सस्ते श्रम व उत्पादन नहीं, नवाचार से बनेंगे विकसित भारत

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आज के वैश्विक युग में यह धारणा आम है कि यदि कोई देश बड़े पैमाने पर वस्तुओं का निर्माण करता है तो वह स्वतः समृद्ध हो जाएगा, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और कठोर है। केवल उत्पादन करना और दुनिया के लिए सस्ता श्रम उपलब्ध कराना किसी राष्ट्र को विकसित नहीं बनाता; विकसित राष्ट्र वही बनते हैं जो ज्ञान, नवाचार और बौद्धिक संपदा पर अधिकार रखते हैं। इस सच्चाई को समझने के लिए आईफोन का उदाहरण पर्याप्त है। चीन में एक आईफोन को असेंबल करने की लागत लगभग 10–15 डॉलर, यानी लगभग एक हज़ार रुपये होती है, जबकि वही फोन वैश्विक बाज़ार में 70 हज़ार से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक बिकता है। स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि शेष मूल्य कहाँ जाता है। इसका उत्तर स्पष्ट है, आईफोन का डिज़ाइन कैलिफ़ोर्निया में तैयार होता है, उसकी चिप ताइवान में बनती है, ऑपरेटिंग सिस्टम और सॉफ्टवेयर अमेरिका तथा भारत जैसे देशों के इंजीनियर विकसित करते हैं, और ब्रांड वैल्यू पश्चिमी कंपनियों के पास रहती है। अर्थात् वास्तविक मुनाफा उस देश को मिलता है जो सोचता है, नवाचार करता है और बौद्धिक अधिकारों का स्वामी होता है, न कि उस देश को जो केवल उत्पाद को जोड़ने का कार्य करता है।

सस्ते श्रम का भ्रम और क्रय-शक्ति की सच्चाई

भारत जैसे विकासशील देशों में दशकों तक यह मान्यता बनी रही कि हमारी सबसे बड़ी ताकत सस्ता श्रम है और इसी के आधार पर हमने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका तय की। प्रारंभिक दौर में इस रणनीति ने रोज़गार के अवसर तो दिए, लेकिन लंबे समय में यही सोच हमारी कम क्रय-शक्ति की सबसे बड़ी वजह बन गई। जब कोई अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कम मूल्य वाले कार्यों, जैसे असेंबली, पैकेजिंग या आउटसोर्सिंग पर निर्भर रहती है, तो वहाँ मजदूरी स्वाभाविक रूप से सीमित रहती है और आय में तेज़ वृद्धि संभव नहीं हो पाती। कम आय का सीधा असर घरेलू खपत पर पड़ता है, जिससे बाज़ार की मांग कमजोर रहती है और आर्थिक विकास की गति धीमी हो जाती है। इसका सबसे बड़ा दबाव मध्यम वर्ग पर पड़ता है, जो एक ओर बढ़ती महँगाई से जूझता है और दूसरी ओर सीमित वेतन वृद्धि के कारण अपनी जीवन-शैली और आकांक्षाओं को लगातार समेटने को मजबूर होता है। अर्थशास्त्र में इस स्थिति को “मिडिल इनकम ट्रैप” कहा जाता है, जहाँ कोई देश गरीबी से तो बाहर निकल आता है, लेकिन नवाचार और उच्च मूल्य सृजन के अभाव में विकसित अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज़ पर ही अटका रह जाता है।

