ट्रंप के टैरिफ धमकियों के बीच अडिग और आत्मविश्वासी भारत

Spread the love! Please share!!

 

ट्रम्प का विश्व-राजनीती से प्रेरित यह कदम रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में किये गए सामूहिक प्रयासों को भी हानि पहुंचाएगा। उसकी घातक व्यापार नीति और भारत को “डेड इकॉनमी” कहना दोनों देशों द्वारा क्वाड (Quad) मंच के माध्यम से चीन के बढ़ते प्रभुत्व को नियंत्रित करने के लिए विकसित किए गए हिंद-प्रशांत रणनीति के मूलभूत उद्देश्यों और रणनीतिक सहयोग की भावना के विरुद्ध है।

 

अमेरिका में ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) अभियान के सहारे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा सत्ता में आने के साथ ही पुरानी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का पुनः अनुशरण करते हुए वैश्विक व्यापार विमर्श में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया था। इस क्रम में एकतरफा निर्णय,उच्च शुल्क,और आर्थिक राष्ट्रवाद सिद्धांत को अपनाते हुए ट्रम्प ने भारत द्वारा अमेरिका को किये जाने वाले निर्यात पर 25% का व्यापक टैरिफ लगाने की घोषणा किया, जो भारत-अमेरिका संबंधों की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। अपने पहले कार्यकाल (2017-2021) के दौरान आक्रामक संरक्षणवादी रुख के लिए जाने जाने वाले ट्रंप ने एक बार फिर टैरिफ कूटनीति को अमेरिकी विदेश और आर्थिक नीति के केंद्र में ला दिया है। 1 अगस्त, 2025 को भारत सहित कई देशों पर टैरिफ और जुर्माने की एक नई लहर का प्रस्ताव रखने वाली घोषणा ने व्यापार युद्धों, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और बहुपक्षवाद की कमज़ोरी जैसे प्रमुख मुद्दे आधारित वैश्विक चिंताओं को फिर से हवा दे दी है।

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था को “डेड इकॉनमी” कहना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़ों के विरुद्ध भी है। IMF और विश्व बैंक के अनुसार, भारत वर्ष 2025 में 6.8% की दर से बढ़ रही दुनिया की सबसे तेज़ी से विकसित होती बड़ी अर्थव्यवस्था है, भारत की जीडीपी $4.2 ट्रिलियन को पार कर चुकी है, जबकि तकनीक, विनिर्माण, और डिजिटल अर्थव्यवस्था में उसका प्रदर्शन सराहनीय है। वहीं अमेरिका, मंदी की आहट, उच्च ब्याज दरों और चीन के साथ व्यापार युद्ध की पुनरावृत्ति के बीच फंसा हुआ है। ट्रंप की आर्थिक नीतियों के कारण अमेरिका में महंगाई और वैश्विक निवेश की अनिश्चितता बढ़ी है। यही कारण है कि वह हाल ही में नए निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से खाड़ी देशों की यात्रा पर गए। भारत जहां आत्मनिर्भरता और वैश्विक साझेदारी की नीति पर काम कर रहा है, वहीं अमेरिका संरक्षणवाद, आर्थिक राष्ट्रवाद की के रुख को अपनाया हुआ है।   भारत और रूस को डेड इकॉनमी कहना महज राजनीति व भारत रूस के संबंधों के प्रति रोष से प्रेरित है, न कि आर्थिक तथ्यों पर आधारित।

टैरिफ रणनीति ट्रम्प की संरक्षणवादी नीति का हिस्सा रही

ट्रम्प की टैरिफ रणनीति का विकास पहले कार्यकाल के दौरान से ही उसके संरक्षणवादी नीति का हिस्सा रहा है। जिस दौरान उसने कट्टर एवं एकतरफा उलटफेर करने वाले आर्थिक निर्णय लिए जिसने भारत सहित दुनियाँ के कई महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था के साथ व्यापारिक समीकरण को नए सिरे से परिभाषित किया। ट्रम्प प्रशासन ने 2017 में जहां एक तरफ ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप (TPP) से खुद को अलग कर लिया, वहीं NAFTA को नए नियमों व शर्तों के साथ एक आधुनिक संस्करण ‘संयुक्त राज्य अमेरिका-मेक्सिको-कनाडा समझौते’ (USMCA) के रूप में प्रतिस्थापित किया था जो उसके प्रशासन की आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ अधिक संरेखित है। ट्रम्प का मानना था कि NAFTA अमेरिकी श्रमिकों और उद्योग के लिए अनुचित था। इसके अलावे ट्रम्प के संरक्षणवादी नीति व अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत कई देशों पर स्टील (25%) और एल्युमीनियम (10%) पर टैरिफ लगान, चीन के साथ व्यापार युद्ध (360 अरब डॉलर से ज़्यादा मूल्य के चीनी सामानों पर टैरिफ लगाने) से लेकर 2019 में भारत की सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (GSP) को समाप्त करना भी शामिल था, जिससे 5.6 अरब डॉलर का भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ था।

