भारत, अपनी विशाल भूगोल-सामाजिक विविधता के बावजूद, एक मजबूत राष्ट्रीय एकता को संजोए हुए रहा है। इसमें न केवल विविध भाषा-भाषी, सम्प्रदाय-समुदाय और संस्कृति-संपन्न लोग शामिल हैं, बल्कि एक गंभीर और अक्षुण्ण सांस्कृतिक-सामाजिक धारा भी मौजूद है जो हमें एक-दूसरे से जोड़ती है। इस संदर्भ में भारतीय संविधान एक कानूनी दस्तावेज से अधिक प्राचीन भारत और आधुनिक भारत के बीच एक सेतु के रूप में खड़ा हुआ है, जहाँ सनातन संस्कृति की मूल अवधारणाएँ जैसे करुणा, समता, भ्रातृत्व, सर्वधर्म-सामभाव, वसुधैव कुटुम्बकम् आदि संविधान के मूल में समाहित हैं।
प्राचीन भारत की संस्कृति और संविधान के मूल्यों का संगम
प्राचीन भारत में धार्मिक-दार्शनिक परिप्रेक्ष्य से मानव-समाज को देखा गया, जहाँ कर्म, संस्कार, समता, अहिंसा, एवं बहुलता-सहिष्णुता के सिद्धांत प्रमुख थे। उदाहरण के लिए “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना सिर्फ वैश्विक दृष्टि नहीं, बल्कि सामाजिक अंतःकरण की सहज अनुभूति थी। इस प्रकार- हमारी संस्कृति ने विविधता में एकता को एक स्वभावतः स्वीकार्य स्थिति माना।
भारतीय संविधान ने इन प्रवृत्तियों को अपनी संरचना में समाहित किया। संविधान के प्रस्तावना में …हम, भारत के लोग कहने के साथ हम सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, धर्म एवं उपासना की स्वतंत्रता, अवसर की समता के साथ ऐसे भ्रातृत्व विकसित करने की बात करते हैं जिससे व्यक्तिगत गरिमा सुनिश्चित हो सके तथा राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता स्थापित हो सके। यह स्पष्ट बताता है कि संविधान हेतु “स्वतंत्रता- समानता-बंधुत्व” ये तीन स्तम्भ हैं।
भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व के सिद्धांतों को न केवल कानूनी प्रावधानों के रूप में, बल्कि सामाजिक नैतिकता के रूप में स्थापित किया है। संविधान ने समानता की गारंटी दी है की “प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता का अधिकार है” और “किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा” (अनुच्छेद 14-15)। इसी प्रकार, संविधान ने विविध धर्मों, आस्थाओं और संस्कृतियों के प्रति समभाव और सम्मान को प्रोत्साहित किया है। अनुच्छेद 25 नागरिकों को “धर्म की स्वतंत्रता” प्रदान करता है और राज्य को धर्म-निरपेक्ष बने रहने की दिशा में मार्गदर्शन देता है। इसके अतिरिक्त, संविधान के अनुच्छेद 51-ए में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों को निर्धारित किया गया है जिनमें “राष्ट्र की एकता और अखण्डता की रक्षा करना”, “साम्प्रदायिक, भाषाई और क्षेत्रीय भेदभाव से ऊपर उठना” तथा “सामाजिक भ्रातृत्व को विकसित करना” जैसे उद्देश्यों को प्रमुखता दी गई है। इन प्रावधानों के माध्यम से भारतीय संविधान ने प्राचीन भारतीय जीवन-दर्शन की मूल भावनाओं जैसे सहनशीलता, करुणा, समानता और विविधता में एकता को आधुनिक संवैधानिक ढांचे में सशक्त रूप से स्थापित किया है।
संविधान = आधुनिक भारत का अभिभाषक-मंच