समृद्ध वैश्विक अनुभव यह सिद्ध करता है कि किसी देश की आर्थिक शक्ति का आधार कम मजदूरी नहीं, बल्कि नवाचार, उत्पादकता और तकनीकी बढ़त होती है। अमेरिका, जर्मनी, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में औसत मजदूरी विश्व के सर्वोच्च स्तरों में है, फिर भी ये देश वैश्विक बाजारों में अग्रणी बने हुए हैं। इसका कारण यह है कि उनकी अर्थव्यवस्थाएँ केवल निर्माण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अनुसंधान एवं विकास (R&D), डिज़ाइन, ब्रांडिंग, पेटेंट, और उच्च मूल्य वर्धन पर आधारित हैं। उदाहरण के लिए, जर्मनी की “मिडलस्टैंड” कंपनियाँ अत्यधिक विशिष्ट तकनीकी उत्पाद बनाती हैं, जिनका कोई सस्ता विकल्प विश्व में उपलब्ध नहीं होता। इसी तरह, जापान और अमेरिका नवाचार के माध्यम से ऐसे उत्पाद और तकनीक विकसित करते हैं, जिनकी मांग मूल्य से अधिक गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर आधारित होती है। उच्च प्रति-श्रमिक उत्पादन (Labour Productivity) के कारण ये देश ऊँची मजदूरी देने के बावजूद प्रतिस्पर्धी बने रहते हैं और वैश्विक मूल्य श्रृंखला में शीर्ष स्थान पर होते हैं।

दक्षिण कोरिया का अनुभव विशेष रूप से भारत के लिए प्रेरक है। 1960 के दशक में दक्षिण कोरिया की प्रति व्यक्ति आय भारत के आसपास ही थी और उसके पास भी सीमित प्राकृतिक संसाधन थे। किंतु कोरिया ने दीर्घकालिक दृष्टि अपनाते हुए शिक्षा, विज्ञान, इंजीनियरिंग और तकनीकी कौशल को राष्ट्रीय विकास की धुरी बनाया। सरकार, उद्योग और विश्वविद्यालयों के बीच गहरा सहयोग स्थापित किया गया, जिससे अनुसंधान सीधे औद्योगिक उत्पादन और निर्यात से जुड़ सका। परिणामस्वरूप, सैमसंग, एलजी और हुंडई जैसी कंपनियाँ केवल सस्ते उत्पाद बनाने वाली इकाइयाँ नहीं रहीं, बल्कि वैश्विक तकनीकी ब्रांड बन गईं। आज दक्षिण कोरिया GDP का बड़ा हिस्सा R&D पर निवेश करता है और उच्च तकनीक वाले उत्पादों का निर्यात करता है। यह परिवर्तन इस बात का ठोस प्रमाण है कि सही नीति, निरंतर निवेश और नवाचार-केन्द्रित सोच से कोई भी देश सस्ते श्रम के जाल से निकलकर विकसित अर्थव्यवस्था बन सकता है।

वास्तविक संपत्ति: श्रम नहीं, ज्ञान

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस स्टुअर्ट ने अपनी पुस्तक The Wealth of Knowledge में स्पष्ट रूप से कहा है कि इक्कीसवीं सदी की अर्थव्यवस्था में असली पूंजी श्रम या प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि इंटेलेक्चुअल कैपिटल है, अर्थात् ज्ञान, नवाचार और कौशल। आज विश्व में वही देश आर्थिक रूप से समृद्ध और स्थिर हैं जो अनुसंधान एवं विकास में लगातार निवेश करते हैं, उच्च शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता मानते हैं और डिज़ाइन, पेटेंट, सॉफ्टवेयर तथा ब्रांड जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में नेतृत्व स्थापित करते हैं। इसी कारण जर्मनी अपनी उन्नत इंजीनियरिंग, दक्षिण कोरिया इलेक्ट्रॉनिक्स और तकनीक, जापान उच्च गुणवत्ता वाले विनिर्माण और अमेरिका वैश्विक नवाचार के क्षेत्र में अग्रणी बने हुए हैं। इन देशों की सफलता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था में वास्तविक संपत्ति हाथों की मेहनत से नहीं, बल्कि दिमाग की क्षमता से पैदा होती है।

