आपातकाल में मेरठ आए थे रज्जू भैया | आपातकाल का स्मरण

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मेरठ l 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी l आपातकाल की घोषणा होते ही सभी विपक्षी राजनीतिक दलों के छोटे बड़े नेताओं को जेल में दिया गया था l राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूरे देश के कार्यालयों में छापे मारकर सभी प्रचारकों, अधिकारी, कार्यकर्ता जो भी कार्यालय पर मिले सबको जेल में डाल दिया गया था l देशभर के सभी संघ कार्यालयों पर ताले लग गए थे l
मेंने इसी साल देवनागरी इंटर कॉलेज से इंटर की परीक्षा पास की थी l उम्र होगी 17 -18 साल l हम उस समय आनंदपुरी की बीच वाली गली में रहते थे l हमारे साथ पढ़ने वाले बहुत से जैन लड़के जैन बोर्डिंग हाउस रेलवे रोड पर रहते थे l बोर्डिंग हाउस में उस समय दो राकेश जी जैन रहते थे l एक अमीनगर सराय वाले और दूसरे सरधना वाले l और दोनों ही शायद महानगर स्तर पर कार्यरत थे l उस समय मैं सायं शाखा का मुख्य शिक्षक था l देवेंद्र गोयल ब्रह्मपुरी वाले मेरे मित्र थे l जो शायद उस समय महानगर के शारीरिक प्रमुख थे l और मोटरसाइकिल पर घूमा करते थे l
आपातकाल में हम दोनों रात को 9.00 बजे बाद मोटरसाइकिल पर निकलते थे l देवेंद्र जी मोटरसाइकिल चलाते थे l और उनके पीछे मैं राष्ट्रदेव और पोस्टर जो हम हाथ से काली स्याही से लिखकर बनाते थे को कमीज के अंदर डालकर और हाथ में लई का छोटा सा डब्बा और कपड़ा लेकर बैठा करता था l पोस्टर और राष्ट्रदेव को सार्वजनिक स्थानो की दीवारों पर चिपकाया करते थे l हमारा काम देर रात तक चलता था l मैं आनंदपुरी में बाहर वाले कमरे में सोता था ,और उसी कमरे में स्टोव पर पतली लई बनाकर एक डिब्बे में ले लेते थे l हमने कई बार घंटाघर, रेलवे रोड थाने की दीवारों, जैननगर पार्क , स्कूल और स्टेशन ,आनंदपुरी ,जैन नगर,देवपुरी , प्रेमपुरी, शांतिनगर,ईदगाह की दीवारो , रेलवे रोड , पर आपातकाल के विरुद्ध पोस्टर बनाकर चिपकाते थे l 15 अगस्त को बेगम पुल चौराहे पर शास्त्री की मूर्ति के पास आपातकाल के विरोध में हम लोगों ने जनता को पर्चे और राष्ट्रदेव बाटें और चिपकाए थे l पुलिस के आने पर हम सब भाग गए थे l इसमें लाल कुर्ती के राजेश जी भी साथ थे l और शायद उनकी साइकिल भी टूट गयी थी l इस काम में शायद महेन्द्र जी खंदक ,देवेन्द्र जी और मैं स्वयं,रजनीकांत जी प्रेमपुरी, अखिलेश जी सदर ,और महानगर के कई अन्य कार्यकर्ता भी थे l सभी के नाम याद नहीं हैं l

