Vikrant Nirmala, Author at VisionViksitBharat https://visionviksitbharat.com/author/vikrant-nirmala/ Policy & Research Center Thu, 28 Aug 2025 06:09:14 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://visionviksitbharat.com/wp-content/uploads/2025/02/cropped-VVB-200x200-1-32x32.jpg Vikrant Nirmala, Author at VisionViksitBharat https://visionviksitbharat.com/author/vikrant-nirmala/ 32 32 नई अर्थव्यवस्था का ब्लूप्रिंट है जीएसटी रिफॉर्म https://visionviksitbharat.com/gst-reform-is-the-blueprint-of-the-new-economy/ https://visionviksitbharat.com/gst-reform-is-the-blueprint-of-the-new-economy/#respond Thu, 28 Aug 2025 06:09:14 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1931   ‘लैफर कर्व सिद्धांत’  कहता है कि यदि कर-दरें बहुत ऊँची हों तो लोग कर चोरी या कर से बचाव के रास्ते खोजने लगते हैं, जिससे राजस्व घट जाता है;…

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‘लैफर कर्व सिद्धांत’  कहता है कि यदि कर-दरें बहुत ऊँची हों तो लोग कर चोरी या कर से बचाव के रास्ते खोजने लगते हैं, जिससे राजस्व घट जाता है; और यदि कर-दरें बहुत कम हों तो भी पर्याप्त राजस्व नहीं मिलता। लेकिन एक आदर्श मध्यम कर-दर पर राजस्व सर्वोच्च होता है। इस दृष्टिकोण से देखें तो भारत अपने इनकम टैक्स और जीएसटी सुधारों के जरिए न केवल एक संतुलित कर-दर की ओर बढ़ रहा है बल्कि डिरेगुलेशन के माध्यम से नियमों को सरल बनाकर अनुपालन लागत भी घटा रहा है।

 

अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधारों की घोषणा बीते स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने की। इस घोषणा की पृष्ठभूमि में एक ओर वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल थी, तो दूसरी ओर लंबे समय से लंबित एक अहम सुधार की जरूरत। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो साफ है कि आज की अनिश्चित आर्थिक दुनिया में किसी भी देश की मजबूती का पहला आधार उसकी घरेलू मांग और खपत होनी चाहिए। क्योंकि आज अमेरिका टैरिफ को हथियार बनाकर अपने हित में ट्रेड डील की कोशिश कर रहा है, जैसा उसने यूरोपीय संघ, जापान या वियतनाम आदि के साथ किया है। लेकिन भारत ऐसे किसी भी समझौते पर तैयार नहीं है जो उसके किसानों, छोटे व्यापारियों और पशुपालकों के हितों को नुकसान पहुँचाए। ऐसे परिदृश्य में टैरिफ से उपजी चुनौतियों का सर्वोत्तम समाधान यही है कि हम घरेलू स्तर पर सुधारों के जरिए खपत, मांग और निवेश की श्रृंखला को गति दें। इससे न केवल हमारी जीडीपी में वृद्धि बरकरार रहेगी, बल्कि बढ़ती मांग से निवेश और रोजगार का चक्र भी जरी रहेगा। यह स्थिरता हमें दुनिया में वैकल्पिक बाजारों की ओर बढ़ने का भी अवसर देगी। इसलिए जीएसटी सुधारों की घोषणा को केवल कर-संरचना में बदलाव नहीं, बल्कि एक नई अर्थव्यवस्था  के निर्माण के रूप में देखना चाहिए। यह उस ‘डिरेगुलेशन’  का अगला पड़ाव है जिसकी नींव इस बार के बजट में रखी जा चुकी है। जिस तरह 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी थी, उसी प्रकार अब हो रहा डिरेगुलेशन भी आने वाले वर्षों में बड़े बदलावों की शुरुआत करेगा। यह वह ठोस आधार बनेगा जिस पर आने वाले कई दशकों की भारतीय अर्थव्यवस्था खड़ी होगी।

टैक्स सुधारों से खपत और निवेश दोनों को लाभ 

भारत की कुल जीडीपी में उपभोग यानी खपत का हिस्सा लगभग 60% है। यह खपत बनी रहे, इसके लिए दो शर्तें सबसे अहम हैं: पहली, लोगों की आय लगातार बढ़े और दूसरी, महँगाई नियंत्रण में रहे। आय तभी बढ़ेगी जब देश में निवेश और उत्पादन को गति मिले और रोजगार के नए अवसर बनें। वहीं महँगाई पर काबू पाने के लिए अप्रत्यक्ष करों में कटौती सबसे प्रभावी उपायों में से एक मानी जाती है। इसी आर्थिक सोच के तहत सरकार ने इस साल डिरेगुलेशन की दिशा में दो बड़े सुधार किए हैं। पहला, ₹12 लाख तक आयकर छूट, जिससे लोगों की जेब में अधिक पैसा बचेगा और उपभोग तथा माँग दोनों में वृद्धि होगी। दूसरा, ‘नेक्स्ट-जनरेशन जीएसटी सुधार’, जो कर ढाँचे को सरल बनाता है। जहाँ पहले जीएसटी में 5%, 12%, 18% और 28% की बहु-दर संरचना थी, अब इसे घटाकर केवल दो मानक दरों 5% और 18% तक सीमित किया जा रहा है। यानी 12% स्लैब की अधिकांश वस्तुएँ 5% पर और 28% स्लैब की अधिकतर वस्तुएँ 18% पर आ जाएँगी। इस बदलाव का सीधा असर यह होगा कि रोजमर्रा की जरूरी वस्तुएँ सस्ती होंगी, महँगाई पर लगाम लगेगी और खपत को निर्णायक रफ्तार मिलेगी। जैसा कि जॉन मेनार्ड कीन्स का ‘उपभोग-सिद्धांत’  कहता है, लोगों की अतिरिक्त आय का बड़ा हिस्सा उपभोग पर खर्च होता है, जिससे कुल माँग बढ़ती है। परिणामस्वरूप उत्पादन और रोजगार को गति मिलती है और पूरी अर्थव्यवस्था का चक्र गतिमान रहता है।

लेकिन यहाँ दो महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं, पहला यदि यह सुधार इतना व्यापक है तो जीएसटी लागू होने के साथ ही क्यों नहीं किया गया, और दूसरा, इससे होने वाली राजस्व-हानि कहीं आवश्यक बड़े प्रोजेक्ट्स की रफ्तार को धीमा तो नहीं कर देगी? पहले सवाल का उत्तर यह है कि जब जीएसटी 2017 में लागू हुआ था, तब शुरुआती वर्षों में राजस्व स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए बहु-दर संरचना रखना एक आवश्यक समझौता था, ताकि राज्यों को हो रही राजस्व-घटोतरी की भरपाई की जा सके। अब जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था का कर-आधार काफी विस्तृत हो चुका है, ऐसे में जीएसटी दरों का सरलीकरण (रेशनलाइज़ेशन) न केवल कर प्रणाली को आसान बनाएगा बल्कि दरों से जुड़े विवाद और भ्रम को भी कम करेगा। हालांकि यह भी सच है कि शुरुआती दौर में इससे राजस्व पर दबाव पड़ेगा। अनुमान है कि जीएसटी सुधारों के चलते अनुमानतः ₹50,000 करोड़ (0.15% जीडीपी) की राजस्व-हानि होगी। लेकिन आर्थिक अध्यन बताते हैं कि टैक्स दरों में सरलीकरण से समय के साथ कर-संग्रह न केवल वापस बढ़ता है बल्कि पहले से अधिक हो जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि जब नियम सरल होते हैं, कर-दरें तर्कसंगत रहती हैं और लालफीताशाही घटती है, तो कर चोरी की प्रवृत्ति स्वतः कम होती है और करदाता आधार बढ़ता है।

इसी सन्दर्भ में ‘लैफर कर्व सिद्धांत’  महत्वपूर्ण है। यह सिद्धांत कहता है कि यदि कर-दरें बहुत ऊँची हों तो लोग कर चोरी या कर से बचाव के रास्ते खोजने लगते हैं, जिससे राजस्व घट जाता है; और यदि कर-दरें बहुत कम हों तो भी पर्याप्त राजस्व नहीं मिलता। लेकिन एक आदर्श मध्यम कर-दर पर राजस्व सर्वोच्च होता है। इस दृष्टिकोण से देखें तो भारत अपने इनकम टैक्स और जीएसटी सुधारों के जरिए न केवल एक संतुलित कर-दर की ओर बढ़ रहा है बल्कि डिरेगुलेशन के माध्यम से नियमों को सरल बनाकर अनुपालन लागत भी घटा रहा है। ऐसे में यह संभावना है कि निकट भविष्य में अर्थव्यवस्था की गतिविधियाँ तेज होंगी और कर-संग्रह भी बढ़ेगा, क्योंकि कर का कम बोझ उपभोग और निवेश दोनों को प्रोत्साहित करेगा। अनुमान है कि यदि टैरिफ और वैश्विक अस्थिरता के कारण जीडीपी वृद्धि दर में 1 प्रतिशत की गिरावट आती है, तो ये सुधार उतनी ही जीडीपी बढ़ाने में कारगर साबित होंगे। यानी भारत अपनी वृद्धि को स्थिर बनाए रखने में कामयाब रहेगा।

‘डिरेगुलेशन’ के जरिए नव-उदारीकरण

1991 के उदारीकरण के बाद आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया लगातार आगे बढ़ती रही, फिर भी भारत वैश्विक ईज ऑफ डूइंग बिजनेस सूचकांकों में शीर्ष स्थानों तक नहीं पहुँच सका। इसका कारण रहा कि सुधारों के बावजूद अनावश्यक नियम-क़ानून, लाइसेंस और धीमी नौकरशाही ने व्यापार सुगमता को प्रभावित रखा। यही स्थिति जीएसटी के साथ भी देखने को मिली। ‘एक देश, एक कर’ व्यवस्था का सपना जटिल बहु-दर संरचना और उलझनों में ऐसा फँसा कि यह आम लोगों के लिए सरल कर प्रणाली नहीं बन पाया। अंततः बजट 2025 में सरकार ने नियंत्रक की जगह सुविधादाता की भूमिका अपनाने हुए डिरेगुलेशन की दिशा में निर्णायक शुरुआत की। इसी सोच से जन विश्वास अभियान 2.0 की घोषणा हुई।

पहले जन विश्वास अधिनियम 2023 के तहत कारोबारी गतिविधियों से जुड़े 180 छोटे अपराधों को अपराधमुक्त कर केवल आर्थिक दंड तक सीमित किया गया था। अब जन विश्वास बिल 2.0 से इस एजेंडे को और आगे बढ़ाते हुए 288 धाराओं को अपराधमुक्त किया गया है और 67 धाराओं में ईज़ ऑफ लिविंग को ध्यान में रखते हुए संशोधन किया गया है। इन प्रयासों का उद्देश्य यही है कि तकनीकी उल्लंघनों पर उद्यमियों को आपराधिक कार्रवाई का भय न रहे और वे निडर होकर काम कर सकें। पिछले दस वर्षों में ऐसे 40,000 से अधिक अनुपालनों को समाप्त किया है जो या तो अप्रासंगिक हो चुके थे या व्यापार पर बोझ डाल रहे थे।

लेकिन, डिरेगुलेशन की यह प्रक्रिया केवल कानूनी सुधारों तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को खोलने तक विस्तारित है। सरकार रक्षा और बीमा जैसे क्षेत्रों में भी खुले बाज़ार को प्रोत्साहित कर रही है। हाल के बजट में बीमा क्षेत्र में एफडीआई सीमा 74 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दी गई है, जिससे इस क्षेत्र में पूंजी और तकनीक का प्रवाह होगा, प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और उपभोक्ता को अधिक विकल्प तथा बेहतर सेवाएँ मिलेंगी। इसी तरह राजमार्ग, रेलवे और बंदरगाहों में निजी निवेश बढ़ाने के लिए लगभग दस लाख करोड़ रुपये की परिसंपत्तियों के मोनेटाइजेशन का लक्ष्य रखा गया है। डिरेगुलेशन के ये तमाम प्रयास नव-उदारीकरण की कहानी हैं जो एक नई अर्थव्यवस्था को आकार दे रहे हैं।

इंडियन इकॉनमी 2.0 : फॉर्मल, प्रतिस्पर्धी, समावेशी और नवाचार आधारित

भारतीय अर्थव्यवस्था आज एक नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहाँ उसका ढाँचा चार मजबूत स्तंभों पर खड़ा दिखाई देता है। पहला स्तंभ है फॉर्मलाइजेशन। डिजिटल क्रांति ने लेन-देन को नए आयाम दिए हैं। अकेले जून 2025 में यूपीआई लेन-देन 24.03 लाख करोड़ रुपये रहा। आयकर रिटर्न दाख़िल करने वालों की संख्या पाँच वर्षों में 36 प्रतिशत बढ़कर 9.19 करोड़ पहुँच गई है। 2024–25 में जीएसटी संग्रह 22.08 लाख करोड़ रुपये के नए रिकॉर्ड पर पहुँचा और पंजीकरण 1.5 करोड़ से ऊपर निकल गया। डीबीटी के ज़रिए अब तक 43.95 लाख करोड़ रुपये सीधे लाभार्थियों के खातों में पहुँचे हैं। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने 76 करोड़ लोगों को बीमा कवच दिया है। इन पहलों ने अर्थव्यवस्था को पहले से कहीं अधिक औपचारिक, मजबूत और पारदर्शी बना दिया है।

दूसरा स्तंभ है प्रतिस्पर्धा। उत्पादन क्षमता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में पीएलआई योजना, नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन और औद्योगिक कॉरिडोर ने अहम भूमिका निभाई हैं। नतीजा यह है कि भारत की सप्लाई चेन पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ हुई है। समर्पित लॉजिस्टिक कॉरिडोर इसका एक उदाहरण हैं। कभी लगभग सभी मोबाइल फोन आयात करने वाला भारत आज एप्पल और सैमसंग जैसे वैश्विक ब्रांडों का असेंबली हब बन चुका है। यह बदलाव भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखला में नए सिरे से स्थापित कर रहा है।

तीसरा स्तंभ है नवाचार। आज नेशनल रिसर्च फाउंडेशन और रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन योजना के माध्यम से उच्च तकनीकी क्षेत्रों में अनुसंधान और निवेश को बढ़ावा दिया जा रहा है। डीप-टेक फंड ऑफ फंड्स और रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण तकनीकों के अधिग्रहण जैसी पहलें निजी क्षेत्र को सक्रिय भागीदारी का अवसर दे रही हैं। इससे भारत का नवाचार तंत्र अधिक आत्मनिर्भर और भविष्य-केंद्रित बन रहा है।

चौथा स्तंभ है समावेशिता। नियामक सुधार, कर सरलीकरण और विश्वास आधारित नीतियाँ निवेशकों को आज स्थिर वातावरण दे रही हैं। सरकार निजी निवेश और उद्यमिता को प्रोत्साहित कर रही है जिससे एक भरोसे का माहौल बना है। यही नया संतुलन आज इंडियन इकॉनमी 2.0 को तैयार कर रहा है, जो आने वाले दशकों में उच्च विकास को बरकरार रखेगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत को निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित करेगा।

उपभोग, निवेश और उद्यमशीलता की त्रिवेणी पर तैयार हो रही इस नई अर्थव्यवस्था का असर आने वाले वर्षों में दिखेगा, जब जीएसटी दरों में कटौती से रोजमर्रा की चीज़ें सस्ती होंगी और मध्यम वर्ग की जेब में बचत बढ़ेगी। यही बचत नए घरों, उपभोक्ता वस्तुओं और यात्रा-पर्यटन पर खर्च होगी और माँग का नया चक्र शुरू करेगी। बढ़ती माँग उद्योगों को भरोसा देगी कि बाज़ार स्थिर है और सरकार नीतिगत रूप से साथ खड़ी है। विदेशी कंपनियाँ निवेश की ओर आकर्षित होंगी और भारतीय कंपनिया और स्टार्टअप्स अनुपालन के बोझ से मुक्त होकर नवाचार में छलांग लगाएंगे।

लेकिन, चुनौती अब केवल क्रियान्वयन की है। केंद्र और राज्यों को मिलकर प्रक्रियाएँ आसान करनी होंगी। केंद्र को जीएसटी दरों में बदलाव से होने वाली संभावित राजस्व-हानि की भरपाई का भरोसा राज्यों को देना होगा और राज्यों को भी अपने स्तर पर नियमों को सरल बनाकर निवेश-अनुकूल वातावरण तैयार करना होगा। क्योंकि अंततः हर सुधार से विकास की कहानी इन्हीं से होकर गुजरनी है। यदि यह तालमेल कायम रहा, तो सात से आठ प्रतिशत की सतत आर्थिक वृद्धि संभव होगी।

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नई राह पर वैश्विक व्यापार https://visionviksitbharat.com/global-trade-on-a-new-path/ https://visionviksitbharat.com/global-trade-on-a-new-path/#respond Sat, 16 Aug 2025 20:13:52 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1884   भारत की व्यापार नीति का मूल स्वर ‘विनियमित उदारीकरण’ है, यानी एक ऐसी रणनीति जिसमें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंच को बढ़ावा देते हुए घरेलू उद्योगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित…

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भारत की व्यापार नीति का मूल स्वर ‘विनियमित उदारीकरण’ है, यानी एक ऐसी रणनीति जिसमें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंच को बढ़ावा देते हुए घरेलू उद्योगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। इसका सबसे स्पष्ट और सशक्त उदाहरण क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी से भारत का पीछे हटना है, जहाँ वह चीन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों से आने वाले सस्ते उत्पादों की बाढ़ से अपने घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना चाहता था। भारत मानता है कि वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक भागीदारी से निर्यात, निवेश और रोज़गार को बल मिलेगा, लेकिन यह तभी संभव है जब घरेलू उद्योग प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम हों। यही कारण है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में भारत सतर्कता बरत रहा है।

 

भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच हुआ ‘व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता’ आज वैश्विक चर्चा का केंद्र है। इसका कारण है कि यह समझौता दो अलग-अलग आर्थिक संरचनाओं, एक विकसित (यूके) और एक विकासशील (भारत) अर्थव्यवस्था के बीच हुआ है। इस समझौते के तहत भारत करीब 90% ब्रिटिश वस्तुओं पर टैरिफ़ घटाएगा या समाप्त करेगा, जबकि ब्रिटेन 99% भारतीय उत्पादों को शुल्क मुक्त पहुंच देगा। लेकिन इस आपसी लाभ के आगे यह समझौता उस व्यापक परिवर्तन को भी दर्शाता है जो आज की बदलती वैश्विक व्यापार व्यवस्था का परिचायक है। इस समझौते ने वैश्विक समुदाय को स्पष्ट संदेश दिया है कि वैश्वीकरण अब अपने पारंपरिक रूप से हटकर एक नए स्वरूप की ओर अग्रसर है। बहुपक्षीय व्यापार समझौते, जो कभी विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) जैसे मंचों पर आधारित हुआ करते थे, अब तेजी से क्षेत्रीय और द्विपक्षीय समझौतों में बदलते जा रहे हैं।

