून बहाया। वो हिड़मा जो अपनी मां, बाप, घर-परिवार, गांव और अपने जनजातीय समाज का सगा नहीं हुआ। वो हिड़मा जिसने सैकड़ों निर्दोष लोगों की बर्बरतापूर्ण ढंग से हत्या की। अब , अर्बन नक्सली हीरो बनाने पर जुटे हैं। ये दुर्भाग्यपूर्ण है।  तथ्य ये भी है कि—महेंद्र कर्मा की नक्सलियों ने इसीलिए हत्या की, क्योंकि उन्होंने ‘सलवा जूडूम’ की शुरुआत की थी। उन्होंने कांग्रेस की पार्टी लाइन से  हटकर माओवादी आतंकवाद के ख़िलाफ़ मोर्चा लिया था।

अब, सलवा जुडूम को बैन करवाने से जुड़े  दो किरदारों की बात करते हैं जिनका गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में ज़िक्र किया। इन दोनों का कांग्रेस से कैसे कनेक्शन जुड़ता है? इस पर भी चर्चा करेंगे। पहली हैं नंदिनी सुंदर और दूसरे हैं जस्टिस सुदर्शन रेड्डी। नंदिनी सुंदर, डीयू की प्रोफेसर हैं जिन पर माओवादियों का साथ देने के आरोप लगते रहे हैं। वहीं उनके ख़िलाफ़ साल 2016 में एक आदिवासी की हत्या का मुक़दमा दर्ज हुआ था। दरअसल, बस्तर क्षेत्र के सुकमा जिले के नामा गांव में ग्रामीण शामनाथ बघेल की हत्या के आरोप में पुलिस ने मृतक की पत्नी की लिखित शिकायत पर FIR दर्ज की थी। उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर , जेएनयू की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद, विनीत तिवारी और  छतीसगढ़ में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते  और अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। हालांकि 2018 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार आई। साल 2019 में भूपेश सरकार ने नंदिनी सुंदर के ख़िलाफ़ दर्ज केस वापस ले लिया था। दूसरे हैं जस्टिस सुदर्शन रेड्डी जिन्होंने ‘सलवा जुडूम’ को असंवैधानिक बताकर बैन किया था। वो उपराष्ट्रपति उपचुनाव 2025 में कांग्रेस और इंडी गठबंधन के प्रत्याशी बने।

इसी आधार पर गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में तीखा हमला बोलते हुए कहा था कि —“जस्टिस सुदर्शन रेड्डी विपक्ष का उपराष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बने, यह स्पष्ट करता है कि कांग्रेस पार्टी का कहना ‘हमारा क्या लेना-देना’ सही नहीं है। हमारे न्यायतंत्र में न्यायधीश को तटस्थ माना जाता है, लेकिन यदि कोई न्यायधीश अपनी व्यक्तिगत विचारधारा को संवैधानिक पोशाक में बदलकर आदेश जारी करता है और इसके कारण हजारों निर्दोष आदिवासियों की जान जाती है, तो मैं इस न्यायनिर्णय की घोर निंदा होनी चाहिए। जिन लोगों ने इन्हें वोट दिया और प्रत्याशी बनाया, उन्हें यह समझना चाहिए कि विचारधारा जनता के भले से ऊपर नहीं हो सकती। विचारधारा कभी भोले-भाले आदिवासियों की सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकती। विचारधारा जनता के कल्याण से ऊपर नहीं हो सकती।”

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सदन में जिस तरह से कांग्रेस पर नक्सलियों को संरक्षण देने के आरोप लगाए।वो झकझोर कर रख देने वाले हैं।

ऐसे में सवाल उठते हैं कि— क्या ‘सलवा जुडूम’ बैन, नंदिनी सुंदर, जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी  और कांग्रेस का कनेक्शन केवल एक संयोग है या सुनियोजित तंत्र?

इसके अतिरिक्त भी  गृहमंत्री अमित शाह ने मनमोहन सरकार के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की सबसे पॉवरफुल काउंसिल NAC के बारे में भी तीखे प्रहार किए। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली NAC में नक्सलवाद माओवाद से जुड़े लोगों की भूमिका पर भी पर्याप्त प्रकाश डाला। उन्होंने इसे ‘अर्बन नक्सल’ इकोसिस्टम से जोड़ा। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा —“1970 से नक्सली आतंक क्यों चला, इसका मूल समझना आवश्यक है। जब मनमोहन सिंह जी की सरकार बनी, तब एक NAC यानी नेशनल एडवाइजरी काउंसिल बनाई गई। यह एक्स्ट्रा कॉन्स्टिट्यूशनल फोरम था, देश की नीति और कानून बनाने वाला। इस फोरम में सोनिया गांधी अध्यक्ष थीं, हर्ष मंदर इसके सदस्य थे, उनके एनजीओ ‘अमन वेदिका’ ने शीर्ष नक्सली नेता की पत्नी को जिम्मेदारी दी। रिकॉर्ड है कि वही नक्सलियों में शामिल थी जिन्होंने अपहरण किए थे।  इस NAC ने देश की नीति निर्धारण की, रामदयाल मुंडा कहते थे कि— नक्सल ऑपरेशन ज़रूरत से ज़्यादा कठोर है। प्रच्छन्न समर्थन ने नक्सलियों की हिम्मत बढ़ाई। शबनम हाशमी, राम पुनियानी, उषा रामनाथन, एनसी सक्सेना, जीन ड्रेज़, फराह नकवी और विनायक सेन जैसे लोग—2010 में अदालत द्वारा दोषी पाए गए—फिर भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। जयराम रमेश ने महेश राउत, जो नक्सली था, उसकी रिहाई के लिए तत्कालीन कांग्रेस मुख्यमंत्री को पत्र लिखा।”

उपर्युक्त तथ्य डराने वाले हैं। ये तथ्य ये बताते हैं कि कैसे दशकों तक कांग्रेस और माओवादियों के गठबंधन के चलते देश हिंसा झेलता रहा। छत्तीसगढ़ के बस्तर समेत देश के कई राज्यों में नक्सलवाद का रक्त चरित्र देखने को मिला। कैसे माओवादी आतंकी- कांग्रेस के संरक्षण में आतंक मचाते रहे। देश के संविधान और कानून से ऊपर उठकर नक्सलियों ने पूरे जनजीवन को त्रासदी में बदल दिया था।‌

गृहमंत्री अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को संसद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर अब तक – ‘माओवाद, अर्बन नक्सल, कांग्रेस’ के अंतर्संबंधों को लेकर ही बातें नहीं रखी। बल्कि वर्तमान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लेकर भी चौंकाने वाले खुलासे किए। गृहमंत्री अमित शाह ने सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि — “जब सर्वोच्च सत्ता के केंद्र में नक्सल समर्थक बैठें, तो नक्सलियों का हौसला कैसे टूटेगा? यह कांग्रेस पार्टी ने किया था, यह इतिहास है। राहुल गांधी के राजनीतिक करियर में कई बार नक्सलियों और उनके हमदर्दों के साथ देखा गया। भारत जोड़ो यात्रा में कई नक्सल फ्रंटल संगठन शामिल थे। राहुल गांधी ने 2010 में ओडिशा में लाडो सिकोका के साथ मंच साझा किया, 2018 में हैदराबाद में गुम्माडी विट्ठल राव उर्फ ‘गद्दार’ से मुलाकात की। 2025 में कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ पीस के साथ मुलाकात हुई। हिडमा, जिसने 172 जवानों को मारा, वो जब मारा गया तो इंडिया गेट पर नारे लगे कि ‘कितने हिड़मा मारोगे, हर घर से निकलेंगे हिडमा’।— यह वीडियो राहुल गांधी ने खुद ट्वीट किया। वर्ष 2010 से मार्च 2026 तक नक्सलवाद का समर्थन जारी रहा, 20,000 लोगों की हत्या का दोषी अगर कोई एक है, तो कांग्रेस और उनकी वामपंथी विचारधारा वाली पार्टी है। नक्सलियों के बीच रहकर ये पार्टी और उनके नेता स्वयं नक्सलवादी बन गए।”

 

समेकित तौर पर कहा जाए तो अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे को लेकर अपने संबोधन में जिन तथ्यों का उल्लेख किया। वो एक ओर हथियार बंद माओवादी आतंक पर निर्णायक जीत प्रकट करते हैं। दूसरी ओर अर्बन नक्सलियों के गंभीर ख़तरों को भी देश के सामने लाते हैं। लेकिन शाह ने इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि अर्बन नक्सली भी बख़्शे नहीं जाएंगे। अगर देश और समाज में हिंसा, रक्तपात, संघर्ष के विषैले नाग निकलेंगे तो फन सहित कुचल दिए जाएंगे। क्योंकि ये देश संविधान, कानून और राष्ट्रीयता के भाव से चलता है। जो भी देश और समाज को उपद्रकवारी संघर्ष में झोंकेगा उसका हश्र— वही होगा जो माओवादी आतंक का हुआ है। लेकिन

एक व्यक्ति और समाज के नाते हम सभी की ये जिम्मेदारी बनती है कि—हम भी अपने आस-पास ऐसे माड्यूल की पहचान करें। संविधान सम्मत ढंग से उनका प्रतिकार करें।

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गुरु पूर्णिमा-भगवा ध्वज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ https://visionviksitbharat.com/gurupurnima-gurudakshina-bhagwa-dhwaj-rss/ https://visionviksitbharat.com/gurupurnima-gurudakshina-bhagwa-dhwaj-rss/#respond Sun, 13 Jul 2025 07:22:58 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1825 भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्ता सृष्टि के आरंभ से ही अपने चिरकालिक शाश्वत स्वरूप में दिखाई देती है। जो विभिन्न कालप्रवाहों में भी कभी बाधित नहीं हुई। भारतीय संस्कृति…

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भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्ता सृष्टि के आरंभ से ही अपने चिरकालिक शाश्वत स्वरूप में दिखाई देती है। जो विभिन्न कालप्रवाहों में भी कभी बाधित नहीं हुई। भारतीय संस्कृति ही एक ऐसी विशिष्ट संस्कृति है कि यहां गुरु को ईश्वर के रूप में स्वीकार कर उनकी वंदना की जाती है। गुरु अर्थात् जो अज्ञान के अंधकार से दूर कर ज्ञान रुपी अक्षय प्रकाश पुञ्ज की ओर ले जाएं। गुरु भारतीय जीवन में ‘सत्व-तत्व-सत्य’ के रूप में मिलते हैं।जो मनुष्य के इहलोक ही नहीं बल्कि परलोक को भी अपनी कृपादृष्टि से सुधारते हैं।पुण्यता का पथ प्रशस्त करते हैं। इसीलिए भारत की सनातन परंपरा ने धार्मिक एवं आध्यात्मिक अर्थों में साकार और निराकार दोनों रुपों में गुरु को प्रतिष्ठित किया। कभी त्रिदेव के रुप में में आराधना करते हुए स्तुति की गई—

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

 स्कन्द पुराण में गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनकी वंदना में कहा गया —

ध्यानमूलं गुरुर्मूर्तिः पूजामूलं गुरुर्पदम्।
मंत्रमूलं गुरुर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरुकृपा॥

उसी परंपरा को प्रति वर्ष अषाढ़ मास में आने वाली व्यास पूर्णिमा की तिथि को ‘गुरुपूर्णिमा’ के पावन अवसर के तौर पर मनाया जाता है। यह तिथि हमारी सांस्कृतिक चेतना और विरासत का जीवंत शाश्वत प्रवाह है।जो राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति के सर्वोच्च और सार्वभौमिक सत्य और आदर्श के प्रति श्रद्धा एवं मानवंदना की प्रतीक है।गुरु पूर्णिमा को गुरु पूजन कर हम नतशीश होते हैं और गुरुकृपा का पुण्य लाभ अर्जित करते हैं। भारत की इसी परंपरा ने ध्वज विशेषकर भगवा ध्वज को भी अपने गुरु और सर्वोच्च आदर्शों के रूप में माना है। भगवा ध्वज अर्थात् भगवान का ध्वज;इस रूप में हम अपने शाश्वत प्रतीकों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते आ रहे हैं।वैदिक युग से लेकर रामायण और महाभारत के कालखंड और भारतीय राजवंशों की परंपरा में ‘ध्वज’ का अपना विशिष्ट स्थान है। विशेषतया ‘भगवा ध्वज’ (केसरिया) त्याग, तप, तेज और बलिदान के प्रतीक के रूप में भारत की संस्कृति और आदर्शों में रचा बसा हुआ है।

भारतीय संस्कृति के  समस्त मानबिंदुओं और सर्वोच्च आदर्शों के आधार पर गठित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2025 की  विजयादशमी की तिथि से सौ वर्ष की यात्रा पूर्ण कर लेगा। जोकि आधुनिक विश्व इतिहास में किसी भी सांस्कृतिक संगठन की तत्वनिष्ठ पद्धति के रूप में शोध का विषय है।संघ ने राष्ट्र सर्वोपरि और हिंदू समाज के संगठन का महान व्रत लिया। भारत माता को परम् वैभव संपन्न बनाने के लिए असंख्य स्वयंसेवकों की दीपमालिका तैयार की। जो समाज जीवन के समस्त क्षेत्रों में कार्यरत हैं। गुरु पूर्णिमा और भगवा ध्वज को लेकर संघ की मान्यता को लेकर प्रायः चिंतन-मनन होते ही रहते हैं। ऐसे में भगवा ध्वज, गुरु पूर्णिमा और गुरु दक्षिणा को लेकर संघ की पद्धति क्या है? संघ ने किस प्रकार ये संरचना विकसित की और इसके पीछे क्या कारण हैं? इनके विषय में जानने के लिए— हमें संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार से लेकर द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी और वर्तमान तक संघ की कार्यपद्धति और दृष्टि का सिंहावलोकन करना होगा।

27 सितम्बर 1925 को विजयादशमी की तिथि को हिन्दू समाज को संगठित और सशक्त करने का  ध्येय लेकर जन्मजात देशभक्त  डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। 10 नवम्बर 1929 को संघ की औपचारिक संरचना के उद्देश्य से उन्हें सरसंघचालक चुना गया। इस प्रकार वे संघ के संस्थापक सरसंघचालक कहलाए। संघ की शुरुआत करने से पूर्व वे स्वतन्त्रता संग्राम के प्रखर क्रान्तिकारी नेता के रूप में भी बहुचर्चित रहे।कांग्रेस में रहने के दौरान क्रान्तिकारी गतिविधियों में शामिल होने के चलते उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।  डॉ. हेडगेवार के सम्मुख भारत माता की सेवा का जो भी कार्य आया। उसे उन्होंने अपनी सम्पूर्ण निष्ठा से निभाया। वे उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ – साथ स्वातंत्र्य समर के विभिन्न समूहों के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभा रहे थे। गांधी जी के सत्याग्रह आन्दोलन के समय भी डॉ हेडगेवार  को ‘राज्य समिति के सदस्य’ के रूप में क्रान्तिकारी गतिविधियों में भाग लेने के चलते सन् 1917 में जेल भी जाना पड़ा था। इतना ही नहीं जब गांधी जी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में भी उन्होंने  सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभाई।आन्दोलन में सहभागिता निभाने के कारण अंग्रेज सरकार ने उन पर देशद्रोह मुकदमा दर्ज कर उन्हें कारावास में बंद कर दिया था। जहां उन्हें 19 अगस्त 1921 को 1 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। लेकिन जेल की यातनाओं से भी क्रान्तिधर्मी डॉ. हेडगेवार  किञ्चित मात्र भी विचलित नहीं हुए। बल्कि उनके अन्दर का राष्ट्रभक्त — राष्ट्रभक्ति की साधना में तपता ही चला गया।

आगे चलकर डॉ. हेडगेवार ने जब 1925 में संघ की शुरुआत की तब उन्होंने घोषणा की थी—

“हमारा उद्देश्य हिन्दू राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता है, संघ का निर्माण इसी महान लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए हुआ है।”

वैसे 1925 में संघ की विधिवत शुरुआत हो चुकी थी लेकिन स्थायित्व और संगठनात्मक सुव्यवस्था – दृढ़ीकरण को लेकर डॉ. हेडगेवार चिंतन करते रहते थे।चूंकि किसी भी संगठन को चलाने के लिए अर्थ ( धन ) की आवश्यकता होती है। अतएव संघ के लिए धन कहां से आएगा? आर्थिक अनुशासन के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए। इन समस्त बिन्दुओं पर उन्होंने स्वयंसेवकों से विचार विमर्श किया। किसी ने चंदा लेने, किसी ने दान, किसी ने सदस्यता शुल्क तो किसी ने निजी बचत से संघ कार्य के संचालन का सुझाव दिया। अन्ततः डॉ. हेडगेवार ने ‘गुरु पूजन और समर्पण’ की अपनी संकल्पना प्रस्तुत की। इसके लिए गुरु पूर्णिमा (व्यास  पूर्णिमा) को चुना गया। तय किया गया कि इसी दिन गुरु के समक्ष सभी स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा के रूप में समर्पण करेंगे। चूंकि डॉ. हेडगेवार ने  उस समय स्वयंसेवकों के मध्य यह प्रकट नहीं किया था कि गुरु के रूप में वे किसे स्वीकार कर रहे हैं? इसलिए सभी स्वयंसेवकों के मन में भांति-भांति प्रकार की जिज्ञासा थी। गुरु को लेकर अपनी अपनी कल्पना – परिकल्पना थी। किन्तु  जब 1928 में संघ के पहले गुरुपूजन, गुरु पूर्णिमा का अवसर आया तो डॉ . हेडगेवार के भाषण को सुन वहां उपस्थित स्वयंसेवक अचम्भित रह गए। उस दिन सर्वप्रथम उन्होंने कहा था —

“गुरु के रूप में हम परम पवित्र भगवा ध्वज का पूजन करेंगे और उसके सामने ही समर्पण करेंगे।”

अर्थात्  हेडगेवार ने स्पष्ट रूप से संघ के गुरु के रूप में ‘भगवा’ ध्वज की प्रतिष्ठा की घोषणा कर दी थी‌। उन्होंने संघ के लिए ‘भगवा ध्वज’ को ही गुरु के रूप में क्यों स्वीकार किया? इसके सम्बन्ध में गुरुपूजन के अवसर पर  उन्होंने भगवा ध्वज की महत्ता और उसकी ऐतिहासिक सांस्कृतिक प्रतिष्ठा पर विस्तार से प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा था कि—

“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी भी व्यक्ति को गुरु न मानकर परम् पवित्र भगवा ध्वज को ही गुरु मानता है। व्यक्ति कितना भी महान हो फिर भी उसमें अपूर्णता रह सकती है। इसके अतिरिक्त यह नहीं कहा जा सकता कि व्यक्ति सदैव ही अडिग रहेगा। तत्व सदा अटल रहता है। उस तत्व का प्रतीक भगवा ध्वज भी अटल है। इस ध्वज को देखते ही राष्ट्र का सम्पूर्ण इतिहास, संस्कृति और परम्परा हमारी आँखों के सामने आ जाती है। जिस ध्वज को देखकर मन में स्फूर्ति का संचार होता है वह अपना भगवा ध्वज ही अपने तत्व के प्रतीक के नाते हमारे गुरु-स्थान पर है। संघ इसीलिए किसी भी व्यक्ति को गुरु-स्थान पर रखना नहीं चाहता।”

(डॉ. हेडगेवार चरित,सप्तम संस्करण 2020, लोकहित प्रकाशन, लखनऊ पृ. 191, लेखक ना.ह.पालकर )

अपने भाषण के उपरान्त सबसे पहले डॉ. हेडगेवार ने स्वयं गुरु पूजन किया। तत्पश्चात वहां उपस्थित स्वयंसेवकों ने भगवा ध्वज की गुरु के रूप में पूजा की और अपना- अपना समर्पण दिया। इस प्रकार वर्ष 1928 में नागपुर में संपन्न हुए गुरु पूर्णिमा- गुरुपूजन उत्सव में  स्वयंसेवकों ने 84 रुपए और कुछ आने ही गुरु दक्षिणा के रूप में समर्पण किया। स्पष्टतः  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में संगठन की शुरुआत करते हुए डॉ. हेडगेवार ने  संघ के लिए ‘व्यक्तिनिष्ठ’ के स्थान पर ‘तत्वनिष्ठ’ होने की पद्धति विकसित की। पद नहीं अपितु ‘दायित्व’ की पद्धति को अपनाया।‌ उन्होंने संघ को लेकर जिन मूल संकल्पनाओं एवं व्यवस्थाओं का सूत्रपात किया वे वर्तमान तक अपने उसी स्वरुप में दिखाई देती हैं।

संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्री गुरुजी’ से लेकर वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत तक ने गुरु के रूप में ‘भगवा ध्वज’ की महत्ता को बारम्बार उद्धाटित किया है। 23 अगस्त 1966 को पुणे में आयोजित गुरु पूर्णिमा के अवसर पर श्री गुरुजी ने स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहा था कि —

“हम सब लोग जानते हैं कि हमारे संघ कार्य में हमने किसी व्यक्ति विशेष को गुरु नहीं माना है। शास्त्रों में गुरु की बड़ी महत्ता बतायी गई है। गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना गया है। हमारे ऋषियों ने गुरु के गुण विस्तार से बखाने हैं। अब इतने गुण किसी एक व्यक्ति में पाना कठिन है। किसी व्यक्ति में हम कुछ श्रेष्ठ बातें देख लेते हैं, तो हम उसका आदर करने लगते हैं । परन्तु थोड़े ही दिनों में जब उसके दोष ध्यान में आ जाते हैं तब हमारे मन में अनादर उत्पन्न होता है। कदाचित् हम उसका तिरस्कार ही करने लगते हैं। यह सब घोर अनुचित है। क्योंकि गुरु का त्याग अपने यहाँ बड़ा पाप माना गया है। परन्तु यह सब हो सकता है, क्योंकि मनुष्य मात्र स्खलनशील है । गायत्री मंत्र के निर्माता विश्वामित्र बड़े उग्र तपस्वी और महान द्रष्टा थे।परन्तु उनका भी तो आखिर पतन हुआ।अतः किसी भी व्यक्ति को ऐसा अहंकार नहीं करना चाहिए कि मैं निर्दोष हूँ और परिपूर्ण हूँ।मनुष्य – जीवन की कली खिलकर बड़ा सुंदर और सुगंधी पुष्प विकसित हो जाता है। परन्तु पता नहीं कैसे और कहाँ से उसमें कीड़ा लग जाता है।अतः जब तक जीवन पूर्ण नहीं हो जाता, तब तक उसका मूल्यांकन नहीं किया जाता। इसलिये संघ कार्य में उचित समझा गया है कि हम भावना, चिन्ह, लक्षण या प्रतीक को गुरु मानें। हमने संघ कार्य के द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र के पुनर्निर्माण का संकल्प किया है। समाज के सव व्यक्तियों के गुणों तथा शक्तियों को हमें एकत्र करना है।इस ध्येय की सतत् प्रेरणा देने वाले गुरु की हमें आवश्यकता थी।”

(गुरु दक्षिणा, मा.स. गोलवलकर , चतुर्थ संस्करण 1998, जागृति प्रकाशन, नोएडा, पृ. 4)

संघ के स्वयंसेवक वर्ष में एक बार भगवा ध्वज के समक्ष गुरु पूजन का ‘समर्पण’ करते हैं। संघ में यही गुरु दक्षिणा मानी जाती है।‌ इसी से वर्ष भर संघ के कार्यों का संचालन होता है। गुरु दक्षिणा अर्थात् ‘समर्पण’ को लेकर श्री गुरुजी कहते थे कि —

“गुरुदक्षिणा, याने निश्चित धनराशि देने का आग्रह अथवा नियमित रूप से इकठ्ठा किया जाने वाला चंदा नहीं है। यह कार्य केवल स्वेच्छा का है। जीवन कष्टमय हो गया है, कुटुंब का भरणपोषण ठीक से नहीं हो पाता अथवा मैंने कम धन दिया तो लोग क्या कहेंगे?  इस कारण यह पूजन टालना नहीं चाहिए। यहाँ आकर अंतः करण की ओत-प्रोत श्रद्धा से ध्वज को प्रणाम कर केवल एक पुष्प अर्पण किया तो भी काफी है। इस प्रकार के भाव से दिया हुआ एक पैसा भी धनी व्यक्ति द्वारा अर्पित किए गए सहस्रों रुपयों से अधिक मूल्य का है।“

संघ के वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत भी गुरु दक्षिणा और भगवा ध्वज की महानता के सन्दर्भ में अपने उद्बोधनों के माध्यम से उन्हीं विचारों को प्रकट करते  हैं। विज्ञान भवन नई दिल्ली में आयोजित ‘भविष्य का भारत ‘ व्याख्यानमाला कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था—

“हमारा संघ स्वावलंबी है। जो खर्चा करना पड़ता है वो हम ही जुटाते हैं। हम संघ का काम चलाने के लिए एक पाई भी बाहर से नहीं लेते। किसी ने लाकर दी तो हम लौटा देते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयंसेवकों की गुरुदक्षिणा पर चलता है। साल में एक बार भगवा ध्वज को गुरु मानकर उसकी पूजा में दक्षिणा समर्पित करते हैं। भगवा ध्वज गुरु क्यों, क्योंकि वह अपनी तब से आज तक की परम्परा का चिह्न है। जब-जब हमारे इतिहास का विषय आता है, ये भगवा झंडा कहीं न कहीं रहता है ।”

(‘भविष्य का भारत’, विज्ञान भवन नई दिल्ली 17 – 19 सितंबर 2018 )

डॉ. हेडगेवार ने जब संघ के संचालन के लिए आदर्श और प्रतीक चुने तो व्यक्ति को नहीं बल्कि विचारों को चुना । इसके लिए उन्होंने भारत के स्वर्णिम अतीत को आत्मसात करने का दिग्दर्शन प्रस्तुत किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति के शाश्वत प्रतीक द्वय — ‘भगवा ध्वज’ और ‘भारत माता की जय’ के घोष को केन्द्र में रखा और संघ कार्य प्रारम्भ किया।  इस सम्बन्ध में  संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर — ‘ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: स्वर्णिम भारत के दिशा सूत्र ‘ में लिखते हैं — “स्थायित्व, सुनिश्चितता तथा उन्नति व अवनति के समय में दरारों से बचने के लिए डॉक्टर जी ने दो प्रतिष्ठित व पवित्र प्रतीकों को प्रतिष्ठापित किया—’भगवा ध्वज’ और ‘भारत माता की जय’ का घोष। चिरकाल से भगवा ध्वज, त्याग, तपस्या, शौर्य और ज्ञान जैसे शाश्वत मूल्यों का पर्याय रहा है। महाराणा प्रताप से लेकर शिवाजी तक सभी महान् योद्धाओं ने इसकी छत्रछाया में ही युद्ध लड़े हैं, मनीषियों ने इसकी प्रतिष्ठा में गीत गाए हैं, तपस्वियों ने इसकी आराधना की है। ‘भारत माता की जय’ का घोष भारत को माता के रूप में प्रतिष्ठापित करता है। इन दो शाश्वत प्रेरणास्त्रोतों के साथ स्वयंसेवकों ने बहुत छोटे रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को स्थापित किया और उद्यमपूर्वक इसका विकास किया है।”

( पृ. 47 , प्रभात प्रकाशन,  संस्करण 2022)

भगवा ध्वज की सनातनता और भारत के सांस्कृतिक जीवन में कैसी महत्ता रही है? भारत के लिए ‘भगवा ध्वज’ के निहितार्थ क्या हैं? इस संबंध में श्री गुरुजी के संबोधन का संक्षिप्तांश महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है — “हमारे समाज की सांस्कृतिक जीवन धारा में यज्ञ का बड़ा महत्व रहा है। ‘यज्ञ’ शब्द के अनेक अर्थ हैं।व्यक्तिगत जीवन को समर्पित करते हुए समष्टि जीवन को परिपुष्ट करने के प्रयास को ही ‘यज्ञ’ कहा गया है।सद्गुणरूप ‘अग्नि में अयोग्य, अनिष्ट, अहितकर बातों का होम करना ही यज्ञ है ।श्रद्धामय, त्यागमय, सेवामय, तपस्यामय जीवन व्यतीत करना ही यज्ञ है। यज्ञ की अधिष्ठात्री देवता अग्नि है।अग्नि का प्रतीक है ज्वाला, और ज्वालाओं का प्रतिरूप है – हमारा परमपवित्र ‘भगवा ध्वज। हम श्रद्धा के उपासक हैं, अन्धविश्वास के नहीं। हम ज्ञान के उपासक हैं, अज्ञान के नहीं। जीवन के हर क्षेत्र में बिल्कुल विशुद्ध रूप में ज्ञान की प्रतिष्ठापना करना ही हमारी संस्कृति की विशेषता रही है।अज्ञान के नाश के लिए ही हमारे ऋषि-मुनियों ने उग्र तपश्चर्या की है। अज्ञान का प्रतीक है अंधकार, और ज्ञान का प्रतीक है सूर्य।पुराणों में कहा गया है कि सूर्य नारायण रथ में बैठ कर आते हैं । उनके रथ में सात घोड़े लगे हैं और उनके आगमन के बहुत पहले उनके रथ की सुनहरी गैरिक ध्वजा फड़कती हुई दिखायी देती है।इसी ध्वज को हमने हमारे समाज का परम आदरणीय प्रतीक माना है।वह भगवान का ध्वज है।इसीलिए उसे हम ‘भगवद् ध्वज’ कहते हैं। उसी से आगे चलकर शब्द बना है – ‘भगवा ध्वज’ । वही हमारा गुरु है।”

( गुरु दक्षिणा, मा.स. गोलवलकर , चतुर्थ संस्करण 1998, जागृति प्रकाशन, नोएडा, पृ. 4)

अभिप्रायत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत की महान परंपरा और संस्कृति के महान आदर्शों को आत्मसात किया।श्रेष्ठ मूल्यों और विचार दृष्टि के साथ संघ की कार्यपद्धति विकसित की। राष्ट्रीयता के मूल्यों के आलोक में समाज का संगठन करते हुए सर्जनात्मकता का वृहद वातावरण निर्मित किया। जो संजीवनी शक्ति के तौर पर स्वयंसेवकों के आचरणों और संघ कार्य में स्पष्ट दिखाई देता है। संघ में ‘गुरु’ के रूप में ‘भगवा ध्वज’ की प्रतिष्ठा — तत्व निष्ठा के सर्वश्रेष्ठ -सर्वोच्च प्रतिमान के रूप में दिखाई देती है। भगवा ध्वज को गुरु के रूप में स्वीकार करने की संकल्पना के पीछे – भगवा में समाहित सूर्य की अनंत शक्ति, संन्यासियों के वेश में त्याग, तपस्या, पुरुषार्थ और सेवा का महत् संकल्प है।भगवा में भारत के दिग्विजयी सम्राटों/ वीरों के ध्वज की गौरवपूर्ण झंकार एवं राष्ट्रीय एकता-एकात्मता की महान संकल्पना अन्तर्निहित है। जो सतत् शौर्य और‌ साहस की असीम शक्ति का संचार कर रही है। इसी से प्रेरणा पाकर संघ के असंख्य स्वयंसेवक— समरसता की भावना के साथ संपूर्ण समाज को अपना मानकर राष्ट्रोत्थान और राष्ट्र निर्माण के कार्य में संलग्न हैं।डॉ. हेडगेवार द्वारा प्रणीत संकल्पना – पद्धति का अनुगमन करते हुए राष्ट्र निर्माण के पथ पर गतिमान हैं।

यह डॉ. हेडगेवार की उसी दूरदृष्टि का सुफल है कि अपनी ‘तत्व निष्ठा’ के चलते ही संघ अपने विविध अनुषांगिक संगठनों के साथ वृहद स्वरूप ले पाया। साथ ही डॉ हेडगेवार और श्री गुरुजी का विशद् दृष्टि का अनुकरण करते हुए संघ के स्वयंसेवक समस्त क्षेत्रों में अपनी कर्त्तव्याहुति समर्पित कर रहे हैं।‌लेकिन कार्यों और विचारों में कहीं भी ‘अहं’ नहीं मिलेगा बल्कि ‘वयं’ और ‘मैं नहीं तू’ की उदात्त भावना दिखाई देगी। इसी ‘कर्ता भाव’ के साथ संघ और उसके स्वयंसेवक राष्ट्रीयता के संस्कारों की दिव्य ज्योति को घर-घर तक पहुंचाने के लिए कृतसंकल्पित हैं।

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भाषायी विवादों के पीछे विभाजनकारी षड्यंत्र https://visionviksitbharat.com/divisive-conspiracies-behind-linguistic-disputes/ https://visionviksitbharat.com/divisive-conspiracies-behind-linguistic-disputes/#respond Thu, 10 Jul 2025 07:10:53 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1822 संत ज्ञानेश्वर और हिंदवी स्वराज्य प्रणेता छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यभूमि में राजनीतिक वितंडावादियों ने ‘भाषा’ के नाम पर जिस अराजकता का परिचय दिया। हिंसा का मार्ग अपनाते हुए विभाजनकारी…

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संत ज्ञानेश्वर और हिंदवी स्वराज्य प्रणेता छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यभूमि में राजनीतिक वितंडावादियों ने ‘भाषा’ के नाम पर जिस अराजकता का परिचय दिया। हिंसा का मार्ग अपनाते हुए विभाजनकारी सोच का उत्पात मचाया। वह हर किसी को अंदर से झकझोर देने वाला षड्यंत्र है। वस्तुत: ऐसा करने वालों के मूल में ‘मराठी अस्मिता’ का भाव नहीं है। बल्कि वे भारत की विराट पहचान को मिटाने की कुत्सित सोच से ग्रसित हैं। आप सोचिए कि जिस महान महाराष्ट्र की भूमि में – संत नामदेव , संत एकनाथ, संत तुकाराम महाराज, संत बहिणाबाई,संत जनाबाई, संत कान्होपात्रा और समर्थ रामदास, संत गाडगे जैसी महान विभूतियों ने राष्ट्रीय एकता और एकात्मता को स्थापित किया हो। मूल्यों, संस्कारों और आदर्शों का मार्ग दिखाया हो। उस भूमि से अगर अलगाव के उत्पाती कृत्य आ रहे हों तो यह निश्चित तौर पर महाराष्ट्र की छवि को धूमिल करने का षड्यंत्र ही सिद्ध होता है।‌ जो ‘मराठी अस्मिता’ के नाम पर समाज में विभाजन फैला रहे हैं। विराट हिंदू समाज को बांटने का षड्यंत्र कर रहे हैं। वे महाराष्ट्र के आदर्शों की कही या लिखी गई — ऐसी एक पंक्ति लाकर समाज के मध्य दिखला दें। जो किसी भी प्रकार के विभाजन की बात करती हो। ऐसे में क्या यह अक्षम्य अपराध नहीं है? क्या महाराष्ट्र की महान परंपरा को आघात पहुंचाने वालों को समाज स्वीकार करेगा?

ईश्वरीय निमित्त वश मुझे छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज्य स्थापना के 350 वें वर्ष पर एक ग्रंथ के संपादन का सौभाग्य मिला। उस समय मैंने छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़े कई ग्रंथों का अध्ययन किया।‌विभिन्न विद्वानों के विचारों को पढ़ा और सुना। लेकिन एक भी अंश ऐसा नहीं पाया जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने स्थानीयता, प्रांतीयता की परिधि में स्वयं को समेटा हो। उनके कार्यों और विचारों की दृष्टि सर्वदा अखिल भारतीय-अखंड भारत वर्ष पर ही केंद्रित रही।‌ शिवाजी महाराज ने जब स्वराज्य की स्थापना की तो उसका नाम उन्होंने ‘महाराष्ट्र’ या मराठी राज्य नहीं किया। अपितु उन्होंने उसका नामकरण’हिंदवी स्वराज्य’  किया। उन्होंने स्वराज्य के संचालन के लिए जब ‘राज व्यवहार कोश’ का निर्माण कराया।‌उस समय उन्होंने अरबी फ़ारसी के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ और मराठी के शब्दों का शब्दकोष बनवाया। इसी प्रकार शिवाजी महाराज की राजमुद्रा में ‘संस्कृत’ का प्रयोग किया गया। उनकी राजमुद्रा में लिखा रहता था—

“प्रतिपच्चन्द्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववन्दिता ।
शाहसूनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते ।।”

अभिप्रायत: छत्रपति शिवाजी महाराज ने जिस महान हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की। राष्ट्रीय एकता और एकात्मता को स्थापित किया। अब उस पर ‘मराठी अस्मिता’ के नाम पर आघात किया जा रहा है। विराट हिंदू पहचान को संकुचित और संकीर्ण दायरों में समेटने का अक्षम्य अपराध किया जा रहा है। ऐसा करने वाले ये वही लोग हैं जिन्हें ‘मराठी मानुष’ ने चुनावों में सिरे से खारिज़ कर दिया है। क्योंकि महाराष्ट्र की जनता अपनी महान विरासत के साथ राष्ट्रीय विचारों के साथ एकात्म है।उसे किसी भी हाल में विभाजन स्वीकार नहीं है। ऐसे में विभाजनकारी मानसिकता से ग्रस्त लोग और राजनेता; समाज की एकता को खंडित करने में जुट गए हैं। चाहे हिंदी हो, मराठी हो, तमिल, तेलुगू, कन्नड़ हो या बंगाली हो। संस्कृत हो मलयालम हो, कोंकणी,संथाली या उड़िया हो चाहे पंजाबी हो। याकि कश्मीरी, असमिया, बोडो या डोगरी हो। संथाली, सिंधी, नेपाली हो। सभी भारतीय भाषाएं हमारी हैं। भारत की कोख से जन्मी हर भाषा, बोली और परंपराएं हमारी अमूल्य विरासत हैं। ये किसी व्यक्ति विशेष या राज्य विशेष की संपत्ति नहीं हैं बल्कि हर भारतीय का जीवन मूल्य और संस्कार हैं। इनमें राष्ट्र की महान परंपरा और संस्कृति का अविरल और अक्षुण्ण प्रवाह अंतर्निहित है। जो एक ही धुन सुनाता है जय-जय जय भारत।‌

ऐसे में भला कोई ये दावा कैसे कर सकता है कि, ये मेरी भाषा है-ये तुम्हारी भाषा है? क्या हमारे महापुरुषों और भाषाओं ने किसी भी व्यक्ति, दल या समूह को ऐसे कोई अधिकार दिए हैं? क्या समाज ने कभी भी ऐसे विभाजन को स्वीकार किया है? क्या हमारे संविधान ने ऐसे किसी भी प्रकार के भेदभाव का प्रावधान किया है? इन सबका उत्तर है, नहीं। भारत के कोने-कोने में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी हर भाषा, बोली, परंपराओं के प्रति गहरा आदर और श्रद्धा रखता है। उसे अपनी सभी भाषाओं और सभी परंपराओं से प्रेम है। उसके लिए कुछ भी अपना या पराया नहीं है। हमारे सभी श्रद्धा के केंद्र, आदर्श, महापुरुष और भाषाएं हमें एकता के सूत्रों से गुंफित किए हुए हैं।‌हम सबका मस्तक अपनी महान परंपरा के हर मानबिंदु के समक्ष श्रद्धा से नत होता है। यही तो भारतीय मूल्य और संस्कार हैं।  हो सकता है सभी को हर भाषा नहीं आती हो। किसी को सभी भारतीय भाषाएं आती हों। किसी को दो-चार या उससे अधिक भाषाएं आती हों।‌लेकिन इसका अर्थ तो ये नहीं कि इस आधार पर कोई अपनी श्रेष्ठता का दावा करेगा? किसी के साथ अत्याचार या भेदभाव करेगा। यह तो असह्य है। इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।‌

दूजे जहां तक बात रही ‘हिंदी’ के विरोध की तो ये कोई नई बात नहीं है। भारत विभाजनकारी शक्तियां  ‘हिंदी और हिंदू’  के विरोध से अपना षड्यंत्र शुरू करते हैं और फिर हिंदुस्तान के विरोध में उतर जाते हैं। भारत विभाजनकारी शक्तियों का एक और अंतिम लक्ष्य है भारत राष्ट्र का खंडन करना। इसके लिए वो कभी समाज को भाषा के आधार पर लड़ाएंगे। कभी जाति और महापुरुष के नाम पर लड़ाएंगे।‌कभी क्षेत्रवाद, बोली, पहनावों और परंपराओं के नाम पर समाज के मध्य विभाजन की दीवार खड़ी करेंगे। क्योंकि उन्हें ये पता है कि विराट हिंदू समाज को छोटे-छोटे विभाजनों में फंसाकर आसानी से तोड़ा जा सकता है। लेकिन अगर एक और अंतिम पहचान ‘हिंदू’ है तो वे मुंह की खाएंगे। वे कभी भी हिंदू समाज को कमजोर नहीं कर पाएंगे। बस इसी के निमित्त वो कोई न कोई ऐसा भावनात्मक मुद्दा उठाएंगे जो हिंदू समाज को आपस में ही लड़ा देने वाला हो। वो भावनाओं को उद्वेलित करेंगे। मुद्दा बनाएंगे और समाज में विभाजन के विष फैलाने में जुट जाएंगे।