अमेरिकी टैरिफ नीति का कारण भारत रूस सम्बन्ध या भारत की व्यापर नीति

एक तरफ यह प्रतीत होता है की भारत के प्रति ट्रम्प के इस निर्णय का प्रमुख कारण रूस के साथ भारत की स्थायी रक्षा और ऊर्जा साझेदारी है, जिस पर अमेरिका लंबे समय से नज़र रख रहा है। खासकर यूक्रेन और अन्य क्षेत्रों में मास्को की कार्रवाइयों के बाद रूस को अलग-थलग करने के पश्चिमी देशों के निरंतर प्रयासों के बीच भारत का व्यापारिक सम्बन्ध के कारण व्यापारिक तनाव एवं उसमे अंतर्निहित कूटनीतिक चिंता के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि अमेरिका का यह रवैय्या उसके प्रति भारतीय व्यापार नीति को भी एक प्रमुख वजह के रूप में देखा जा सकता है। चुकि अमेरिका द्वारा जुर्माने की नीति के तहत वैसे भारतीय कंपनियों के उत्पादों को जो रूसी रक्षा या ऊर्जा क्षेत्रों से वित्तीय रूप से जुड़े हैं उन्हें बाज़ार पहुँच से वंचित होने, लाइसेंस में देरी, द्वितीयक शुल्क (25 % के व्यापक टैरिफ के अलावा अतिरिक्त 100 % तक के टैरिफ), निर्यात प्रतिबंध आदि जैसे परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।

दोनों देशों के बीच व्यापारपरक रणनीतिक टकराव के अन्य कारणों में डेटा संग्रहण नीति, GSP से भारत का निष्कासन, बायोमेडिकल व पेटेंट नीति एवं भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों के निर्यात पर उच्च शुल्क दर शामिल हैं।  भारत की नीति है कि उपभोक्ता डेटा भारत में ही स्टोर हो। अमेरिका की कंपनियां (जैसे अमेज़न, गूगल, वालमार्ट) इस नियम का विरोध करती हैं क्योंकि इससे उनकी संचालन लागत और नियंत्रण पर असर पड़ता है। अमेरिका ने 2019 में भारत को GSP से बाहर कर दिया था, जिससे भारत को कई उत्पादों पर शून्य शुल्क का लाभ नहीं मिल रहा। भारत चाहता है कि पुनः स्पेशल ट्रेड स्टेटस (GSP) का दर्जा बहाल हो, लेकिन अमेरिका इसके लिए भारत में अधिक बाजार पहुंच की मांग कर रहा है। अमेरिका भारत की बायोमेडिकल और पेटेंट नीति पर भी आपत्ति जताते आया है। खासतौर पर जेनेरिक दवाइयों को लेकर अमेरिका भारत की मुनाफा-आधारित पेटेंट प्रणाली के बजाय जन-स्वास्थ्य आधारित प्रणाली को प्राथमिकता देने से नाखुश रहा है। दरअसल अमेरिका चाहता है कि भारत अमेरिकी आईटी उत्पादों, कृषि वस्तुओं, और चिकित्सा उपकरणों पर टैरिफ (शुल्क) को कम करे, जबकि भारत घरेलू उद्योगों की रक्षा के लिए इन उत्पादों पर मौजूदा आयात शुल्क बनाए रखना चाहता है। ट्रंप ने भारत द्वारा कृषि उत्पादों पर 39%, और वनस्पति तेलों और सेब जैसी चुनिंदा वस्तुओं पर 45-50% औसत टैरिफ स्तरों को अनुचित करार दिया था। अगर दोनों देशों के रवैय्ये पर गौर करें तो यह मूल्यों और हितों का टकराव जैसा दिखाई देता है। ऐसे में आगे चलकर भारत को अंतरराष्ट्रीय दबाव और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन बनाना होगा।