केवल मैन्युफैक्चरिंग क्यों पर्याप्त नहीं है

केवल मैन्युफैक्चरिंग पर निर्भर रहना आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में किसी देश को समृद्ध बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। अमेरिकी शोधकर्ताओं ग्रेग लिंडन, केनेथ क्रेमर और जेसन डेड्रिक के प्रसिद्ध अध्ययन Who Profits from Innovation in Global Value Chains में यह तथ्य सामने आया है कि आईफोन की कुल वैल्यू में चीन की हिस्सेदारी दो प्रतिशत से भी कम है, जबकि अधिकांश मुनाफा उन देशों को जाता है जो उसके डिजाइन, सॉफ्टवेयर और ब्रांड के मालिक हैं। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि उत्पादन की मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण उत्पादन पर नियंत्रण और बौद्धिक अधिकार हैं। यह स्थिति केवल मोबाइल उद्योग तक सीमित नहीं है; फैशन, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बायोटेक जैसे हर आधुनिक क्षेत्र में वही देश अग्रणी हैं जो नवाचार को नियंत्रित करते हैं, न कि वे जो केवल श्रम प्रदान करते हैं।

विकसित भारत का रास्ता: शिक्षा और नवाचार

भारत के लिए विकसित राष्ट्र बनने का वास्तविक रास्ता शिक्षा और नवाचार से होकर गुजरता है। यदि भारत को सचमुच विकसित भारत बनाना है और आम नागरिक की क्रय-शक्ति में ठोस वृद्धि करनी है, तो नीतियों का केंद्र केवल उत्पादन बढ़ाने से हटाकर ज्ञान-आधारित विकास की ओर ले जाना होगा। वर्तमान में भारत उच्च शिक्षा और शोध पर अपनी सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.37 से 0.4 प्रतिशत ही खर्च करता है, जो वैश्विक मानकों की तुलना में अत्यंत कम है। इसके विपरीत चीन इस क्षेत्र में लगभग 1.2 प्रतिशत और अमेरिका 1.7 प्रतिशत से अधिक निवेश करता है, जबकि विकसित OECD देशों में यह अनुपात और भी ऊँचा है। शिक्षा और अनुसंधान में निवेश का यही अंतर तय करता है कि कौन देश भविष्य की तकनीक, उत्पाद और विचारों का निर्माता बनेगा और कौन केवल दूसरों द्वारा विकसित नवाचारों का उपभोक्ता बनकर रह जाएगा।

विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी

विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संस्थानों ने भी इस विषय पर बार-बार चेतावनी दी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट The Innovation Paradox स्पष्ट रूप से कहती है कि विकासशील देश नवाचार और उच्च शिक्षा में अपेक्षाकृत कम निवेश करते हैं, जबकि इन्हीं क्षेत्रों से मिलने वाला प्रतिफल सबसे अधिक होता है। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (UNCTAD) और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) लगातार यह रेखांकित करते रहे हैं कि कौशल विकास, अनुसंधान, तकनीकी शिक्षा और एक मजबूत स्टार्टअप इकोसिस्टम के बिना कोई भी देश वैश्विक अर्थव्यवस्था में केवल उपभोक्ता की भूमिका से बाहर निकलकर मूल्य सृजन करने वाला राष्ट्र नहीं बन सकता।

डिजिटल भारत से डिज़ाइन भारत की ओर जाने का समय

डिजिटल भारत की उपलब्धियों के बाद अब देश के सामने अगला और कहीं अधिक निर्णायक लक्ष्य “डिज़ाइन भारत” की ओर बढ़ना है। भारत के पास आज एक ऐतिहासिक अवसर मौजूद है, एक विशाल युवा जनसंख्या, तेजी से मजबूत होता डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक टेक कंपनियों की सक्रिय उपस्थिति। लेकिन केवल कोड लिखना या सेवाएँ देना ही किसी राष्ट्र को तकनीकी महाशक्ति नहीं बनाता। इसके लिए डिज़ाइन, डेवलपमेंट, डिस्कवरी और डिस्रप्शन—इन चारों क्षेत्रों में नियंत्रण आवश्यक है। जब तक भारत अपने सेमीकंडक्टर और चिप्स स्वयं विकसित नहीं करेगा, अपनी तकनीकों पर पेटेंट नहीं लेगा, अपनी यूनिवर्सिटीज़ को वास्तविक रिसर्च हब में परिवर्तित नहीं करेगा और उद्योग तथा शिक्षा के बीच गहरी साझेदारी स्थापित नहीं करेगा, तब तक देश की अर्थव्यवस्था उच्च मूल्य सृजन की ओर नहीं बढ़ पाएगी और आम नागरिक की क्रय-शक्ति सीमित ही बनी रहेगी।