अक्सर जो राजनीतिक दल, नेता या समूह हिंदी या संस्कृत का विरोध करते दिखते हैं। वो क्या कभी विदेशी विशेषकर ‘अंग्रेजी’ भाषा का विरोध करते नज़र आए हैं? क्या कभी आपने ऐसा देखा है कि वे अंग्रेजी के बायकॉट का अभियान चलाते दिखे हों। आप एक भी उदाहरण नहीं देखेंगे। क्योंकि भाषायी आधार पर समाज में अलगाववाद फैलाने वालों का एजेंडा भारतीय भाषाओं-स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देना नहीं है। बल्कि हिंदी विरोध के नाम पर समाज में विभाजन उत्पन्न करना और ध्रुवीकरण करना है। ताकि उनकी राजनीतिक सत्ता बनी रहे और संपूर्ण हिंदू समाज एकजुट न हो पाए। इतना ही नहीं भाषायी या क्षेत्रीय आधार पर अलगाववाद फैलाने वालों के पीछे कई सारी भारत विरोधी शक्तियां काम करती हैं। जो कभी राजनेताओं के माध्यम से,कभी समूहों के माध्यम से विभाजन उत्पन्न करती रहती हैं।‌ प्रायः चुनावों के समय इसकी गति बढ़ जाती है। क्या आप ये सब अनुभव करते हैं? अगर हां तो तय मानिए कि ये सब बिल्कुल योजनाबद्ध ढंग से किया जाता है। आपने ध्यान दिया होगा कि असमय ही हिंदी विरोध की ये मुहिम कभी इस राज्य से तो कभी उस राज्य से दिखाई देती है। ये सब इसलिए होता है क्योंकि राष्ट्र की अधिसंख्य जनता हिंदी में एकता और राष्ट्रीयता का बोध पाती है। ऐसे में राष्ट्रीय एकता और अखंडता को व्यक्त करने वाले जितने भी प्रतीक, आदर्श और व्यवहार होंगे। उनके विरोध में अलगाववाद का वातावरण तैयार करना— राष्ट्रद्रोही शक्तियों का उद्देश्य है।‌

इसीलिए हम सबकी सतर्कता और सजगता की महती आवश्यकता है।‌ हम देश के किसी भी हिस्से में रहें। जहां भी पृथकता और अलगाववाद के ये कुकृत्य हों। उनका हमें मुखरता के साथ प्रतिकार करना चाहिए। क्योंकि हम सब भारतवासी — भारत माता की संतान हैं। जो हमारी माता का अपमान करेगा। भारत माता को पीड़ा देने का अपराध करेगा। हम भला उसे कैसे छोड़ सकते हैं? हमारी परंपरा तो यही कहती है न कि न्यायार्थ अपने बंधु को भी, दंड देना धर्म है। अतएव हम सबकी जितनी भी भिन्न-भिन्न पहचाने हैं  वो सब ‘राष्ट्रीयता’ और हिंदुत्व की छतरी के नीचे ही समवेत होनी चाहिए। एकाकार और एकात्म होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो हम नि:संदेह यह मान लें कि हम किसी बहुत बड़े विभाजनकारी ‘ट्रैप’ का टूल बनते जा रहे हैं।

हमारी सभी भाषाएं, बोलियां, प्रांत, स्थानीयता वेशभूषा सबकुछ राष्ट्र की एकता-अखण्डता को अभिव्यक्त करने वाली हैं। भारत की संस्कृति इतनी विविधवर्णी है कि वह अपने संयोजन में संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करती है। अनंत कलाएं, अनंत परंपराएं और शैलियां आपको मिलेंगी। लेकिन सबके केन्द्र में सर्वसमावेशी दृष्टि और सृष्टि का दर्शन मिलेगा। आप किसी भी भाषा, बोली या क्षेत्र में जाइए वहां एकता के सूत्र एक मिलेंगे। हमारे आदर्श, मूल्य और संस्कार एक मिलेंगे। कहीं कोई विभाजन नहीं मिलेगा। हां ये ज़रूर हो सकता है कि इनके रुप और अभिव्यक्तियां अलग-अलग हों। लेकिन मूल और ध्येय आपको एक ही मिलेगा जो राष्ट्र को अभिव्यक्त करेगा। अपनी-अपनी परंपराओं, क्षेत्रों , बोलियों और भाषाओं के प्रत्येक आदर्शों को देख लीजिए। कहावतों, मुहावरों और सूक्तियों को देख लीजिए। संतों और विद्वानों को देख लीजिए। उनके विचारों और कार्यों में ‘विराट राष्ट्र’ और एकता, समरसता, बंधुता और प्राणि मात्र के कल्याण की ही भावना मिलेगी। सबमें राष्ट्र की परंपरा का अविरल प्रवाह मिलेगा जो सबको सत्मार्ग की ओर ले जाने वाला है। यही हमारा वैशिष्ट्य है। यही हमारी शक्ति और सामर्थ्य है।‌  लेकिन भारत की यही शक्ति और सामर्थ्य भारत विरोधियों को रास नहीं आ रही है। दुराग्रही कुंठित राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को राष्ट्रीयता का यह विराट स्वरूप पच नहीं पा रहा है। क्योंकि अलगाववाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद के नाम पर बने राजनीतिक दलों को जनता ने बारंबार ख़ारिज कर दिया है। ऐसे में राष्ट्रीयता के समस्त मूल्य और आदर्श उनके लिए बाधक सिद्ध हो रहे हैं। इसीलिए वो अपनी खीझ उतारने के लिए किसी भी स्तर तक नीचे गिरते चले जा रहे हैं। लेकिन क्या राष्ट्र और समाज उन्हें देख और समझ नहीं रहा है?  अगर उन्हें ये भ्रम है तो वो जितना जल्दी हो उसे दूर कर लें। क्योंकि ये राष्ट्र अपने महान आदर्शों और परंपराओं के साथ आगे बढ़ चला है। जो हर विभाजन का मुखर प्रतिकार कर रहा है। एकता की बांसुरी बजाता हुआ—हर भाषा और परंपराओं को अपनाता हुआ नित निरंतर आगे बढ़ रहा है। ये राष्ट्र पाञ्चजन्य का शंखनाद करते हुए समरसता का जीवन जीते हुए नई लीक बनाते की ओर बढ़ चला है।

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स्वामी विवेकानन्द के आदर्शों को आत्मसात कर अग्रसर हों युवा https://visionviksitbharat.com/let-the-youth-move-forward-by-imbibing-the-ideals-of-swami-vivekananda/ https://visionviksitbharat.com/let-the-youth-move-forward-by-imbibing-the-ideals-of-swami-vivekananda/#respond Tue, 08 Jul 2025 06:50:12 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1820 स्वामी विवेकानंद यह शब्द आते ही मनोमस्तिष्क में एक ऐसी महान विभूति का दृश्य चित्र तैरने लगता है। जो ज्ञान-विज्ञान, धर्म अध्यात्म , त्याग, तप , साहस, शौर्य और पराक्रम…

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स्वामी विवेकानंद यह शब्द आते ही मनोमस्तिष्क में एक ऐसी महान विभूति का दृश्य चित्र तैरने लगता है। जो ज्ञान-विज्ञान, धर्म अध्यात्म , त्याग, तप , साहस, शौर्य और पराक्रम के अजस्र स्त्रोत के रूप में ; भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में सर्वकालिक महान दार्शनिक और चिंतक के रूप में विद्यमान हैं। एक ऐसे युवा संन्यासी जिन्होंने मात्र 39 वर्षों के अपने अल्प जीवन में ही भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति की धरोहर से विश्व को साक्षात्कार कराया। भारतीयता के महान मूल्यों और आदर्शों की विचार गङ्गा में डुबकी लगवाया। वो संन्यासी जिन्होंने भगवा वेश धरकर भारत के सांस्कृतिक सूर्य की अनंत दीप्ति से विश्व को ज्ञान के सच्चे अर्थों से परिचित करवाया। 11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सभा में अपने व्याख्यान/ उद्बोधन से पहले ; जो अनाम-अपरिचित थे। किन्तु जैसे ही उन्होंने वीणापाणि माँ सरस्वती को प्रणाम कर ‘अमेरिका वासी बहनों और भाइयों’ के संबोधन के साथ संबोधित करना शुरू किया तो कुछ मिनटों तक वहां उपस्थित 7 हजार लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट से आर्ट इन्स्टीट्यूट का सभागृह गुंजित होता रहा। फिर विश्व धर्मसभा के सबसे बड़े आकर्षण के केंद्र बनने से लेकर भारतीय ज्ञान-मेधा और हिन्दू धर्म के महान आर्ष सत्य के प्रखर संवाहक के तौर पर स्वामी विवेकानंद जग-प्रसिद्ध हुए। वह दिग्विजय की यात्रा भारत की महान सांस्कृतिक विरासत का प्रतिबिम्ब थी जो स्वामी विवेकानंद की ऋषि वाणी से अमेरिका में गूंजी।

इसी संदर्भ में विश्व धर्म महासभा में स्वामी जी के उद्बोधन का संक्षिप्तांश दृष्टव्य है — मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन समस्त धर्म सत्य मानते हैं | मुझे आप से कहने में गर्व है कि मैं ऐसे धर्म का अनुयायी हूँ जिसकी पवित्र भाषा संस्कृत में ‘exclusion’ शब्द अननुवाद्य है (जयध्वनि) । मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि जिस वर्ष यहूदियों का मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था उसी वर्ष विशुद्धतम यहुदियों के एक अंश को जिसने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, अपने हृदय में स्थान दिया था। मैं उस धर्म का अनुयायी होने में गर्व अनुभव करता हूँ, जिसने महान ज़रथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह आज भी कर रहा है।”

स्वामी विवेकानंद ने केवल 30 वर्ष की अवस्था में ही विश्व के समक्ष भारत के ज्ञान की पताका फहराई थी। किंतु स्वामी विवेकानंद की निर्मित्ति के पीछे त्याग और तप की विराट शक्ति थी। जो उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस और गुरुमाता शारदा देवी के रूप में सदैव विद्यमान रही। लेकिन उस शक्ति की ग्राह्यता के लिए ‘विवेकानंद’ रुपी व्रतधारी का आदर्श जीवन चरित्र भी था। जो राष्ट्र-समाज,धर्म-अध्यात्म को जहां एक ओर तर्क और विज्ञान की कसौटी पर रखता था तो दूसरी ओर असीम श्रद्धा के साथ महान हिन्दू पूर्वजों, धर्मग्रंथों, परम्पराओं के प्रति समर्पण का एकात्म भी प्रस्तुत करता था। एक ऐसा परिव्राजक संन्यासी जिसका क्षण-क्षण राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित रहा। एक-एक विचार राष्ट्रीय जीवन को सशक्त -समृद्ध करने के लिए रहा। उन्होंने केवल कोरे उपदेश ही नहीं दिए बल्कि उसको साकार करने के लिए स्वयं को राष्ट्र की यज्ञ वेदी में समर्पित कर दिया। स्वामी विवेकानंद युवाओं के लिए सबसे बड़े आदर्श इसीलिए हैं क्योंकि उनके जीवन का एक-एक पक्ष, एक-एक विचार-अनंत ऊर्जा की विद्युतमय तरंगों से परिपूर्ण है। उनके विचार और दर्शन में तथ्य-तर्क, धर्म-कर्म, ज्ञान-विज्ञान सबका समावेश है। वे कहते हैं कि — “मनुष्य, केवल मनुष्य भर चाहिए। बाकी सब कुछ अपने आप हो जायगा। आवश्यकता है वीर्यवान, तेजस्वी, श्रद्धासंपन्न और दृढ़विश्वासी निष्कपट नवयुवकों की। ऐसे सौ मिल जायँ, तो संसार का कायाकल्प हो जाए।”

जब हम स्वयं के युवा होने का दावा करते हैं तो यह प्रश्न भी उठता है कि — क्या हम स्वामी जी के उन सौ युवाओं की अर्हता को पूरा करते हैं? इतना ही नहीं जब वे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं तो हमें सर्वसामर्थ्यवान होने का बोध भी प्रदान करते हैं। स्वामी जी कहते हैं कि —

“आगे बढ़ो। हमें अनंत शक्ति, अनंत उत्साह, अनंत साहस तथा अनंत धैर्य चाहिए, तभी महान् कार्य संपन्न होगा। मेरे बच्चे, मैं जो चाहता हूँ वह है लोहे की नसें और फौलाद के स्नायु जिनके भीतर ऐसा मन वास करता हो, जो कि वज्र के समान पदार्थ का बना हो। बल, पुरुषार्थ, क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज !”

यह सब कैसे प्राप्त होगा? नि:संदेह इसके लिए चारित्रिक श्रेष्ठता और दृढ़इच्छा शक्ति से संपन्न बनना होगा। क्योंकि यही दो मूल्य होते हैं जो किसी भी राष्ट्र और समाज की उन्नति में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्वामी जी उच्च चारित्रिक बल और इच्छाशक्ति को जागृत करने के लिए अपने विविध उद्बोधनों/ पत्र-व्यवहारों में आह्वान करते हुए कहते हैं कि —

“तुमको आवश्यकता है, चरित्र की और इच्छाशक्ति को सबल बनाने की ।अपनी इच्छाशक्ति का प्रयोग करते रहो, तो और भी उन्नत हो जाओगे। इच्छा सर्वशक्तिमान है। केवल चरित्र ही कठिनाइयों के दुर्भेद्य पत्थर की दीवारों को भेदकर उस पार जा सकता है। किसी मनुष्य का चरित्र वास्तव में उसकी मानसिक प्रवृत्तियों एवं मानसिक झुकाव की समष्टि ही है। हम अभी जो कुछ हैं, वह सब अपने चिन्तन का ही फल है। चिन्तन ही बहुकाल-स्थायी है और उसकी गति भी दूरव्यापी है। अत: तुम क्या चिन्तन करते हो, इस विषय में विशेष ध्यान रखो। हमारा प्रत्येक कार्य, हमारा प्रत्येक अंग-संचालन, हमारा प्रत्येक विचार हमारे चित्त पर इसी प्रकार का एक संस्कार छोड़ जाता है। हम प्रत्येक क्षण जो कुछ होते हैं, वह इन संस्कारों के समूह द्वारा ही निर्धारित होता है। प्रत्येक मनुष्य का चरित्र इन संस्कारों की समष्टि द्वारा ही नियमित होता है। यदि भले संस्कारों का प्राबल्य रहे, तो मनुष्य का चरित्र अच्छा होता है और यदि बुरे संस्कारों का, तो बुरा । ”

स्वामीजी अपने कालखंड में समाज को संगठित करने के लिए युवाशक्ति में नव चैतन्यता भर रहे थे। उनके अनुसार कैसा होना चाहिए युवा? साथ ही युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए वे आत्मोत्सर्ग की भावना से ओत-प्रोत रहते थे। इसीलिए उन्होंने उस समय जो कहा था वह आज भी उतना ही अधिक प्रासंगिक है — “वह मैं अच्छी तरह जानता हूँ, भारतमाता अपनी उन्नति के लिए अपने श्रेष्ठ संतानों की बलि चाहती है। संसार के वीरों को और सर्वश्रेष्ठों को ‘बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय’ अपना बलिदान करना होगा। असीम दया और प्रेम से परिपूर्ण सैकड़ों बुद्धों की आवश्यकता है। पहले उनका जीवननिर्माण करना होगा, तब कहीं काम होगा। जो सच्चे हृदय से भारतीय कल्याण का व्रत ले सकें तथा उसे ही जो अपना एकमात्र कर्तव्य समझें – ऐसे युवकों के साथ कार्य करते रहो। उन्हें जागृत करो, संगठित करो तथा उनमें त्याग का मंत्र फूँक दो। भारतीय युवकों पर ही यह कार्य संपूर्ण रूप से निर्भर है। मैंने तो इन नवयुवकों का संगठन करने के लिए जन्म लिया है। यही क्या, प्रत्येक नगर में सैकड़ों और मेरे साथ सम्मिलित होने को तैयार हैं, और मैं चाहता हूँ कि इन्हें अप्रतिहत गतिशील तरंगों की भाँति भारत में सब ओर भेजूँ, जो दीन-हीनों एवं पददलितों के द्वार पर सुख, नैतिकता, धर्म और शिक्षा उड़ेल दें। और इसे मैं करूँगा, या मरूँगा।”

फिर जब बात आती है शिक्षा की तो स्वामी जी का शिक्षा के उद्देश्य से क्या आशय था? युवा होने के नाते हम शिक्षा का क्या अर्थ ग्रहण करते हैं? केवल डिग्री जो हमारे रोजगार/ जीविकोपार्जन का माध्यम बनती है? क्या शिक्षा वह जिसे हम तथाकथित आधुनिकता के विषाक्त रंग-रोगन में समेटे ‘अभिजात’ होने का मिथ्यादंभ पाले फिरते रहते हैं? स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को अत्यंत सुंदर रूप में परिभाषित किया है। वे कहते हैं कि —

“जो शिक्षा साधारण व्यक्ति को जीवन-संग्राम में समर्थ नहीं बना सकती, जो मनुष्य में चरित्र-बल, परहित-भावना तथा सिंह के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है? जिस शिक्षा के द्वारा जीवन में अपने पैरों पर खड़ा हुआ जाता है, वही है शिक्षा।”

यह रही शिक्षा की बात लेकिन यह शिक्षा आचार-व्यवहार में कैसे प्रकट होगी। इसके लिए वे उन्नति के दो सूत्र देते हुए कहते हैं कि — ‘त्याग’ और ‘सेवा’ ही भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं इन दो बातों में भारत को उन्नत करो। ऐसा होने पर सब कुछ अपने आप ही उन्नत हो जाएगा। इतना ही नहीं वो सज्जन होने की अनिवार्य शर्त घोषित करते हुए कहते हैं कि —

“उसी को मैं महात्मा कहता हूँ, जिसका हृदय गरीबों के लिए रोता है, अन्यथा वह तो दुरात्मा है।”

अभिप्रायत: हम जो भी ग्रहण करें वह राष्ट्र जीवन के लिए हो। त्याग और सेवा के मूल के साथ हम समाज के वंचितों-उपेक्षितों के सहायक बनें। उनके उत्थान और कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हों। इसी दिशा में प्रबोधन करते हुए कहते हैं कि —

“अपने तन, मन और वाणी को ‘जगद्धिताय’ अर्पित करो। तुमने पढ़ा ‘अपनी माता को ईश्वर समझो, अपने है, ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव’ पिता को ईश्वर समझो’ परंतु मैं कहता हूँ, दरिद्रदेवो भव, मूर्खदेवो भव गरीब, निरक्षर, मूर्ख और दुःखी, इन्हें अपना ईश्वर मानो। इनकी सेवा करना ही परम धर्म समझो।”

वस्तुत: स्वामी विवेकानंद ने युवा होने के जिन अर्थों को-बोध को प्रकट किया। हमें उन्हें आत्मसात कर कर्त्तव्य पथ की ओर अग्रसर होना पड़ेगा। 21 वीं सदी भारत की है उसकी बागडोर युवाओं के कंधों में है। ऐसे में उच्च चारित्र्यबल से संपन्न, आत्मानुशासित, आत्मगौरव से परिपूर्ण विचारों के प्रवाह की आवश्यकता है। जो राष्ट्र जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रवहमान हो। राष्ट्र की गौरवपूर्ण विरासत के साथ नागरिक कर्त्तव्यों का पालन करना। ‘स्व’ को केंद्रित रखकर व्यक्तिगत जीवन से लेकर समाज जीवन शुचिता की ओर अग्रसर होना।उच्छृंखलता के विकृत वातावरण को समाप्त करते हुए सर्जनात्मकता के साथ गतिमान रहना। युवा होने के नाते यह हमारी प्राथमिक और अनिवार्य जिम्मेदारी है। समाज को स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से नवाचारों और नवोन्मेष के पथ पर सतत् अग्रसर रहना। सामाजिक समरसता को आचार और व्यवहार में उतारना और विभाजनकारी शक्तियों के प्रतिकार करने के लिए प्रति क्षण तत्पर रहना होगा। त्याग और सेवा को आचरण में उतारना होगा। इसके साथ ही तकनीकी के प्रसार के साथ ही जिस ढंग से चुनौतियां राष्ट्रजीवन के समक्ष आई हैं। उनके उपाय भी हमें ही खोजने होंगे। समाज को जागरूक करना पड़ेगा। फिर जब हम राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ अपने जीवन को गढ़ेंगे तो निश्चय ही सर्वत्र राष्ट्र की जय-जयकार सुनाई देगी। भारत माता विश्व गुरु के पद पर सिंहासनारुढ़ होकर राष्ट्र को अमरता के पथ की ओर प्रेरित करेंगी। यही स्वामी जी के आदर्शों पर चलते हुए नव भारत को गढ़ने का – मन्त्र है।