अमेरिकी टैरिफ और पेनाल्टी घोषणा भारत के प्रति दोहरे मापदंड हैं 

हालांकि देखा जाए तो अमेरिका भारत के साथ दोहरे मापदंड अपना रहा है। तुर्की और मिस्र का रूस के साथ रक्षा संबंध, व जर्मनी का रूसी गैस अवसंरचना के साथ जुड़े होने के बावजूद भी अमेरिका का रवैय्या उनके प्रति सहयोगात्मक है। ट्रंप की घोषणा एक लेन-देन संबंधी कूटनीति का संकेत देती है, जहाँ आपसी सम्मान के माध्यम से सहयोग को बढ़ावा देने के बजाय, व्यापार के लाभ का इस्तेमाल राजनीतिक गुटबाज़ी हासिल करने के लिए किया जा रहा है। भारत के विपरीत, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान और आसियान सदस्य देशों ने अंतरिम समझौते किए हैं, जिनमें टैरिफ दरें 10% (ब्रिटेन), 15% (यूरोपीय संघ, जापान) या 19-20% (वियतनाम, इंडोनेशिया) तक सीमित हैं। इसके विपरीत, भारत को सबसे अधिक दरों में से एक 25% का सामना तो करना पड़ ही रहा है, साथ में रूस से सम्बद्ध भारतीय उद्द्योगों के सन्दर्भ में 100 प्रतिशत तक के अतिरिक्त जुर्माना की भी घोषणा की गयी है।

अमेरिकी टैरिफ नीति प्रभाव

वित्त वर्ष 2024-25 में, अमेरिका को भारत का निर्यात 110 अरब डॉलर को पार कर गया, जिसमें आईटी सेवाएँ, फार्मास्यूटिकल्स, परिधान, रत्न एवं आभूषण, और ऑटो पार्ट्स जैसे क्षेत्रों का दबदबा रहा। इस टैरिफ नीति से लगभग सभी भारतीय निर्यात श्रेणियाँ प्रभावित होने की संभावना है, जिनमें वस्त्र, रत्न एवं आभूषण (लगभग 10 अरब डॉलर का निर्यात), फार्मास्युटिकल्स और जेनेरिक दवाएँ, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो कंपोनेंट्स, समुद्री खाद्य पदार्थ आदि शामिल हैं। वैसे भारतीय उत्पाद जो अमेरिकी बाज़ार पर अत्यधिक निर्भर हैं उनके निर्यात लागत में वृद्धि होगी, जिससे वियतनाम, इंडोनेशिया एवं चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हमारी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है। ऐसे में अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता वाले उद्योगों को विविध बाज़ारों जैसे यूरोप, आसियान, लैटिन अमेरिका आदि की ओर रुख करना चाहिए जो भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती देगी।

ट्रम्प का विश्व-राजनीती से प्रेरित यह कदम रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में किये गए सामूहिक प्रयासों को भी हानि पहुंचाएगा। उसकी घातक व्यापार नीति और भारत को “डेड इकॉनमी” कहना दोनों देशों द्वारा क्वाड (Quad) मंच के माध्यम से चीन के बढ़ते प्रभुत्व को नियंत्रित करने के लिए विकसित किए गए हिंद-प्रशांत रणनीति के मूलभूत उद्देश्यों और रणनीतिक सहयोग की भावना के विरुद्ध है, जो अमेरिका और भारत के बीच लॉजिस्टिक्स सहायता सम्बंधित LEMOA, भू-स्थितिक एवं सैटेलाइट डाटा सम्बंधित BECA  और तकनीक और सुरक्षित संचार प्रणाली व साझा सैन्य कार्यक्रम सम्बंधित COMCASA जैसे रसद, तकनिकी एवं रक्षा सौदों के साथ यह चीन को घेरने की क्वाड रणनीति को भी निश्चित रूप से कमजोर करेगा। इन समझौतों का प्रभावित होना भारत के लिए कई दृष्टिकोण से नुकसानदायी हो सकता है, जैसे अमेरिका जहां LEMOA के तहत मिलने वाली लॉजिस्टिक सपोर्ट की लागत बढ़ा सकता है जिससे अमेरिकी रक्षा आपूर्ति (ईंधन, स्पेयर पार्ट्स) महंगे हो सकते हैं, वहीं ट्रम्प की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर कड़ी शर्तें और “Buy American” नीति COMCASA के अंतर्गत भारत को किये जाने वाले रक्षा उपकरणों की आपूर्ति को सीमित करने के साथ साथ रक्षा उपकरणों से सम्बंधित लाइसेंस शर्तें कठोर कर सकता है। यही नहीं बल्कि BECA के तहत भारत को अमेरिका द्वारा दिए जाने वाले सैटेलाइट एवं भूस्थितिक डाटा सहायता भी सीमित हो सकते हैं।