असल में इस नव-उदारीकरण की लहर को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक स्तर पर आर्थिक सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से एक बहुपक्षीय व्यापार संगठन की स्थापना का विचार आया। यद्यपि वह प्रस्तावित संगठन मूर्त रूप नहीं ले सका, परंतु 23 देशों ने ‘टैरिफ़ एवं व्यापार पर सामान्य समझौते’ पर हस्ताक्षर किए। इसके अंतर्गत 1994 तक आठ व्यापारिक दौर आयोजित हुए, जिनमें शुल्कों में कटौती और व्यापार नियमों पर आम सहमति बनी। इन सभी दौरों में सबसे निर्णायक रहा उरुग्वे राउंड (1986–94), जिसके तहत न केवल औद्योगिक उत्पादों पर औसत शुल्क दरों में कटौती हुई, बल्कि कृषि सब्सिडी, सेवाओं का व्यापार, कपड़ा-परिधान कोटा और बौद्धिक संपदा जैसे नए क्षेत्रों पर भी वैश्विक नियम तय किए गए। इसके परिणामस्वरूप 1995 में डब्ल्यूटीओ की स्थापना हुई, जिसने वैश्विक व्यापार संचालन को औपचारिक रूप दिया।

हालाँकि 21वीं सदी में विश्व व्यापार संगठन की व्यवस्था आंतरिक मतभेदों, वैश्विक असंतुलनों और धीमी प्रगति के चलते दबाव में आने लगी। वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी, 2015 में विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को केंद्र में रखकर प्रारंभ हुआ ‘दोहा विकास एजेंडा’ का असफल समापन, और फिर कोविड-19 महामारी जैसे झटकों ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को क्षेत्रीय व्यापार समझौतों (आरटीए) की ओर मोड़ दिया। इस बदलाव की पुष्टि आँकड़ों से भी होती है, जहाँ वर्ष 1990 में 50 से भी कम आरटीए प्रभावी थे, वहीं मई 2025 के अंत तक यह संख्या बढ़कर 375 हो चुकी है। यह स्पष्ट संकेत है कि डब्ल्यूटीओ वैश्विक व्यापार में एकीकरण के अपने उद्देश्य में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका। परिणामस्वरूप, आज अधिकांश राष्ट्र आपसी हितों के आधार पर क्षेत्रीय या द्विपक्षीय आधारित उदारीकरण की राह पर है।

हालाँकि, क्षेत्रीय समझौतों के विस्तार में एक जटिल समस्या ‘स्पैगेटी बाउल प्रभाव’ की रही है। क्योंकि, आरटीए के अपने-अपने नियम, रूल्स ऑफ ओरिजिन, और शुल्क संरचनाएं होती हैं जिसके कारण सदस्य देशों के लिए सामंजस्य बैठाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। एक ही उत्पाद पर अलग-अलग समझौतों के तहत विभिन्न नियम लागू होते हैं, जिससे प्रशासनिक जटिलताएं बढ़ती है। इस समस्या से निपटने के लिए बड़े बहुपक्षीय ब्लॉकों की अवधारणा शुरू हुई, जैसे: क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी, समग्र एवं प्रगतिशील ट्रांस-प्रशांत साझेदारी और अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र, जिनका उद्देश्य व्यापार नियमों को एकरूप बनाकर बाधाएं घटाना रहा। लेकिन यह प्रयोग व्यापक परिवर्तन लाता उससे पहले ही अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, यूक्रेन संकट और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में विघटन ने विश्व व्यापर के नियम फिर बदल दिए। इन झटकों ने वैश्विक व्यापार की रफ्तार धीमी कर दी और दुनिया ‘धीमी वैश्वीकरण’ का शिकार हो गयी। ट्रेड ब्लाक की जगह विश्व व्यापार व्यवस्था छोटे और ‘मॉड्यूलर’ द्विपक्षीय सौदों की तरफ बढ़ गयी। आज अमेरिका से लेकर एशिया और यूरोप तक, ऐसे लचीले व्यापार समझौते तेजी से हो रहे हैं। इनकी विशेषता यह है कि ये केवल शुल्क कटौती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रौद्योगिकी, निवेश, रक्षा आपूर्ति, और नीति समन्वय जैसे अहम क्षेत्रों को भी समाहित कर रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प कि भाषा में इसे ‘डील-आधारित’ व्यापार नीति के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है, जहाँ देश प्रत्येक साझेदार के साथ अलग-अलग और लचीली रणनीति के तहत समझौते हो रहे हैं।

नए दौर का वैश्वीकरण

आज के वैश्विक व्यापार समझौते पारंपरिक वैश्वीकरण लहर से काफी भिन्न हैं। जहाँ पहले मुक्त व्यापार  ‘तुलनात्मक लाभ के सिद्धांत’ पर आधारित था, वह आज रणनीतिक हितों, आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा, तकनीकी नियमों और पर्यावरणीय मानकों पर ज्यादा आधारित है। तुलनात्मक लाभ का सिद्धांत कहता है कि प्रत्येक देश को उन उत्पादों में विशेषज्ञता लेनी चाहिए, जिनमें वह अपेक्षाकृत दक्ष है, और अन्य वस्तुएँ आयात करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, भारत के संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए समझौतों से तेल, कोयला जैसे कच्चे माल का आयात सस्ता हुआ और भारत के दक्ष कपड़ा, रत्न, फार्मा जैसे क्षेत्रों का निर्यात बढ़ा। हालाँकि इस सिद्धांत के अनुपालन से कुछ घरेलू उद्योग प्रतिस्पर्धा में पिछड़ते हैं, जिससे दबाव बढ़ता है, नौकरियाँ जाती हैं, और सामाजिक-आर्थिक असंतुलन उत्पन्न होता है। इसे ऐसे समझिए कि भारत ने किसी देश के साथ ऐसा व्यापार समझौता किया जो स्टील उतपादन में दक्ष था। इससे हुआ ये कि उस देश से सस्ते स्टील का आयात बड़ी मात्रा में भारत आने लगा। अब चूंकि वह स्टील सस्ता है, तो भारतीय कंपनियाँ और उपभोक्ता उसी का उपयोग करने लगे। इससे भारत के छोटे और मध्यम स्तर के घरेलू स्टील निर्माता प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएं। उनका उत्पादन घटा, यूनिट बंद हो गई, और बड़ी संख्या में नौकरियाँ चली गयीं। इसलिए आज अधिकांश व्यापार समझौतों में सभी पक्षों की ताकत और कमज़ोरी को संतुलित करने की कोशिश की जाती है, ताकि ऐसा असंतुलन सीमित हो और समझौते टिकाऊ बन सकें। उदाहरण के लिए, भारत-यूके समझौते में भारत ने ऑटो क्षेत्र में सीमित रियायतें दीं, जबकि ब्रिटेन ने वस्त्र और परिधान क्षेत्र में।

इसलिए आज व्यापार समझौतों में केवल आर्थिक दक्षता नहीं, बल्कि सामरिक हित, औद्योगिक संरक्षण और आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा भी केंद्रीय भूमिका में हैं। यही ‘सामरिक व्यापार सिद्धांत’ है जो कहता है कि समझौतों के बीच देशों को रणनीतिक क्षेत्रों, उच्च तकनीक या पूंजी गहन उद्योगों  में सब्सिडी और टैरिफ़ के ज़रिए अपने उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बनाये रखना चाहिए। उदहारण के लिए भारत सभी मुक्त व्यापार समझौतों में रणनीतिक उद्योगों को समायोजन समय देने के लिए चरणबद्ध शुल्क कटौती, सेफ़गार्ड प्रावधान, और सख्त मूल-उत्पाद नियमों को शामिल कर रहा है। कोविड-19, यूक्रेन संकट और रेयर अर्थ मटेरियल संकट जैसे अनुभवों ने दुनिया को सिखाया है कि व्यापार में सिर्फ न्यूनतम लागत नहीं बल्कि आपूर्ति की विश्वसनीयता भी उतना ही आवश्यक है। यही कारण है कि अब देशों के बीच ‘सप्लाई चेन रेजिलिएंस’ और ‘डिजिटल संप्रभुता’ जैसे शब्द व्यापार वार्ताओं के मुख्य विषय बन गए हैं।

बदलते वैश्विक व्यापार में भारत की स्थिति

भारत की व्यापार नीति का मूल स्वर ‘विनियमित उदारीकरण’ है, यानी एक ऐसी रणनीति जिसमें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंच को बढ़ावा देते हुए घरेलू उद्योगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। इसका सबसे स्पष्ट और सशक्त उदाहरण क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी से भारत का पीछे हटना है, जहाँ वह चीन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों से आने वाले सस्ते उत्पादों की बाढ़ से अपने घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना चाहता था। भारत मानता है कि वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक भागीदारी से निर्यात, निवेश और रोज़गार को बल मिलेगा, लेकिन यह तभी संभव है जब घरेलू उद्योग प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम हों। यही कारण है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में भारत सतर्कता बरत रहा है। वह कृषि, डेयरी और छोटे उद्योगों के हितों से समझौता करने को तैयार नहीं है। भारत का यह दृष्टिकोण न तो पूर्ण संरक्षणवाद है और न ही अंध उदारीकरण, बल्कि यह एक परिपक्व, संतुलित और भारत-केंद्रित मुक्त व्यापार नीति का परिचायक है। वर्तमान में भारत यूरोपीय संघ, अमेरिका, कनाडा, ओमान, कतर और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों के साथ वार्ताओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है, जो इस रणनीति की व्यावहारिकता पर ही आगे बढ़ रहा है।

आज वैश्विक व्यापार संरचना में परिवर्तन के इस दौर में भारत के सामने एक ऐतिहासिक अवसर है कि वह वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन का लाभ उठाकर एक नई विनिर्माण शक्ति के रूप में उभरे। इसके लिए आवश्यक है कि भारत बहुपक्षीय, लचीली और संतुलित नीति को अपनाए, जिसमें दीर्घकालिक रणनीति और अल्पकालिक व्यावहारिकता का समन्वय हो। हालाँकि, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित न रहे, बल्कि छोटे और मझोले उद्यमी भी उन्हें समझें और उनका उपयोग कर सकें। साथ ही, भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में चरणबद्ध उदारीकरण की दिशा में बढ़ना होगा। वर्तमान में ऐसे क्षेत्र ऊँचे टैरिफ़ से घरेलू बाजार में तो सुरक्षित हैं, पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा और नवाचार से दूर हैं। भारत की नीति अब ‘गतिशील संरक्षणवाद’ की होनी चाहिए, अर्थात् जब तक घरेलू उद्योग तैयार न हो जाएं, तब तक उन्हें संरक्षण देना और जैसे-जैसे वे सक्षम हों, वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए उन्हें आगे बढ़ाना। भारत आज उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ वह अपने संतुलित दृष्टिकोण और दूरदर्शिता से न केवल स्वयं को, बल्कि वैश्विक व्यापार को भी एक नई दिशा देने में सक्षम हो सकता है।

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ब्रिक्स : उभरती गैर-पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं का नया मंच https://visionviksitbharat.com/brics-a-new-platform-for-emerging-non-western-economies/ https://visionviksitbharat.com/brics-a-new-platform-for-emerging-non-western-economies/#respond Sat, 19 Jul 2025 09:56:27 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1866 हाल ही में ब्राज़ील की राजधानी रियो डी जेनेरो में आयोजित ब्रिक्स की सत्रहवीं शिखर बैठक दो प्रमुख कारणों से वैश्विक चर्चाओं का केंद्र बनी। पहला, अमेरिका की इस मंच…

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हाल ही में ब्राज़ील की राजधानी रियो डी जेनेरो में आयोजित ब्रिक्स की सत्रहवीं शिखर बैठक दो प्रमुख कारणों से वैश्विक चर्चाओं का केंद्र बनी। पहला, अमेरिका की इस मंच को लेकर स्पष्ट असहजता और दूसरा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, पर्यावरण संरक्षण और सीमा-पार आतंकवाद जैसे विषयों पर दिए गए ठोस वक्तव्य। इन दोनों घटनाओं के निहितार्थ आज के बदलते वैश्विक परिदृश्य को समझने के लिए आवश्यक है। वर्ष 1945 से ही अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में नेतृत्वकारी भूमिका के दम पर एकध्रुवीय व्यवस्था को बनाए रखा है। लेकिन, आज ब्रिक्स जैसे मंच का उभार अमेरिका के वैश्विक प्रभुत्व को सीधे चुनौती दे रहा है। वहीं प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जलवायु परिवर्तन और उभरती तकनीकों को ब्रिक्स के एजेंडे में लाना इस मंच को वैश्विक भविष्य की दिशा तय करने वाला एक वैचारिक और नैतिक नेतृत्व मंच बनाने की शुरुआत है। इसका सीधा आशय था कि ब्रिक्स अब केवल एक आर्थिक मंच नहीं, बल्कि वैश्विक नीति और विमर्श को दिशा देने वाला एक प्रभावशाली मंच है।

यही कारण है कि अमेरिका में असहजता गहराती जा रही है, और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ब्रिक्स देशों पर भारी शुल्क लगाने की चेतावनी इस बेचैनी का स्पष्ट संकेत है। क्योंकि आज ब्रिक्स अन्य वैश्विक मंचो में कुछ पश्चिमी देशों के एकाधिकार की निति के बिलकुल उलट सदस्य देशों के लिए विकास और समावेशिता का एक नया मार्ग प्रस्तुत कर रहा है। इस बार की बैठक में जो साझा घोषणा-पत्र (डिक्लेरेशन) जारी किया गया, वह ब्रिक्स की भविष्य दृष्टि और वैश्विक योगदान को स्पष्ट करता है। यह दस्तावेज बहुपक्षीयता को सुदृढ़ करने, अंतरराष्ट्रीय कानूनों की रक्षा करने और एक न्यायसंगत वैश्विक व्यवस्था की बात करता है।

उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ब्रिक्स में बढ़ती दिलचस्पी

पिछले कुछ वर्षों में ब्रिक्स ने स्वयं को पश्चिमी गुट, विशेषकर जी-7 की तुलना में एक समतामूलक मंच के रूप में स्थापित किया है। यही कारण है कि दुनियाभर की उभरती अर्थव्यवस्थाएँ इसका हिस्सा बनना चाहती हैं। पिछले कुछ वर्षों में ब्रिक्स को लेकर यह आकर्षण इतना बढ़ा कि 2023 में दक्षिण अफ्रीका में हुए सम्मेलन में 40 से अधिक देशों ने ब्रिक्स की सदस्यता में रुचि दिखाई, और 22 ने औपचारिक आवेदन किया था। इस बढ़ती दिलचस्पी के पीछे दो प्रमुख कारण हैं: पहला, सभी सदस्य देशों को बराबरी का स्थान और निर्णय में समान भागीदारी। दूसरा, यह समूह आर्थिक संभावनाओं और व्यावहारिक विकास के नए द्वार खोल रहा है, विशेषकर उन देशों के लिए जिन्हें पारंपरिक पश्चिमी संस्थानों में अक्सर हाशिए पर रखा गया। इस बात को समझना ज़रूरी है कि आईएमएफ जैसी संस्थाओं में उभरते देशों को उनकी आर्थिक क्षमता के अनुपात में अधिकार नहीं है। इसके अलावा ब्रिक्स “वीटो” जैसे विशेषाधिकारों के आधार पर निर्णय नहीं थोपता है। उदाहरण के लिए, ब्रिक्स द्वारा स्थापित न्यू डेवलपमेंट बैंक में सभी सदस्य देशों के पास एक वोट होता है। इसके अलावा यह बैंक ‘कंटिंजेंट रिजर्व अरेंजमेंट’ के अंतर्गत सदस्य देशों को भुगतान संतुलन की समस्या से निपटने में तत्काल सहायता भी प्रदान करता है। यही विशेषता ब्रिक्स को जी-7 और ब्रेटन वुड्स संस्थाओं से अलग और अधिक लोकतांत्रिक बनाती है।

वहीं आर्थिक दृष्टिकोण से भी ब्रिक्स एक व्यवहारिक विकल्प प्रस्तुत करता है। वर्ष 2010 में इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सा मात्र 18 प्रतिशत था और उस समय इसे जी-7 के मुकाबले एक ‘कमजोर आवाज’ माना जाता था, किंतु अब यह धारणा टूट चुकी है। वर्ष 2023 में पहली बार ब्रिक्स देशों की सम्मिलित जीडीपी (क्रय शक्ति समता के आधार पर) जी-7 समूह की कुल जीडीपी से अधिक हो गई। इसके अलावा नॉमिनल जीडीपी के आधार पर ब्रिक्स 2030 तक वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में होगा, जो वैश्विक उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान देगा। इसके अलावा, अन्य आर्थिक संकेतक भी ब्रिक्स की बढ़ती ताकत को रेखांकित करते हैं। यह समूह वैश्विक निर्यात में लगभग 25 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है, कच्चे तेल का 43 प्रतिशत उत्पादन करता है और दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ मिनरल्स) का 72 प्रतिशत से अधिक भंडार अपने पास रखता है। साथ ही, ब्रिक्स वर्तमान में विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 43 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है, जो इसे मानव संसाधन के दृष्टिकोण से अत्यंत समृद्ध और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।

डॉलर के वर्चस्व को चुनौती और पश्चिमी देशों की चिंता

दशकों से अमेरिकी डॉलर वैश्विक वित्तीय प्रणाली का केंद्र बिंदु रहा है, किंतु ब्रिक्स देशों ने इस डॉलर-आधारित व्यवस्था के समानांतर एक नई प्रणाली की संभावनाओं पर गंभीर चर्चा शुरू कर दी है। विशेष रूप से सदस्य देश आपसी व्यापार में अपनी स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा दे रहे हैं। उदाहरण के लिए, भारत–रूस और रूस–चीन के बीच हाल के वर्षों में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को प्रोत्साहित किया गया है। इसके अतिरिक्त, ब्रिक्स द्वारा एक साझा मुद्रा विकसित करने की संभावना पर भी चर्चा हो रही है। विशेष रूप से ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा के इस पर बयान के बाद चर्चा तेज हो गई। यद्यपि एक साझा मुद्रा का निर्माण तकनीकी, राजनीतिक और संरचनात्मक दृष्टिकोण से आसान नहीं है, फिर भी यह अमेरिकी डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को सांकेतिक  चुनौती देने जैसा है। यही कारण है कि आज पश्चिमी देशों में ब्रिक्स की इन डी-डॉलराइजेशन  पहलों को लेकर गंभीर चिंता देखी जा रही है।