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षड्यंत्रों के साये में राष्ट्रीयता का मानक गढ़ने वाले वीतरागी श्यामा प्रसाद मुखर्जी https://visionviksitbharat.com/the-detached-and-selfless-syama-prasad-mookerjee-who-upheld-the-banner-of-nationalism-amidst-the-shadows-of-conspiracies/ https://visionviksitbharat.com/the-detached-and-selfless-syama-prasad-mookerjee-who-upheld-the-banner-of-nationalism-amidst-the-shadows-of-conspiracies/#respond Mon, 23 Jun 2025 09:12:09 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1798 24 मई 1952 के दिन प्रधानमंत्री नेहरू और डॉ.कैलाशनाथ काटजू श्रीनगर में थे। लेकिन उन्होंने शेख अब्दुल्ला सरकार के कारावास में बंद श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का हाल-चाल तक पूछना…

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24 मई 1952 के दिन प्रधानमंत्री नेहरू और डॉ.कैलाशनाथ काटजू श्रीनगर में थे। लेकिन उन्होंने शेख अब्दुल्ला सरकार के कारावास में बंद श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का हाल-चाल तक पूछना भी उचित नहीं समझा। क्या यह उनकी भूमिका पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता है? क्या ये तथ्य मुखर्जी जी की गिरफ्तारी के प्रति पंडित नेहरू की कूटरचित संलिप्तता को नहीं दर्शाता है? क्या पंडित नेहरू कश्मीर को शेख अब्दुल्ला के हाथों सौंपकर अलगावद को खाद-पानी दे रहे थे?
राष्ट्र की एकता-अखण्डता के लिए प्रतिबद्ध अपना सर्वस्व आहुत करने वाले डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे महान व्यक्तित्व हैं जिनका जीवनवृत्त भारतीय राजनीति में सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला रहा है।6 जुलाई सन् 1901 को कलकत्ता के प्रतिष्ठित परिवार आशुतोष मुखर्जी के घर जन्मे डॉ. मुखर्जी अपने प्रारंभिक जीवन से ही राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित हो गए थे। घर-परिवार के संस्कारों से समृद्ध डॉ मुखर्जी शैक्षणिक और सामाजिक कार्यों के प्रति तत्परता से संलग्न रहने लगे थे। मैट्रिक, स्नातक और कानून की पढ़ाई के बाद वे सन् 1926 में इंग्लैंड से बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे। तत्पश्चात वे सन् 1934 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बन गए। उनका मात्र 32/33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति होने का गौरव प्राप्त करना अपने आप में ऐतिहासिक घटना थी। यदि हम सामान्य दृष्टि से देखें तो क्या एक सम्पन्न एवं प्रतिष्ठित परिवार से होने के कारण श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को स्वयं को संघर्ष में झोंकने की कोई आवश्यकता थी? लेकिन उनसे राष्ट्र और समाज की दुर्दशा नहीं देखी गईं । अतएव उन्होंने स्वेच्छा से राष्ट्र के लिए आहुति बनना स्वीकार किया।
उनके जीवन से संबंधित एक चीज कौतूहल का विषय बनती है। वह यह कि डॉ मुखर्जी स्वातंत्र्य संघर्ष और स्वातंत्र्योत्तर काल के ऐसे शिखर पुरुष थे। जो सरदार पटेल, महात्मा गांधी आदि के बराबर का क़द रखते थे। राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित डॉ मुखर्जी का योगदान सर्वज्ञात ही था। इसके बावजूद भी नेहरू-गांधी परिवार ने अपने सत्ता के कालखण्ड में उन्हें उपेक्षित क्यों किया ? क्या उनका योगदान एक क्रांतिकारी एवं संगठक के रूप में राष्ट्र के लिए अपने आप में अद्वितीय नहीं है? वे मुखर्जी जी जिन्होंने अपने जीवन को निजी स्वार्थ एवं पद-प्रतिष्ठा के मोह से खुद को विरक्त कर दिया।एक भी प्रसंग नहीं है जब राष्ट्र के जमीनी मुद्दों पर लड़ने से वे पीछे हटे हों। बल्कि उन्होंने स्वयं को राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। राष्ट्र की नस-नस में घुल-मिल गए। राष्ट्रीयता और भारत की अखंडता के संकल्प को अपने कार्यों से साकार किया।
जब सत्ता के गलियारों में कोई सांसद अपनी आवाज भी प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के मत खिलाफ नहीं उठा सकते थे। उस समय भी मुखर्जी जी संसद में बेबाकी से धारा-370 के लिए आवाज बुलंद कर रहे थे। एक ऐसे प्रकाण्ड विद्वान शिक्षाविद् और राजनेता थे जिन्होंने देश के पहले उद्योग मंत्री रहते हुए भी सरकार को घेरा। वे सत्य के लिए-राष्ट्र के लिए किंचित मात्र नहीं डिगे। क्या उनमें हम किसी भी प्रकार के साहस की कमी की कल्पना कर सकते हैं?
लेकिन ऐसे व्यक्तित्व को हमेशा मुख्यधारा से काटना क्या भारतीय जनमानस में व्याप्त राष्ट्र-प्रेम का गला काटना नहीं था? नेहरू खानदान की पैरवी करने वाले जरा बताएँ कि मुखर्जी जी तत्कालीन समय में शीर्ष पर बैठने वाले राजनेताओं से किस पैमाने पर पीछे थे? चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र रहा हो याकि राष्ट्रसेवा सेवा में तत्परता का भाव रहा हो। याकि स्वतंत्र भारत के लिए नीतियों के स्पष्ट एवं दूरदर्शी रोडमैप के स्वरूप को प्रस्तुत करने की उनकी दृष्टि रही हो। यदि उनका आँकलन किया जाए तो वे किसी भी पैमाने पर कमतर नहीं दिखे। किन्तु-परन्तु उन्हें क्यों पीछे धकेला जाता रहा ?
श्यामा प्रसाद मुखर्जी को नेपथ्य में कोसों ढकेलने का कार्य हुआ। इसकी केवल एक ही वजह दिखती है कि -नीतियों को लेकर पंडित नेहरू से राष्ट्रीय एकता एवं राष्ट्रीय हितों के विषय पर मतांतर रखना।इसके अलावा अन्य कोई कारण स्पष्ट दृष्टव्य नहीं होता है। लेकिन इतिहास आज नहीं तो कल परत दर परत खुलता ही है।चाहे कुछ भी हो इतिहास और समय सभी के चाल-चरित्र एवं कार्यों का निर्धारण स्वमेव करता है।
वे मुखर्जी जी ही थे,जिन्होंने राष्ट्र पर आए संकट को पहले भांपकर उसका हल खोज निकाला था। उन्होंने 1946 में मुस्लिम लीग के धार्मिक उन्माद से प्रेरित बंगाल विभाजन के हिन्दू-सिख नरसंहार की त्रासदी के नापाक इरादों को कामयाब नहीं होने दिया। उस समय उन्होंने हिन्दुओं को सशक्त करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ।यह बात उस समय की थी जब तत्कालीन समय में राजनीतिक हस्तक्षेप करने में सक्षम देश के किसी भी बड़े नेता की इस ओर नजर नहीं जा रही थी कि – “पाकिस्तान के लिए लड़ने वाले लोगों की कुत्सित दृष्टि सम्पूर्ण पंजाब व बंगाल को पाकिस्तान के हिस्से में मिलाने की है, जिसके लिए वे किसी भी सीमा तक गिर सकते हैं तथा मुस्लिम लीग एवं सोहराबर्दी ने बर्बरता की सारी सीमा लाँघ दी थी।”

उस समय मुखर्जी जी ने अपनी कुशल दूरदृष्टि एवं रणनीतिक कौशल का का परिचय दिया। भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय पंजाब एवं बंगाल के आधे-आधे भाग को विभाजित कर शेष भारत के हिस्से में करने का अतुलनीय कार्य किया था।यह एक प्रखर राष्ट्रवादी देशभक्त का संकल्प था जिसके हृदय में अखण्ड भारत का संकल्प आलोड़ित हो रहा था।अपने इसी ध्येय को उन्होंने जीवन पर्यन्त निभाया।

राष्ट्र की एकता-अखण्डता एवं सर्वांगीण विकास के लिए आजीवन संघर्षरत रहने वाले मुखर्जी जी ही थे। उन्होंने देश की सभ्यता, संस्कृति के साथ किसी कदम पर कोई समझौता नहीं किया। बल्कि राष्ट्रीय चेतना के प्रखर उद्घोष के साथ संसद व देश भर में अपनी आवाज बुलंद करते रहे। मुखर्जी जी एक बार जिस निर्णय पर डट गए तो फिर कभी पीछे नहीं हटे। भले ही इसके लिए उन्हें अपने प्राणों की बाजी ही क्यों न लगानी पड़ गई हो।राष्ट्र हित के लिए उनकी अनन्य निष्ठा ही उन्हें विरला बनाती है।जब देश स्वतंत्र हुआ और कैबिनेट का गठन हो रहा था। उस समय डॉ मुखर्जी , सरदार पटेल और महात्मा गांधी के अनुरोध पर ही मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे। आगे जब उन्हें नेहरू सरकार में राजनीतिक स्वार्थपरता, पदलिप्सा का जोर दिखा। नेहरू सरदार राष्ट्र की समस्याओं एवं मुख्य उद्देश्यों से भटकती हुई दिखी। ऐसे में उन्होंने मंत्री पद से सहर्ष त्यागपत्र दे दिया।विपक्ष में बैठकर राष्ट्र की आवाज बनना न्यायोचित समझा।
वे भारत में जम्मू-कश्मीर कै सम्पूर्ण विलय एवं धारा-370 की समाप्ति के लिए सम्पूर्ण निष्ठा एवं समर्पण के साथ प्रतिबद्ध थे।वे इस पर नेहरू सरकार के विरुद्ध मुखरता के साथ प्रतिरोध दर्ज करवा रहे थे। राष्ट्र जागरण में जुटे थे। जब पंडित नेहरू के खासमखास शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर के अलावा शेष भारत के लोगों को जम्मू-कश्मीर में बगैर परमिट प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए – “एक देश, दो विधान, दो प्रधान , नहीं चलेंगे” ; ये उद्घोष कर काश्मीर की ओर 8 मई सन् 1953 को कूच कर दिया।जहाँ उन्हें 10 मई 1953 को जम्मूकश्मीर की सीमा में ही शेख अब्दुल्ला सरकार ने गिरफ्तार करवा लिया।उनकी इस गिरफ्तारी में साजिशों की दुर्गंध आती है। उनकी इस गिरफ्तारी में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की भूमिका का पर्दे के पीछे होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि नेहरू व शेख अब्दुल्ला अजीज मित्र की तरह ही थे। इसीलिए पंडित नेहरू ने महाराजा हरिसिंह से सत्ता का स्थानांतरण शेख अब्दुल्ला के हाथों करवा दिया था।यानी कश्मीर में पृथकता और अलगाववाद की पूरी व्यवस्था प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने कर दी थी।‌
शेख अब्दुल्ला सत्ता में आए और फिर शुरू हुआ कश्मीरी हिन्दुओं के उत्पीड़न का अंतहीन सिलसिला। अब्दुल्ला सरकार ने 1952 से ही डोगरा समुदाय का उत्पीड़न प्रारंभ कर दिया गया था। इसके विरोध में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुखरता के साथ आवाज़ बुलंद की। उन्होंने बलराज माधोक और डोगरा समुदाय के प्रतिष्ठित पंडित प्रेमनाथ डोगरा के द्वारा गठित ‘प्रजा परिषद पार्टी’ का सदैव समर्थन किया। जम्मू-कश्मीर की मूल भावना और राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए सदैव प्रतिबद्धता व्यक्त की। अगस्त 1952 में ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने जम्मू की विशाल रैली में अपना संकल्प व्यक्त करते हुए कहा था कि – “या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा”
फिर अपने इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए उन्हें अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ गई।उनकी गिरफ्तारी के बाद जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग होते हुए भी श्रीनगर के कारावास में उनके लिए सभी प्रकार के प्रतिबंध थे। उनके साथ ऐसा ट्रीटमेंट किया जाता था जैसे कि उन्होंने देशद्रोह किया हो। यह सब प्रधानमंत्री नेहरू और शेख अब्दुल्ला के गठजोड़ के चलते ही संभव हो रहा था। प्रतिबंधों की कड़ाई इतनी कि – मुखर्जी जी लिए आने वाली चिठ्ठियों का अनुवाद करवाकर जाँचा जाता था कि चिठ्ठियों में लिखा क्या है? उसके बाद उनका आदान-प्रदान होता था। इतना ही नहीं उन्हें जेल में किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं थी। क्या यह सब पंडित नेहरु के संरक्षण व इच्छा के बिना ही हो रहा था? भारत के किसी हिस्से में एकता की बात करने के लिए जेल में डालना क्या कभी सही ठहराया जा सकता है? क्या इसके पीछे पंडित नेहरू की मौन‌ सहमति नहीं थी?
अगर पंडित नेहरू चाहते तो क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को शेख अब्दुल्ला सरकार से रिहा नहीं करवा सकते थे ? क्या जम्मू-कश्मीर सरकार नेहरू के वर्चस्व से बड़ी थी? किन्तु उस समय राष्ट्र के दैदीप्यमान ज्योतिपुंज को जिस तरह से बुझाने का संयुक्त प्रयास किया जा रहा था।उसके पीछे के सभी षड्यंत्र स्पष्ट दिखलाई दे रहे थे।लेकिन उस समय मुखर्जी जी की प्रताड़ना पर किसी ने कभी भी उफ! तक की आवाज नहीं उठाई। सवाल कई आते हैं कोई कहता है कि हर चीज के लिए नेहरू को ही जिम्मेदार क्यों ठहराया जाता है?सवाल यह भी कि उनकी भूमिका की संलिप्तता को हर चीज में दिखाने का प्रयास किया जाता है। इस पर हम आप तो दूर अब इतिहास की ही तारीखों की ओर ही चलते हैं —
24 मई 1952 के दिन प्रधानमंत्री नेहरू और डॉ.कैलाशनाथ काटजू श्रीनगर में थे। लेकिन उन्होंने शेख अब्दुल्ला सरकार के कारावास में बंद श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का हाल-चाल तक पूछना भी उचित नहीं समझा। क्या यह उनकी भूमिका पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता है? क्या ये तथ्य मुखर्जी जी की गिरफ्तारी के प्रति पंडित नेहरू की कूटरचित संलिप्तता को नहीं दर्शाता है? क्या पंडित नेहरू को श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा धारा-370 का विरोध करना स्वीकार नहीं था? क्या पंडित नेहरू कश्मीर को शेख अब्दुल्ला के हाथों सौंपकर अलगावद को खाद-पानी दे रहे थे?
सत्ता का मोह त्यागने वाले वीतरागी श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिन्होंने राष्ट्र हित के लिए मंत्री पद त्याग दिया।विपक्ष में बैठे मुखर और आक्रामक प्रतिकार किया। लेकिन राष्ट्रीय अस्मिता से रत्तीभर भी समझौता नहीं किया।
ऐसे प्रकाण्ड विद्वान,राजनीतिज्ञ व्यक्तित्व को पंडित नेहरू द्वारा उपेक्षित करना-क्या कभी सही ठहराया जा सकता है? मुखर्जी जी के जम्मू-कश्मीर जाने पर उनकी गिरफ्तारी एवं स्थान की जम्मू-काश्मीर की शेख अब्दुल्ला सरकार को पल-पल की ख़ुफ़िया जानकारी देने वाले कौन लोग थे? फिर ‘परमिट सिस्टम’ के षड्यंत्र के अन्तर्गत उन्हें गिरफ्तार करने के साथ-साथ, उनकी गिरफ्तारी का स्थान और कानूनी दाव-पेंचों का चयन करने वाले लोग कौन थे?
जेल में अचानक से मुखर्जी जी का स्वास्थ्य खराब होना तत्पश्चात रहस्यमयी ढंग से उनकी 23 जून 1953 को मृत्यु होना।इसके बाद उनकी संदिग्ध मृत्यु की जाँच को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु के रहस्य की तरह ही ठण्डे बस्ते में डालना आखिर क्या दर्शाता है? क्या यह श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की षड्यंत्र पूर्वक हत्या नहीं थी? क्या उनका अपराध धारा-370 के खत्म करने की दृढ़ प्रतिज्ञा थी? क्या उनका अपराध राष्ट्रवादी चिंतन और जनसंघ की स्थापना कर नेहरू के लिए चुनौती देने वाला होना था? क्या पंडित नेहरू को श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का भय सता रहा था? इसके चलते उन्होंने षड्यंत्रों को समर्थन दिया? क्या इन‌ सवालों का ज़वाब मिलेगा?‌
वर्तमान में कितने भी सवाल उठाएँ जाए लेकिन सच्चाई यह है कि-इस राष्ट्र ने राजनीतिक षड्यंत्रों में एक ऐसे राष्ट्रीय नेतृत्व के महापुरुष को खोया जिसकी उपस्थिति से राष्ट्र को अप्रत्याशित लाभ होता।अगर उनकी षड्यंत्रों के साये में मृत्यु न होती तो सम्भवतः राष्ट्रीय मुद्दों की दशा और दिशा बहुत पहले ही कुछ और होती। किन्तु यह सब संभव न हो सका। धारा-370 की समाप्ति के लिए जनसंघ और भाजपा ने उनके बलिदान को याद रखा। ‘जहां हुए बलिदान मुखर्जी-वह कश्मीर हमारा है’ — इस नारे के साथ वर्षों तक उनके बलिदान की ज्वाला को वैचारिक चेतना में जगाए रखा। असंख्य आंदोलन और प्रदर्शन किए। अंततोगत्वा नरेंद्र मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को धारा-370 को समाप्त करने का ऐतिहासिक कार्य किया।श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को सच्चे अर्थों में श्रृद्धांजलि दी।श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ, चिंतक-विचारक ही भारत के मूल को उद्घाटित करते हैं।‌ राष्ट्रीयता के संस्कारों और व्यवहारों से समृद्ध उनकी वैचारिकी जन-जन के लिए प्रेरणा है। उनका समूचा जीवन त्याग, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है। उन्होंने जिस ‘अखण्ड भारत’ का चित्र अपने हृदय में बसाया-संघर्ष किया और राष्ट्र यज्ञ की आहुति बन गए। उन्हीं भावों और विचारों पर आधारित राजनीति ही भारत को नई दिशा दे सकती है।‌यही भारत का आत्म स्वर है। यही स्व और राष्ट्रीयता का शाश्वत उद्घोष है।‌आवश्यकता है कि उनके इस संदेश को आत्मसात किया जाए— “राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है।”

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भगवान महावीर स्वामी के ज्ञानपुञ्ज से प्रकाशित होता रहेगा संसार https://visionviksitbharat.com/the-world-will-continue-to-be-illuminated-by-the-radiant-wisdom-of-lord-mahavir-swami/ https://visionviksitbharat.com/the-world-will-continue-to-be-illuminated-by-the-radiant-wisdom-of-lord-mahavir-swami/#respond Fri, 18 Apr 2025 17:08:30 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1622 सनातन धर्म संस्कृति जिसमें सदैव सत्य की अनुभूति, खोज तथा उसका वैयक्तिक और सामूहिक तौर पर अनुसन्धान, परिष्करण और परिमार्जन के माध्यम से सृष्टि के लौकिक-पारलौकिक दर्शन की खोज की…