 

 

LEMOA इसके तहत भारत और अमेरिका की सेनाएँ एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों पर ईंधन, मरम्मत और रसद सहायता ले सकती हैं। दोनों सेनाएँ एक-दूसरे के ठिकानों पर ईंधन, मरम्मत और रसद सुविधा ले सकती हैं। यह समझौता साझा सैन्य अभियानों और मानवीय राहत में बहुत कारगर है।

 

 

COMCASA भारतऔर अमेरिका के बीचसुरक्षित सैन्य संचार प्रणालीसाझा करने का समझौताहै। इससेभारत को अमेरिकी रक्षाउपकरणों (जैसे पनडुब्बी, जहाज, विमान) मेंउपयोग की जाने वालीसुरक्षित संचार तकनीक काउपयोग करने की अनुमतिमिलती है।

 

BECA भारत और अमेरिका के बीच भू-स्थानिक जानकारी (geospatial intelligence) के आदान-प्रदान से संबंधित एक समझौता है। अमेरिका भारत को सैटेलाइट डेटा, समुद्री जानकारी और रियल-टाइम सैन्य नक्शे मुहैया कराता है। इससे सर्जिकल स्ट्राइक, मिसाइल टारगेटिंग, और ड्रोन ऑपरेशन जैसी सैन्य क्षमताओं में भारत को लाभ होता है। ECA भारत की सैन्य-संचालन सटीकता और निगरानी क्षमताओं को बढ़ाता है।

 

अमेरिका द्वारा टैरिफ लगाए जाने भारतीय व्यापार नीति में बदलाव तो तय है ही, साथ ही विश्व व्यापार सतह पर तनाव भी बढ़ेंगे। प्रमुख क्षेत्रों में भारतीय आपूर्तिकर्ताओं की लागत बढ़ेगी और जीडीपी वृद्धि दर में संभावित रूप से कमी आने की प्रबल संभावना है । टैरिफ व्यवस्थाओं में संरचनात्मक अंतर, गहराते भू-राजनीतिक विवाद और रुके हुए सौदे भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों की नाज़ुक प्रकृति को उजागर करते हैं। भारतीय निर्यातकों के लिए, आगे का रास्ता बाज़ार विविधीकरण, नीतिगत लचीलेपन और एक निष्पक्ष द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर निर्भर करता है। यह कदम कूटनीतिक सफलता का संकेत देता है या नहीं, यह देखना अभी बाकी है।

टैरिफ सुधारों की आड़ में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए व्यापार प्रतिबंध और ठीक उसी के एक दिन बाद पाकिस्तान के साथ व्यापारिक समझौते में विस्तार, भारत के भू-राजनीतिक संरेखण पर दबाव डालने के उद्देश्य से लिए गए निर्णय प्रतीत होते हैं। व्यापार विवादों को भारत के रूस संबंधों से जोड़कर, अमेरिका एशिया में एक महत्वपूर्ण साझेदार को अलग-थलग करने का जोखिम उठा रहा है। अमेरिका को दंडात्मक कार्रवाई के बजाय, आपसी हितों पर आधारित रचनात्मक कूटनीति, रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति सम्मान और रक्षा विविधीकरण पर संवाद दोनों देशों के लिए बेहतर होगा। भारत की बात करें तो इस व्यापार निर्भरताओं को पुनर्निर्धारित करने, बहुपक्षीय मंचों पर नेतृत्व स्थापित करने और एक अधिक आत्मनिर्भर, लचीला आर्थिक मॉडल गढ़ने का अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। इस विकसित होती व्यापारिक बिसात में भारत झुकता है, संतुलन बनाता है या संघर्ष करता है, यह देखना अभी बाकी है। एक बात स्पष्ट है: वैश्विक व्यापार के नियम एक बार फिर से लिखे जा रहे हैं और भारत को चतुराई से खेलने के लिए तैयार रहना होगा।


Spread the love! Please share!!
Dr. Sameer Shekhar

Dr. Sameer Shekhar is a distinguished academic and thought leader in the fields of International Business and Marketing. Currently serving as a Senior Assistant Professor at KIIT University, he brings deep expertise in trade, logistics, and digital marketing. A Ph.D. in Trade and Marketing from Banaras Hindu University (BHU) and a Post-Doctoral Fellow in Trade and Logistics from IIFT, Dr. Shekhar has consistently combined scholarship with practical insights on global commerce.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!