पश्चिमी देशों की इस चिंता को ऊर्जा क्षेत्र के उदहारण से भी समझा जा सकता है। वर्तमान में दुनिया के बड़े तेल उत्पादक रूस, ईरान और सऊदी अरब और दो सबसे बड़े उपभोक्ता चीन और भारत ब्रिक्स मंच का हिस्सा हैं। यदि इन देशों के बीच डॉलर के स्थान पर घरेलू मुद्राओं या किसी वैकल्पिक माध्यम से तेल व्यापार शुरू हो जाता है, तो यह डॉलर की प्रतिष्ठा को सीधी चुनौती होगी। उदहारण के लिए जब भारत ने प्रतिबंधों के बीच रूस से तेल की खरीद स्थानीय मुद्रा में आगे बढाई थी तब अमेरिका और यूरोप की खीझ दिखाई पड़ी थी. इसलिए यदि ब्रिक्स देश आपसी व्यापार के लिए एक सफल गैर-डॉलर व्यापार मॉडल तैयार कर लेते हैं, तो इससे वैश्विक लेनदेन में डॉलर की मांग घटेगी और अंततः अमेरिका की आर्थिक स्थिति और वित्तीय प्रभुत्व पर गहरा असर पड़ सकता है। यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स की गतिविधियों को एक उभरते प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रहे हैं। ट्रंप द्वारा ब्रिक्स सदस्य देशों पर टैरिफ लगाने की खुली धमकी चाहे कठोर और अतिवादी हो, परंतु यह सच है कि ब्रिक्स का डी-डॉलराइजेशन एजेंडा दीर्घकाल में डॉलर की वैश्विक स्थिति को कमजोर कर सकता है।

यही कारण है कि आज विश्व स्वीकार कर रहा है कि ब्रिक्स एक वास्तविक प्रभाव रखने वाला ध्रुव है। ब्रिक्स देशों में अब पश्चिमी प्रतिबंधों को निष्प्रभावी करने की क्षमता है। उदाहरण के लिए, रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखा। हालाँकि, इसके बावजूद ब्रिक्स अभी वैश्विक नेतृत्व के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। इसका कारण यह है कि ब्रिक्स के भीतर आंतरिक मतभेद स्पष्ट हैं। चीन और रूस जहां तेजी से नए सदस्यों को जोड़कर प्रभाव क्षेत्र का विस्तार चाहते हैं, वहीं भारत और ब्राज़ील इस विस्तार को लेकर आशंकित हैं कि इससे समूह में उनका अनुपातित प्रभाव कम न हो जाए। इसी प्रकार, सऊदी अरब और ईरान जैसे पारस्परिक प्रतिद्वंद्वी अब एक ही मंच पर हैं, तो उनके बीच की तनातनी को संभालना ब्रिक्स के लिए एक बड़ी चुनौती है। इसके अतिरिक्त, लोकतांत्रिक भारत और ब्राज़ील बनाम अधिनायकवादी चीन और ईरान की वैचारिक भिन्नता भी एक महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण है। इसलिए जहाँ एक ओर ब्रिक्स की विविधता इसे समावेशी बनाती है, वहीं दूसरी ओर यही विविधता आंतरिक एकता के लिए एक बड़ी चुनौती भी है। फिर भी, आज ब्रिक्स ने विश्व मंच पर परिवर्तन की जो आहट दी है, उसे अब अनसुना नहीं किया जा सकता।

भारत ब्रिक्स को ‘गैर-पश्चिमी’ से ‘नए वैश्विक मंच’ के रूप में करे स्थापित

ब्रिक्स मंच पर भारत की भूमिका केवल एक सहभागी देश की नहीं, बल्कि एक संतुलनकारी नेतृत्वकर्ता की है। इस समूह में जहां एक ओर चीन और रूस अमेरिका और पश्चिमी गुटों के साथ सीधे टकराव में हैं, वहीं भारत की विदेश नीति बहुध्रुवीय संवाद और सहभागिता पर केंद्रित है। यही दृष्टिकोण भारत को ब्रिक्स के भीतर एक ऐसा केंद्र-बिंदु बनाता है, जो इसे पश्चिम और ब्रिक्स के बीच एक पुल की तरह प्रस्तुत करता है। भारत की यह क्षमता केवल आर्थिक आकार से नहीं, बल्कि उसकी बहुध्रुवीय कूटनीतिक सक्रियता से है। भारत आज क्वाड, शंघाई सहयोग संगठन, जी-20, जी-7 आमंत्रण समूह और ब्रिक्स में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। इन विविध मंचों में भारत की स्वीकार्यता उसे एक विश्वसनीय ब्रिज-नेशन’  बनाती है। विशेष रूप से ‘ब्रिक्स+’ विस्तार के संदर्भ में भारत को चाहिए कि वह अपनी रणनीति स्पष्ट रखे और ऐसे देशों की सदस्यता का समर्थन करे जो न केवल आर्थिक रूप से सक्षम हों, बल्कि राजनीतिक रूप से संतुलित, बहुपक्षीय और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व में विविधता लाने वाले हों। भारत अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया के देशों को शामिल कराने की दिशा में अग्रसर रह इस मंच को चीन या रूस के प्रभाव में झुकने के बजाय ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधि  के रूप में आगे बढ़ा सकता है। यदि भारत ब्रिक्स+ के विस्तार को संतुलित, समावेशी और दक्षिणमुखी बनाए रखने में अपनी निर्णायक भूमिका निभाता है, तो वह न केवल समूह की स्थिरता सुनिश्चित करेगा बल्कि भविष्य की बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में भी अपनी नेतृत्वकारी भूमिका को सुदृढ़ करेगा।

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Developed Northeast: PM Modi’s Commitment for Developed India 2047 https://visionviksitbharat.com/developed-northeast-pm-modis-commitment-for-developed-india-2047/ https://visionviksitbharat.com/developed-northeast-pm-modis-commitment-for-developed-india-2047/#respond Thu, 29 May 2025 21:25:18 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1756   Northeast India has made remarkable progress in the last ten years, overcoming violence, center negligence, and instability.  The region has moved towards peace, stability, and development. In the last…

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Northeast India has made remarkable progress in the last ten years, overcoming violence, center negligence, and instability.  The region has moved towards peace, stability, and development. In the last decade, violent incidents in the Northeast have reduced by 71% and civilian deaths by 86%. Its annual growth rate is now between 9.5% and 11%, more than the national average. Today, PM Modi’s ‘Act East Policy’ has ensured that the Northeast is not only perceived as one of the crucial parts in the Vision Viksit Bharat 2047 journey but also developed as a major gateway for trade and cultural cooperation with South-East Asia.

 

Northeast India is a unique region of possibilities. Strategically, economically, and culturally significant, this region also holds immense potential for industrial development, especially in tourism, Agro-food processing, textile manufacturing, handloom and handicrafts, energy, and other key sectors. Linking these possibilities with industrialization can strengthen Northeast India as a dynamic economic engine. To fulfill this objective, the ‘Rising Northeast Investors Summit 2025’ was recently organized at Bharat Mandapam, New Delhi. This summit has emerged as a strong platform for private investment in Northeast India, where global and domestic investors have expressed commitments for large-scale investment. For example, Vedanta Group has announced an investment of ₹80,000 crore, Reliance Group ₹75,000 crore, and Adani Group ₹50,000 crore. This event, held in the country’s capital, highlights the fact that Northeast India, which was once known for insurgency, the Armed Forces Special Powers Act (AFSPA), and separatist movements, is today becoming the new hub of industrial development and inclusiveness.

In fact, in the last decade, many important infrastructure projects have been started in the Northeast, which have connected the region to the mainstream and strengthened its strategic and economic position. For example, the Dhubri-Phulbari bridge, which is under construction and about 19 km long, is the longest river bridge in the country. This will reduce the distance between Assam and Meghalaya by about 203 km. Similarly, the Sivok-Rangpo rail project is progressing at a rapid pace, which will connect Sivok in Darjeeling to Rangpo in Sikkim. It is imperative from a strategic point of view, especially for this region near the China border. Currently, the National Highways and Infrastructure Development Corporation is working on projects worth more than Rs 1 lakh crore in the Northeast region. While the total length of national highways in Northeast India was only 8,480 km till 2013-14, it has increased to 15,735 km in 2022-23. Similarly, significant progress has also been observed in air connectivity. While only nine airports were operational earlier, now their number has increased to 17. These efforts have not only simplified regional transportation but have also given new momentum to tourism.

There are immense possibilities for tourism in the Northeast. Realizing this, the Modi Government at the center is spending an amount of ₹ 1502.48 crore in the Northeast to develop religious and cultural places under the ‘Swadesh Darshan’ and ‘Prasad’ schemes. Apart from this, a special focus is also on network connectivity. A total of ₹3,466 crore has been spent since 2014 to strengthen digital and communication infrastructure and work on providing 4G and 5G connectivity in 4,525 villages across the northeast, which is progressing rapidly.

Northeast India: the new center of industrial development

The rising story of Northeast India is not limited to just infrastructure; this region is now becoming an attractive center for industrial investment. This development is now taking place in areas like semiconductors, a strategic dimension of the future. Currently, the central government has approved the establishment of Tata Semiconductor Assembly and Test Private Limited in Assam, which will be the most significant industrial venture in the region so far, with an investment of about ₹27,000 crore. This will not only create new employment opportunities locally but will also mark the Northeast on India’s semiconductor manufacturing map. Additionally, under the National Bamboo Mission, 208 product development and processing units have been established in the region by March 2022, which is an essential step towards better utilization of local resources and local economic empowerment.

Peaceful Northeast:  An Engine for India’s Development

In the last ten years, the Northeast has emerged from the shadow of conflict, insurgency, and center negligence. Under the new Modi government in the center, it has made a remarkable journey towards peace, stability, and development. The foundation of lasting peace has now been laid in this region. In the last ten years, violent incidents in the Northeast have declined by 71% and civilian deaths by 86%. This transformation also reflects the changing social and political scenario of the region. So far, through several peace agreements, about 10,574 armed youths have surrendered and returned to the mainstream of society. The crucial success of the Modi Government is the phased removal of debated laws like AFSPA. It has been removed from 60% of Assam’s area, seven districts of Nagaland, most parts of Arunachal Pradesh, and states like Tripura and Meghalaya. Along with this, progress has been achieved in peacefully resolving long-pending inter-state border disputes, such as those between Assam and Meghalaya, Nagaland, Mizoram, and Arunachal Pradesh. As a result, the Northeast now records an annual growth rate between 9.5% and 11%, significantly higher than the national average of 6.5% to 7.5%. The ‘Act East Policy’, which replaced the ‘Look East Policy’, has connected the region to the mainstream and made it a gateway for trade, communication, and cultural cooperation with South-East Asian countries.

Northeast: A strategic gateway to South-East Asian countries

The Northeast region is a ‘strategic bridge’ between India and South-East Asian countries due to its geographical importance. The ‘Act East Policy’ of the Modi Government is now connecting this region with new dimensions of trade, connectivity, and cultural cooperation. Currently, work is being done on many strategic projects to connect Northeast India with South-East Asia. Among these, the prominent developments are the ‘India-Myanmar-Thailand Trilateral Highway’ and the ‘Kaladan Multi-Modal Transport Project’. The India-Myanmar-Thailand Highway Project covers about 1,360 km of international road connectivity from Moreh in Manipur to Mae Sot in Thailand via Tamu in Myanmar. Similarly, the Kaladan Project connects Kolkata Port to Sittwe Port in Myanmar, and from there, it establishes direct connectivity to Mizoram via the Kaladan River and road. As infrastructure, trade corridors, and international cooperation expand, the Northeast region is also becoming a powerful pillar of the country’s foreign policy. This region connects India with South-East Asian countries like Thailand, Vietnam, Laos, Cambodia, and Malaysia.

Rising Northeast: The Result of the Modi government’s Consistent Efforts 

The multi-dimensional transformation that has taken place in Northeast India is a testimony to the dedicated efforts of the Modi government. Prime Minister Narendra Modi himself has visited the Northeast about 65 times so far, which is a record for the visits made by any Prime Minister. Additionally, the central government has taken steps to strengthen cooperation with the region by ensuring the active involvement of Union Ministers. Union Ministers have made over 700 overnight visits to the Northeast as part of this effort. The Modi government’s commitment to this region can also be evident in the Budgetary allocation. In the Union Budget 2025-26, a provision of ₹5,915 crore was made for the Ministry of Development of the Northeastern Region (DONER), which is an increase of 47 percent compared to last year. Not only this, but all the central ministries have also been directed to spend a minimum of 10 percent of the Gross Budgetary Support (GBS) in this region. The effect of this has been that the amount of ₹1,05,833.28 crore has been allocated for the Northeast by 54 ministries in the year 2025-26. Apart from this, the “Pradhan Mantri-Divine Scheme” was started in 2022-23 for the overall development of the Northeast. Under this, the Northeast is to be strengthened at every level, from infrastructure to social welfare and economic inclusion, at a total cost of ₹6,600 crore. Prime Minister Modi’s ‘Act East Policy’ has not only included the Northeast in the mainstream, but today this region is also leading the country’s economic progress.

This progress in the Northeast is extremely important not only from an economic point of view but also from a security and strategic point of view. Northeast India shares its borders with countries like China, Myanmar, and Bangladesh, which is why this region is considered sensitive from a defense point of view. For this reason, constructing fast and strong roads, large bridges, and airstrips will play an important role in making military supplies, quick deployment, and security preparations effective in emergencies.

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ऑपरेशन सिन्दूर: बदलती सुरक्षा नीति, सैन्य ताकत और अंतरराष्ट्रीय स्थिति का अनोखा संदर्भ बिंदु https://visionviksitbharat.com/operation-sindoor-a-unique-reference-point-in-evolving-security-policy-military-strength-and-international-standing/ https://visionviksitbharat.com/operation-sindoor-a-unique-reference-point-in-evolving-security-policy-military-strength-and-international-standing/#respond Thu, 29 May 2025 21:21:24 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1754 ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि विश्व को भारत का ऐतिहासिक सन्देश है कि भारत आतंक को सहने वाला नहीं, बल्कि निर्णायक प्रतिकार करने वाला राष्ट्र है। इस…

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‘ऑपरेशन सिन्दूर’ केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि विश्व को भारत का ऐतिहासिक सन्देश है कि भारत आतंक को सहने वाला नहीं, बल्कि निर्णायक प्रतिकार करने वाला राष्ट्र है। इस ऑपरेशन के मूल में वह गहन पीड़ा थी जिसे भारत ने पिछले दो दशकों में बार-बार आतंकवादी हमलों के माध्यम से झेला है। 2001 का संसद हमला, 2008 का मुंबई ताज हमला, 2016 का उरी हमला, 2019 का पुलवामा हमला और अब हालिया पहलगाम की घटना, ये भारत की अस्मिता पर सीधे प्रहार थे। इन हमलों में निर्दोष नागरिकों की जानें गईं, अनगिनत घर उजड़ गए, माताओं की गोद सूनी हुई और सिन्दूर उजड़ गए। इसलिए एक ऐसे प्रतिकार की आवश्यकता थी, जो न केवल आतंकियों के मन में भय पैदा करे, बल्कि उन्हें पनाह देने वाले पाकिस्तान के लिए भी एक ऐसी पीड़ा बन जाए, जो उसकी स्मृति में हमेशा दर्ज रहे।

यह ऑपरेशन दुनिया के लिए एक नज़ीर बन गया है। नज़ीर इसलिए नहीं कि भारत ने सिर्फ अपने दशकों की पीड़ा का बदला लिया, बल्कि इसलिए क्योंकि भारत ने इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध लड़ने की एक प्रभावी और नैतिक रणनीति प्रस्तुत की है। यह विश्व इतिहास में पहली बार है जब किसी देश ने इतने संगठित और सटीक ढंग से आतंकी हमलों का जवाब उस राष्ट्र के भीतर जाकर दिया, जिसने आतंक को अपनी कूटनीति और अस्तित्व का आधार बना रखा है। जिस देश ने परमाणु शक्ति की आड़ लेकर वर्षों तक आतंक को शह दी, भारत ने उसी के घर में घुसकर मारा और यह स्पष्ट कर दिया कि यह ‘नया भारत’ है। अब कोई भी आतंकी हमला महज सुरक्षा का मामला नहीं रहेगा, वह भारत के लिए युद्ध की घोषणा मानी जाएगी। और भारत उसका उत्तर युद्ध स्तर पर ही देगा। इस ऐतिहासिक ऑपरेशन की सफलता के तीन स्तम्भ हैं: भारतीय सेना,  जिसने दुश्मन को असाधारण सटीकता और रणनीतिक कौशल दिखाई है। मजबूत राजनीतिक नेतृत्व,  जिसने स्पष्ट कर दिया कि भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और आत्मसम्मान पर कोई समझौता नहीं होगा। और जन चेतना, जो इस राष्ट्र की शक्ति है। कश्मीर से कन्याकुमारी और अरुणाचल से सोमनाथ तक हर भारतवासी ने एक स्वर में कहा: तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें।”

भारत ने बदल दी आतंक के विरुद्ध लड़ाई की परिभाषा 

पिछले एक दशक में भारत ने आतंकी हमलों के खिलाफ अपनी रणनीति बदल दी है. 2016 में उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए आतंकियों के ठिकानों को ध्वस्त किया और लगभग 40 आतंकवादियों को मार गिराया। इसके बाद 2019 में पुलवामा हमले के जवाब में बालाकोट एयर स्ट्राइक में भारतीय वायुसेना ने 300 से अधिक आतंकियों को खत्म किया। और अब ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ ने तो पाकिस्तान को उसकी धरती पर जाकर वह संदेश दिया है जो अब तक केवल भारत की सहनशीलता पर भरोसा करने वाले देशों के लिए कल्पना से परे था। इस बार का नुकसान इतना भयावह था कि आतंकी कमांडरों के जनाजे में पाकिस्तान के टॉप आर्मी अफसर तक शामिल होने को मजबूर हुए। ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ आने वाले समय में केवल एक सैन्य अभियान नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक केस स्टडी के रूप में जाना जाएगा। यह वह अध्ययन होगा जिसे देश-विदेश के रक्षा संस्थानों और सैन्य प्रशिक्षण केंद्रों में पढ़ाया जाएगा। एक आदर्श उदाहरण के रूप में, कि आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक और सटीक कार्यवाही कैसे की जाती है। यह ऑपरेशन दुनिया को निरंतर यह स्मरण कराता रहेगा कि भारत आतंक के खिलाफ किस हद तक जा सकता है, और किस रूप में उसे कुचल सकता है। इस ऑपरेशन का विश्लेषण बहुआयामी होगा जिसमें सैन्य रणनीति, कूटनीति, राजनीतिक नेतृत्व और जन समर्थन प्रमुख हिस्से होंगे।

ऑपरेशन सिन्दूर: भारत की सैन्य शक्ति का ठोस साक्ष्य 

भारत ने ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के अंतर्गत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) में स्थित कुल 9 हाई-वैल्यू आतंकी लॉन्चपैड्स को सफलतापूर्वक ध्वस्त कर दिया। ये ठिकाने लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों के प्रमुख प्रशिक्षण और संचालन केंद्र थे, जो भारत के विरुद्ध आतंकी साजिशों की योजना बनाते थे। यह ऑपरेशन केवल PoJK तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पाकिस्तान के भीतर सैकड़ों किलोमीटर अंदर तक भारतीय सेना की सटीक और साहसिक कार्यवाही का प्रमाण भी रहा। भारतीय वायुसेना ने पंजाब प्रांत के गहराई में स्थित आतंकवादी अड्डों को भी निशाना बनाया। जिन क्षेत्रों को लक्षित किया गया उनमें बहावलपुर जैसे अति संवेदनशील आतंकी गढ़ भी शामिल थे।