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सनातन धर्म संस्कृति जिसमें सदैव सत्य की अनुभूति, खोज तथा उसका वैयक्तिक और सामूहिक तौर पर अनुसन्धान, परिष्करण और परिमार्जन के माध्यम से सृष्टि के लौकिक-पारलौकिक दर्शन की खोज की गई है। भारत की इसी महान संस्कृति में जीवमात्र के कल्याण के लिए तपस्या करने की श्रेष्ठ परम्परा रही है।याकि विविध कालक्रमों में जब-जब समाज पथभ्रष्ट हुआ। समाज मूल्यों को भूलकर अराजक होने लगा तब-तब सनातन रूपी वटवृक्ष की शाखाओं ने अपनी छाँव और शीतलता से मनुष्य को नई दिशा दी है। भगवान श्रीकृष्ण, श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय के सप्तम् एवं अष्टम् श्लोक में अर्जुन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं:―

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

ये श्लोक भारतीय मनीषा एवं चित्ति को प्रकट करते हैं जिनमें धर्म-बोध के द्वारा श्रेष्ठ मूल्यों की संस्थापना और सर्जनात्मकता की धरोहर का अमर सन्देश गुञ्जित होता है।

राष्ट्र की संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि समय-समय पर विविध विचारधाराओं, सन्तों-महापुरुषों का अवतरण होता रहा है। इसी परम्परा में महापुरुष भारत की महान धरा पर , धर्म रक्षा हेतु मानव रूप में अवतरित हुए‌। आचरण को परिमार्जित कर धर्म और अध्यात्म की नवदृष्टि तथा कालसुसंगत परिपाटी निर्मित की। सनातन हिन्दू धर्म से जिस जैन पंथ की आधारशिला को तपोबल के साथ स्वामी ऋषभदेव ने रखा। वह तीर्थंकरों की परम्परा से वृद्धि करती हुई कालान्तर में जैन धर्म के रूप में अपनी पूर्णता को प्राप्त हुई। सम्पूर्ण विश्व में शांति-सौहार्द के साथ जीवमात्र के प्रति प्रेम एवं सत्य-अहिंसा के आचरण को ढालने वाले 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी हुए।‌ सरसता की त्रिवेणी प्रवाहित करने वाले महावीर स्वामी का जन्म — चैत्र माह की त्रयोदशी तिथि को लगभग 540-599 वर्ष ईसा पूर्व वैशाली गणतन्त्र के कुण्डलपुर, वर्तमान बिहार राज्य में ईक्ष्वाकुवंशीय राजा सिद्धार्थ एवं माँ त्रिशला के यहाँ हुआ।

जैन धर्मग्रन्थों की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महावीर स्वामी के जन्म के उपरान्त उनके राज्य में सुख-शांति-समृद्धि, यश-कीर्ति वैभव में अप्रत्याशित वृद्धि होनी प्रारंभ हो गई। इन्हीं वैशिष्ट्यों के चलते उनका नाम वर्धमान रखा गया । अर्थात् सभी प्रकार की वृद्धि करने वाला जिनके आने से सभी ओर खुशहाली छा गई। यह सब प्रकृति का ही गुण है। वस्तुत: जब कोई ऐसी ईश्वरीय विभूति धरा धाम में आती है। उस समय स्वत: ही प्रकृति अपने माध्यम से सभी प्रकार की समृद्धि से सूचित करने लगती है।

महावीर स्वामी का जन्म ऐसे कालखण्ड में हुआ जब तत्कालीन देशकाल में पशु‍बलि, हिंसा, अस्पृश्यता, विविध भेदभाव और अन्धविश्वास, पाखण्ड अपने चरम पर थे। मनुष्य अपनी मनुष्यता भूलकर अराजक होता जा रहा था।स्वार्थ एवं अन्य समस्याएँ सामाजिक जनजीवन को अस्वस्थ कर रहीं थी। सामाजिक कुरीतियाँ विद्वेष फैला रही थीं। ऐसा कहा जाता है कि इन विद्रूपताओं और समस्याओं से महावीर स्वामी बचपन से ही विचलित होने लगे थे। उनके मनोमस्तिष्क में जीवमात्र के प्रति दया प्रेम का भाव था। सभी के लिए अनुराग-बन्धुभाव उनके ह्रदय में आलोड़ित होता रहता था। इस प्रकार महावीर स्वामी के अंदर प्राणिमात्र के प्रति सहानुभूति, दु:ख -दारिद्र्य निर्मूल का बीज अंकुरित होने लगा था।

महावीर स्वामी ने ब्रम्हचर्य के पालन का उद्देश्य बना लिया। किन्तु राजसी परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें पारिवारिक नियमों का पालन करना था। इसीलिए उनकी शादी यशोदा से हुई किन्तु 30 वर्ष की आयु में भगवान महावीर ने सांसारिक सुखों को त्याग कर जैन धर्म की दिगम्बर शाखा की दीक्षा ले ली। दिगम्बर यानि दिशाएँ जिसका वस्त्र हों अर्थात् शिव। महावीर स्वामी ने बाद में दिगम्बर के साथ श्वेताम्बर शाखा में दीक्षा लेकर उसकी पद्धति भी अपनाई। कठोर तप एवं साधना में तपते-तपते अन्ततोगत्वा लगभग 12 वर्षों के उपरान्त उन्हें शाल वृक्ष के नीचे वैशाख शुक्ल पक्ष दशमी के दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई। तदुपरान्त उनके उपदेशों का क्रम चलता रहा। वो भ्रमण कर संपूर्ण भारत वर्ष में अपना उपदेश देते रहे। समाज को जागृत करते रहे। दीक्षित होने के बाद ‘वर्धमान से भगवान महावीर स्वामी’ के रूप में वे चौबीसवें तीर्थंकर के रूप में प्रतिष्ठित होकर सामाजिक चेतना में ज्ञान, तप, संयम, नियम के माध्यम से जागृति लाने के लिए कटिबद्ध रहे।

भगवान महावीर स्वामी ने अहिंसा को सर्वोपरि बताया। उनके मतानुसार किसी को भी क्षति पहुँचाए बिना जीवन जीना ही वास्तविक ज्ञान का प्रतिफल है। उन्होंने जैन धर्म के स्वरूप को जीवमात्र के प्रति प्रेम करने व नई दिशा देने के लिए पांच सिद्धांतों- अहिंसा, सत्‍य, अपरिग्रह, अस्‍तेय और ब्रह्मचर्य का प्रतिपादन किया जिन्हें पंचशील सिद्धांत कहा गया। ये सिद्धांत अपने आप में विभिन्न बोधों के गूढ़ार्थों को समाहित किए हुए हैं। इन सिद्धांतों के पालन से मानव जीवन का कल्याण होता है। सम्पूर्ण प्रकार की व्याधियों की समाप्ति तथा लोकमङ्गल की स्थापना होती है।

भगवान महावीर स्वामी ने ‘जिओ और जीने दो’ का मूल मन्त्र देकर उसकी वृहद तौर पर विवेचना करते हुए जीवन की नैसर्गिकता को धरातल पर उद्घाटित किया। उनके मतानुसार ‘मनसा वाचा कर्मणा’ अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति ‘समभाव’ को जीवन में ढालकर जीव में स्वयं की अनुभूति कर हर जीव के लिए वही भाव रखे जिसकी अपेक्षा वह अपने लिए करता है।

उन्होंने ‘क्षमा’ रूपी अस्त्र को कवच के रूप में स्वीकृति प्रदान की। ‘क्षमा’ ऐसा अद्भुत गुण है जो स्वयं को शान्ति प्रदान करता है। महावीर स्वामी कहते हैं कि धर्म माँगने से नहीं बल्कि स्वयं के धारण करने से मिलता है। उन्होंने सनातन हिन्दू संस्कृति के सूत्र वाक्य “ध्रियते इति धर्म:” को प्राथमिकता दी।उनके ‘अनेकान्तवाद’ को हम ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ के द्वारा आसानी से समझ सकते हैं।उनके अनुसार सत्य की अनुभूति वैयक्तिक स्तर पर होती है। महावीर स्वामी ने अपने सम्पूर्ण दर्शन में मानव-प्रकृति के समन्वय तथा आपसी सहयोग के द्वारा जीवनबोध का मार्ग बतलाया है।उनके उपदेशों में मानवीय आत्मिक संतुष्टि एवं शान्ति की उच्चतम पराकाष्ठा है। भगवान महावीर का आत्म धर्म सम्पूर्ण चराचर जगत की प्रत्येक आत्मा अर्थात् सभी जीवों के लिए समान दृष्टिकोण रखता है। आत्म परिष्कार के साथ उच्च मूल्यादर्शों एवं इहलौकिक से पारलौकिक उन्नति का पथ प्रशस्त करता है।

महावीर स्वामी के ज्ञान दर्शन में संसार की सभी आत्माओं में ऐक्यता का भाव दृष्टिगोचर होता है। इसीलिए महावीर स्वामी ने अपने उपदेशों में सहजता, सरलता, बन्धुत्व, जीव प्रेम के लिए आचरण एवं कर्त्तव्यपारायणता के माध्यम से सभी को सन्देश दिया। उन्होंने बतलाया कि हमें दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखना चाहिए, जो हमें स्वयं को पसन्द हो। वे अपनी दिव्य ज्योति से जीवन पथ को आलोकित कर सत्यान्वेषण के द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि में प्रसन्नता के ज्योति-पुञ्जों को बिखरते हैं। उनका जीवन ही दर्शन है और दर्शन ही जीवन है। महावीर स्वामी के द्वारा प्रणीत सिद्धांतों और दर्शन में भारतीयता का महान दर्शन स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होता है।जो मनुष्य को ‘मनुष्यत्व’ की प्राप्ति के साथ सभी मध्य साहचर्य, समन्वय, समरसता, प्रकृति-पर्यावरण, आत्मानुशासन और एकत्व के सर्वसमावेशी विचारों से साक्षात्कार कराता है। यही मूल्यबोध ही भारत के ‘स्व’ और आत्मगौरव की चैतन्यता हैं।जो महावीर स्वामी ने अपनी तपश्चर्या के माध्यम से लोक के मध्य प्रकट की। प्रतिस्पर्धा की भावना से मुक्त होकर ‘समन्वय’ और सर्जनात्मकता का पथ प्रशस्त किया।

धर्मग्रंथों एवं पौराणिक सन्दर्भों की मान्यता अनुसार भगवान महावीर ने 72 वर्ष की आयु में कार्तिक कृष्‍ण पक्ष अमावस्‍या को मोक्ष प्राप्‍त किया।मोक्ष स्थान के रूप में बिहार के पावपुरी को जाना जाता है। उस अमावस्या को संसार को नई दिशा देने वाले महापुरुष की दिव्य ज्योति भौतिक रूप से भले अनंत में विलीन हो गई।
किन्तु उनके अद्वितीय दर्शन, ज्ञानपुञ्ज से समूचा संसार चिरकाल तक प्रकाशित होता रहेगा।जो जीवमात्र के प्रति साहचर्यता के बोध से आप्लावित करेगा। उनका दर्शन मानवीय मूल्यों की श्रेष्ठता के बिम्बों को बिखेरता हुआ खुशहाली और समन्वय की रसधारा की सरसता को बनाए रखेगा। आवश्यकता है उन मूल्यों को जानने-समझने और आत्मसात कर ,अपने आचरण में ढालकर— ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः‘ का भाव लेकर अपने जीवन को सुघड़ बनाने की। समाज के वातावरण को उच्च आदर्शों का स्वप्रेरणा से अनुकरण करने वाला बनाने की। ताकि भगवान महावीर स्वामी के विचारों और दर्शन से राष्ट्र को सशक्त और सर्वसमर्थ बनाने वाले समाज का निर्माण हो। जो विश्व गगन में पुनश्च भारत की महान सभ्यता और संस्कृति के आदर्शों को स्थापित करे। और सर्वत्र सुख-शांति-समन्वय और मूल्यों की अमृत धार प्रवाहित होती रहे।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बाबा साहेब अम्बेडकर https://visionviksitbharat.com/rashtriya-swayamsevak-sangh-dr-b-r-ambedkar/ https://visionviksitbharat.com/rashtriya-swayamsevak-sangh-dr-b-r-ambedkar/#respond Wed, 02 Apr 2025 04:26:33 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1564   संघ ने ‘व्यक्तिनिष्ठ’ नहीं अपितु ‘तत्वनिष्ठ’ प्रणाली को चरितार्थ किया। इसी का प्रतिफल है कि संघ कार्यों की समाज जीवन में व्यापक स्वीकार्यता हुई। राष्ट्रीयता समरसता, एकता, बंधुता और…

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संघ ने ‘व्यक्तिनिष्ठ’ नहीं अपितु ‘तत्वनिष्ठ’ प्रणाली को चरितार्थ किया। इसी का प्रतिफल है कि संघ कार्यों की समाज जीवन में व्यापक स्वीकार्यता हुई। राष्ट्रीयता समरसता, एकता, बंधुता और एकात्मता के उन्हीं मूल्यों के साथ संघ आगे बढ़ा जिसका स्वप्न डॉ अंबेडकर जैसे महापुरुष देखा करते थे।

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2025 में विजयादशमी की तिथि को अपना शताब्दी वर्ष पूर्ण करेगा। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में किसी भी सामाजिक सांस्कृतिक संगठन के 100 वर्ष पूरे होना अपने आप में आश्चर्य एवं शोध का विषय है। किंतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसे अपनी वैचारिक निष्ठा, दूरदर्शिता, अनुशासन और श्रेष्ठ सांगठनिक पद्धति के साथ इस महानतम् पड़ाव को साकार किया है। राष्ट्रीयता के मूल्यों की पुनर्स्थापना और राष्ट्र निर्माण के लिए असंख्य स्वयंसेवकों की दीपमालिकाओं से राष्ट्र को आलोकित किया है। यह संभव हुआ है तो संघ के प्रथम सरसंघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार की विशद् दृष्टि के चलते जिन्होंने बीज रूप में स्वयं को संगठन में आत्मार्पित कर-संघ को विशाल वृक्ष के रूप में मूर्तरूप प्रदान किया। संघ उसी समुज्ज्वल वैचारिक दृढ़ता के साथ उसी ऊर्जा के साथ राष्ट्र निर्माण में लगा है । जो ऊर्जा 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी की तिथि को संघ की स्थापना के समय थी। ‘सर्वेषां अविरोधेन’ अर्थात् हमारा कोई विरोधी नहीं है। इस मान्यता के साथ संघ ने राष्ट्र के मानस और हिन्दू समाज के आत्मगौरव को जागृत करने में महती भूमिका निभाई है। इसी कड़ी में प्रायः जब संघ और बाबा साहेब अम्बेडकर के कार्यों पर दृष्टि जाती है तो अद्भुत साम्य देखने को मिलता है। संघ प्रारंभ से ही अखंड भारत और सामाजिक समरसता के साथ राष्ट्रीयता के मूल्यों

के अनुरूप समाज को सशक्त बनाने के लिए काम करता आ रहा है। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में संघ प्रेरित संगठन काम कर रहे हैं। इसी प्रकार डॉक्टर अंबेडकर की सामाजिक समरसता की दृष्टि, राष्ट्रीयता, आर्थिक नीति, स्वावलंबन, स्वदेशी, स्व-भाषा और कन्वर्जन के विरुद्ध  जो दृष्टि मिलती है।‌वही संघ में साकार रूप में दिखाई देती है। संघ के वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, स्वदेशी, संस्कार भारती, संस्कृत भारती, एकल विद्यालय जैसे प्रकल्प इसी कड़ी के महत्वपूर्ण आयाम हैं।  यह इसी साम्य भाव की परिणति रही है कि बाबा साहेब अंबेडकर उस समय के समस्त राजनीतिक परिदृश्यों/ राजनेताओं और कांग्रेस आदि की कटु आलोचना करते रहे। किन्तु एक भी ऐसा प्रसंग नहीं आता है जब बाबा साहेब अंबेडकर ने कभी भी संघ की  आलोचना की हो।

वर्तमान में जब कुत्सित राजनीति ‘भाषायी  विवाद’ खड़े कर विभाजन उत्पन्न करना चाहती है। उस समय डॉ अंबेडकर के विचार मार्गदर्शक बनकर खड़े हैं।डॉ अंबेडकर वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने संसद में संस्कृत को राष्ट्रभाषा/राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रस्ताव दिया था। वो भारतीय भाषाओं की सामर्थ्य और एकात्मता को समझते थे। अतएव उन्होंने एकता के सूत्रों को अपने विचारों और कार्यों से प्रकट किया।

इसी प्रकार संघ निरंतर सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण, सम्वर्द्धन और उसके प्रयोग को लेकर  कार्य करता है। विदेशी भाषा के स्थान पर ‘मातृभाषा’ के प्रयोग के लिए समाज को प्रेरित करता है। संघ कन्वर्जन के विरुद्ध मुखर होकर प्रतिरोध दर्ज कराता है। समाज को प्रेरित करता है। जनजातीय अस्मिता के साथ-साथ समस्त क्षेत्रों में भारत के ‘स्व’ को प्रतिष्ठित करता है।

डॉ हेडगेवार और डॉ. अंबेडकर दोनों आजीवन सामाजिक समरसता को मूर्तरूप देने में लगे रहे। डॉक्टर जी की उसी संकल्पना का सुफल है सामाजिक समरसता का उत्कृष्ट उदाहरण संघ में सर्वत्र दिखता है। संघ में कभी भी किसी भी स्वयंसेवक से जाति- धर्म नहीं पूछा जाता है। संघ का स्वयंसेवक केवल स्वयंसेवक होता है। सभी एक पंक्ति में एक साथ बैठकर भोजन करते हैं – साथ रहते हैं और संघ कार्य में जुटे रहते हैं। इसी सम्बन्ध में 1 मार्च 2024 को डॉक्टर जी की जीवनी ‘मैन ऑफ द मिलेनिया: डॉ. हेडगेवार’ के विमोचन के अवसर पर संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने अपने उद्बोधन के दौरान कहा था कि — “संघ ने पहले दिन से जाति, अस्पृश्यता के बारे में कभी सोचा तक नहीं। इतना ही नहीं, डॉ हेडगेवार जी ने सामाजिक समरसता के लिए डॉ बाबा साहब अंबेडकर के साथ पुणे में चर्चा-संवाद किया। बाद में बाबासाहब संघ के कार्यक्रम में आए। साळुके जी ने उस बातचीत को अपनी डायरी में रिकॉर्ड किया है। उस पर पुस्तक भी छपी है।”

इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के उद्बोधन/ लेख के इस संक्षिप्तांश से बाबा साहेब अंबेडकर और संघ के अन्तर्सम्बन्धों पर सारगर्भित संदेश प्राप्त होता है — “बाबासाहब को संघ के विषय में पूरी जानकारी थी । 1935 में वह पुणे में महाराष्ट्र के पहले संघ शिविर में आये थे । उसी समय उनकी डॉ. हेडगेवार से भी भेंट हुई थी । वकालत के लिए वे दापोली (महाराष्ट्र) गये थे, तब भी वे वहाँ की संघ शाखा में गये थे और संघ स्वयंसेवकों से दिल खोलकर संघ कार्य के बारे में चर्चा की थी ।1937 की करहाड शाखा (महाराष्ट्र) के विजयादशमी उत्सव पर बाबासाहब का भाषण और उसमें संघ के विषय में प्रगट किए गए उनके विचार जिन्हें आज भी स्मरण हैं, ऐसे लोग आज भी वहाँ हैं ।सितम्बर 1948 में श्री गुरुजी और बाबासाहब की दिल्ली में भेंट हुई थी। गांधीजी की हत्या के बाद सरकार ने द्वेष के कारण संघ पर प्रतिबंध लगाया था, उसे हटवाने के लिए पू. बाबासाहब, सरदार पटेल और श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कोशिश की थी । 1939 में पूना संघ शिक्षा वर्ग में सायंकाल के कार्यक्रम हेतु बाबासाहब आए थे । डॉ. हेडगेवार भी वहीं थे । लगभग 525 पूर्ण गणवेशधारी स्वयंसेवक संघस्थान पर थे। बाबासाहब ने पूछा, ‘इनमें अस्पृश्य कितने हैं ?’