नीति-निर्माताओं के लिए संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि वास्तव में विकसित भारत के सपने को साकार करना है, तो सोच और प्राथमिकताओं में बुनियादी बदलाव करना होगा। शिक्षा को अब केवल सरकारी खर्च के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय निवेश के रूप में देखना होगा। नवाचार को केवल स्टार्टअप संस्कृति तक सीमित रखने के बजाय उसे उद्योग, कृषि, स्वास्थ्य और शासन जैसे सभी क्षेत्रों तक विस्तार देना होगा। इसके साथ ही अनुसंधान एवं विकास को सरकारी और निजी, दोनों स्तरों पर संगठित और निरंतर समर्थन देना अनिवार्य है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि युवाओं को केवल नौकरी खोजने के लिए तैयार करने के बजाय उन्हें नौकरी सृजित करने वाला, नवाचार करने वाला और मूल्य पैदा करने वाला बनाना होगा, क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी की रचनात्मक क्षमता पर ही टिका होता है।

हाथ नहीं, दिमाग राष्ट्र बनाते हैं

भारत की विशाल युवा आबादी तभी राष्ट्रीय संपदा बन सकती है, जब वह कुशल, नवाचारी और तकनीक-सक्षम हो। बीते दशकों में भारत ने सॉफ्टवेयर, फार्मास्यूटिकल्स, अंतरिक्ष और डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों में यह सिद्ध किया है कि जहाँ ज्ञान और नवाचार को बढ़ावा मिला, वहाँ भारत ने वैश्विक नेतृत्व किया। ISRO का कम लागत में सफल अंतरिक्ष मिशन, भारत का वैश्विक दवा आपूर्ति में अग्रणी स्थान और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (UPI, Aadhaar) इस बात के उदाहरण हैं कि भारत की ताकत सस्ते श्रम में नहीं, बल्कि उच्च बौद्धिक क्षमता और नवाचार में निहित है।

आज जब विश्व चौथे औद्योगिक क्रांति में प्रवेश कर रहा है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रों का निर्माण केवल हाथों की मेहनत से नहीं, बल्कि दिमागों की शक्ति से होता है। कम लागत वाला श्रम भारत को वैश्विक मानचित्र पर तो ले आया, लेकिन नवाचार और शिक्षा ही उसे उस मानचित्र का स्वामी बना सकते हैं। आज आवश्यकता है हाथों की तुलना में दिमागों में अधिक निवेश करने की, निर्माण से आगे बढ़कर सृजन को प्राथमिकता देने की और सस्ते उत्पादन की मानसिकता से बाहर निकलकर उच्च गुणवत्ता सृजन की दिशा में कदम बढ़ाने की। यदि भारत को अपनी जनता की क्रय-शक्ति में वास्तविक वृद्धि करनी है और देश को सच अर्थों में विकसित बनाना है, तो शिक्षा और नवाचार को केवल नीति का हिस्सा नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आंदोलन बनाना ही होगा, क्योंकि राष्ट्र भविष्य को जोड़कर नहीं, बल्कि भविष्य को गढ़कर विकसित होते हैं।


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Dr. Shivesh Pratap

Shivesh Pratap is a management consultant, author, and public policy analyst, having written extensively on the policies of the Modi government, foreign policy, and diplomacy. He is an electronic engineer and alumnus of IIM Calcutta in Supply Chain Management. Shivesh is actively involved in several think tank initiatives and policy framing activities, aiming to contribute towards India's development.

https://visionviksitbharat.com

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