यह ऑपरेशन न केवल आतंक के विरुद्ध भारत की निर्णायक नीति का प्रमाण था, बल्कि यह विश्व को भारत की सैन्य शक्ति, रणनीतिक सूझबूझ और तकनीकी आत्मनिर्भरता का ठोस साक्ष्य भी प्रदान करता है। भारत ने मात्र 23 मिनट में इस अभूतपूर्व हमले को अंजाम दिया और पाकिस्तान की चीनी तकनीक आधारित सुरक्षा प्रणाली की वास्तविकता को उजागर कर दिया। भारतीय लड़ाकू विमानों ने अत्यधिक सटीकता के साथ बिना किसी नागरिक क्षति के मिशन को पूरा किया, जो भारत की तकनीकी प्रगति, रणनीतिक सूझबूझ, और मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाता है। विशेष उल्लेखनीय है स्वदेशी आकाशतीर’ एयर डिफेंस सिस्टम, जिसने सैकड़ों पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को हवा में ही ध्वस्त कर दिया। यह न केवल भारत की रक्षा तकनीक का उदाहरण है, बल्कि भविष्य के वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत भी है। इतना ही नहीं, 9 और 10 मई की रात भारत ने जो सैन्य कार्रवाई की, वह इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज की जाएगी। भारतीय वायुसेना ने एक परमाणु संपन्न देश की वायुशक्ति को चुनौती देते हुए उसके 11 प्रमुख एयरबेस को निशाना बनाया, जिनमें नूर खान, सरगोधा, रफीक़ी, मुरिद, सुक्कुर, सियालकोट, पस्रूर, चूनियां, स्कारू, भोला री और जैकबाबाद शामिल हैं। इनमें से कई ऐसे एयरबेस थे (जैसे नूर खान और सरगोधा)  जिन्हें पाकिस्तान अपनी सबसे सुरक्षित सैन्य परिसंपत्तियों में गिनता था। इस पूरे ऑपरेशन का सबसे बड़ा तथ्य यह है कि केवल तीन घंटे की कार्रवाई में भारत ने पाकिस्तान की वायुसेना के 20% बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दिया।

कूटनीतिक रूप से सशक्त भारत: ऑपरेशन सिन्दूर का वैश्विक संदेश

जब पहलगाम में आतंकी हमला हुआ तब दुनिया भर से इस कायराना हरकत की निंदा की गई। संयुक्त राष्ट्र सहित अनेक देशों ने भारत के साथ खड़े होने की बात कही। लेकिन जब भारत ने इसका सटीक, साहसिक और निर्णायक उत्तर ऑपरेशन सिन्दूर के माध्यम से दिया, तब एक सवाल उठ खड़ा हुआ कि दुनिया इस प्रतिकार को किस दृष्टि से देखेगी? कुछ वर्गों ने तर्क देना शुरू कर दिया कि भारत कूटनीतिक रूप से अकेला पड़ गया है। चीन और तुर्की ने खुलकर पाकिस्तान के पक्ष में बयान दिए। लेकिन सवाल है कि इसमें नया क्या है? क्या यह पहले से ज्ञात नहीं था कि चीन पाकिस्तान का रणनीतिक साझेदार है? क्या हमें यह नहीं मालूम कि धारा 370 हटाने के समय तुर्की ने भारत के खिलाफ क्या प्रतिक्रिया दी थी? फिर आज इसे लेकर आश्चर्य क्यों?

असल में, यह कहना कि भारत कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गया, एक भ्रम फैलाने वाला तर्क है। ऐसे लोगों से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या किसी प्रमुख इस्लामिक देश ने इस बार पाकिस्तान के समर्थन में भारत के खिलाफ बयान जारी किया? क्या इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) ने भारत के विरोध में कोई प्रस्ताव पारित किया? क्या सऊदी अरब ने कुछ कहा? सच्चाई यह है कि भारत आज विश्व मंच पर एक स्वतंत्र और निर्णायक राष्ट्र के रूप में खड़ा है, जो किसी के दबाव में नहीं बल्कि अपनी नीति और संप्रभुता के आधार पर निर्णय लेता है। प्रधानमंत्री ने स्वयं स्पष्ट किया कि पाकिस्तान की ओर से DGMO स्तर पर युद्धविराम का अनुरोध किया गया था, न कि किसी तीसरे देश की मध्यस्थता से। उन्होंने यह भी दो टूक कहा कि अब पाकिस्तान से कोई बातचीत होगी तो वह सिर्फ पाक अधिकृत कश्मीर पर होगी।

दरअसल, एक सीमित और पूर्वाग्रही वर्ग है, जो पहले भारत को बार-बार उकसा रहा था कि “आख़िर कब तक सहते रहेंगे?” लेकिन जब भारत ने साहसिक और निर्णायक कार्यवाही कर दी, तो वही वर्ग अब उसकी तीव्रता से असहज होकर इसे “कूटनीतिक अलगाव” का नाम देने लगा है। इनकी समस्या यह नहीं है कि भारत ने जवाब क्यों दिया, बल्कि यह है कि भारत ने इतना प्रभावी और योजनाबद्ध जवाब कैसे दे दिया। अब ये लोग कभी ट्रंप के ट्वीट्स का हवाला देते हैं, तो कभी विदेशी मीडिया की अपुष्ट और भ्रामक रिपोर्टों को पकड़कर भारत पर सवाल उठा रहे हैं। हकीकत यह है कि इस पूरे अभियान को लेकर न सेना ने, न सरकार ने और न ही जनता के स्तर पर कहीं भी ऐसा संकेत दिया कि भारत किसी कूटनीतिक दबाव में आया हो या अलग-थलग पड़ा हो। बल्कि इस बार तो हमला इतना स्पष्ट और सटीक था कि पाकिस्तान खुद ही अगले दिन से इसके प्रमाण देना शुरू कर चुका था। यही तथ्य दिखाने के लिए काफी है कि भारत ने किस स्तर और कितनी गहराई तक जाकर पाकिस्तान को चोट पहुंचाई है। जब दुश्मन खुद अपनी स्थिति स्पष्ट करने लगे, तो यह किसी भी सैन्य अभियान की सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है।

आने वाले वर्षों में इस अभियान पर शोध होंगे, पुस्तकें लिखी जाएंगी, और यह भारत की आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता नीति” (Zero Tolerance Against Terror) का जीवंत प्रतीक बन जाएगा। ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ भारतीय सेना की अभूतपूर्व रणनीतिक क्षमता का प्रमाण है और साथ ही यह नए वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की उभरती भूमिका और प्रभाव को भी दर्शाता है। यह ऑपरेशन भविष्य में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति, सैन्य तैयारी और अंतरराष्ट्रीय स्थिति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु रहेगा।

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Cruise Tourism in India: Steering Towards a Golden Horizon Under Modi’s Leadership https://visionviksitbharat.com/cruise-tourism-in-india-steering-towards-a-golden-horizon-under-modis-leadership/ https://visionviksitbharat.com/cruise-tourism-in-india-steering-towards-a-golden-horizon-under-modis-leadership/#respond Sun, 27 Apr 2025 08:29:06 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1664 Cruise tourism is about making travel inclusive, sustainable, and accessible. With 7,500 kilometers of coastline, 12 major and 200 minor ports, and a sprawling 20,000-kilometer network of navigable waterways connecting…

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Cruise tourism is about making travel inclusive, sustainable, and accessible. With 7,500 kilometers of coastline, 12 major and 200 minor ports, and a sprawling 20,000-kilometer network of navigable waterways connecting nearly 400 rivers, India holds unparalleled potential.

In the vibrant tapestry of Bharat’s growth story, cruise tourism is rapidly emerging as a powerful new chapter. Under the visionary leadership of Prime Minister Shri Narendra Modi, India’s vast coastlines, mighty rivers, and tranquil backwaters are being transformed into dynamic corridors of connectivity, commerce, and cultural exploration.

Sailing New Waters: A Vision Unfolds

Cruise tourism is not just about luxury voyages; it is about making travel inclusive, sustainable, and accessible. With 7,500 kilometers of coastline, 12 major and 200 minor ports, and a sprawling 20,000-kilometer network of navigable waterways connecting nearly 400 rivers, India holds unparalleled potential. For the first time, serious and structured steps are unlocking this treasure under the Modi government’s focused approach.

The Cruise Bharat Mission: Doubling the Dream

Launched on September 30, 2024, the Cruise Bharat Mission (CBM) symbolizes India’s renewed ambition. It aims to double cruise passenger traffic by 2029. This mission isn’t merely aspirational—it is backed by a comprehensive inter-ministerial framework that ensures seamless coordination among Customs, Immigration, CISF, State Tourism Departments, and local authorities.

By 2029, India anticipates over 1.5 million river cruise passengers across more than 5,000 kilometers of operational waterways—democratizing travel and enriching the economic tapestry of countless communities.

Maritime India Vision 2030: Setting Sail for Global Glory

Under Maritime India Vision (MIV) 2030, the Government envisions India as a leading player in global cruise tourism. With an expected 8X growth in the cruise market over the next decade, the groundwork is being meticulously laid across oceanic, coastal, and riverine sectors.

Forward-looking reforms such as priority berthing for cruise vessels, rationalized port tariffs, waiver of cabotage laws for foreign cruise ships, and the introduction of e-visas and single e-Landing Cards have dramatically reduced bureaucratic hurdles. These bold steps embody the Modi government’s commitment to “Ease of Doing Business” and “Ease of Traveling” alike.

River Cruise Renaissance: A Journey Through India’s Soul

While oceans glisten with promise, India’s rivers are crafting an equally compelling narrative. Initiatives led by the Inland Waterways Authority of India (IWAI) have rejuvenated major waterways like the Ganga, Brahmaputra, Jhelum, and Chenab.

The launch of MV Ganga Vilas—the world’s longest river cruise in 2023—was a global headline and a proud testament to India’s ingenuity. Stretching from Varanasi to Dibrugarh, this luxurious voyage captured the world’s imagination and earned its place in the Limca Book of Records.

Memoranda of Understanding signed with the Governments of Delhi, Jammu & Kashmir, Gujarat, and Madhya Pradesh further underscore a pan-India commitment to developing eco-friendly cruise tourism. Investments worth ₹45,000 crore, announced during the first Inland Waterways Development Council meet, will bolster cruise vessels and terminal infrastructure by 2047.

Infrastructure, Integration, Accessibility, and Policy: The Four Pillars of the Future

The River Cruise Tourism Roadmap 2047 outlines a powerful vision centered on infrastructure, seamless integration, enhanced accessibility, and supportive policy frameworks. More than 30 tourist circuits have already been identified—ensuring that river cruise tourism will not just be a luxury experience, but a mainstream economic driver, weaving prosperity through India’s heartlands.

Modi’s Maritime Magic

The Modi government’s relentless pursuit of unlocking India’s cruise tourism potential is a perfect blend of tradition and modernity. From the sun-dappled backwaters of Kerala to the sacred currents of the Ganga and the Brahmaputra’s mighty flow, India’s waterways are becoming vibrant highways of hope.

With transformative policies, strategic investments, and a passion for inclusive development, cruise tourism is set to become a jewel in India’s tourism crown. The journey is not just about connecting ports—it’s about connecting people, creating livelihoods, and showcasing Bharat’s timeless heritage to the world.

Under Prime Minister Narendra Modi’s leadership, India is truly sailing towards a golden horizon—Viksit Bharat beckons, and the voyage has only just begun.

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टैरिफ से अमेरिका को कितना फायदा? कौन सी गलती फिर दोहरा रहा है अमेरिका? https://visionviksitbharat.com/how-much-does-the-u-s-benefit-from-tariffs/ https://visionviksitbharat.com/how-much-does-the-u-s-benefit-from-tariffs/#respond Thu, 20 Mar 2025 18:49:59 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1454   1947 में GATT (टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौता) की स्थापना की गई, जिसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक व्यापार को अधिक उदार और सहज बनाना था. इतिहास हमें यह स्मरण…

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1947 में GATT (टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौता) की स्थापना की गई, जिसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक व्यापार को अधिक उदार और सहज बनाना था. इतिहास हमें यह स्मरण कराता है कि स्मूट-हावले टैरिफ का प्रभाव कितना विनाशकारी रहा था. इसका सबसे गंभीर परिणाम यह हुआ कि 1930 की आर्थिक मंदी लंबे समय तक बनी रही.

 

साल 1929—अमेरिका में अनिश्चितता का माहौल था. न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज धराशायी हो चुका था, फैक्ट्रियाँ बंद हो रही थीं, और बेरोजगारी चरम पर थी. यह महामंदी (Great Depression 1930) की शुरुआत थी. ऐसे कठिन समय में अमेरिकी नेता आर्थिक संकट से उबरने के उपाय खोज रहे थे. इसी क्रम में, तत्कालीन सीनेटर रीड स्मूट और प्रतिनिधि विलिस हावले ने कांग्रेस में यह प्रस्ताव रखा कि विदेशी वस्तुओं पर ऊँचे टैरिफ लगाने से अमेरिकी उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी.

1930 में, स्मूट-हावले टैरिफ कानून पारित हुआ, जिसने लगभग 20,000 से अधिक विदेशी उत्पादों पर भारी शुल्क बढ़ा दिया. लेकिन यह नीति अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी सिद्ध होने के बजाय एक बड़े व्यापार युद्ध की चिंगारी बन गई. अन्य देशों ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी सामानों पर भारी शुल्क लगा दिया. ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और अन्य देशों ने भी अपने आयात शुल्क बढ़ा दिए. परिणामस्वरूप, अमेरिका का निर्यात तेजी से घटने लगा, फैक्ट्रियाँ और अधिक संख्या में बंद होने लगीं, और वैश्विक व्यापार प्रणाली गंभीर रूप से प्रभावित हुई. इसका असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहा—यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएँ कमजोर पड़ गईं, और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क लगभग ध्वस्त हो गया.

सालों बाद, द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात, अमेरिका और अन्य देशों ने यह भली-भाँति समझ लिया कि अत्यधिक संरक्षणवाद आर्थिक प्रगति में बाधक बनता है. इसी अनुभूति के आधार पर, 1947 में GATT (टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौता) की स्थापना की गई, जिसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक व्यापार को अधिक उदार और सहज बनाना था. इस मुक्त व्यापार नीति ने अमेरिका को वैश्विक आर्थिक नेतृत्व प्रदान किया. आज भी, जब कोई देश संरक्षणवाद की राह पकड़ता है, इतिहास हमें यह स्मरण कराता है कि स्मूट-हावले टैरिफ का प्रभाव कितना विनाशकारी रहा था. इसका सबसे गंभीर परिणाम यह हुआ कि 1930 की आर्थिक मंदी लंबे समय तक बनी रही.

डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ़ नीति: क्या दुनिया व्यापार युद्ध की राह पर?

हाल ही में, डोनाल्ड ट्रंप की शुल्क नीति और उसके तहत रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने की घोषणा ने यह सवाल खड़ा कर दिया है—क्या संरक्षणवाद एक बार फिर वैश्विक व्यापार को बाधित कर रहा है? यह बहस तेज हो गई है कि टैरिफ आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हैं या यह एक आत्मघाती कदम साबित होता है?

ट्रंप ने कनाडा, मैक्सिको और चीन के खिलाफ सख्त व्यापार नीतियाँ अपनाई है. हाल ही में, उन्होंने दो महत्वपूर्ण घोषणाओं पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत स्टील और एल्युमिनियम पर मौजूदा शुल्क दर को 10% से बढ़ाकर 25% कर दिया गया. जवाब में, चीन ने लगभग 21.2 बिलियन डॉलर मूल्य के अमेरिकी निर्यात पर 10% से 15% तक प्रतिरोधात्मक शुल्क लगाने की घोषणा की. अमेरिका, जो दुनिया का सबसे बड़ा स्टील आयातक है, अपने शीर्ष तीन आपूर्तिकर्ताओं—कनाडा, ब्राजील और मैक्सिको पर अत्यधिक निर्भर है. 2024 में, कनाडा ने अमेरिका में आयातित एल्युमिनियम का 50% से अधिक हिस्सा आपूर्ति किया. ट्रंप ने इससे पहले भी 2018 में अपने पहले कार्यकाल में स्टील पर 25% और एल्युमिनियम पर 15% शुल्क लगाया था.

ट्रंप टैरिफ का उपयोग क्यों कर रहे हैं?

असल में, ‘टैरिफ’ ट्रंप की आर्थिक नीतियों का एक प्रमुख आधार हैं. अपने चुनाव प्रचार के दौरान, उन्होंने अमेरिका के प्रमुख व्यापार भागीदारों के खिलाफ आयात शुल्क लगाने का वादा किया था. ट्रंप की आर्थिक सोच यह है कि टैरिफ से अमेरिकी विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, नौकरियों की सुरक्षा होगी, कर राजस्व बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था मजबूत होगी. अब ट्रंप ने अगले महीने से सभी देशों पर ‘रेसिप्रोकल टैरिफ़’ लगाने का फैसला किया है, यानी जो देश अमेरिकी उत्पादों पर जितना टैरिफ लगाएगा, अमेरिका भी उसके उत्पादों पर उतना ही टैरिफ लगाएगा. इस नीति के कारण भारत समेत कई अन्य देश भी इसकी चपेट में आ सकते हैं.

ट्रंप की टैरिफ नीति ने 2018 में पहले ही एक व्यापक व्यापार युद्ध को जन्म दिया था, जिसका असर अमेरिका समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा था. संरक्षणवाद की यह नीति वैश्विक व्यापार संतुलन को अस्थिर कर सकती है, जिससे निवेश, उत्पादन और रोजगार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

टैरिफ से अमेरिका को कितना फ़ायदा?

ट्रंप के हालिया टैरिफ निर्णयों ने वैश्विक बाजार में चिंता और अनिश्चितता पैदा कर दी है. इसका प्रभाव न केवल अमेरिका बल्कि यूरोपीय संघ, यूके और ब्राज़ील जैसे देशों पर भी पड़ा है. स्टील और एल्युमिनियम पर 25% आयात शुल्क लगाने से अमेरिका में घरेलू महंगाई बढ़ने की आशंका है, क्योंकि अमेरिकी कंपनियां जो इन धातुओं का उपयोग उत्पाद बनाने में करती हैं, उन्हें ऊंची लागत का सामना करना पड़ेगा, जिससे उनके उत्पादों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं.

टैरिफ़ लगाने का उद्देश्य सरकारी राजस्व बढ़ाना है ताकि आयकर में छूट दी जा सके. हालांकि, आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी सरकार की कुल कमाई में टैरिफ़ का योगदान मात्र 1.2% है. जानकारों को संदेह है कि टैरिफ बढ़ाने से इतनी आमदनी नहीं होगी कि आयकर में कटौती की जा सके. हालांकि अब ऐसे निर्णयों के प्रभाव अमेरिकी शेयर बाज़ार पर साफ दिखाई पड़ रहे हैं. इधर बीच S&P 500 में 4% की गिरावट और NASDAQ में 8% की गिरावट हुई है. इससे निवेशकों में असमंजस की स्थिति है और अब तमाम वित्तीय संस्थाओं ने अमेरिका में संभावित मंदी की चेतावनी दी है.