डॉ. हेडगेवार ने कहा, ‘अब आप पूछिए न?’ बाबासाहब ने कहा, “देखो, मैं पहले ही कहता था ।” इस पर डॉ. हेडगेवार ने कहा — “यहाँ हम अस्पृश्य हैं ऐसा किसी को कभी लगने ही नहीं दिया जाता । अब यदि चाहें तो जो उपजातियाँ हैं, उनका नाम लेकर पूछिए ।“ तब बाबासाहब ने कहा – “वर्ग में जो चमार, महार, मांग, मेहतर हों वे एक-एक कदम आगे आएं ।” ऐसा कहते ही कोई सौ से ऊपर स्वयंसेवक आगे आए ।

1953 में मा. मोरोपंत पिंगले, मा. बाबासाहब साठे और प्राध्यापक ठकार औरंगाबाद में बाबासाहब से मिले थे । तब उन्होंने उनसे संघ के बारे में ब्योरेवार जानकारी प्राप्त की । शाखाएँ कितनी हैं, संख्या कितनी रहती है आदि पूछा । वह जानकारी प्राप्त करने के बाद बाबासाहब मोरोपंत जी से कहने लगे, “मैंने तुम्हारी ओ.टी.सी. देखी थी। उसमें जो तुम्हारी शक्ति थी, उसमें इतने वर्षों में जितनी होनी चाहिए थी उतनी प्रगति नहीं हुई। प्रगति की गति बड़ी धीमी दिखाई देती है। मेरा समाज इतने दिन प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं है।”

आगे चलकर संघ ने एकात्मता स्त्रोत में महापुरुषों के पुण्य स्मरण के क्रम में 30वें श्लोक में “ठक्करो भीमरावश्च फुले नारायणो गुरुः ” के रूप में उसी परंपरा को संघ के स्वयंसेवकों के माध्यम से समाज तक ले जाने के भावबोध को विकसित किया है। अर्थात् डॉ अंबेडकर ने जो सूत्र दिए-जो विचार दिए संघ ने उसे समाज जीवन में साकार किया।

डॉक्टर हेडगेवार से चली आ रही मूल्यों की परंपरा के प्रति संघ के विचार पीढ़ी दर पीढ़ी उसी स्वरूप में दृष्टव्य होते हैं। संघ के वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के समरसता पर केन्द्रित ये विचार उसी भावभूमि को प्रकट करते हैं —

“भारत के प्रत्येक गांव, तहसील और जिले में ऐसी सज्जन शक्ति विद्यमान है जो सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने का कार्य करती है। भारतीय समाज में जाति और पंथ से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी गई है जिससे 140 करोड़ भारतीय किसी भी धर्म, जाति या पंथ से हो। अपने राष्ट्रीय चरित्र को नहीं भूलते। देश में विभिन्न भाषाएं, वेशभूषा, पूजा पद्धतियां और उपासना विधियां होने के बावजूद भारतीयता की डोर उन्हें एक सूत्र में बांधती है। राष्ट्रीय चरित्र की स्थापना के लिए सामाजिक समरसता की जड़ों को मजबूत करना आवश्यक है। मंदिर, जलाशय, शमशान जैसे स्थानों पर सभी जाति, पंथ और वर्गों का समान अधिकार है। यह भारत का शाश्वत आचरण है और इसे बरकरार रखना होगा। ”  ( 30 दिसंबर 2024, रायपुर , छत्तीसगढ़)

अभिप्रायत: संघ और डॉक्टर अंबेडकर के विचारों में साम्य और एकात्म ही नहीं अपितु उसे प्रामाणिकता के साथ कार्य रूप में परिणत करने का शाश्वत बोध भी है। जो संघ कार्य में सर्वत्र प्रतिबिंबित होता है।

इसी प्रकार जब बात स्वातंत्र्य आंदोलन की आती है तो ‘जन्मजात देशभक्त’ स्वतंत्रता सेनानी डॉ हेडगेवार उस समय  अखण्ड भारत की संकल्पना को लेकर तपस्वी स्वयंसेवकों को तैयार कर समाज को संगठित कर रहे थे। समाज के‌ विविध क्षेत्रों में कार्य कर रहे थे। उन्होंने घोषणा की थी “हमारा उद्देश्य हिन्दू राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता है, संघ का निर्माण इसी महान लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए हुआ है।”

उस समय संघ की शाखा में  सभी स्वयंसेवक यह प्रतिज्ञा लेते थे कि —“मैं अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए तन–मन – धन पूर्वक आजन्म और प्रामाणिकता से प्रयत्नरत रहने का संकल्प लेता हूं।”

जहां संघ ने अखंड भारत के विचार के साथ

भारत विभाजन का विरोध किया,  वहीं अखंड भारत को लेकर डॉ.अम्बेडकर के भी विचार सुस्पष्ट थे। वे किसी भी स्थिति में भारत विभाजन के पक्षधर नहीं थे। ‘पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया पुस्तक’ में उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों को लेकर सविस्तार लिखा है। ‘मुस्लिम मानसिकता और इस्लामिक ब्रदरहुड’ पर कटुसत्य उद्धाटित किया है।साथ ही विभाजन को लेकर उन्होंने जहां – जिन्ना को लताड़ा वहीं विभाजन पर कांग्रेस सहित महात्मा गांधी और पंडित नेहरू को भी कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने भारत विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार करने को स्पष्ट रूप से कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण बताया था। डॉ. अम्बेडकर ने मुस्लिम साम्प्रदायिकता पर तीखा प्रहार किया था। उन्होंने पाकिस्तान बन जाने के बाद जनसंख्या की अदला बदली को लेकर स्पष्ट रूप से कहा था —

“प्रत्येक हिन्दू के मन में यह प्रश्न उठ रहा था कि पाकिस्तान बनने के बाद हिन्दुस्थान से साम्प्रदायिकता का मामला हटेगा या नहीं, यह एक जायज प्रश्न था और इस पर विचार किया जाना जरूरी था। यह भी स्वीकारना पड़ेगा कि पाकिस्तान के बन जाने से हिंदुस्थान साम्प्रदायिक प्रश्न से मुक्त नहीं हो पाया।पाकिस्तान की सीमाओं की पुनर्रचना कर भले ही इसे सजातीय राज्य बना दिया गया हो लेकिन भारत को तो एक संयुक्त राज्य ही बना रहना चाहिए। हिंदुस्थान में मुसलमान सभी जगह बिखरे हुए हैं, इसलिए वे ज्यादातर कस्बों में एकत्रित होते हैं। इसलिए इनकी सीमाओं की पुनर्रचना और सजातीयता के आधार पर निर्धारण सरल नहीं है। हिंदुस्थान को सजातीय बनाने का एक ही रास्ता है कि जनसंख्या की अदला-बदली सुनिश्चित हो, जब तक यह नहीं किया जाता तब तक यह स्वीकारना पड़ेगा कि पाकिस्तान के निर्माण के बाद भी, बहुसंख्यक समस्या बनी रहेगी। हिंदुस्थान में अल्पसंख्यक पहले की तरह ही बचे रहेंगें और हिंदुस्थान की राजनीति में हमेशा बाधाएं पैदा करते रहेंगे।” (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया संस्करण 1945, थाकेर एंड क., पृष्ठ-104)

उपरोक्त संदर्भों एवं विवेचनों से सुस्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत की महान परंपरा को दर्शन बनाकर – कार्यों में प्रकट किया।व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण का ध्येय लेकर समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आदर्शों का उदाहरण प्रस्तुत किया। राष्ट्र के महापुरुषों और गौरवशाली परंपरा के अनुरूप राष्ट्रीयता के ‘पाञ्चजन्य’ का शंखनाद किया। यह इसीलिए फलीभूत हुआ क्योंकि संघ ने ‘व्यक्तिनिष्ठ’ नहीं अपितु ‘तत्वनिष्ठ’ प्रणाली को चरितार्थ किया। इसी का प्रतिफल है कि संघ कार्यों की समाज जीवन में व्यापक स्वीकार्यता हुई।राष्ट्रीयता समरसता, एकता, बंधुता और एकात्मता के उन्हीं मूल्यों के साथ संघ आगे बढ़ा जिसका स्वप्न डॉ अंबेडकर जैसे महापुरुष देखा करते थे।संघ में जो कुछ भी है वह समाज का ही है और संघ की स्पष्ट मान्यता है कि ‘समूचा समाज संघ बने और संघ ही समाज बने’। इसी संदर्भ में डॉ मोहन भागवत के ये विचार  प्रासंगिक है— “संघ पूरे समाज को अपना मानता है।‌ एक दिन यह बढ़ते-बढ़ते समाज का रूप ले लेगा तब संघ का यह नाम भी हट जाएगा और हिंदू समाज ही संघ बन जाएगा।” ( 18 अप्रैल, 2023 , ब्रम्हपुर (बुरहानपुर) मप्र)

 

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सृष्टि चक्र का शाश्वत सनातन संवाहक भारतीय नवसम्वत्सर https://visionviksitbharat.com/srishti-chakra-ka-shaswat-sanatan-samvahak-bhartiya-navsamvatsar/ https://visionviksitbharat.com/srishti-chakra-ka-shaswat-sanatan-samvahak-bhartiya-navsamvatsar/#respond Sun, 30 Mar 2025 17:55:34 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1548   भारतीय संस्कृति एवं प्रकृति का पारस्परिक तादात्म्य भी अपने आप में अनूठा है। हम प्रायः देखते हैं कि  चैत्र प्रतिपदा के साथ ही प्रकृति में परिवर्तन – नव चैतन्यता,…

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भारतीय संस्कृति एवं प्रकृति का पारस्परिक तादात्म्य भी अपने आप में अनूठा है। हम प्रायः देखते हैं कि  चैत्र प्रतिपदा के साथ ही प्रकृति में परिवर्तन – नव चैतन्यता, नवोत्साह का वातावरण यत्र – तत्र सर्वत्र दिखाई देने लग जाता है। बसंतोत्सव में माँ वीणापाणि के पूजन के सङ्ग वृक्षों पर नव कोपल आने लगते हैं। साथ ही ऋतुराज वसंत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से अपनी पूर्णता को प्राप्त करता हुआ दिखता है।

 

चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि भारतीय संस्कृति में अपना विशिष्ट महत्व रखती है। यह तिथि नवसम्वत्सर – हिन्दू नववर्ष के उत्साह पर्व की तिथि है। यह तिथि भारतीय मेधा के शाश्वत वैज्ञानिकीय चिंतन – मंथन के साथ – साथ लोकपर्व के रङ्ग में जीवन के सर्वोच्च आदर्शों से एकात्मकता स्थापित करती है। वैज्ञानिकता पर आधारित प्राचीन श्रेष्ठ कालगणना पद्धति के अनुरूप ऋतु चक्र परिवर्तन एवं सूर्य – चन्द्र की गति के अनुरूप नव सम्वत्सर का प्रारम्भ होता है। भारतीय संस्कृति अर्थात् हिन्दू संस्कृति के माहों ( मासों ) का नामकरण नक्षत्रों के नाम पर हुआ। इसके लिए हमारे पूर्वजों ने व्यवस्था दी कि – जिस मास में जिस नक्षत्र में चन्द्रमा पूर्ण होगा , वह मास उसी नक्षत्र के नाम से जाना जाएगा। और इस पध्दति के अनुसार — चैत्र – चित्रा, वैशाख – विशाखा, ज्येष्ठ – ज्येष्ठ, अषाढ़ – अषाढ़ा, श्रावण – श्रवण, भाद्रपद -भाद्रपद, अश्विन – आश्विनी , कार्तिक – कृतिका, मार्गशीर्ष – मृगशिरा, पौष – पुष्य, माघ- मघा, फाल्गुन – फाल्गुनी ; आदि के आधार पर नामकरण किया है।

सृष्टि रचयिता भगवान ब्रह्मा जी ने चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को सूर्योदय के साथ ही सृष्टि निर्माण कार्य प्रारम्भ किया था। जो कि सात दिनों तक चला और इसी कारण से सृष्टि सम्वत्सर – नवसम्वत्सर का प्रारम्भ भी इसी तिथि से माना जाता है ‌। इस प्रकार भारत की शाश्वत सनातनी हिन्दू धर्म संस्कृति के संवाहक एवं अविरल प्रवाह के रूप में – हिन्दू नववर्ष / नवसम्वत्सर सतत् अपनी वैविध्य पूर्ण उत्सवधर्मी छटा बिखेरता आ रहा है।

भारतीय संस्कृति एवं प्रकृति का पारस्परिक तादात्म्य भी अपने आप में अनूठा है। हम प्रायः देखते हैं कि  चैत्र प्रतिपदा के साथ ही प्रकृति में परिवर्तन – नव चैतन्यता, नवोत्साह का वातावरण यत्र – तत्र सर्वत्र दिखाई देने लग जाता है। बसंतोत्सव में माँ वीणापाणि के पूजन के सङ्ग वृक्षों पर नव कोपल आने लगते हैं। साथ ही ऋतुराज वसंत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से अपनी पूर्णता को प्राप्त करता हुआ दिखता है। ग्रीष्म ऋतु में फलदार वृक्षों पर प्रायः फल आ जाते हैं । सूर्य की किरणों से प्रकृति द्युतिमान होने लग जाती है। इसी समयफसलों की कटाई के साथ ही कृषकों के यहाँ धन- धान्य का आगमन होने लग जाता है। इस प्रकार नव सम्वत्सर में नव परिवर्तन की धानी चूनर ओढ़े प्रकृति आनन्द की रचना करने लग जाती है ।

प्रकृति के साहचर्य के सङ्ग जीवन की उमङ्गों को बिखेरने वाला भारतीय नव‌ सम्वत्सर अपने आप में अद्वितीय-अनूठा-अनुपमेय एवं‌ अप्रतिम है। स्थूल से लेकर सूक्ष्मतम् काल गणना की पद्धति अर्थात् – पृथ्वी के समानान्तर – सूर्य, चन्द्र व समस्त ग्रह – नक्षत्रों की गति के अनुरूप समय की लघुतम ईकाई को ध्यान में रखकर भारतीय पञ्चाङ्ग में वर्ष की कालगणना का प्रतिपादन दृष्टव्य होता है। इस दिशा में महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री भास्कराचार्य का योगदान अप्रतिम है। उन्होंने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सूर्योदय से सूर्यास्त तक कालखण्ड की वैज्ञानिक विवेचना करते हुए दिन, महीने और वर्ष की गणना करते हुए ‘पञ्चाङ्ग’ की रचना की थी। वर्तमान में गेग्रोरियन कैलेण्डर के प्रचलन के बाद भी भारतीय जीवन पद्धति में भारतीय पञ्चाङ्ग प्रणाली के अनुसार ही शुभ मुहूर्त देखकर समस्त शुभकार्य एवं प्रयोजन सम्पन्न कराए जाते हैं। संस्कारवान श्रेष्ठ समाज की रचना के उद्देश्य से महान पूर्वजों द्वारा बनाए गए सोलह संस्कारों यथा —गर्भाधान , पुंसवन , सीमन्तोन्नयन , जातकर्म, नामकरण संस्कार,निष्क्रमण संस्कार, अन्नप्राशन , चूड़ाकर्म , विद्यारम्भ , कर्णवेध , यज्ञोपवीत ,वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह व अंत्येष्टि ; इन समस्त संस्कारों को भारतीय तिथि, मुहूर्त देखकर सम्पन्न कराया जााता है।

भारतीय संस्कृति में ‘शक्ति’ का बहुत बड़ा महत्व है। शक्ति की साधना और आराधना ने भारतीय चिति को ज्ञान- विज्ञान के सर्वोच्च – सर्वोत्कृष्ट वरदान दिए हैं। चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से ही माँ आदिशक्ति दुर्गा भवानी की उपासना का पावन पर्व चैत्र नवरात्रि भी प्रारम्भ होता है।प्रतिपदा से लेकर नवमी तक प्रमुख रूप से माता के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। माँ के नव स्वरुपों का ध्यान इस मन्त्र से किया जाता है —

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

भारतीय परम्परा में शक्ति स्वरूपा माता की पूजा और नौ दिनों में कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर कन्या पूजन करना हमारी संस्कृति के सर्वोच्च जीवनादर्शों को प्रस्तुत करता है भारतीय संस्कृति एवं परम्परा में – नारी शक्ति का स्वरूप जीवन के मूल – आधार के रूप में है। जो अपनी शक्ति से सृजन का संसार रचती है। नवरात्रि का पर्व हमारी उसी महान सभ्यता के साथ हमें एकमेव करता है । जो माता के रूप में शक्ति की भक्ति करता हुआ लोकमङ्गल की कामना करता है।

इतना ही नहीं नवसम्वत्सर की चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि ब्रम्हा जी की सृष्टि रचना के साथ – साथ चतुर्युगों — सतयुग, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग की वैशिष्ट्य से भी जोड़ती है। यह तिथि हमारे गौरवशाली अतीत के साथ – हमारा परिचय करवाती है। यह तिथि यह बोध करवाती है कि – हमारी संस्कृति के महान आदर्श कौन थे? कौन हैं? और उनका पथानुसरण करते हुए युगानुकुल ढंग से हमें निरन्तर गतिमान रहना चाहिए।

त्रेता में यह तिथि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम से जुड़ती है। अपने चौदह वर्ष का वनवास काटने एवं अधर्म रुपी रावण का समूल संहार करने के पश्चात भगवान अयोध्या लौटे। तदुपरान्त चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को उनका वैदिक विधि विधान के‌ साथ राज्याभिषेक हुआ। रामराज्य के शंखनाद से चहुंओर आनंद की लहर दौड़ गई। बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामराज्य के विषय में लिखा—

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

इतना ही नहीं चैत की नवमी तिथि को भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का प्राकट्योत्सव भी है। अहा! कितना सुन्दर समन्वय है न! कि चैत्र की प्रतिपदा और नवमी तिथियाँ – ये दोनों प्रभु के जीवन से जोड़ती हैं। जहां श्री राम नवमी को भगवान का प्राकट्य पर्व है तो प्रतिपदा रामराज्य के राज्याभिषेक का पर्व। वहीं द्वापर में महाभारत युद्ध पूर्ण होने पर भगवान श्री कृष्ण के पाञ्चजन्य घोष के साथ ही युधिष्ठिर का राजतिलक हुआ। उन्होंने राजसूय यज्ञ सम्पन्न करने के पश्चात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से ही युधिष्ठिर सम्वत का शुभारम्भ भी किया था। वरुणदेव के अवतार माने जाने वाले भगवान झूलेलाल के प्राकट्य पर्व ‘चेटी चंड’ को सिंधी समाज के साथ साथ समूचा भारत मनाता है। यह पर्व प्रेम सद्भाव एकत्व एवं सौहार्द के साथ जीवमात्र के प्रति प्रेम की कामना करता है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि को ही भूतभावन बाबा महाकाल की नगरी अवंति (उज्जयिनी) में महान सम्राट राजा विक्रमादित्य ने विक्रम सम्वत का शुभारम्भ किया था। उन्होंने पतित पावनी शिप्रा के तट पर सम्वत पर्व मनाया गया था। वर्तमान में यही विक्रम सम्वत भारतीय जीवन पद्धति में सर्वाधिक प्रचलन में है। आधुनिक सन्दर्भ में हिन्दू नववर्ष के रूप में विक्रम सम्वत के साथ ही नवसम्वत्सर का शुभारम्भ पर्व सर्वत्र मनाया जाता है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि अपने आप में संस्कृति एवं विचारों के वैशिष्ट्य को समेटे हुए है। इसी तिथि को महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना की थी। सिख पंथ की दशम गुरु परम्परा के दूसरे गुरू – गुरु अंगदेव का जन्मपर्व भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही हुआ था। वहीं विश्व के अपने आप में अनूठे – स्वयंसेवी सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी इसी दिन हुआ था। उन्होंने 27 सितम्बर 1925 को विजयादशमी के दिन हिन्दू समाज को संगठित – सर्वशक्तिमान बनाने के उद्देश्य से संघ की स्थापना की थी। उनकी उसी विशद् दृष्टि से निर्मित रा.स्व.संघ राष्ट्रभक्त व्यक्तित्व निर्माण के पुनीत कार्य में सतत् जुटा हुआ है।

नवसम्वत्सर – हिन्दू नववर्ष अपनी महान विरासत व वैज्ञानिक पद्धति के साथ – साथ अपनी बहुवर्णी उत्सवधर्मिता के माध्यम से समूचे भारत को एकसूत्र में पिरोता है। यह पर्व देश के विभिन्न हिस्सों में यथा —दक्षिण भारत क्षेत्र के- आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल व कर्नाटक इसे ‘उगादि पर्व’ व कश्मीर में ‘नवरेह’ तो वहीं पूर्वोत्तर क्षेत्र के असम में ‘बिहू’ और मणिपुर में माह के पहले दिन के रूप में – सजीबू नोंग्मा, पनबा या मीती चेरोबा सा सजीबू चेरोबा आदि के रूप में मनाया जाता है।