आपातकाल में नियमित रूप से शाखा लगती रहीं l पर शाखा का स्वरूप बदल गया था l देव नागरी इंटर कॉलेज में तो कभी डिग्री कॉलेज के मैदान में वॉलीबॉल खेला करते थे l जिसमें आपातकाल में सारे शहर में काम करने वाले मुख्य कार्यकर्ता आते थे l पूरे शहर में कुल मिलाकर 15-20 ही स्वयसेवक कार्यरत थे l वहीं पर राष्ट्रदेव सबको दे दिया जाता था l और अगली बैठक के स्थान और समय की सूचना भी हो जाती थी l सबके नाम तो मुझे याद नहीं पर कुछ के नाम याद है l दोनो राकेश जी, रजनीकांत जी, महेन्द्र जी, अखिलेश जी, देवेन्द्र जी, मैं स्वयं, राजेश जी, अजय जी आदि होते थे l महेंद्र जी का निवास खंदक में था l और उनके यहां कई बैठके हुई l हमारी शाखा में कभी-कभी ज्योति जी भी आते थे l जिन्हें बाद में गिरफ्तार कर लिया गया था l एक और अन्य कार्यकर्ता कैलाश जी उर्फ माधव जी जो उस समय मेरठ विश्वविद्यालय के हॉस्टल में रह रहे थे l महानगर का कार्य देख रहे थे l कभी-कभी शाखा और बैठकों में आते थे l
आपातकाल में हमने राष्ट्रदेव निकाला l हमारे पास पूरे शहर की जो खबरें आती थी l उनको हम एक स्टैंसिल पर हाथ से लिखकर साइक्लोस्टाइल कर लेते थे l जिसमें हम आपातकाल के विभिन्न समाचार और सरकार के अत्याचारों की पोल खोलते थे l और पूरे शहर में अपने कार्यकर्ताओं में बांट देते थे l यह काम लाला के बाजार में सत्य प्रकाश जी अग्रवाल किताब वालों के घर में होता था l गली में अंदर जाकर उनका मकान था l मकान के अंदर एक तहखाना का कमरा बना हुआ था l उसी में साइक्लोस्टाइल मशीन लगी थी l शायद उसी गली में जतन स्वरूप जी का भी मकान था l जिन्हें बाद में गिरफ्तार कर लिया गया था l

मैं स्वयं राष्ट्रदेव को देने के लिए जैन नगर में रोशन लाल जी जैन, केदारनाथ जी जैन , प्रेमपुरी में मानक चंद जैन और आनंदपुरी में राजवीर जी और भी कई लोगों के यहां देने जाता था l जैन नगर, आनंद पुरी, देव पुरी, शांति नगर, रेल्वे रोड में भी यह जिम्मेदारी मेरी ही थी l कुछ लोग मुझे देखकर डर भी जाते थे l और पूरा दरवाजा नहीं खोलते थे l राष्ट्रदेव पकड़कर तुरंत दरवाजा बंद कर देते थे l कुछ लोगों के नाम मुझे याद नहीं है l पर यह काम मैं अंधेरा होने के बाद शाम को करता था l
मेरे पिताजी रक्षा लेखा विभाग (सीडीए) में थे l मेरे चक्कर में उनकी नौकरी पर कोई आंच ना आ जाए l पिताजी को तो शायद ज्यादा खबर नहीं थी l पर मेरे बड़े भाई शरत चंद जी को कुछ-कुछ शक था की यह कुछ गड़बड़ करता है l और एक दिन मेरी पोल खुल गई l उस समय मेरे नाना जी प्रेमपुरी गली नंबर एक में अकेले रहा करते थे l मैं उनके यहां नियमित जाया करता था l और एक दिन मैंने अपनी कमीज के अंदर से निकाल कर नाना जी को राष्ट्र देव की प्रति दे दी l उसे देखते ही वह भड़क गए l क्या करता फिर रहा है कहां से लाया है य़ह ? मुझे खूब डांट लगाई और गालियां दी l घर पर भी आकर बता दिया l घर पर भी मुझे खूब डाट लगी l पिताजी की भी और भैया की भी l
देवेंद्र गोयल का मकान तो ब्रह्मपुरी में था , पर उनकी आढ़त की दुकान साबुन गोदाम में थी l और आपातकाल में वे ज्यादातर वहीं पर सो जाया करते थे l कई बार हम लई गोदाम पर ही बना लिया करते थे l सर्दियों के दिनों में जल्दी दिन छिप जाता था l और नौ बजते बजते सुनसान हो जाता था l उसके बाद अपना काम करने में हमें आसानी रहती थी l और हम लोग देर रात तक पोस्टर चिपकाने का काम करते थे l हम पोस्टर चिपकाने के लिए रोजाना नहीं निकलते थे l हफ्ते में अलग-अलग दिन अलग क्षेत्र मे यह काम किया जाता था l राष्ट्रदेव भी हफ्ते में एक बार ही निकालते थे l साबुन गोदाम से रेलवे रोड आने के लिए हम लोग ज्यादातर रेल की पटरी के साथ वाले रास्ते का प्रयोग करते थे l हमें यह भी ध्यान रखना पड़ता था की खुफिया विभाग का कोई कर्मचारी हमारे पीछे ना लगा हुआ हो l कई बार ऐसा सच में हुआ तो हमने अपना रास्ता बदल उसे चकमा दिया l मैं बाहर के कमरे में सोता था l तो चुपचाप दरवाजे को बंद कर ,लाइट बंद कर देवेंद्र जी के साथ निकल जाया करता था l और पोस्टर लगाने का काम करते थेl
एक दिन की बात है बर्फ खाने वाली गली में साइकिल से पैदल ही जा रहा था l तभी मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रख दिया l चश्मा लगाए हुए पेंट शर्ट पहने हुए जब ध्यान से देखा तो यह मान्य ज्योति जी थे l वे हमेशा धोती कुर्ता पहनते थे l पर अब उनका स्वरूप पूरा बदल गया था l उनको आसानी से नहीं पहचाना जा सकता था l मैं रुकने को हुआ तो बोले जैसे चल रहे थे वैसे ही चलते रहो l फिर उन्होंने कुछ बातें बताई और कुछ दिशा निर्देश दिए और चले गए l