इसके अलावा टैरिफ के प्रति अमेरिका में पीपल सेंटीमेंट भी कमजोर दिखाई पड़ता है. हाल में हुए मारक्वेट लॉ स्कूल पोल के अनुसार, केवल 24% अमेरिकी नागरिकों को लगता है कि टैरिफ उनकी अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक होंगे. अधिकतर लोगों को चिंता है कि टैरिफ महंगाई बढ़ा सकते हैं और वस्तुओं की कीमतें ऊंची कर सकते हैं. पिछले 100 वर्षों के आर्थिक अध्ययन भी यही दर्शाता है कि मुक्त व्यापार से आर्थिक उत्पादन और आय स्तर में वृद्धि होती है, जबकि व्यापार प्रतिबंधों से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. संरक्षणवादी नीतियां रोज़गार में कमी और आर्थिक उत्पादन में गिरावट का कारण बन सकती हैं.

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आर्थिक विकास में महिलाओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण? https://visionviksitbharat.com/how-important-is-the-role-of-women-in-economic-development/ https://visionviksitbharat.com/how-important-is-the-role-of-women-in-economic-development/#respond Sat, 08 Mar 2025 10:33:48 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1337   भारत में महिलाएं कुल जनसंख्या का 48% हैं, लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, वे देश की जीडीपी में केवल 18% का योगदान देती हैं.   अर्थव्यवस्था का…

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भारत में महिलाएं कुल जनसंख्या का 48% हैं, लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, वे देश की जीडीपी में केवल 18% का योगदान देती हैं.

 

अर्थव्यवस्था का एक मूल सिद्धांत है कि इसकी प्रगति में सभी की समान भागीदारी हो. यदि ऐसा नहीं होता है, तो आर्थिक असमानता उत्पन्न होती है और अमीर-गरीब के बीच बहस खड़ी होती है. इसी असमानता के बीच एक और महत्वपूर्ण चर्चा महिलाओं की अर्थव्यवस्था में भागीदारी को लेकर है. दुनिया भर में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी का प्रश्न एक ज्वलंत विषय बना हुआ है. उदाहरण के लिए, भारत में महिलाएं कुल जनसंख्या का 48% हैं, लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, वे देश की जीडीपी में केवल 18% का योगदान देती हैं. यही कारण है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में असमानता की बहस केवल अमीर-गरीब तक सीमित नहीं, बल्कि पुरुष और महिला की आर्थिक शक्ति के अंतर पर भी केंद्रित हो गई है. आज यदि किसी भी देश को प्रगति करनी है, तो उसे अपनी अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी ही होगी. विश्व की सभी विकसित अर्थव्यवस्थाओं का यदि विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वहां पुरुषों की तुलना में महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी लगभग समान या अत्यधिक निकट है. इसके विपरीत, भारत में यह स्थिति अलग है. भारत में महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर 37% है. यह पिछली दशक की तुलना में वृद्धि तो दर्शाता है, लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता.

हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है, जो महिलाओं के अधिकार, समानता और सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करने का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है. इसी क्रम में, वर्ष 2025 की थीम है – “सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए: अधिकार, समानता और सशक्तिकरण.” यदि इस विषय पर विचार करें, तो इन तीनों पहलुओं को सशक्त बनाने में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी एक प्रभावी और आवश्यक साधन साबित हो सकती है. आर्थिक भागीदारी का अर्थ है – देश की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी. जब महिलाओं के हाथ में आमदनी होगी, तो वे स्वतंत्र निर्णय ले सकेंगी. स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता उन्हें बराबरी का अधिकार दिलाएगी. जब महिलाएं काम करेंगी, उत्पादन और सेवाओं में योगदान देंगी, निर्णय लेंगी, तो यह न केवल उनके सशक्तिकरण का माध्यम बनेगा, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति को भी गति देगा.

महिलाओं की अर्थव्यवस्था में भागीदारी सतत आर्थिक विकास, लैंगिक समानता और गरीबी उन्मूलन के लिए न केवल आवश्यक बल्कि अनिवार्य है. मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) की रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत अपने कार्यबल में 6.8 करोड़ और महिलाओं को शामिल करे, तो 2025 तक देश की जीडीपी में 0.7 ट्रिलियन डॉलर की वृद्धि संभव है. वहीं, विश्व बैंक की रिपोर्ट दर्शाती है कि यदि भारत अपने श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी को 50% तक बढ़ा सके, तो देश की जीडीपी वृद्धि दर 1.5 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है.

महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने के लिए आवश्यक उपाय

भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और वित्तीय समावेशन पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ उद्यमिता को भी प्रोत्साहित करना होगा. इसके अलावा, उन सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाओं को दूर करना आवश्यक है जो महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी को सीमित करती हैं. हालांकि इस दिशा में भारत ने काफी प्रगति की है, लेकिन अब भी इस धारणा के खिलाफ कार्य करने की जरूरत है कि महिलाएं कुछ विशेष कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं हैं. उदाहरण के लिए, आतिथ्य और पर्यटन (हॉस्पिटैलिटी एंड टूरिज्म) क्षेत्र में सॉफ्ट स्किल्स से जुड़े कार्य, जैसे रिसेप्शन और गेस्ट वेलकम, महिलाओं के लिए स्वाभाविक रूप से उपयुक्त माने जाते हैं, जबकि निर्णय लेने और नेतृत्वकारी भूमिकाओं में पुरुषों की प्रधानता बनी हुई है. ऐसे तमाम पूर्वाग्रह और रूढ़िवादी धारणाएं हैं जिन्हें तोड़ना आवश्यक है. इस दिशा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:

1. शिक्षा और कौशल विकास: महिलाओं की आर्थिक सशक्तिकरण की आधारशिला शिक्षा और कौशल विकास है. इसके लिए यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि सभी स्तरों—प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक—लड़कियों और महिलाओं को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले. इसके अलावा, शिक्षा को उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप बनाया जाए, ताकि महिलाओं को नई नौकरियों और आधुनिक तकनीकों में प्रशिक्षित किया जा सके. सिलाई मशीन और घरेलू कार्यों तक सीमित कौशल प्रशिक्षण के बजाय, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स, क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों में महिलाओं को दक्ष बनाया जाए, जिससे वे भविष्य की नौकरियों के लिए तैयार हो सकें.

2. आर्थिक सशक्तिकरण और वित्तीय समावेशन: महिलाओं की वित्तीय स्वतंत्रता उनके जीवन में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है. भारत के पास आज दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल भुगतान नेटवर्क है, जिसका उपयोग महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में किया जा सकता है. महिलाओं के लिए माइक्रोफाइनेंस, ऋण और अन्य वित्तीय सेवाओं की पहुंच बढ़ाई जाए, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें. स्वयं सहायता समूहों (SHG) के माध्यम से उन्हें उत्पादक गतिविधियों से जोड़ा जाए और उनमें उद्यमिता को विकसित किया जाए. इसके लिए एक व्यापक योजना बनाई जा सकती है, जिसमें देश के प्रत्येक गांवों को 5 से 10 गांवों के समूहों में संगठित कर एक मजबूत SHG तंत्र विकसित किया जाए. इस मॉडल के तहत घरेलू जरूरतों के हिसाब से उत्पादन और सेवाओं का वितरण SHG के माध्यम से सुनिश्चित किया जाए, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया स्वरूप मिल सके. इसके अलावा, समान कार्य के लिए समान वेतन की नीति को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि महिलाओं को उनके श्रम का उचित पारिश्रमिक मिल सके.

3. महिला रोजगार बढ़ाने पर प्रोत्साहन: यह तर्क दिया जा सकता है कि महिलाओं को नौकरी देने पर प्रोत्साहन देना पक्षपातपूर्ण हो सकता है, लेकिन यह एक आवश्यक कदम है. सरकार एक न्यूनतम कटऑफ तय कर सकती है, जिसके तहत कंपनियों को अपने कुल रोजगार का एक निश्चित प्रतिशत महिलाओं को देना अनिवार्य बनाया जाए. इसके अतिरिक्त, यदि कोई संगठन इस न्यूनतम सीमा से अधिक महिलाओं को रोजगार देता है, तो उसे सरकारी प्रोत्साहन दिए जाएं, जैसे—सस्ती बिजली, उत्पादन सहायता, कर में छूट आदि. इससे दो प्रमुख लाभ होंगे—पहला, भारत में एक कुशल महिला कार्यबल तैयार होगा, जो भविष्य के लिए देश की आर्थिक वृद्धि को गति देगा; और दूसरा, महिला श्रम बल की भागीदारी बढ़ेगी, जिससे समाज में लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा.

महिलाओं की उच्च पदों पर भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता

महिलाओं की उच्च पदों पर भागीदारी बढ़ाना आवश्यक है, क्योंकि विश्व आर्थिक मंच की नवीनतम ‘ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट’ दर्शाती है कि जिन समाजों में राजनीतिक नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है, वे अधिक समृद्ध और समानतापूर्ण होते हैं. जिन देशों में महिलाओं का उच्च पदों पर अधिक प्रतिनिधित्व होता है, वे पुरुषों और महिलाओं के बीच कानूनी असमानता को समाप्त करने में सफल रहते हैं. कानूनी भेदभाव को खत्म करने से महिलाओं के लिए नए रोजगार और आर्थिक अवसर खुलते हैं, जिससे उनकी कार्यबल में भागीदारी बढ़ती है. जब महिलाओं को समान अवसर मिलते हैं, तो इसका सकारात्मक प्रभाव न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन पर पड़ता है, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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अन्य राज्य सरकारों को नसीहत है यूपी बजट 2025-26 https://visionviksitbharat.com/up-budget-2025-26-is-a-lesson-for-other-state-governments/ https://visionviksitbharat.com/up-budget-2025-26-is-a-lesson-for-other-state-governments/#respond Mon, 24 Feb 2025 10:58:04 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1255   यूपी सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के बजट में ‘जीरो पॉवर्टी-उत्तर प्रदेश अभियान’ के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ₹250 करोड़ की व्यवस्था प्रस्तावित की है. इस अभियान का उद्देश्य…

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यूपी सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के बजट में ‘जीरो पॉवर्टी-उत्तर प्रदेश अभियान’ के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ₹250 करोड़ की व्यवस्था प्रस्तावित की है. इस अभियान का उद्देश्य प्रदेश के निर्धनतम परिवारों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालकर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है.

 

उत्तर प्रदेश सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपना बजट प्रस्तुत किया है. सामान्यतः राज्यों के बजट राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा का विषय नहीं बनते, लेकिन हाल के वर्षों में राज्यों के वित्त को लेकर दो मुख्य कारणों से चर्चाएं बढ़ी हैं—पहला, उनका बढ़ता हुआ कर्ज और दूसरा, मुफ्त सुविधाओं (फ्रीबीज़) का बढ़ता प्रचलन. उत्तर प्रदेश का बजट अपने आकार में इतना विशाल है कि इस पर चर्चा आवश्यक हो जाती है. इस बार इसका आकार 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, जो पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत अधिक है. यदि राज्य की जीडीपी के आधार पर राजकोषीय घाटे की बात करें तो वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए यह ₹91,399.80 करोड़ है, जो लगभग 3.5% के स्तर पर है.

उत्तर प्रदेश के बजट का विश्लेषण इस कारण से भी महत्वपूर्ण है कि जहां अधिकांश राज्य सरकारें वित्तीय संतुलन की अनदेखी करते हुए घाटे के बजट और मुफ्त सुविधाओं की ओर बढ़ रही हैं, वहीं उत्तर प्रदेश सरकार इस प्रवृत्ति से सतर्कतापूर्वक दूरी बनाए हुए है. उदाहरणस्वरूप, हाल ही में प्रस्तुत राजस्थान सरकार के बजट में बिजली उपभोक्ताओं को 100 के बजाय 150 यूनिट मुफ्त बिजली देने की घोषणा की गई है. हालांकि, सरकार ने इसमें एक शर्त जोड़ी है कि यह सुविधा केवल उन्हीं उपभोक्ताओं को मिलेगी, जिन्होंने अपने घरों में सोलर पैनल स्थापित किए हैं. इसके विपरीत, यदि उत्तर प्रदेश के बजट पर ध्यान दें, तो इसकी चर्चा चार नए एक्सप्रेसवे, एआई सिटी, ‘जीरो पॉवर्टी-उत्तर प्रदेश अभियान’ और मॉडल सोलर सिटी जैसी घोषणाओं की वजह से अधिक है. वर्तमान समय में बजट की समीक्षा अक्सर इस आधार पर की जाती है कि जनता को क्या मुफ्त में मिला और किसको सरकार नकदी देगी. जबकि, आदर्श रूप में बजट का मूल्यांकन निवेश, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य के विकास के रोडमैप आदि को केंद्र में रखकर किया जाना चाहिए. यदि उत्तर प्रदेश के बजट में सेक्टोरल आवंटन की बात करें तो पूंजीगत व्यय के लिए 20.5%, शिक्षा के लिए 13%, कृषि के लिए 11% और स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 6% का प्रावधान किया गया है.

एक्सप्रेसवे से औद्योगिक विकास का मॉडल

उत्तर प्रदेश देश का एक लैंडलॉक राज्य है. इसके पास गुजरात, महाराष्ट्र जैसे समुद्री तट वाले राज्यों की भांति निर्यात आधारित आर्थिक प्रगति का साधन नहीं है. ऐसी परिस्थिति में, प्रदेश की आर्थिक वृद्धि के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक है—सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स की मजबूती. उत्तर प्रदेश ने पिछले 25 वर्षों में इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है. यमुना एक्सप्रेसवे, लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे और गंगा एक्सप्रेसवे इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं. प्रदेश की अर्थव्यवस्था को वन ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि इस लैंडलॉक स्टेट की कनेक्टिविटी को और सशक्त बनाया जाए, जिससे माल ढुलाई का समय घटे और आर्थिक गतिविधियों में तेज़ी आए. 2025-26 के बजट में भी चार नए एक्सप्रेसवे के निर्माण का निर्णय लिया गया है. ये एक्सप्रेसवे प्रदेश के विभिन्न हिस्सों को आपस में जोड़ते हुए आर्थिक विकास को नया आयाम देंगे.

इसके अतिरिक्त, उत्तर प्रदेश में औद्योगिक विकास को गति प्रदान करने और रोजगार के नए अवसर सृजित करने की दिशा में भी ठोस प्रयास बजट में दिखाई पड़ते हैं. बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के साथ डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर परियोजना के लिए लगभग ₹461 करोड़ की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है, जिसमें ₹9,500 करोड़ के निवेश का अनुमान है.

नवाचार और पारंपरिक उद्योग—दोनों का समग्र विकास

आधुनिक औद्योगिक क्रांति के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब एक अनिवार्य आवश्यकता बन गई है. ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है, जहां इसकी उपयोगिता निरंतर न बढ़ रही हो. इस परिप्रेक्ष्य में, प्रत्येक राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके यहां एआई आधारित नवाचार और विकास की दिशा में ठोस प्रयास हो रहे हैं. विशेष रूप से उन राज्यों के लिए यह और भी महत्वपूर्ण है, जहां हैदराबाद, गुरुग्राम, बेंगलुरु और पुणे जैसी स्थापित आईटी शहर नहीं हैं.

यदि किसी राज्य को अब अपनी नई आईटी सिटी विकसित करनी है, तो उसके इकोसिस्टम को सशक्त बनाने के लिए एआई एक महत्वपूर्ण घटक होगा. इसी को ध्यान में रखते हुए, 2025-26 के बजट में एआई सिटी के विकास हेतु ₹5 करोड़ की व्यवस्था की गई है. हालांकि, इस परियोजना के क्रियान्वयन की विस्तृत रूपरेखा अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह पहल उत्तर प्रदेश को तकनीकी नवाचार के केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. यह एआई सिटी न केवल स्टार्टअप्स, इनक्यूबेशन सेंटर और रिसर्च हब के रूप में कार्य करेगी, बल्कि प्रदेश में कौशल विकास, रोजगार सृजन और डिजिटल अर्थव्यवस्था को भी सशक्त बनाएगी. हालांकि, इसके लिए यह राशि बहुत छोटी है और आगे और प्रयास होने चाहिए.

पारंपरिक उद्योगों के सशक्तिकरण की पहल

नवाचार के साथ-साथ, उत्तर प्रदेश को पारंपरिक उद्योगों के संरक्षण और संवर्धन पर भी विशेष ध्यान देना होगा. इस बार हथकरघा और वस्त्रोद्योग के क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण घोषणाएँ उल्लेखनीय हैं: पीएम मित्र योजना के अंतर्गत टेक्सटाइल पार्क की स्थापना हेतु ₹300 करोड़ की व्यवस्था की गई है. यह पार्क प्रदेश के वस्त्र उद्योग को नई ऊर्जा प्रदान करेगा, जहाँ डिजाइनिंग, उत्पादन, और निर्यात जैसी गतिविधियाँ एक ही छत के नीचे संचालित होंगी. इससे प्रदेश के बुनकरों और हस्तशिल्पियों को अत्याधुनिक सुविधाएँ मिलेंगी, जिससे उनकी उत्पादकता और आय में वृद्धि होगी. इसके अलावा, अटल बिहारी वाजपेयी पॉवरलूम विद्युत फ्लैट रेट योजना के अंतर्गत पारंपरिक बुनकरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए ₹400 करोड़ की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है. इस योजना के तहत, पांच किलोवाट तक के बिजली कनेक्शन वाले पावरलूम बुनकरों को फ्लैट रेट पर बिजली उपलब्ध कराई जाएगी. इससे बुनकरों की उत्पादन लागत में कमी आएगी और वे अपने व्यवसाय को अधिक प्रतिस्पर्धी रूप में आगे बढ़ा सकेंगे.

‘जीरो पॉवर्टी अभियान’—गरीबी के खिलाफ एक प्रयास

यूपी सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के बजट में ‘जीरो पॉवर्टी-उत्तर प्रदेश अभियान’ के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ₹250 करोड़ की व्यवस्था प्रस्तावित की है. इस अभियान का उद्देश्य प्रदेश के निर्धनतम परिवारों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालकर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है. प्रदेश में उन गरीब परिवारों की पहचान की जा रही है, जो दैनिक मजदूरी पर निर्भर हैं और जिनके पास पक्के मकान, निश्चित आय स्रोत और आवश्यक सुविधाओं का अभाव है. इनके लिए मास्टर प्लान तैयार किया गया है, जिसका लक्ष्य 2025 के अंत तक इन परिवारों को गरीबी से उबारना है. इस अभियान के तहत मुख्य विकास अधिकारी को नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाएगा, जो प्रत्येक गांव में 20 से 25 निर्धनतम परिवारों का चयन करेंगे और उन्हें आवास, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के लिए सभी आवश्यक प्रयास किए जाएंगे. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आवास योजना के अंतर्गत पक्के मकान, राज्य आजीविका मिशन के तहत स्वरोजगार, ग्रामीण मनरेगा के अंतर्गत काम के अवसर और कौशल विकास मंत्रालय के माध्यम से प्रशिक्षण की सुविधा दी जाएगी.