इसके साथ ही तमिलनाडु में ‘पुतुहांडु’ और केरल में ‘विशु’ के रूप में भी नवसम्वत्सर मनाने की परम्परा देखने को मिलती है। महाराष्ट्र में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन उत्सव के रूप में ‘गुड़ी पड़वा’ हर्षोल्लास के रंग में डूबकर मनाया जाता है। इस उल्लास पर्व का क्षेत्र भगवान परशुराम की भूमि गोवा , कोंकण क्षेत्र तक विस्तृत है। वहीं पंजाब में ‘बैसाखी’ के रूप में और बंगाल प्रांत में ‘पोहेला बैसाखी ‘ या ‘नबा बरसा’ के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

ज्ञान – विज्ञान एवं उत्सव के विविध रङ्गों से सुसज्जित हिन्दू नववर्ष मनुष्य व प्रकृति के साथ एकात्म स्थापित करने वाला है। यह पर्व मनुष्य की सर्वोच्च मेधा के प्रतीक को अभिव्यक्त करता है। हमारी ऋषि परम्परा ने युगों पहले जिस वैज्ञानिक चिंतन पद्धति को जीवन में ढाल दिया था। वह वर्तमान में भी आश्चर्य का विषय है। सोचिए! प्रकृति के सूक्ष्म परिवर्तन, वैज्ञानिकीय कालगणना के साथ ही हिन्दू नववर्ष – नवसम्वत्सर का शुभारम्भ होता है। अर्थात् प्रकृति के नवोन्मेष के सङ्ग – नवसम्वत्सर का आगमन, जो कि वैज्ञानिक अनुसंधानों की कसौटी पर पूर्णतः खरा है। यह समूचे राष्ट्र के लिए गौरव का विषय है कि हमारे पास ‘स्वत्वबोध’ के महान आदर्श एवं जीवन पद्धतियाँ हैं, जो लोकल्याण की भावना से परिपूर्ण हैं। हमारी श्रेष्ठ भारतीय संस्कृति व्यष्टि -समष्टि एवं परमेष्ठि के साथ तादात्म्य एवं साहचर्य निरुपित करती है । उसी संस्कृति का शाश्वत संवाहक हिन्दू नववर्ष- नवसम्वत्सर है। जो लोकमङ्गल के विपुल उत्साह, उत्सवधर्मी जीवन और सृजन का विराट संसार रचाए बसाए हुए ‘स्व’ को पहचानकर कृण्वन्तो विश्वमार्यम का चिर सनातन संदेश दे रहा है।

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राष्ट्रनिष्ठ व शुचितापूर्ण पत्रकारिता के प्रखर स्तम्भ गणेश शंकर विद्यार्थी https://visionviksitbharat.com/ganesh-shankar-vidyarthi-a-pillar-of-nationalistic-and-ethical-journalism/ https://visionviksitbharat.com/ganesh-shankar-vidyarthi-a-pillar-of-nationalistic-and-ethical-journalism/#respond Mon, 24 Mar 2025 20:35:42 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1509   जिस प्रकार लोकमान्य तिलक जी द्वारा सम्पादित ‘मराठा’ एवं ‘केसरी’ ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया। उसी प्रकार विद्यार्थी जी द्वारा सम्पादित ‘प्रताप’ ने राष्ट्रवादी  हिंदी पत्रकारिता…

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जिस प्रकार लोकमान्य तिलक जी द्वारा सम्पादित ‘मराठा’ एवं ‘केसरी’ ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया। उसी प्रकार विद्यार्थी जी द्वारा सम्पादित ‘प्रताप’ ने राष्ट्रवादी  हिंदी पत्रकारिता में  अनन्य प्रतिष्ठा पाई।

 

स्वातन्त्र्य आन्दोलन के क्रान्तिकारी सम्पादक पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने अपने समूचे जीवन को स्वतन्त्रता की बलिवेदी को होम कर दिया। वे राष्ट्र धर्म का निर्वहन करते हुए लेखनी व आन्दोलन के दोनों मोर्चों में निर्भीक योध्दा की भांति डटकर खड़े थे। नवम्बर 1913 को उनके द्वारा साप्ताहिक प्रताप के प्रथमांक में ‘कर्मवीर महाराणा प्रताप’ शीर्षक से लिखे गए लेख की यह पँक्ति उनके सर्वोच्च आदर्श को प्रतिबिम्बित करती है — “ जो सिर स्वतन्त्रता देवी के सामने झुका, याद रखो, उसे अधिकार नहीं कि संसार की किसी शक्ति के सामने झुके।”

फिर उनकी लेखनी और ध्येयनिष्ठा ने क्रांतिकारी विचारों का चारों ओर अथाह प्रवाह निर्मित कर दिया। पत्रकारिता में उनके आदर्श को खड़ा करने में – ‘कर्मयोगी’ पत्र के सम्पादक पं. सुन्दरलाल और लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी की भूमिका थी। उन्होंने जहाँ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सानिध्य में हिन्दी भाषा के संस्कार सीखे। वहीं पं.सुन्दरलाल से ‘कर्मयोगी’ की भाँति ही राष्ट्र एवं समाज के उत्थान व स्वातन्त्र्य के लिए विचारों का प्रखर स्वर अपनाया। और उनके ये तेवर महामना पं मदनमोहन मालवीय के पत्र ‘अभ्युदय’ में भी निरन्तर परिष्कृत होते रहे। तत्पश्चात नौ नवम्बर 1913 को कानपुर से शुरू हुए ‘प्रताप’ की अठारह वर्षों तक चली ‘स्वातन्त्र्य यात्रा’ में यह क्रम दिनानुदिन अपने तीव्र वेग को प्राप्त करता गया। उनकी पत्रकारिता का ध्येय सुस्पष्ट था – वह ध्येय था स्वाधीनता के महत् उद्देश्य को प्राप्त करना । और समाज के वंचित – पीड़ित, उपेक्षितों की आवाज़ बनना। किसान – मजदूरों को न्याय दिलाना। चाहे इसके दोषी ब्रिटिश हुक्मरान रहे हों, याकि देशी रियासतों के राजा- रजवाड़े। याकि शोषणकारी सामन्त।

विद्यार्थी जी ने जिस मुखरता के साथ ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध पत्रकारिता को जन आन्दोलन बनाया। उसी तरह उन्होंने – भारतीय समाज में व्याप्त रुढ़ियों, कुरीतियों एवं समस्याओं पर तीखे तेवर में अपनी कलम चलाई। और समाज को आत्मचिंतन के लिए झकझोर कर रख डाला था। पत्रकारिता के आदर्श एवं दायित्वबोध को लेकर वे बेहद सजग एवं स्पष्टवादी थे। सन् 1930 में उन्होंने लिखा था — “पत्रकार की समाज के प्रति बड़ी जिम्मेदारी है, वह अपने विवेक के अनुसार अपने पाठकों को ठीक मार्ग पर ले जाता है, वह जो कुछ लिखे प्रमाण और परिणाम काविचार रखकर लिखे, और अपनी गति-मति में सदैव शुद्ध और विवेकशील रहे। पैसा कमाना उसका ध्येय नहीं है, लोक सेवा उसका ध्येय है।”

उनकी यही प्रखर विचार रश्मि ने उन्हें इतना क्रान्तिकारी बना दिया था कि – उन्होंने सत्य को आधार बनाकर राष्ट्र के प्रति असंदिग्ध श्रध्दा एवं समर्पण के साथ गतिमान रहे। उन्हें कोई भी परिस्थितियां – कभी भी उनके कर्त्तव्यपथ सू विचलित न कर सकीं। उनके ओजस्वी विचारों से भयभीत ब्रिटिश सरकार ने सुनियोजित ढंग से उन्हें गिरफ्तार किया। जेल की यातनाएं दी। लेकिन विद्यार्थी जी ‘लोकसेवा-राष्ट्रसेवा’ का लक्ष्य लिए निरन्तर गतिशील बने रहे। प्रताप में उनके जाज्वल्यमान क्रान्तिकारी तेवरों पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने लिखा था —“उनके उग्र लेख देखकर मैं कभी-कभी कांप उठता था।’ मगर ओज और सत्याग्रह ही ‘प्रताप’ और संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी की ज्वलंत पहचान थी। लप्पो-चप्पो का स्वर उसके चरित्र के लिए सर्वथा विजातीय था। सतेज सत्य के बल पर ही ‘प्रताप’ लोकप्रियता के उत्कर्ष पर पहुंचा था और उसकी लोकप्रियता का स्तर यह था कि हिंदी भाषी प्रदेश की जनता ‘समाचारपत्र का अर्थ’ केवल ‘प्रताप’ ही समझती थी । और यह धारणा गणेशशंकर के लोकमानस के प्रतिनिधित्व करने के सामर्थ्य को दर्शाती है। ”

प्रसिद्ध पत्रकार रहे मुकुटबिहारी वर्मा ने भी गणेश शंकर विद्यार्थी जी की गौरवपूर्ण राष्ट्रपरक विशद् विचार दृष्टि पर लिखा – “ ‘प्रताप’ के लिए पत्रकारिता व्यवसायपरक नहीं लोक-कल्याणार्थ थी। इसीलिए आर्थिक प्रलोभनों से मुक्त रहते हुए अन्याय-अत्याचार के खिलाफ सब तरह के बलिदान के लिए वह तैयार रहा। फलत: कई रियासतों में उस पर प्रतिबंध लगे, तरह- तरह की धमकियां दी गईं और मुकदमे भी चले। साथ ही अर्थ प्रलोभन भी उसके सामने आए। पर वह बिना झुके और बगैर प्रलोभन में आए अपने रास्ते चलता रहा; यहां तक कि उन लोगों पर हुए अन्याय के विरुद्ध भी उसने अपनी आवाज उठाई जिनके अन्याय के खिलाफ वह लड़ रहा था और खुद जिनके अन्याय का शिकार था।”

देश के जातीय स्वाभिमान पर आधारित उनकी अग्निधर्मी लेखनी ने अपनी परिपाटी का सृजन किया और राष्ट्रीय परिदृश्य के प्रत्येक घटनाक्रमों एवं विषयों को मुखरता के साथ उठाया। उन्होंने राष्ट्र की चेतना को जागृत करने के लिए विचारों का ज्वार उत्पन्न किया। यह उनकी उसी राष्ट्रनिष्ठा का परिणाम था कि — जिस प्रकार लोकमान्य तिलक जी द्वारा सम्पादित ‘मराठा’ एवं ‘केसरी’ ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता का श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया। उसी प्रकार विद्यार्थी जी द्वारा सम्पादित ‘प्रताप’ ने हिन्दी भाषा में राष्ट्रवादी पत्रकारिता में अपनी अनन्य प्रतिष्ठा पाई। और जन- जन की आवाज़ के रूप में जाना जाने लगा।

विद्यार्थी जी की ‘स्वराज्य’ विषयक विचार दृष्टि का दर्शन ‘प्रताप’ में 14 जुलाई 1924 के ‘स्वराज्य किसके लिए?’ शीर्षक से लिखे लेख के अंश से मिलता है —

“इस युग में, केवल भारतवर्ष के करोड़ों नर-नारियों के ललाट पर ये शब्द नहीं हैं कि जब सब आजाद होंगे तब तुम्हीं गुलाम बने रहोगे, तुम्हारी राह में रोड़े अटकाएंगे और तुम्हें अज्ञान और अंधकार में रखेंगे। यदि सचमुच इस देश के भाग्य में ही बदा है, तो हम यहीं कहेंगे, हमें स्वराज्य नहीं चाहिए। हमारे करोड़ों भाई, यदि गुलामी के बंधन में जकड़े हुए हैं, यदि वे अज्ञान और अंधकार में पड़े हैं, यदि उन्हें पेट भर खाने को नहीं मिलता और पहनने भर को कपड़ा, यदि उन्हें रहने के लिए जगह नहीं मिलती और चलने के लिए राह तो—उस दिशा की ओर जिधर हमारे इने-गिने आदमी सुख से समय बिताते हों और प्रभुता के अधिकारी बने हुए हों-उधर हम अपना मुंह भी नहीं करना चाहते। हम तो उसी ओर जाएंगे, उसी ओर रहेंगे-सड़ने, घुटने, और गुमनामी में मर जाने तक के लिए जिधर हमारे शरीर, हमारे हृदय, हमारे दीन-हीन और पीड़ित करोड़ों भाई होंगे। उस दुःख में एक शांति होगी, और उस सुख में करोड़ों के कंकाल पर भोगे जाने वाले थोड़े से आदमियों के उस सुख में- एक गहरी ग्लानि।”

उपर्युक्त उद्धृत अंश से यह सुस्पष्ट होता है कि – विद्यार्थी जी केवल ‘राजनैतिक स्वतन्त्रता ‘ की भी बात नहीं कहते थे। बल्कि उनकी दृष्टि में ‘स्वाधीनता’ यानी ‘स्वराज्य’ अर्थात् — भारतीय जनमानस के सर्वांगीण विकास एवं कल्याण के लिए वे प्रतिबद्ध थे। विद्यार्थी जी लोकमान्य तिलक के प्रखर – मुखर राष्ट्रवादी विचारों के पक्षधर थे। लेकिन दूसरी ओर महात्मा गाँधी की ‘अहिंसा’ की अवधारणा पर भी उतना ही विश्वास रखते थे। इतना ही नहीं गांधीजी के प्रति उनकी निष्ठा ‘सत्याग्रह’ आन्दोलन के दौरान सर्वाधिक मुखरता के साथ देखने को मिली थी। उनके सम्पादन में ‘प्रताप’ ने सत्याग्रह आन्दोलन को‌ लेकर व्यापक जनचेतना का प्रसार किया था। याकि फिर बात देश के किसानों या मजदूरों की हो ; उन्होंने भारत के कृषक व श्रमिक – इन दोनों वर्गों के लिए भी अपनी लेखनी और आन्दोलन दोनों से लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने किसानों पर होने वाले अत्याचारों के लिए रियासतों के राजाओं, सामंतों एवं अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोला।

होमरुल आन्दोलन के समय ही कानपुर में मिल मालिकों के विरुद्ध हुई हड़ताल का गणेश जी ने नेतृत्व किया था। इसमें 25000 की संख्या में मजदूर शामिल थे। वहीं बिहार के चम्पारण में अंग्रेजों द्वारा किसानों के शोषण के विरोध में जब गांधी जी वहां पहुंचे। तब प्रताप ने उस मुद्दे को उठाया। रायबरेली के निरंकुश जमींदार वीरपाल सिंह द्वारा किसानों पर गोली चलवाने की घटना को — उन्होंने ‘प्रताप’ में विस्तार से प्रकाशित किया था। इसी के चलते अंग्रेज सरकार व वीरपाल सिंह द्वारा सुनियोजित ढंग से उन पर मानहानि का मुकदमा दर्ज किया गया था। इसमें उन्हें आठ महीने की सजा हुई थी।

वे किसानों से जुड़े हुए ब्रिटिश सरकार के दमनकारी – शोषणकारी निर्णयों का निरन्तर निर्भीकतापूर्वक प्रतिकार करते थे। वे स्वयं को एक पत्रकार या राजनेता के स्थान पर गर्वपूर्वक ‘किसान’ कहा करते थे। किसानों – मजदूरों के सच्चे हितचिन्तक के रूप में वे प्रसिद्ध हो चुके थे। उनकी हत्या के बाद एक श्रद्धांजलि सभा में पं. बनारसीदास चतुर्वेदी जी ने विद्यार्थी जी के विषय में कहा था —“आज उस दीनबंधु के लिए किसान रो रहे हैं। कौन उनकी उद्गार-ज्वाला को शांत करने के लिए स्वयं आग में कूद पड़ेगा? मजदूर पछता रहे हैं, कौन उन पीड़ितों का संगठन करेगा, मवेशीखाने से भी बदतर देशी राज्यों के निवासी अश्रुपात कर रहे हैं, कौन उनका दुखड़ा सुनेगा और सुनाएगा? राजनीतिक कार्यकता रो रहे हैं, कौन उन्हें आश्रय देकर स्वयं आफत में फंसेगा? कौन उनके कंधे से कंधा मिलाकर स्वातंत्र्य संग्राम में चलेगा? और एक कोने में पड़े हुए उनके पत्रकार बंधु भी अपने को निराश्रित पाकर चुपचाप चार आंसू बहा रहे हैं। आपातकाल में कौन उन्हें सहारा देगा, किससे वे दिल खोलकर बात कहेंगे, किसे वे अपना बड़ा भाई समझेंगे, और कौन छुटभइयों का इतना खयाल करेगा ?”

उन्होंने ‘प्रताप’ में उस समय चलने वाली मुस्लिम तुष्टिकरण की निरन्तर भर्त्सना करते थे। और साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए उन्होंने इस बात पर जोर डाला था कि – मुसलमानों को अपने मूल यानि भारतीय संस्कृति पर आधारित रास्ते में चलना चाहिए। हिन्दू – मुस्लिम समस्या पर वे अत्यन्त स्पष्ट थे। वे दूरदर्शी थे। अतएव उन्होंने प्रताप में लिखा था — “शुभ होगा वह दिन तब इस देश के मुसलमान यह समझने लगेंगे कि हमारा नाता इस देश के हिंदुओं से तुर्कों और काबुलियों की अपेक्षा अधिक बड़ा और स्वाभाविक है, और जब वे उसी प्रकार जिस प्रकार रोम और ग्रीस के वर्तमान ईसाई, निवासी अपने गैर-ईसाई पूर्वजों की कीर्ति और कला को अपनाते हैं, भारतवर्ष की प्राचीन कीर्ति एवं कला को अपनाने लगेंगे।”

वे जिस साम्प्रदायिक तुष्टिकरण के विरुद्ध लड़ते रहे। बाद में उसी तुष्टिकरण एवं मुस्लिम हठधर्मिता ने देश को विभाजन की त्रासदी में झोंका। और नरसंहार की विभीषिका से देश को रक्त रंजित कर दिया। इतना ही नहीं गणेश शंकर विद्यार्थी जी की हत्या भी कानपुर के साम्प्रदायिक दंगे में अज्ञात धर्मांध मुसलमानों द्वारा 25 मार्च 1931 को की गई थी। जबकि विद्यार्थी जी दंगे से हिन्दू – मुसलमानों को सुरक्षित लाने में जुटे हुए थे।

विद्यार्थी जी की पत्रकारिता के कई आयाम थे। वे हिन्दी के प्रति विशेष निष्ठा रखते थे। यह बात कम लोगों को ही पता होगी मुंशी प्रेमचंद को उर्दू से हिन्दी की ओर लाने में विद्यार्थी जी का ही अतुलनीय योगदान था। इस तथ्य की पुष्टि इस बात से होती है कि – मुंशी प्रेमचंद की पहले -पहल कई कहानियां 1920 —1925 के दौरान ‘प्रभा’ में ही प्रकाशित हुईं थी। इस समय ‘प्रभा’ कानपुर से ‘प्रताप’ प्रेस से प्रकाशित होती थी। 1929 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गोरखपुर अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए विद्यार्थी जी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के विषय में कहा था — “हिंदी राष्ट्रभाषा बने, इसका यह अर्थ कदापी नहीं कि हिंदू हिंदू होने के नाते हिंदी सीखें। मेरे लिए तो हिंदी एक संस्कृति की प्रतीक है और केवल हिंदी के द्वारा ही बिखरे हुए भारत में एकत्व की भावना भरी जा सकती है और सबको एक सूत्र में आबद्ध करने का हिंदी एकमेव साधन है।”

इसी तरह उन्होंने राष्ट्र के स्वत्वबोध को जगाते हुए राष्ट्र भाषा के सन्दर्भ में कहा था—

“ राजनीतिक पराधीनता पराधीन देश की भाषा पर अत्यंत विषम प्रहार करती है। विजयी लोगों की विजय-गति विजित के जीवन के प्रत्येक विभाग पर अपनी श्रेष्ठता की छाप लगाने का सतत प्रयत्न करती है। स्वाभाविक ढंग से विजितों की भाषा पर उनका सबसे पहले वार होता है । भाषा जातीय जीवन और उसकी संस्कृति की सर्वप्रधान रक्षिका है, वह उसके शील का दर्पण है, उसके विकास का वैभव है। भाषा जीती, और सब जीत लिया। फिर कुछ भी जीतने के लिए शेष नहीं रह जाता।विजितों के मुंह से निकली हुई विजयी जनों की भाषा उनकी दासता की सबसे बड़ी चिह्नानी है- पराई भाषा चरित्र की दृढ़ता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नकल करने का स्वभाव बना करके उत्कृष्ट गुणों और प्रतिभा से नमस्कार करा देती है।”