हमें बताया गया कि हमारे क्षेत्र में कुछ विशेष संघ के बड़े लोगों की बैठक होनी है और इस बैठक की सुरक्षा और व्यवस्था हम लोगों को करनी थी l उस समय पुलिस की जीप स्टेशन से घंटाघर तक नियमित रूप से घूमती रहती थी l पुलिस के लोग तो कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं कर रहे हैं हमें यह ध्यान रखना था l आने वाली गाड़ी का मॉडल और रंग बता दिया गया l हमें गाड़ी को कहां पहुंचाना था l उसके लिए थोड़ी-थोड़ी दूरी पर हम तीन जनों को खड़ा कर दिया गया था l किसी के हाथ में छाता था l किसी के हाथ में लाल रुमाल l किसी के सिर पर टोपी l और जो गाड़ी चालक था उसको भी ऐसा पहले से ही बता दिया गया होगा l सड़क पर एक स्वयं सेवक छाता लेकर खड़ा होगा वह आपको दिशा देगा ,तो दूसरे मोड पर टोपी पहने हुए कोई खड़ा होगा, और जो गंतव्य है वहां पर रुमाल लिए कोई खड़ा होगा l सबसे पहले हमें देखना था कि वहां पर कोई पुलिस की या इंटेलिजेंस वालों की हल-चल तो नहीं है l उसके बाद ही हमें गाड़ी को क्लीयरेंस देनी थी l आखिर में जब हमने देखा की काफी देर से पुलिस कोई गाड़ी नहीं आ जा रही और खुफिया विभाग का कोई कर्मचारी भी नहीं घूम रहा l तो हमने गाड़ी को आने की clearence दी l उसके बाद बर्फखाने और जैन बोर्डिंग से होती हुई गली नंबर दो प्रेमपुरी में गाड़ी सीधी मानक चंद जैन के घर में प्रवेश कर गयी l मानक चंद जी का घर बहुत बड़ा था l और बहुत बड़ा गेट था l इशारा मिलते ही गेट को पूरा खोल दिया गया था l और गाड़ी के प्रवेश करते ही गेट को बंद कर दिया गया था l मानक चंद जी धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और उन्होंने घर में जैन मंदिर बनाया हुआ था l उनके घर के पीछे एक गली की जो गली नंबर एक में निकलती थी l ऊपर वाले हाल में बैठक होनी थी l जिसमें रज्जू भैया जो उस समय शायद अखिल भारतीय सह सरसंघचालक थे और तीन चार अन्य अखिल भारतीय अधिकारी थे जिनके नाम याद नहीं है, कुल मिलाकर शायद चार लोग बाहर से आये थे, बाकी हम मेरठ के राकेश जैन सराय वाले, एक दो अन्य अधिकारी, मानक चंद जी, मैं स्वयं थे l जिनकी सेवा करने का हमें मौका मिला और उनको चाय नाश्ता और खाना खिलाया l उधर घर के बाहर गली में रेलवे रोड पर बर्फ खाने तक और जैननगर तिराहे तक कुछ स्वयंसेवक लगातार घूमते रहे कि कहीं कोई खतरा न हो l पुलिस की एक मोबाइल वेन बोर्डिंग के सामने काफी देर से खड़ी थी l बैठक समाप्त होने के बाद प्रेमपुरी की गली नंबर एक से गाड़ी में बैठाकर सभी को निकाला गया l गली एक और दो के बीच कई छोटी गलियां दोनो को जोड़ती हैं l