अगर राज्य का बजट देखें तो एक बात स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश अभी फ्रीबीज़ से बचा हुआ है. उसका ध्यान पूंजीगत खर्च के माध्यम से आर्थिक वृद्धि पर केंद्रित है. बजट भले ही किसी लोकलुभावन घोषणा से दूर रहा हो, लेकिन वित्तीय अनुपालन के जरिए राज्य के लिए कुछ आवश्यक रोडमैप प्रदान करने में सफल रहा है.

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Income Tax Bill 2025: A Major Step Toward New Economic Reform https://visionviksitbharat.com/income-tax-bill-2025-a-major-step-toward-new-economic-reform/ https://visionviksitbharat.com/income-tax-bill-2025-a-major-step-toward-new-economic-reform/#respond Sun, 16 Feb 2025 19:49:14 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=1203   Only 2.24 crore people paid income tax, just 1.6% of the total population. In comparison, about 10% of people in China and 43% in the US pay income tax,…

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Only 2.24 crore people paid income tax, just 1.6% of the total population. In comparison, about 10% of people in China and 43% in the US pay income tax, making it clear that India’s taxpayer base is still very narrow.

 

The Indian economy stands at a critical juncture, requiring extensive structural reforms to inject fresh momentum into its growth trajectory. Upon examining the economic policies over the past quarter-century, it becomes evident that following the Economic Reforms of 1991, pivotal measures such as the FRBM Act, GST, and the Insolvency and Bankruptcy Code have surfaced as key developments. Nonetheless, over time, the nature of reforms has evolved as well. Similarly, the current landscape of the Indian economy now calls for deregulation as a vital reform measure. Today, every economic stakeholder wants to be liberated from excessive complexities and stringent regulations. This is why advocacy for deregulation is constantly on the rise in India. This year’s Economic Survey also clearly mentions that the pace of the Indian economy will now pass through the path of deregulation.

While analysing this year’s budget, it is evident that the Modi government is also committed to deregulation. The decision to alleviate the tax burden on citizens by exempting income up to Rs 12.75 lakh is a significant step. Additionally, a new committee has been announced to enhance the effectiveness of regulatory reforms, thereby creating a more favourable investment environment at the state level. Moving ahead, the finance minister announced the Jan Vishwas Bill 2.0, which aims to eliminate criminal penalties from 100 laws, thereby streamlining business operations. Furthermore, the budget has also introduced eight tariff rates, streamlining the customs duty framework to enhance business operations. In addition, the cap on foreign investment in the insurance sector has been raised from 74% to 100%, which is expected to enhance the influx of foreign capital and bolster this sector. All these steps tell one story: the government also believes that giving maximum freedom to the economy is essential, and that’s why PM Modi always stresses ‘Minimum Government and Maximum Governance.’

In the wake of the budget announcement, the Modi government has now introduced the new ‘Income Tax Bill, 2025’, sent to the Standing Committee for review. Before it becomes law, a preliminary examination of the bill’s draft reveals that its primary aim is to streamline income tax regulations, ensuring they are simple and easily understood. The necessity for a new income tax law has been recognised in the country for an extended period, as the Income Tax Act of 1961 has not only become outdated but has also undergone numerous amendments, resulting in a complex framework. More than 4,000 amendments over the years have infused it with complex legal terminology, complicating comprehension and adherence for the ordinary taxpayer. The new bill has been drafted on three fundamental pillars: Eliminating intricate language to enhance readability, removing redundant and repetitive provisions for better navigation, and Reorganizing sections logically to facilitate ease of reference.

How is the new Income Tax Bill 2025 different?

If we compare the new Income Tax Bill with the old Income Tax Act of 1961, the first noticeable thing is that the new bill has successfully simplified the taxation process. While the old Act comprised 1,647 pages, 298 sections and 52 chapters, the latest Income Tax Bill 2025 has only 622 pages, 536 sections and 23 chapters. Thus, the law has been made more transparent and more understandable, with a reduction of about 25-30% in the number of sections. Apart from this, the time limit for filing updated returns has also been revised. In the previous law, this was 2 years, which has now been increased to 4 years. This will give taxpayers more time to rectify their errors and file updated returns correctly.

In the new bill, special care has also been given to the selection of terminology so that the taxation system can be made more transparent, straightforward, and logical. For example, the concept of “tax year” has been introduced, which will replace the confusing terms “financial year” and “assessment year” used in the previous law. Till now, it has been difficult for a taxpayer to understand the difference between ‘financial year’, which refers to the period in which income is earned, and ‘assessment year’, the period in which that income is assessed and taxed. This often leads to confusion. The adoption of the term “tax year” will bring clarity to the tax that will be applicable in the year in which the income is earned. This will make the process seamless for taxpayers and make compliance more accessible and transparent.

Further, an essential and timely reform has been inculcated in the bill related to tax provisions on digital assets. The new Bill defines “virtual digital assets” (such as cryptocurrencies) in Clauses 67 to 91. In the current economic scenario, digital currencies have expanded rapidly in different forms. Investors are now investing large amounts of capital in digital currencies like Bitcoin and earning profits on price rises. It was necessary to bring it duly under the tax law to ensure transparency in such a situation.

Will the new bill be able to strengthen the economy?

This is an important question because even though the Indian economy has become the fifth largest economy in the world today, its tax-to-GDP ratio and the number of taxpayers have still not reached the level of developed economies. India has a total population of about 142 crores, but only 7.4 crore people filed income tax returns in 2022-23, of which 5.16 crore had zero tax liability. This means that only 2.24 crore people paid income tax, just 1.6% of the total population. In comparison, about 10% of people in China and 43% in the US pay income tax, making it clear that India’s taxpayer base is still very narrow.

Moreover, even though India’s direct tax-to-GDP ratio has reached a historic high of 6.64% in the financial year 2023-24, it is still relatively low in proportion to the size of the economy. If India aims to become a prosperous nation, the number of taxpayers must be increased. Today, the direct taxation system solely relies on the salaried class. Therefore, the biggest challenge before the new bill will be whether it can encourage taxpayers to come forward. Even today, many taxpayers consider income tax rules complex and cumbersome. Apart from this, another critical aspect of the success of this bill will be whether it will be able to increase tax collection. As the central government decided to give up approx. Rs. 1 lakh crore tax revenue by exempting income up to 12.75 lakh from tax, it is the real taste of this bill that how simplification, minimum provision and less regulation can encourage more people to come forward to pay taxes or file returns without any insecurities. But yes, it can be synthesised that once the citizens find out that the taxation system no longer looks like policing; eventually, their faith and trust will rise, and it results positively. If this bill proves successful on both parameters—increasing the number of taxpayers and increasing tax collection—then it will significantly improve the Indian economy.

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Budget 2025 should focus on Economic Stability, Social Inclusion and Capex https://visionviksitbharat.com/budget-2025-should-focus-on-economic-stability-social-inclusion-and-capex/ https://visionviksitbharat.com/budget-2025-should-focus-on-economic-stability-social-inclusion-and-capex/#respond Mon, 27 Jan 2025 20:31:07 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=973   This budget should focus on four major pillars: Economic Stability, Social Inclusion, Employment Generation and Investment-Based Development.   The union budget is an economic document that contains something or…

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This budget should focus on four major pillars: Economic Stability, Social Inclusion, Employment Generation and Investment-Based Development.

 

The union budget is an economic document that contains something or little for every section of society. For some, it answers tax-related issues, while for others, it addresses the requirements for medical and hospital services. For farmers, it talks about increasing their income; on the other hand, it lays down a plan to control the kitchen expenses of a homemaker. This is why the union budget became the most discussed topic in India after cricket and elections. This year, the discussions about Budget 2025 are also rampant. Reforms in the old tax system and the possibilities of heavy investment in various sectors are under discussion. But these discussions are short-lived. Today, India stands at a juncture where it is near to becoming the third-largest economy in the world. In such a situation, this budget should not only present a blueprint for one year but also an economic roadmap for the coming decade. This budget should focus on four major pillars: Economic Stability, Social Inclusion, Employment Generation and Investment-Based Development.

A balance between economic growth and inflation

The primary objective of Budget 2025 should focus on ensuring economic stability, striking a balance between economic growth and inflation and prioritising employment. According to the World Bank’s Global Economic Prospects 2025 report, India’s economy is expected to grow at a stable rate of 6.7% in the next two financial years, much higher than the global average of 2.7%. This underlines India’s economic strength and global rise. However, the slow growth rate of 5.4% in the second quarter has raised concerns. To deal with this, it is necessary to concentrate on infrastructure building by increasing capital expenditure. Also, there is a need to continue the Production-Linked Incentives (PLI) scheme to encourage private investment. Additionally, to accelerate economic growth, it is important to focus on increasing consumption levels through tax reforms. Because consumption in India accounts for approximately 60% of its GDP, making it the primary driver of the Indian economy. However, control over inflation should be a necessary element. Such measures can only ensure the benefits of economic reforms and growth for all sections of society. Inflation is a hidden tax applied to all, which can trade off all the progress. Apart from this, a clear roadmap for employment should be presented in the budget. In the last budget, the government announced internship schemes and several incentives for the manufacturing sector to create new jobs. However, there is still a lack of comprehensive and effective employment schemes. The country expects that in the upcoming budget, measures for employment generation and a vision document for this will be given priority.

Bringing the deprived sections into the mainstream

Now, the success of any budget depends on the kind of social inclusion schemes and plans the government has announced. Social schemes are the means for bringing the deprived sections into the mainstream, ensuring inclusive economic development. In the last ten years of the Modi government, efforts like Swachh Bharat Abhiyan, Jan Dhan Yojana, Ujjwala Yojana, etc., have drastically improved the standard of living of the weaker sections of society. Now, there is a need to expand these efforts and connect with other economically weak sections of society. Today, it is necessary to focus on the ‘Bottom of the Pyramid’. For this, employment and income generation will have to be given priority by going beyond basic needs (Roti, Kapda and Makan). Additionally, three steps can be taken to address rural distress by restructuring schemes like MNREGA.

  1. Increasing the number of working days,
  2. Increasing the minimum wage, and
  3. Adding new work areas.

This will increase liquidity in the rural economy, provide stability and increase employment opportunities. Along with this, emphasis must be laid on making women self-reliant. Beyond free facilities, such schemes must be announced to empower them economically. For instance, Women-led self-help groups can be encouraged by linking them with local manufacturing and entrepreneurship. This will not only increase women’s income, but they will also become active participants/contributors to the country’s economic progress.

A strong and well-thought-out policy for startups

Another important task in this budget should be announcing a new startup policy. This fact must be accepted that through the ‘Startup India’ initiative in 2016, India presented a new economic model, which has played an important role in economic development and employment generation in the last decade. With 118 unicorn startups as of December 2024, India ranks third after the US and China. However, given the changing economic conditions, a strong and well-thought-out policy is needed to encourage startups. Budget 2025 should take three major steps in this direction.

First, tax concessions and simplification of procedures will reduce the financial burden on startups and create a favourable environment for their development. Second, early financial support for innovation ensures easy access to credit and capital. Third, regulatory reforms make the operation of startups simple and transparent. A dedicated policy should be formulated for these reforms and announced in the upcoming budget. This policy will not only take India’s startup economy to new heights but will also contribute to economic growth and employment generation. Apart from this, it is important to pay special attention to startups that use AI, machine learning, space tech, gaming, and other advanced technologies. Budget 2025 is an opportunity to make India a global startup hub, which will establish India globally.

Focus on technological innovation and energy self-sufficiency

Finally, this budget should focus on investment-led growth. In the past years, the Modi government has made an unprecedented increase in capital expenditure, resulting in major improvements in railways and highways. Now, considering the future scenario, it is necessary to prioritise investment in other strategic sectors. For example, increasing the number of EV charging stations is important, given the growing demand for electric vehicles. A plan to set up charging stations every 5-10 kilometres should be announced in this budget. Additionally, investments in sectors such as Artificial Intelligence, Data Centers and Green Hydrogen will promote technological innovation and energy self-sufficiency. Although fiscal deficit can be a major constraint, the numbers tell that efficient financial management has controlled it. The fiscal deficit in 2021 was 9.2% of GDP, which has now come down to 4.9%. In such a situation, there is a significant scope for increasing Capex. Always remember, a budget is not just a one-day event or some announcement; it is a document that shapes the country’s fortune, and it should be inclusive, focusing on growth by adding employment.

(Disclaimer: The views and opinions expressed in this article are solely those of the author and do not necessarily reflect the official policy or position of organization. The content is intended for informational purposes only and is based on Author’s personal analysis and perspective.)

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महाकुंभ 2025: आध्यात्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक समृद्धि की त्रिवेणी https://visionviksitbharat.com/mahakumbh-2025-the-confluence-of-spiritual-social-and-economic-prosperity/ https://visionviksitbharat.com/mahakumbh-2025-the-confluence-of-spiritual-social-and-economic-prosperity/#respond Wed, 22 Jan 2025 18:05:37 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=899   भारत के पास आर्थिक विकास को गति देने का एक नवोन्मेषी मॉडल उपलब्ध है—धर्म आधारित अर्थव्यवस्था। इसका आशय यह नहीं है कि संपूर्ण आर्थिक गतिविधियाँ केवल धार्मिक पर्यटन पर…

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भारत के पास आर्थिक विकास को गति देने का एक नवोन्मेषी मॉडल उपलब्ध है—धर्म आधारित अर्थव्यवस्था। इसका आशय यह नहीं है कि संपूर्ण आर्थिक गतिविधियाँ केवल धार्मिक पर्यटन पर केंद्रित कर दी जाएं, बल्कि यह एक ऐसा क्षेत्र है, जो देश की जीडीपी वृद्धि दर को 1 से 2 प्रतिशत तक बढ़ाने की अपार क्षमता रखता है।

 

मुख्य बिंदु:

  • महाकुंभ 2025 के लिए अब तक ₹6,500 करोड़ आवंटित किए गए हैं, और आयोजन के अंत तक यह राशि ₹7,500 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है।
  • 1882 के कुम्भ मेले की लागत ₹20,228 थी, जबकि इस बार आयोजन से लगभग ₹25,000 करोड़ का प्रत्यक्ष राजस्व उत्पन्न होने का अनुमान है।
  • 45 करोड़ श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है, जिनके औसतन ₹2000 खर्च करने से कुल व्यय लगभग ₹90,000 करोड़ तक पहुंच सकता है।
  • अब तक 45,000 परिवारों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर प्राप्त हुए हैं, जिससे आर्थिक विकास को बल मिलेगा।
  • आयोजन से प्रत्यक्ष लाभ ₹1.25 लाख करोड़ आंका गया है, जो ₹2 लाख करोड़ को पार कर सकता है और राज्य की समग्र आर्थिक वृद्धि को तीव्र करेगा।

विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम ‘महाकुंभ’ 13 जनवरी से प्रयागराज में आरंभ हो रहा है। यह एक ऐसा आयोजन है जहां करोड़ों लोगों की आस्था, विविध संस्कृतियों की झलक और ‘लघु भारत’ का दर्शन होता है। महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है; यह आध्यात्म, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का अनूठा संगम है, जो बहुआयामी विश्लेषण और गहन चर्चा का विषय बनता है। इसे धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह पूजा-पद्धतियों, अखाड़ों, नागा साधुओं और विभिन्न पंथों का एक अनोखा केंद्र बिंदु है। हालांकि, महाकुंभ का महत्व केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दायरे तक सीमित नहीं है। यह आयोजन भारत के प्राचीन धार्मिक अर्थशास्त्र, ‘टेम्पल इकोनॉमी’ का सशक्त उदाहरण है। यह आयोजन समझने का अवसर देता है कि किस प्रकार धर्म और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे के पूरक रहे हैं और कैसे धार्मिक आयोजन आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करते हैं।

महाकुंभ 2025 देश के इतिहास में अब तक का सबसे महंगा आयोजन

इस बार का महाकुंभ आर्थिक परिप्रेक्ष्य से भी विशेष महत्व रखता है। चाहे इसके बजट की बात हो, आयोजन की भव्यता का स्तर हो या अनुमानित आगंतुकों की संख्या—हर पहलू इसे एक बड़े पैमाने का आयोजन साबित कर रहे हैं। वास्तव में, यह आयोजन भारत के लिए एक नए आर्थिक मॉडल के पुनर्जागरण का द्वार खोल सकता है। दुर्भाग्यवश, समय के साथ हमने इस आर्थिक मॉडल को नजरअंदाज कर दिया। आजादी के शुरुआती दशकों में इसे विकसित करने की आवश्यकता थी, लेकिन हम इस तथ्य को देर से समझ पाए कि भारत में धर्म एक प्रमुख आर्थिक व्यवस्था का आधार रहा है। हालांकि, अब लंबे अंतराल के बाद इस दिशा में गंभीर प्रयास होते दिखाई दे रहे हैं। महाकुंभ की तैयारियां यह संकेत देती हैं कि यह आयोजन स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा प्रदान करेगा। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, जिसने एक 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसलिए, महाकुंभ को आर्थिक विकास के दृष्टिकोण से भी विश्लेषित करना आवश्यक है।

अगर बजट के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो महाकुंभ 2025 देश के इतिहास में अब तक का सबसे महंगा आयोजन है। इसके लिए अभी तक ₹6,500 करोड़ से अधिक की राशि आवंटित की जा चुकी है, और अनुमान है कि आयोजन समाप्त होते-होते यह आंकड़ा ₹7,500 करोड़ तक पहुंच जाएगा। यह राशि देश के कई छोटे राज्यों के वार्षिक बजट के लगभग आधे के बराबर है। स्वाभाविक रूप से, कुछ लोगों के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि केवल 56 दिनों तक चलने वाले इस अस्थायी आयोजन पर इतना भारी-भरकम खर्च कितना तर्कसंगत है। इस प्रश्न का उत्तर महाकुंभ की आर्थिक संभावनाओं में छुपा है। यह आयोजन जितना बड़ा निवेश है, उससे कहीं अधिक राजस्व उत्पन्न करने की क्षमता रखता है। उदाहरण के लिए, ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि 1882 के कुम्भ मेले के आयोजन में ₹20,228 की लागत आई थी, जबकि उससे ₹49,840 का राजस्व प्राप्त हुआ था, जिससे कुल ₹29,612 का शुद्ध लाभ हुआ। इस बार अनुमान है कि इस बार महाकुंभ से लगभग ₹25,000 करोड़ का प्रत्यक्ष राजस्व उत्पन्न होगा।