वे पत्रकारिता को देश सेवा का सबसे अच्छा माध्यम मानते थे। उनकी पत्रकारिता के सिद्धान्त सत्यनिष्ठा, राष्ट्रनिष्ठा, स्वदेशी एवं स्वराज्य की संकल्पना पर आधारित थे। उनके ध्येय में भारतीय समाज का उत्थान एवं स्वाधीनता की चैतन्यता थी। उन्होंने भारतीय समाज की ‘न्यासत्व’ की पध्दति को ‘प्रताप’ में अपनाया। और ‘प्रताप ट्रस्ट’ का गठन किया था। 15 मार्च 1919 को रजिस्टर्ड प्रताप ट्रस्ट में पाँच सदस्य थे — गणेश शंकर विद्यार्थी, शिवनारायण मिश्र ‘वैद्य’, मैथिलीशरण गुप्त, डॉ. जवाहरलाल रोहतगी और लाला फूलचंद। विद्यार्थी जी की पत्रकारिता में ‘प्रताप’ की यात्रा के साथ – पं.माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल, श्रीराम शर्मा, देवव्रत शास्त्री, सुरेशचंद्र भट्टाचार्य और युगल किशोर सिंह शास्त्री इत्यादि का नाम प्रमुख सहयोगी पत्रकारों के रूप में जाना जाता है।

सरस्वती से अभ्युदय एवं तदुपरान्त ‘प्रताप’ व ‘प्रभा’ के माध्यम से उन्होंने भारतीय पत्रकारिता की क्रान्तिकारी धुरी का निर्माण किया। और स्वातन्त्र्य समर में भारतीय चेतना को जागृत करने के अभूतपूर्व पुरुषार्थ को उन्होंने निभाया। 18 वर्ष के प्रतापी ‘प्रताप’ ने भारत को ‘स्वत्व-स्वाभिमान- स्वदेशी – स्वराज्य – स्वाधीनता एवं स्वधर्म ‘ का महान पथ प्रशस्त किया। युगबोध दिशाबोध प्रदान किया। गणेश शंकर विद्यार्थी जी के अनन्य सहयोगी -मित्र दादा माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’ में 28 मार्च 1935 को उनका स्मरण करते हुए लिखा —

“कठिनाइयों में उन दिनों संकटों की अपेक्षा संन्यास अधिक यशस्वी होता था। गणेश जी ने इस प्रवाह को सीधा संकटों की ओर घुमा दिया। जमानतें, तलाशियां, मुकदमे, सजा-दंड देकर शासक सुखी होते, दंड पाकर गणेश गर्वीले होते क्योंकि गणेश जी संकटों में चाहे जो सोचते, किंतु सहस्र-सहस्र हिंदी भाषी, गणेश जी और ‘प्रताप’ के संकटों के साथ सोचते और सेवा के लिए प्रस्तुत रहते। पत्रकार-कला के हिंदी स्वरूप के ‘प्रताप’ नामक राष्ट्र मंच से गणेशी जी ने कायरों को, देश-घातकों को, महलों को, मुकुटों को, अत्याचारियों को और स्वार्थियों को लगातार चुनौतियां दीं और परिणाम में तलाशियां, अपमान, अर्थ हानि और कारागर सहे।”

 

सन्दर्भ ग्रन्थ :

गणेश शंकर विद्यार्थी और स्वतन्त्रता आन्दोलन, लेखक – विष्णु कुमार राय

पत्रकारिता के युग निर्माता गणेश शंकर विद्यार्थी — सुरेश सलिल

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राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक महाकुंभ पर्व https://visionviksitbharat.com/the-mahakumbh-festival-a-symbol-of-the-cultural-unity-of-the-nation/ https://visionviksitbharat.com/the-mahakumbh-festival-a-symbol-of-the-cultural-unity-of-the-nation/#respond Tue, 04 Feb 2025 12:20:45 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1075   कुंभ पर्व भारत की सहस्त्राब्दियों पूर्व की सांस्कृतिक एकता – एकात्मता, समरसता और अखण्डता का जीवन्त प्रतीक है। कुंभ का सनातन प्रवाह विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में कभी नहीं…

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कुंभ पर्व भारत की सहस्त्राब्दियों पूर्व की सांस्कृतिक एकता – एकात्मता, समरसता और अखण्डता का जीवन्त प्रतीक है। कुंभ का सनातन प्रवाह विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में कभी नहीं टूटा। क्रूर-बर्बर इस्लामिक और ब्रिटिश आक्रमणों के कालखंड में भी भारत अपनी ‘स्व’ की पताका को लिए दृढ़ अडिग खड़ा रहा।

~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

भारत की सांस्कृतिक धारा में कुंभ महापर्व का अपना वैशिष्ट्य है। ये महापर्व केवल धार्मिक और आध्यात्मिक तपश्चर्या की प्राणवान धरोहर ही नहीं हैं।अपितु भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रकटीकरण और एकात्मता की भावाभिव्यक्ति के श्रेष्ठ आदर्शों को प्रस्तुत करता है। कुंभ का भारतीय समाज में जितना आदर धर्मनिष्ठा के रूप में है। ठीक, उतना ही राष्ट्र की सांस्कृतिक और सामाजिक एकजुटता के साक्षात् दर्शन को निरुपित करने के रूप में भी है। भारतवर्ष में जितने भी पर्व, त्योहार, मेले हैं ; इन सबके पीछे हमारे महान पूर्वजों की अन्तश्चेतना और सामाजिकता की वैज्ञानिकता है। जो सबको एकसूत्र में गुंफित कर सर्जन और निर्माण का पथ प्रशस्त करती है।महीनों चलने वाले कुंभ महापर्व में ईश्वरीय शक्तियों के साक्षात्कार का तो पथ प्रशस्त ही होता है। साथ ही व्यक्तिगत और सामाजिक आचरणों की दशा और दिशा तय होती है।जो समाज जीवन के विविध पक्षों में उपयोगि सिद्ध होती है।

वस्तुत: पवित्र भारत भूमि तो युगों-युगों से ईश्वर की लीला भूमि- पुण्यभूमि रही है। ये वही भूमि है जहां ईश्वर भी मनुज रुप में अवतार लेते रहे हैं। ऋषि- महर्षि अपनी मेधा और तपबल से राष्ट्र को पोषित करते रहे हैं। यहां के कंकर-कंकर में ‘शंकर’ अर्थात् भगवान ‘शिव’ तथा बच्चे-बच्चे में ‘राम’ और बालिका में ‘देवि’ अर्थात् ‘शक्ति’ को देखने और पूजने की दृष्टि और परंपरा विकसित हुई है। प्रकृति के पञ्च तत्वों यथा — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश को ईश्वर माना गया।नदियों को माँ की संज्ञा देकर उनकी पूजा की जाती है। यह अगर कहीं संभव हो सकता है तो वो केवल भारत भूमि ही है। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म का भार बढ़ा-तब-तब परमात्मा ने हर युग में अवतार लिए। पृथ्वी के संताप का हरण कर धर्म की संस्थापना की। भारतीय जीवन दर्शन में प्रायः चतुर्युगों और चार पुरुषार्थों की मान्यता है। सतयुग, त्रेता द्वापर और वर्तमान कलियुग तो वहीं — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रुपी चार पुरुषार्थ हैं। भगवान विष्णु के दशावतारों के रुप में ईश्वर ने यहां समय-समय पर हर युग में धर्म का महत् संदेश दिया। प्राणिमात्र के कल्याणार्थ व्यष्टि-समष्टि और परमेष्ठि के एकीकृत स्वरूप को प्रकट किया। इसी धरा धाम में-इसी पुण्यभूमि में भगवान श्रीरामचन्द्र जी और गीतोपदेशक -धर्मोपदेशक भगवान श्रीकृष्ण के आदर्श कण-कण में व्याप्त हुए ।

जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते हुए भारतीय जन-जीवन के अंदर गहरे समाए हुए हैं। इसी लीलाभूमि में ऋषि-मुनियों के तप, त्याग, वैराग्य के महान मूल्यों और आदर्शों से श्रेष्ठ समाज की रचना हुई। ज्ञान-भक्ति और अध्यात्म की त्रिवेणी प्रवाहित हुई। प्रभु राम के पूर्वज भागीरथ की कठोर तपस्या से ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को माँ गंगा भगवान शिव की जटाओं से होते हुए पृथ्वी पर अवतीर्ण हुईं। इसी क्रम में समुद्र मंथन के समय अमृत की चार बूंदों में से एक-एक बूंद प्रयागराज और हरिद्वार में गंगा में, एक बूंद उज्जयिनी में क्षिप्रा में और नासिक में गोदावरी में गिरा। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बृहस्पति के कुंभ राशि में और सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर हरिद्वार में गंगा के किनारे पर कुंभ आयोजित होता है। इसी प्रकार बृहस्पति के मेष राशि में प्रविष्ट होने के साथ -साथ सूर्य और चंद्र के मकर राशि में होने पर प्रयागराज में त्रिवेणी संगम तट पर कुंभ का आयोजन होता है। वहीं नासिक में गोदावरी के तट पर बृहस्पति और सूर्य के सिंह राशि में प्रवेश करने पर कुंभ का आयोजन होता है।

उज्जयिनी में क्षिप्रा तट पर कुंभ बृहस्‍पति के सिंह राशि में और सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने पर आयोजित होता है। चूंकि दानवों से अमृत कुंभ को बचाने के लिए देवताओं के बीच 12 दिन का संघर्ष चला था। देवों के उन 12 दिनों की मनुष्य के 12 वर्षों के रूप में गणना की गई । इसी विधान के चलते प्रत्येक 12 वर्ष में कुंभ पर्व का आयोजन होता है।

प्रयाग राज में कुंभ का वैशिष्ट्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां गंगा-यमुना और सरस्वती तीनों का संगम होता है। श्रीरामचरितमानस में बाबा गोस्वामी तुलसीदास ने प्रयागराज और कुंभ की महिमा के विषय में लिखा —

माघ मकरगत रबि जब होई । तीरथपतिहिं आव सब कोई ॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं । सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥

अर्थात् – माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं, तब सब लोग तीर्थराज प्रयाग को आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं

आगे बाबा गोस्वामी तुलसीदास – प्रयागराज की महिमा बतलाते कहते हैं कि —

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ॥
अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा॥

अर्थात् — पापों के समूह रूपी हाथी के मारने के लिए सिंह रूप प्रयागराज का प्रभाव (महत्व-माहात्म्य) कौन कह सकता है? ऐसे सुहावने तीर्थराज का दर्शन कर सुख के समुद्र रघुकुल श्रेष्ठ श्री रामजी ने भी सुख पाया।

भारतीय परंपरा के इन्हीं मानकों और मूल्यों के वाहक कुंभ का महात्म्य और उसकी पवित्रता भारतीय जनजीवन में गहरे रची बसी हुई है। कुंभ पर्व भारत की सहस्त्राब्दियों पूर्व की सांस्कृतिक एकता – एकात्मता, समरसता और अखण्डता का जीवन्त प्रतीक है। कुंभ का सनातन प्रवाह विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में कभी नहीं टूटा। क्रूर-बर्बर इस्लामिक और ब्रिटिश आक्रमणों के कालखंड में भी भारत अपनी ‘स्व’ की पताका को लिए दृढ़ अडिग खड़ा रहा। माँ गंगा की भांति अविरल स्वच्छ, धवल और कान्तिमय स्वरुप में ‘कुंभ पर्व’ प्रवहमान रहा आया। यदि हम गहराई के साथ कुंभ महापर्व के विविध पहलुओं पर दृष्टिपात करें तो कुंभ महापर्व भारत की सांस्कृतिक एकता के शाश्वत संगीत के रूप में दिखाई देता है। जो राष्ट्र की विविधता में एकता की भावना के स्वर को गुंजित करता है।मूल्यों की प्रेरणा-प्रकटीकरण के विराट और अनंत वैशिष्ट्य-स्वरुप की प्राणवान झांकी प्रस्तुत करता है।

कुंभ महापर्व की पावन झंकृति के साथ राष्ट्र माँ गंगा के पावन तट पर विशुद्ध धार्मिकता और आध्यात्मिकता के शंखनाद के यज्ञ- आहुतियों, भजन- संकीर्तन और धर्मानुसार आचरण के साथ भारत गतिशील रहा आया। संतों के आश्रमों में भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक लहराते भगवा ध्वज, वेदमन्त्रों की ह्रदयङ्गम गुञ्जार, संतों के ललाट पर चमकते शैव, वैष्णव , शाक्त और समस्त भारतीय परंपराओं के सुशोभित चंदन ; ये सहज ही दिखाई देने वाले सारे दृश्य अद्भुत-अनुपमेय रहते हैं। यह इसी का पुण्य प्रताप रहा है कि — कुंभ के दौरान विद्वतजनों की सभाओं, धर्मोपदेश और सत्संग के साथ समूचे राष्ट्र की एकता और एकात्मता का मंत्र गंगा तट से भारतवर्ष के कोने-कोने में जाता रहा आया। यह परंपरा भारतीय जन-जीवन के अविभाज्य अंग के रूप में लोक की जीवनी-सञ्जीवनी शक्ति बन गई।

यदि वर्तमान में देखें तो माघ मास के आने के कई माह पूर्व से ही देश भर में कुंभ, कल्पवास की तैयारियां शुरु हो जाती हैं। राष्ट्र के पूर्व से लेकर पश्चिम, उत्तर से लेकर दक्षिण सभी दिशाओं में निवासरत समूचा समाज माघ मास में कुंभ स्नान-गंगा स्नान के लिए प्रयागराज आता है। हर-हर गंगे, हर-हर महादेव, जय सियाराम, राधे-कृष्ण, राधेश्याम रटता रहता है। गङ्गा स्नान करता है। सूर्य को अर्घ्य देता है। पूजन-अर्चन करता है। अपने को तपाता है। संस्कारित करता है‌। गङ्गा की पुण्यता से मन-वचन और कर्म की निर्मलता का अनुभव करता है। परमात्मा से एकात्म स्थापित करने के लिए उद्यत होता है। अपनी संस्कृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए अपने मूल-वैशिष्ट्य के प्रति गौरवान्वित अनुभूत करता है।जीवन के महत् उद्देश्य के साथ साक्षात्कार करता है। पूर्वजों की महान विरासत के साथ एकात्म होता हुआ लोकमङ्गल की संस्थापना का संकल्प लेता है।

भारत इसीलिए भारत है क्योंकि यह धर्म रुपी आत्मा और संस्कृतिनिष्ठ, प्रकृतिनिष्ठ काया का अनुपमेय सम्मुचय है। ‘यत् पिंडे-तत् ब्रम्हाण्डे’ के साथ ‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये’ की धर्मोदात्त चेतना से संपृक्त है। भारत के इसी वैशिष्ट्यपूर्ण सांस्कृतिक चेतना से समृद्ध और धर्म से अलंकृत कुंभ महापर्व में शुभ्रता और पुण्यता की आभा के साथ भारत के लोक के विराट दर्शन होते हैं। प्रयागराज में महाकुंभ के अवसर पर हम अपने ‘राष्ट्र’ का साक्षात् दर्शन पाते हैं। यहां हर पंथ और उपासना को मानने वाले लोग मिलेंगे। यहां राष्ट्र के हर प्रांत से आने वाले वे लोग मिलेंगे जिनकी बोली और भाषाएं परस्पर भिन्न हैं। वे लोग मिलेंगे जिनके पहनावे, रहन-सहन, खान-पान सब अलग-अलग हैं। वे लोग मिलेंगे जिनकी सामुदायिक और जातीय पहचान अलग-अलग रूप में जानी जाती है। यहां एक ओर वे लोग भी मिलेंगे जिनके पास अथाह संपत्ति है तो एक ओर वे लोग भी दिखाई देंगे जिनका जीवन यापन भी चुनौतीपूर्ण होता है। ज्ञानी-ध्यानी, शहरी- ग्रामीण समेत जितने भी प्रकार की भिन्नताएं होती हैं – वो गङ्गा तट में ‘अभिन्न’ स्वरुप में परिवर्तित हो जाती हैं। फिर महाकुंभ में सारी विविधताएं—एकता के सर्वोच्च मानक के रूप में दिखाई देती हैं।

एकात्मता का प्रतीक

कुंभ में सबकी अलग-अलग पहचानें तिरोहित हो जाती हैं और सबके सामने एक पहचान अपनी संपूर्ण आभा के साथ आलोकित होती है। वह एक पहचान होती है भारतीय होने की—सनातनी मूल्यों को जीने वाले हिन्दू होने की। यह पहचान एक ऐसी अमिट पहचान होती है।जो तमाम विद्रूपताओं, भेदभावों और पृथकता को समाप्त कर देती है और एकत्व की उद्घोषणा करती है।

भारत मूल रूप से जो है-उसके ‘तत्व’ को ‘सत्व’ को और ‘सत्य’ को प्रकट करती है। फिर कुंभ महापर्व में प्रकट होता है भारत का विराट दर्शन जो भारत के सनातन काल से चले आ रहे सामाजिक और सांस्कृतिक एकत्व को प्रतिबिंबित करता है।कुंभ पर्व केवल आध्यात्मिक होने के भाव में होने का बोध नहीं प्रदान करता है। अपितु कुंभ महापर्व धार्मिकता के साथ सबको एकता के इस मंत्र से दीक्षित करता है —

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।

अर्थात् — हम सब एक साथ चलें। एक साथ बोलें। हमारे मन एक हों। प्राचीन समय में देवताओं का ऐसा आचरण रहा । इसी कारण वे वंदनीय हैं।

भारतीय समाज की सामाजिकता के संस्कारों का सर्वश्रेष्ठ आदर्श यदि देखना है तो महाकुंभ में इसके दृश्य सहज ही दिखाई देंगे। यहां आने वाला हर व्यक्ति केवल धर्म-अध्यात्म, ज्ञान-भक्ति, तपस्या और कर्मनिष्ठा के एक ध्येय को जीने वाला होता है । सबके अंदर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की महान उदात्त भावना संचारित होती है। यह अपने को विस्तारित करती हुई ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः’ के स्वरूप में दृष्टिगोचर होती है। कुंभ में आने वाला जन-जन लोककल्याण की भावना से ओत-प्रोत रहता है। यहां लोक बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी की ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी’ भावना के अनुसार आचरण का संकल्प लेता है। साथ ही कुंभ की पावनता में ‘तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु’ को आत्मसात करते हुए प्राणिमात्र के कल्याण के लिए जीवन को समर्पित करने के पथ पर अग्रसर होता है।

कुंभ माँ गङ्गा की पावनता के साथ ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’ के मन्त्र को आत्मसात करते हुए समदर्शी होने-समरस होने के तत्वबोध को जागृत करता है। कुंभ महापर्व भारतीय संस्कृति का एक ऐसा सेतु है जो अपने महाविराट स्वरूप में सबको समावेशित करता है। सबको ‘तप’ के तत्वबोध और सत्य के प्रताप से दीक्षित करता है। पवित्र करता है। सामाजिक और सांस्कृतिक एकता के सूत्रों को दृढ़ बनाता है। लोक को उत्सवधर्मिता के बहुरङ्गों और ह्रदय से ह्रदय के बंध को जोड़ता है। ‘स्व’ के मूल्यों को आत्मसात करने और तदानुसार आचरण के लिए प्रेरित करता है। यह कुंभ महापर्व ही है जो-

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया’ के बोध को जागृत करता है। सत्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित और पथ प्रदर्शित करता है। आवश्यकता है कि राष्ट्र अपनी इस गौरवपूर्ण विरासत के साथ गतिमान हो और राष्ट्र निर्माण के पथ पर अग्रसर रहे। कुंभ महापर्व में सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकरुपता का जो दर्शन मिलता है उसे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में आचार और व्यवहार में उतारें। सर्जन का ध्येय वाक्य सूत्रवाक्य लेकर जाएं और राष्ट्रीयता के मूल्यों से अनुप्राणित होकर माँ गङ्गा सा अविरल सनातन प्रवाहित होते रहें..।

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