आपातकाल में भी गुरु दक्षिणा के कार्यक्रम पूरे शहर में करवाए गए थे l प्रहलादनगर में होने वाली गुरु दक्षिणा की जिम्मेदारी मुझ पर डाली गई थी l और मैंने जैन नगर, आनंदपुरी, देवपुरी,प्रेम पुरी, शांति नगर, सभी क्षेत्रों की गुरु दक्षिणा गुप्त रूप से अलग-अलग जगह पर करवाई गई थी l जब दर्शन लाल जी अरोड़ा गिरफ्तार हुए तो उनके घर पर देखभाल का काम भी किया l घर का राशन लाकर देते थे l आटा पिसवाना, घर का सामान लाना, सब्जी लाना आदि काम हम लोग करते थे l हफ्ते में एक चक्कर जरूर लगाते थे l अशोक जी डेरी वाले जैन नगर पार्क की प्रभात सुबह की शाखा के मुख्य शिक्षक थे l वे भी साथ में काम करवाते रहते थे l नरेंद्र तनेजा जी भी दर्शन जी के सामने देवपुरी में ही रहते थे l और हम लोगों को सहयोग निर्देश देते थे l हम लोग भी उस समय देखभाल कर चलते थे कि कहीं कोई खुफिया कर्मी हमारा पीछा तो नहीं कर रहा l शहर में होने वाली हलचलों की खबर रोजाना ही मिल जाती थी l ज्योति मेडिकल बेगमपुल से रामलाल जी को गिरफ्तार किया गया था l पता लगा कि रामलाल जी ने डीएम के कमरे में बैठे-बैठे कार्यकर्ताओं की जो सूची उनके पास थी उसको मुंह में चबाकर खा लिया था l जिससे मेरठ महानगर के लगभग पचास कार्यकर्ता गिरफ्तारी से बच गए l यह सुनने में आया था की जेल के अंदर के पुलिस प्रशासन स्वयं सेवकों के साथ बहुत बुरा व्यवहार कर रहा था l उनके साथ मारपीट की जाती थी l प्रताड़ित किया जाता था l और सुनने में आया कि कुछ लोगों के नाखून भी उखाड़ दिए गए थे l आपातकाल में अंग्रेजी मानसिकता से ग्रस्त कांग्रेस सरकार के आतंकवाद की य़ह पराकाष्ठा थी l प्रशासन के अत्याचारों के विरोध में जेल में बंद नेताओं और स्वयं सेवकों ने भूख हड़ताल और आंदोलन किया था l तब जाकर प्रताड़ना बंद हुई थी l
बात पचास साल पुरानी हो चुकी है l जितनी याद थी लिख दी है l कुछ कम या ज्यादा लिखा गया हो उसके लिए मैं आप सभी लोगों से क्षमा मांगता हूं l उस समय के साथियों से अनुरोध करता हूं कि वह भी अपनी आप बीती लिखकर शेयर करें l

वैसे तो कई वर्षों से आपातकाल की यह कहानी लिखने का विचार मन में आया पर लिख नहीं पाया था l पर आपातकाल के पचास साल होने पर अपनी धुंधली यादों से उपरोक्त वर्णन लिखा है l आपातकाल में एक कैलाश जी उर्फ माधव जी के नाम से विश्वविद्यालय के हॉस्टल में रहते थे l वहीं मुख्य रूप से मेरठ महानगर का काम देख रहे थे l राज्यों में और देश में भाजपा सरकार आने पर आपातकाल में बंदी बनाए गए सभी स्वयंसेवको नेताओं को लोकतंत्र सेनानी का सम्मान दिया गया l और उनको पेंशन भी दी जा रही है l पर आपातकाल में जमीन पर जाकर निरंतर काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहीं लेखा-जोखा या कोई पूछ नहीं है l ना हीं उनका कहीं कोई सम्मान किया गया l संघ अधिकारियों को यह सोचना चाहिए की जो आपातकाल में जेल नहीं गए और बाहर रहकर आपातकाल का निरंतर विरोध करते रहे कार्य करते रहे और देश की जनता को जीवंत बनाए रखा उनकी पहचान कर उन्हें ” लोकतंत्र के योद्धा ” का सम्मान दिलाना चाहिए l

 


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Ativir Jain

श्री अतिवीर जैन जी मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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