इसके अतिरिक्त, 45 करोड़ श्रद्धालुओं के आगमन की उम्मीद है। यदि प्रत्येक व्यक्ति औसतन ₹2000 खर्च करता है, तो कुल व्यय लगभग ₹90,000 करोड़ तक पहुंच सकता है। यह धनराशि पर्यटन, आवास, परिवहन, खानपान, और स्थानीय उत्पादों के माध्यम से अर्थव्यवस्था में व्यापक गति लाएगी। हालांकि, यह आकलन केवल प्रत्यक्ष खर्च और राजस्व तक सीमित है। वास्तव में, ऐसे आयोजनों के कई अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभाव भी होते हैं, जिन्हें आर्थिक भाषा में ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ कहा जाता है। पर्यटन में मल्टीप्लायर इफेक्ट विशेष रूप से अधिक होता है, और जब इसमें 45 करोड़ की भीड़, ₹7500 करोड़ का खर्च, तथा नव निर्माण शामिल हो, तो इसका प्रभाव अप्रत्याशित रूप से विशाल हो सकता है।

महाकुंभ के मल्टीप्लायर इफेक्ट

मल्टीप्लायर इफेक्ट को सरल शब्दों में इस तरह समझा जा सकता है कि जब कोई पर्यटक किसी स्थल पर पैसा खर्च करता है, तो वह धन स्थानीय अर्थव्यवस्था में विभिन्न माध्यमों से प्रसारित होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई पर्यटक होटल में ठहरता है, तो होटल के मालिक और कर्मचारियों को आय प्राप्त होती है। पर्यटक द्वारा टैक्सी या ऑटो किराए पर लेने से परिवहन सेवाओं को लाभ होता है। साथ ही, खानपान पर खर्च किए गए पैसे से रेस्तरां मालिकों और उनके कर्मचारियों की आय बढ़ती है। इस तरह यह धन कई स्तरों पर घूमता है और विभिन्न व्यवसायों को लाभ पहुंचाता है। यह आर्थिक चक्र आगे भी जारी रहता है क्योंकि वे लोग, जिन्हें इस प्रक्रिया में आय प्राप्त हुई, वे भी अपनी जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए खर्च करेंगे। इससे बाजार में मांग बढती है, उत्पादन में वृद्धि होती है, और नए रोजगार के अवसर सृजित होंगे। इस प्रकार, अर्थव्यवस्था का पहिया तेजी से घुमने लगता है।

इसके अलावा, ऐसे बड़े धार्मिक आयोजन एक महत्वपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश की मांग करते हैं। इतनी विशाल भीड़ के प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचे का नए सिरे से निर्माण आवश्यक हो जाता है, जिससे स्थानीय विकास को बढ़ावा मिलता है और रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, महाकुंभ 2025 की तैयारियों के अंतर्गत अब तक लगभग 45,000 परिवारों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर प्राप्त हुए हैं। आज, स्थानीय स्तर पर प्रयागराज शहर में इस निवेश से बुनियादी ढांचे में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। नए सड़क मार्गों, पुलों और आधुनिक सुविधाओं के निर्माण के साथ शहर को पूरी तरह से संजोया और संवारा गया है। लेकिन, यह प्रभाव केवल प्रयागराज के बुनियादी ढांचे के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव उत्तर प्रदेश की व्यापक अर्थव्यवस्था पर भी दूरगामी होने वाला है।

प्रयागराज की भौगोलिक स्थिति इसे वाराणसी और अयोध्या जैसे दो प्रमुख धार्मिक स्थलों के निकट लाती है, जिससे इसका आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव और भी व्यापक हो जाता है। महाकुंभ के दौरान आने वाले करोड़ों श्रद्धालु अयोध्या में नव निर्मित श्रीराम मंदिर और वाराणसी के काशी विश्वनाथ धाम का भी दर्शन करेंगे। इससे इन दोनों शहरों में पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को अभूतपूर्व बढ़ावा मिलेगा। तो इस आयोजन से जो प्रत्यक्ष लाभ (अनुमानित ₹1.25 लाख करोड़) का आकलन हम कर रहे हैं वह ₹2 लाख करोड़ को पार कर सकता है। इस आर्थिक परिवर्तन का प्रभाव न केवल स्थानीय व्यवसायों और रोजगार सृजन पर पड़ेगा, बल्कि राज्य की समग्र आर्थिक वृद्धि की गति को भी तीव्र करेगा।

असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लोगों की आय वृद्धि

धार्मिक आयोजनों की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि ये देश के असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लोगों की आय वृद्धि का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं। उदाहरण के लिए, पूजा सामग्री, फूलों की माला, प्रसाद, और धार्मिक स्मृतियों की बिक्री से जुड़े व्यापारी और छोटे उद्यमी इससे प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होते हैं। इन आयोजनों से स्थानीय अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। विशेष रूप से फूलों की खेती को प्रोत्साहन मिलता है, जिससे किसानों को तत्काल नकदी प्राप्त होती है। इसके अलावा, पूजा सामग्रियों की मांग को पूरा करने के लिए लघु और कुटीर उद्योगों का विस्तार होता है, जिससे स्थानीय रोजगार के नए अवसर सृजित होते हैं।

इसके अलावा धार्मिक मेलों और आयोजनों के माध्यम से स्थानीय कारीगरों और कलाकारों के उत्पादों की बिक्री को भी एक नया मंच प्राप्त होता है। इससे हस्तशिल्प और लोककला को न केवल संरक्षण मिलता है, बल्कि यह इनके वाणिज्यिक विकास का भी मार्ग प्रशस्त करता है। उदाहरण के लिए, ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ योजना में प्रयागराज के मूंज उत्पादों को शामिल किया गया है। मूंज से निर्मित उत्पाद, जैसे टोकरी (डालिया), कोस्टर स्टैंड, बैग, और सजावटी वस्तुएं, हर घर की आवश्यक जरूरतों को पूरा करती हैं। ये उत्पाद न केवल उपयोगी हैं, बल्कि अपनी पारंपरिक सुंदरता और टिकाऊपन के कारण भी लोगों को आकर्षित करते हैं। यदि इन उत्पादों को कुम्भ मेले में स्थानीय, स्वदेशी, और इंडिजेनस के रूप में ब्रांडिंग के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो ये देश-विदेश से आए पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं। यही नहीं, इन आयोजनों का प्रभाव सिर्फ प्रयागराज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आसपास के जिलों में भी इसका सकारात्मक असर देखने को मिलेगा। उदाहरण के लिए, प्रयागराज के साथ ही, भदोही के कालीन, चित्रकूट के लकड़ी के खिलौने, और प्रतापगढ़ के आंवला उत्पादों को भी इन आयोजनों से नया बाजार और पहचान मिलने की संभावना है।

इसलिए महाकुंभ 2025 केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह आर्थिक दृष्टि से एक ‘मेगा इंवेस्टमेंट प्रोजेक्ट’ के रूप में भी उभरकर सामने आ रहा है। इस आयोजन से न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भारत को वैश्विक पहचान मिलेगी, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के 1 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था लक्ष्य को भी महत्वपूर्ण गति प्रदान करेगा। यह आयोजन एक ऐसा मंच प्रदान करेगा, जो धर्म से आर्थिक विकास का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करेगा। महाकुंभ से प्राप्त अनुभवों को ध्यान में रखते हुए, यदि इसी तरह के आयोजनों को और अधिक संगठित और संरचित रूप में विकसित किया जाए, तो भारत आर्थिक प्रगति के नए आयाम स्थापित कर सकेगा।

आर्थिक विकास के लिए जरुरी ‘टेम्पल-ड्रिवन इकोनॉमी’

भारत के पास आर्थिक विकास को गति देने का एक नवोन्मेषी मॉडल उपलब्ध है—धर्म आधारित अर्थव्यवस्था। इसका आशय यह नहीं है कि संपूर्ण आर्थिक गतिविधियाँ केवल धार्मिक पर्यटन पर केंद्रित कर दी जाएं, बल्कि यह एक ऐसा क्षेत्र है, जो देश की जीडीपी वृद्धि दर को 1 से 2 प्रतिशत तक बढ़ाने की अपार क्षमता रखता है। उदाहरण के तौर पर, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के बाद काशी को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर एक नया और विशिष्ट स्थान प्राप्त हुआ। आंकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी से 31 मई 2025 के बीच 2.86 करोड़ श्रद्धालुओं ने काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन किए, जबकि 1 जनवरी 2025 को 7.43 लाख भक्तों ने एक ही दिन में पूजा-अर्चना कर नया कीर्तिमान स्थापित किया। इसी प्रकार, राम मंदिर के निर्माण ने अयोध्या को एक वैश्विक तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित कर दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से सितंबर 2024 के बीच अकेले अयोध्या में 13.55 करोड़ पर्यटकों का आगमन हुआ, जो आगरा के ताजमहल को कुल पर्यटकों के मामले में पीछे छोड़ चुका है। यह उपलब्धि न केवल धार्मिक पर्यटन की आर्थिक क्षमता को दर्शाती है, बल्कि इसे विकास का सशक्त माध्यम भी बनाती है।

भारत, जो चार धामों, 51 शक्तिपीठों, 12 ज्योतिर्लिंगों और अनेकों प्राचीन मंदिरों का केंद्र है, धार्मिक पर्यटन के माध्यम से आर्थिक विकास को एक नई दिशा दे सकता है। इस संदर्भ में, भारत को “टेम्पल-ड्रिवन इकोनॉमी” की अवधारणा को अपनाने की आवश्यकता है। यदि राम मंदिर, प्रयागराज के महाकुंभ और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के मॉडल पर देश के 100 प्रमुख धार्मिक स्थलों का विकास किया जाए, तो यह व्यापक आर्थिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इन स्थलों पर बेहतर बुनियादी ढाँचा, आधुनिक सुविधाएँ, और सुगम परिवहन नेटवर्क तैयार कर धार्मिक पर्यटन को एक व्यापक आर्थिक गतिविधि के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। इससे स्थानीय व्यवसायों और लघु एवं मध्यम उद्यमों को विकास के नए अवसर मिलेंगे। आधारभूत संरचना, नवीन उद्यमिता, और आर्थिक सुदृढ़ता को भी प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे यह मॉडल स्थायी आर्थिक विकास का आधार बन सकता है।

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8th Pay Commission: Modi 3.0’s Major Second Gift to Government Employees https://visionviksitbharat.com/8th-pay-commission-modi-3-0s-major-second-gift-to-government-employees/ https://visionviksitbharat.com/8th-pay-commission-modi-3-0s-major-second-gift-to-government-employees/#respond Fri, 17 Jan 2025 05:13:54 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=864   About 50 lakh government employees and 65 lakh pensioners will be benefited under this commission. The Modi government has made two important decisions for employees so far in its…

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About 50 lakh government employees and 65 lakh pensioners will be benefited under this commission.

The Modi government has made two important decisions for employees so far in its third term. The first decision was the “Unified Pension Scheme,” which provided a guaranteed pension. Now, the second decision was made yesterday, in which the government approved the 8th Pay Commission. After this decision, a committee will be formed, releasing a report on all the provisions and changes related to this pay commission. It is expected that this new pay commission will be implemented by 2026. However, there are three important questions related to this decision that need to be discussed: What will be the impact of the pay commission on the employees? How will it work as a booster for the Indian Economy? And how will the 8th Pay Commission be different from other commissions? After understanding these questions, the entire discussion related to this topic will be clear and meaningful.

Why is the Pay Commission brought?

The central government has approved the 8th Pay Commission, which aims to review the salaries and allowances of government employees and pensioners. About 50 lakh government employees and 65 lakh pensioners will be benefitted under this commission. If the figures of the state government are also included in it, then this number can exceed 2 crores. But the question arises as to why this commission is brought.

Since independence, the central government has constituted seven pay commissions. The main objective of these commissions has been to review the salaries, allowances, and pensions of government employees from time to time. Each commission is constituted at an interval of about 10 years so that necessary amendments can be made to the salary structure given inflation and economic conditions. The Pay Commission is a government body that reviews the structure of salaries, allowances, and other benefits of central employees and pensioners. This process is important so that government employees can be ensured a fair and equitable income, which aligns with their work and contribution.

What changes can come from the 8th Pay Commission?

Many important changes are expected under this Pay Commission, which can benefit government employees and pensioners. First of all, the impact of the salary increase can be seen. It is estimated that after the implementation of the 8th Pay Commission, the minimum salary of government employees can be between ₹40,000 to ₹45,000, while currently it is around ₹18,000. Additionally, pensioners will also benefit from this pay commission. The pension amount will also increase, strengthening pensioners’ financial position. Revision in dearness allowance will also increase the total salary of the employees, as dearness allowance is directly linked to the basic salary of the employees. However, the dearness allowance is zero with the implementation of the pay commission, but it is revised afterward, further increasing the employee’s salary.

What will be the impact of the 8th Pay Commission on the economy?

The impact of the 8th Pay Commission will be directly on the country’s economy. The increase in the salary of government employees will not only increase their personal purchasing power but will also increase consumption spending. The increased purchasing power of employees will boost demand in the economy, leading to a rise in demand for goods and services in the market. Additionally, the salary hike will increase the spending capacity of consumers, which will also improve the government’s tax collection. Thus, this hike will contribute to the government’s revenue in both direct and indirect taxes. When government employees get a decent salary, their morale will also increase. This will result in improved efficiency and productivity, improving the quality of government services.

How will the 8th Pay Commission be different from other commissions?

The difference between pay commissions is visible, and these changes play a significant role in affecting the financial condition of government employees. For example, the minimum salary in the 7th Pay Commission was ₹18,000, while in the 6th Pay Commission, it was only ₹7,000. Apart from this, there was also a variation in the ‘fitment factor.’ The fitment factor is the multiplier used to calculate the basic pay and other allowances of government employees. This factor is determined to convert the current salary of the employees to the new pay structure. The fitment factor in the 7th Pay Commission was 2.57, while in the 6th, it was 1.86. Now, there are possibilities of increasing the fitment factor to 2.8 in the 8th Pay Commission. If implemented, an employee earning ₹50,000 monthly salary can increase to ₹1.4 lakh.

However, its implementation will also raise some concerns, which the government must resolve. The salary hike will increase the money supply in the economy, which may lead to a rise in inflation due to the sudden increase in demand. Moreover, The government will need more revenue to meet salary payments as per the 8th pay commission, raising a fiscal concern. Nevertheless, the recommendations of the 8th Pay Commission will be a relief for government employees and pensioners. It will not only improve their financial condition but will also give a boost to the economy. However, the government will have to adopt appropriate strategies in parallel to deal with the potential challenges that may arise due to this.

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What Changes in Fiscal Policy Can Improve the Economy Again https://visionviksitbharat.com/what-changes-in-fiscal-policy-can-improve-the-economy-again/ https://visionviksitbharat.com/what-changes-in-fiscal-policy-can-improve-the-economy-again/#respond Sat, 11 Jan 2025 06:22:35 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=760 The current state of the Indian economy is at a pivotal crossroads. The diminishing GDP statistics provoke apprehension, whereas the escalating inflation metrics affect the daily lives of the general…

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The current state of the Indian economy is at a pivotal crossroads. The diminishing GDP statistics provoke apprehension, whereas the escalating inflation metrics affect the daily lives of the general populace. Upon examining the stock market, it becomes evident that the previous boom has shifted into a bearish trend, reflecting signs of a slowdown in the Indian economy. The stock market is frequently viewed as an indicator of the overall economic condition. An upward trend in the stock market indicates economic growth, while a downturn points to a potential economic slump or a slowdown. The present condition of the stock market is a subtle reflection of the financial challenges India is facing right now.

After two years, reports indicating a decline in the growth rate have begun to emerge. The National Statistical Office’s (NSO) advance estimate for 2025 indicates that the growth rate of the Indian economy is projected to fall to 6.4 percent in the financial year 2025 (FY25). This figure is lower than the recent estimate of 6.6 percent published by the Reserve Bank of India. Therefore, two primary questions arise here. Does the current economic decline signify a temporary setback or suggest a prolonged slowdown? The second question pertains to the steps required to escape this situation. What economic measures can be employed to achieve rapid growth and stability in the Indian economy?

Is the economic decline temporary or indicative of a prolonged slowdown?

Addressing the first question, we must accept that the Indian economy is under global pressure. Over the past two years, global instability, including warfare, oil supply disruptions, and shifting geopolitical dynamics, has impacted both the global economy and the Indian economy. The effects of significant initiatives aimed at rapid growth following the COVID-19 pandemic are now diminishing, highlighting the necessity for renewed efforts to bolster the global economy. The International Monetary Fund (IMF) reports that global economic growth was stable yet moderate in 2024. It has projected global GDP growth to be approximately 3.3% in 2025. This slowdown is also evident in the Indian economy. India’s growth rate falls to 5.4% in the July-September 2024, marking the lowest level in the past seven quarters. Additionally, The State Bank of India has projected retail inflation to exceed 5% in the ongoing financial year. It simply means that India must revisit its policy decisions and ensure an effective strategy for sustainable long-term growth.

What Key Measures Are Essential for Sparking an Economic Boom Again?

Addressing the second question necessitates an examination of fiscal policy, which serves as the sole instrument capable of revitalizing the economy as of now. Before suggesting any changes, it is essential to note that not all economic data is negative or disappointing. Instead, attention should be focused on specific areas of concern. The agriculture and manufacturing sectors are projected to grow in the latter half of the financial year. This sector experienced a growth of 2.7 percent in the first half of FY25, with projections indicating an increase to 3.8 percent in the second half. Besides, the manufacturing sector experienced a growth of 4.5 percent in the first half and is expected to grow by 5.3 percent for FY25. The figures indicate a potential enhancement in domestic demand.

However, the growth rate of the labor-intensive manufacturing sector, essential for job creation, is expected to decelerate in the latter half of the year. The sector is expected to expand by 8.6 percent for FY25, a decrease from 9.1 percent in the first half. The shortage may result from increasing raw material costs, project delays, and global economic challenges. The deceleration in this sector will adversely influence worker income and negatively affect both rural and urban demand. Therefore, it is crucial to boost investment in the construction sector and ensure employment security for workers through fiscal policy.

To do so, boosting the government’s investment spending can be a powerful approach to stimulating economic activities. The significance of government investment grows even more due to its extensive and lasting multiplier effect. The government’s investment in large projects like roads, railways, ports, energy, and urban development extends its impact beyond those sectors. This investment additionally promotes associated industries and services. Highway construction projects, for instance, create job opportunities for laborers, engineers, and technical experts. In addition, the heightened demand for construction materials such as cement and steel leads to a rise in employment and production within these sectors. One more advantage of this is that infrastructure projects boost the income of individuals working, thereby enhancing their purchasing power. This boosts market demand, prompting producers to ramp up their production efforts. This cycle generates new employment opportunities and stimulates economic activities.

Optimal Direction and Methodologie

However, the crucial inquiry pertains to the optimal direction and methodologies for enhancing governmental investment to expedite growth. Should initiatives such as cash transfers be implemented to strengthen domestic demand, or should greater emphasis be placed on infrastructure projects? While cash transfer schemes can yield immediate benefits, they fall short of fostering sustainable capital formation over the long term. However, Infrastructure projects serve a dual purpose: they generate employment opportunities while simultaneously fortifying the economic framework for the future. In this context, the government may consider implementing a dual strategy. To enhance rural demand, raising the honorarium of farmers (including farm workers) is essential, thereby augmenting their purchasing power. Secondly, a designated sum must be allocated to women beneath the poverty threshold, as this will enhance rural demand and foster economic transformations.

In addition, the government needs to concentrate primarily on the middle and lower middle classes to enhance urban demand. A significant portion of the monthly expenditure of these groups goes to education, healthcare, and household necessities. Therefore, if assistance is provided in any of these domains, individuals may experience an enhancement in their savings, allowing them to spend toward other essential needs. Expanding the ‘Ayushman Bharat Yojana’ may be a significant strategy for relief. The government has recently incorporated the older people into its coverage. Similarly, households within a specified income bracket may be encompassed in this consideration. This will significantly reduce the health-related financial burden, motivating them to allocate resources toward alternative purchases.

Today, it is imperative for the government to find an equilibrium between providing immediate support to the economically weak population and engaging in long-term strategic investments. It is essential to provide direct financial assistance to the underprivileged while ensuring that investments are made with a forward-looking perspective for the future of India. To transform India into a developed nation by 2047, this must be considered in the forthcoming budget.

(The views expressed are the author’s own and do not necessarily reflect the position of the organisation)

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विश्व 2024 का आर्थिक परिदृश्य तथा भारत की भावी संभावनाएं? https://visionviksitbharat.com/economic-landscape-of-world-and-india-and-the-upcoming-plans-for-india/ https://visionviksitbharat.com/economic-landscape-of-world-and-india-and-the-upcoming-plans-for-india/#respond Tue, 31 Dec 2024 12:42:38 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=427 रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में जारी संघर्षों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। यही कारण है कि IMF ने अनुमान जताया है कि 2025 में वैश्विक जीडीपी…

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रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में जारी संघर्षों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। यही कारण है कि IMF ने अनुमान जताया है कि 2025 में वैश्विक जीडीपी वृद्धि दर लगभग 3.3 प्रतिशत रह सकती है।

 

वर्ष 2024 वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए उथल-पुथल भरा रहा। दुनिया के विभिन्न मोर्चों पर जारी संघर्षों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर लगातार दबाव बनाए रखा। इसका परिणाम यह हुआ कि महंगाई बढ़ी, विकास दर धीमी पड़ी, और लगभग हर देश को रोज़गार और आर्थिक स्थिरता की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। भारत भी इन प्रभावों से अछूता नहीं रहा। दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का अर्थ है कि भारत वैश्विक विकास का एक महत्वपूर्ण इंजन है, और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों से बच पाना इसके लिए संभव नहीं है। यदि गहराई से देखा जाए, तो वर्ष 2024 भारत के लिए मिला-जुला साबित हुआ। इस वर्ष की शुरुआत सकारात्मक रही, बीच का समय भी संतोषजनक रहा, लेकिन साल के अंत तक आर्थिक आंकड़ों और महंगाई ने सतर्क कर दिया।

जुलाई-सितंबर 2024 की तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर घटकर 5.4% रह गई, जो पिछले सात तिमाहियों का सबसे निचला स्तर था। यह गिरावट आर्थिक प्रबंधन के लिए एक चेतावनी संकेत है। वहीं, भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने अपनी मौद्रिक नीति समिति की बैठक में रेपो दर को 6.50% पर स्थिर रखने का निर्णय लिया। इस निर्णय के पीछे मुख्य कारण महंगाई के बढ़ते हुए स्तर को नियंत्रित करने की आवश्यकता रही। हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के ताज़ा अनुमान के अनुसार, मौजूदा वित्तीय वर्ष में खुदरा महंगाई 5% से ऊपर बनी रह सकती है।

कैसा रहा वैश्विक अर्थव्यवस्था का हाल?  

वर्ष 2024 वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए उतार-चढ़ाव और चुनौतियों से भरा रहा। इस वर्ष की आर्थिक समीक्षा के लिए दो प्रमुख पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है—पहला, वैश्विक आर्थिक परिदृश्य और दूसरा, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं का प्रदर्शन।

वैश्विक आर्थिक परिदृश्य

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, 2024 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि स्थिर लेकिन मध्यम स्तर पर रही। महंगाई के खिलाफ चल रही लड़ाई में कुछ प्रगति दर्ज की गई, जिससे आर्थिक सुधार की संभावनाएँ बढ़ीं। हालाँकि, रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में जारी संघर्षों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। यही कारण है कि IMF ने अनुमान जताया है कि 2025 में वैश्विक जीडीपी वृद्धि दर लगभग 3.3 प्रतिशत रह सकती है। फिर भी अगर यह वृद्धि साकार होती है तो आर्थिक बेहतरी की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत होगा।

प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं का प्रदर्शन

अमेरिका: 2024 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई। ऊँची ब्याज दरें, महंगाई और धीमे श्रम बाजार के बावजूद, अमेरिका ने G7 देशों में सबसे बेहतर प्रदर्शन किया। IMF ने इसे सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में स्थान दिया।

चीन: चीन की अर्थव्यवस्था ने वर्ष की पहली तीन तिमाहियों में 4.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, लेकिन बाद में मंदी की ओर बढ़ी। घरेलू मांग में कमजोरी और रियल एस्टेट क्षेत्र की समस्याओं ने इस गिरावट को और बढ़ाया। सरकार ने अल्पकालिक मांग को बढ़ावा देने के लिए विशेष पैकेज जारी किए, लेकिन दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता बनाए रखना अब भी चुनौती बना हुआ है। विश्व बैंक ने चीन की वृद्धि दर 2024 में 4.9 प्रतिशत और 2025 में 4.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है।

भारत: भारत, जो वर्तमान में $3.89 ट्रिलियन GDP के साथ दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, ने 2024 में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। ऊँची महंगाई और वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की विकास दर मजबूत बनी रही। विश्व बैंक ने वित्तीय वर्ष 2025 में भारत की वृद्धि दर 7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो भविष्य में स्थिर बनी रह सकती है। यह भारत को 2030 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर करता है। विदेशी मुद्रा भंडार और रिकॉर्ड प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह ने भी भारत की आर्थिक सफलता को मजबूत किया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था: कैसा रहा साल 2024? 

वर्ष 2024 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए विकास और परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण वर्ष रहा। इस वर्ष FDI में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जो अप्रैल 2000 से सितंबर 2024 के बीच 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। निर्यात के क्षेत्र में भी भारत ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं। वर्ष 2024 में निर्यात 778 बिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। बुनियादी ढांचे के विकास में भी प्रगति जारी रही। प्रतिदिन औसतन 27 किलोमीटर नई सड़कों का निर्माण हुआ।

सामाजिक प्रगति के दृष्टिकोण से भी वर्ष 2024 महत्वपूर्ण रहा। भारत प्रगति रिपोर्ट 2024 के अनुसार, 79 प्रतिशत घरों तक स्वच्छ पेयजल की पहुंच सुनिश्चित की गई। यह पिछले पांच वर्षों में पांच गुना वृद्धि है। इसके अलावा 2024 महिला सशक्तिकरण के लिए भी एक ऐतिहासिक वर्ष रहा। केंद्रीय बजट में महिलाओं के लिए 3 लाख करोड़ रुपये की योजनाएं आवंटित की गईं। महिला करदाताओं की संख्या में 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि 11 लाख से अधिक महिलाएं ‘लखपति दीदी’ बनकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनीं।

हालांकि, इस साल कुछ चिंताएं भी बनी रही। भारतीय शेयर बाजारों में वर्ष की पहली छमाही में मजबूती देखने को मिली, जहां निफ्टी 50 और सेंसेक्स ने 10.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। लेकिन, दूसरी छमाही में 2 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। यह गिरावट मुख्य रूप से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा भारी बिकवाली, ऊंचे मूल्यांकन, धीमी आर्थिक गति, कमजोर शहरी खपत और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण हुई। महंगाई भी पूरे वर्ष चिंता का विषय बनी रही। असामान्य मानसून और यूरोप एवं मध्य पूर्व में जारी संघर्षों के कारण खाद्य और ऊर्जा कीमतों में वृद्धि हुई। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) छह महीनों तक 5 प्रतिशत से ऊपर बना रहा और अक्टूबर 2024 में यह 6 प्रतिशत को पार कर गया।

रोजगार के मोर्चे पर भी मिश्रित परिणाम देखने को मिले। नौकरी के लिए आवेदन करने वालों की संख्या 7 करोड़ तक पहुंच गई, जो 25 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि को दर्शाती है। वहीं, रोजगार-से-जनसंख्या अनुपात बढ़कर 52.8 प्रतिशत तक पहुंचा। हालांकि, बड़ी संख्या में लोग अभी भी श्रम शक्ति का हिस्सा नहीं बन पाए हैं, जिससे श्रम निर्भरता अनुपात 1.52 बना हुआ है।

  1. इन उपलब्धियों और चुनौतियों के बीच, वर्ष 2025 को संभावनाओं से भरपूर है। मजबूत बुनियादी ढांचे, महिला सशक्तिकरण और विदेशी निवेश में वृद्धि जैसे कारकों के आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था के तेज गति से आगे बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, मुद्रास्फीति और वैश्विक अनिश्चितताओं को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी। सरकार ने वर्ष 2024 में पूंजीगत व्यय के लिए रिकॉर्ड 10.89 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए, जो GDP का लगभग 3.3 प्रतिशत है। यह राशि सड़क एवं रेल नेटवर्क, शहरी विकास, रक्षा क्षेत्र और ग्रामीण बुनियादी ढांचे पर खर्च की गई। इन निवेशों से आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार सृजन के नए अवसर सृजित होंगे। समग्र रूप से कहें तो वर्ष 2024 ने भी भारत की आर्थिक यात्रा में एक मजबूत नींव तैयार की है, जिस पर आगे के वर्षों में विकास और स्थिरता के नए आयाम जोड़े जा सकते हैं। यदि सरकार की नीतिगत योजनाएं और आर्थिक सुधारों की दिशा बनी रही, तो वर्ष 2025 भारत के लिए आर्थिक प्रगति का एक निर्णायक वर्ष साबित हो सकता है।

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अटल बिहारी वाजपेयी: 21वीं सदी में विकसित भारत की आधारशिला रखने वाले नेता https://visionviksitbharat.com/atal-bihari-vajpayee-the-leader-who-laid-the-foundation-of-a-developed-india-in-the-21st-century/ https://visionviksitbharat.com/atal-bihari-vajpayee-the-leader-who-laid-the-foundation-of-a-developed-india-in-the-21st-century/#respond Wed, 25 Dec 2024 07:43:26 +0000 https://visionviksitbharat.com/?p=324 लेखक: विक्रांत निर्मला (शोधार्थी, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला।) आज का दिन देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जन्मतिथि के रूप में हमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को याद…

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लेखक: विक्रांत निर्मला (शोधार्थी, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला।)

आज का दिन देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जन्मतिथि के रूप में हमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करने का अवसर देता है। अटल जी के कई रूप थे—कभी वे ओजस्वी वक्ता के रूप में मंचों पर चमकते थे, तो कभी एक संवेदनशील कवि के रूप में मन को छू जाते थे। लेकिन उनकी सबसे प्रभावशाली पहचान एक दूरदर्शी नीति-निर्माता की रही, जिनकी आर्थिक नीतियों ने 21वीं सदी के विकसित भारत की बुनियाद रखी। आज जब हम विकसित भारत के सपनों की चर्चा करते हैं, तो उनके कार्यकाल की नीतियाँ इस अभियान के प्रेरणास्रोत के रूप में सामने आती हैं।

इस कहानी की शुरुआत 1990 के दशक से होती है। भारत 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद नई संभावनाओं के द्वार खोल चुका था। विदेशी निवेश बढ़ रहा था और भारत एक बड़े बाजार के रूप में उभरने लगा था। लेकिन 1995 के बाद का दौर राजनीतिक अस्थिरता का था—सरकारें बनती और गिरती रहीं, जिससे आर्थिक चिंताएँ भी बढ़ गईं। इसी राजनीतिक उथल-पुथल पर 1999 में विराम लगा, जब भारतीय जनता पार्टी ने कई दलों के समर्थन से एक स्थायी सरकार बनाई और अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने। हालाँकि, अर्थव्यवस्था को लेकर संदेह बरकरार था। संघ की पृष्ठभूमि से आए नेता के लिए खुली अर्थव्यवस्था का समर्थन करना आसान नहीं था। 1991 में संघ की इकाई ‘स्वदेशी जागरण मंच’ ने उदारीकरण और वैश्वीकरण को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे। लेकिन वाजपेयी जी ने इन आशंकाओं को गलत साबित किया।

उनके नेतृत्व में बड़े आर्थिक सुधार हुए। सरकारी कंपनियों का विनिवेश और निजीकरण तेज़ी से आगे बढ़ा। इसके लिए बाकायदा एक अलग मंत्रालय बनाया गया, जिसकी जिम्मेदारी अरुण शौरी को सौंपी गई। वित्तीय घाटे को नियंत्रित रखने के लिए कड़े कदम उठाए गए, और देशभर में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर सरकारी खर्च को बढ़ावा दिया गया। वाजपेयी सरकार के ‘स्वर्णिम चतुर्भुज’ सड़क परियोजना और ग्रामीण सड़कों के विकास कार्यक्रम ने आर्थिक प्रगति के लिए नई राहें खोलीं। उन्होंने सिर्फ नीतियाँ नहीं बनाईं, बल्कि भारत की आर्थिक सोच को एक नई दिशा दी।

आर्थिक विकास के सूत्रधार: अटल बिहारी वाजपेयी के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की आर्थिक उपलब्धियों में सबसे चमकदार पहल “स्वर्णिम चतुर्भुज योजना” रही। यह परियोजना देश के चार प्रमुख महानगरों—दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और मुंबई—को जोड़ने वाले कुल 5846 किलोमीटर लंबे हाईवे नेटवर्क के निर्माण के लिए जानी जाती है। इस योजना ने देश में बुनियादी ढांचे का एक ऐसा मजबूत ढांचा खड़ा किया, जिसकी नींव पर आज भारतमाला और सागरमाला परियोजनाएं आगे बढ़ रही हैं। वाजपेयी सरकार ने न केवल शहरी विकास को प्राथमिकता दी, बल्कि ग्रामीण भारत की प्रगति का भी पूरा ख्याल रखा। साल 2000 में शुरू की गई ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ इसका प्रमाण है। इस योजना ने गाँवों को शहरों से जोड़ने के लिए सड़क नेटवर्क का एक विस्तृत जाल बिछाया, जो आज भी ग्रामीण भारत की आर्थिक धमनियों को गतिशील बनाए हुए है।

सरकार की इन रणनीतिक पहलों ने देश में निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा किए। इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर बड़े पैमाने पर सरकारी खर्च ने अर्थव्यवस्था में नई जान फूँकी। इसका असर आर्थिक विकास दर पर भी साफ नजर आया। साल 2003 में भारत की जीडीपी ग्रोथ दर 8% तक पहुँच गई, जो उस समय देश के आर्थिक कायाकल्प की मिसाल बनी।

जीएसटी की आधारशिला: वाजपेयी सरकार की दूरदर्शी पहल

आज भारत की वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था को देश की कर प्रणाली में सबसे बड़ा सुधार माना जाता है, लेकिन इसकी नींव साल 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में रखी गई थी। उस समय देश के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा थे, जिन्होंने इस क्रांतिकारी कर सुधार की दिशा में पहला कदम उठाया। वाजपेयी सरकार ने राज्यों के वित्त मंत्रियों की एक समिति गठित की, जिसे जीएसटी के प्रारूप और क्रियान्वयन पर सिफारिशें तैयार करने का दायित्व सौंपा गया। साल 2003 में आई इस समिति की रिपोर्ट में राज्यों को एक समान कर प्रणाली अपनाने का सुझाव दिया गया। यह सुझाव भारत में एकीकृत कर व्यवस्था की दिशा में पहला ठोस कदम था।

आज जीएसटी भारत के लिए राजस्व का प्रमुख स्रोत बन चुका है। इसकी प्रणाली ने देश को अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से औपचारिक अर्थव्यवस्था में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में जीएसटी से हर महीने 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व जुटाया जा रहा है, जो देश की आर्थिक मजबूती को दर्शाता है। हालाँकि, इस सुधार को लागू होने में कई वर्ष लगे, लेकिन इसकी आधारशिला अटल बिहारी वाजपेयी की दूरदर्शी सोच और आर्थिक सुधारों की प्रतिबद्धता ने रखी थी।

वित्तीय अनुशासन की नींव: वाजपेयी सरकार का ऐतिहासिक कदम

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिरता और अनुशासन की ओर ले जाने के लिए कई दूरगामी कदम उठाए, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण था ‘फिस्कल रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट एक्ट (FRBM) 2003’। उस दौर में देश की अर्थव्यवस्था को वित्तीय घाटे का सामना करना पड़ रहा था, जिसे नियंत्रित करने के लिए कोई ठोस कानूनी व्यवस्था नहीं थी। वित्तीय घाटा तब होता है जब सरकार की खर्च अधिक और राजस्व कम होता है। यह स्थिति अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक विकास के लिए खतरा बन सकती थी। वाजपेयी सरकार ने इस चुनौती का समाधान निकालते हुए FRBM एक्ट 2003 लागू किया, जिसने वित्तीय घाटे पर कानूनी नियंत्रण स्थापित किया। इस कानून के तहत लक्ष्य रखा गया कि वित्तीय घाटा जीडीपी के 3% के भीतर रखा जाए।

आज यही कहा जा सकता है कि अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार भारतीय आर्थिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई। उनके कार्यकाल में लिए गए दूरगामी फैसलों ने न केवल तत्कालीन अर्थव्यवस्था को स्थिरता दी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए विकास का मजबूत ढांचा भी तैयार किया। जेम्स फ्रीमैन का एक प्रसिद्ध कथन है—”राजनेता अगले चुनाव के बारे में सोचते हैं, जबकि राष्ट्र-नेता अगली पीढ़ी के बारे में।” अटल बिहारी वाजपेयी ने इस सिद्धांत को जीवन में उतारा। उन्होंने आर्थ‍िक संरचनात्मक सुधारों, बुनियादी ढांचे के विस्तार, और वित्तीय अनुशासन की मजबूत नींव दी, जिसने भारत को एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित किया।

कई आर्थिक विश्लेषक यह मानते हैं कि 2004-2009 के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में दर्ज की गई तेज आर्थिक वृद्धि का एक बड़ा श्रेय वाजपेयी सरकार के बड़े पूंजी निवेश और आर्थिक सुधारों को जाता है। उनके द्वारा शुरू किए गए विनिवेश, जीएसटी की पहल, और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास जैसे कदमों ने भारत को वैश्विक आर्थिक मंच पर सशक्त स्थान दिलाया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यदि वाजपेयी जी को दूसरा कार्यकाल मिलता, तो आज भारत की आर्थिक तस्वीर कहीं अधिक सशक्त और उज्ज्वल होती। उनकी दूरदृष्टि, नीतियां और प्रतिबद्धता ने उन्हें सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि एक राजऋषि बना दिया।

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