संविधान ने भारत को एक राष्ट्र-राज्य के रूप में आकार दिया है जिसमें राज्यों की संघ-व्यवस्था, एक नागरिकता, एक राष्ट्रीय बाजार, एक न्याय-प्रणाली तथा एक सार्वभौमिक संवैधानिक छत्र-मंडल मौजूद है। उदाहरण के लिए संविधान के आठवें अनुसूची में 22 भाषाएँ सूचीबद्ध हैं। इसके अतिरिक्त, संविधान ने “एक देश-एक बाजार” की दिशा में भी कदम उठाया है, उदाहरण के लिए संविधान का अनुच्छेद 301 व्यापार में स्वतंत्रता देता है। इस प्रकार, संविधान ने आधुनिक भारत में इस तरह की संरचना दी है जो विविध राज्यों-भाषाओं-समुदायों को एक साझा राष्ट्रीय मंच पर लाती है और इस साझा मंच के भीतर विविधता को सम्मानित करती है। इसे हम कह सकते हैं की संविधान ने प्राचीन संस्कृति के समावेशी भाव को आधुनिक भारत की संवैधानिक व्यवस्था में स्थान दिया।
सामाजिक सूत्र और राष्ट्रीय एकता
संविधान ने केवल कानूनी अधिकार नहीं दिए बल्कि एक सामाजिक सूत्र स्थापित किया जहाँ प्रत्येक नागरिक को “हम-भारतवासी” की भावना का अनुभव हो। सामाजिक सद्भाव-भाव, विविधता-स्वीकृति और मिली-जुली पहचान को संवैधानिक मान्यता मिली है। इस दृष्टि से संविधान ने “बहु-संस्कृति में एकता”(Unity in Diversity) का स्वरूप कानूनी-संस्थागत रूप में स्थापित किया है। उदाहरणस्वरूप: नागरिकों को यह कर्तव्य सौंपा गया है कि वे “भारत के समृद्ध सांस्कृतिक-विरासत को संरक्षित करें तथा सभी प्रकार की सांप्रदायिक, भाषाई एवं क्षेत्रीय विभाजनकारी प्रवृत्तियों से ऊपर उठें।” यह सामाजिक-धारा विशेष रूप से भारत जैसे गौण-भाषाई-समाज वाले देश में राष्ट्रीयता की मजबूत नींव बनती है। संविधान का यह सामाजिक-संदेश “मैं-भिन्न हूँ लेकिन हम-एक हैं” का मूल बनाए रखता है।
संविधान का राष्ट्रीय एकता के प्रति योगदान
- भाषाई एवं सांस्कृतिक समावेशन : भारत में 29 से अधिक राज्य एवं संघ-शासित प्रदेश, 7 हजार से अधिक जातियां, 100 + भाषाएँ एवं बोलियाँ हैं। संविधान ने इन सभी को सिर्फ स्वीकार नहीं किया, बल्कि संवैधानिक तौर-पर संरक्षित किया। उदाहरण के लिए, भाषाई विविधता को संरक्षित करने हेतु विभिन्न संस्थागत प्रावधान किए गए।
- सामाजिक न्याय एवं समता–प्रवर्तन : संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त किया (अनुच्छेद 17) तथा पिछड़ों, अनुसूचित जाति-जनजाति को विशेष प्रावधान दिए। ये न सिर्फ सामाजिक समावेशन की दिशा हैं, बल्कि राष्ट्रीय एकता को मज़बूती देते हैं, क्योंकि अलग-थलग पड़ने की भावना को कम करते हैं।
- संघ–राज्य समन्वय एवं अखण्डता : संविधान ने “भारत संघ” को एक अखण्ड इकाई के रूप में देखा है और संघवाद के साथ एकात्मता को प्राथमिकता दी है।
वैश्विक दृष्टि से भारत का उदाहरण
आज अन्य देशों में धार्मिक-भाषाई विभाजन, अलगाववादी वृत्तियाँ बढ़ रही हैं। ऐसे समय में भारत का संवैधानिक मॉडल एक प्रासंगिक उदाहरण प्रस्तुत करता है। पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद का कहना है कि भारतीय संविधान की “धर्म-निरपेक्षता” तथा “विविधता में एकता” की दृष्टि, हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक आचरण में अंतर्निहित है। तथ्य यह है कि 1950 से अब तक 75 वर्षों से भी अधिक समय से संविधान सफलतापूर्वक काम कर रहा है, इसे सफल संस्थागत रचना सिद्ध करता है।
हालाँकि, संविधान आधारित एकता के मार्ग में चुनौतियाँ भी हैं जैसे क्षेत्रीय असमर्थता, भाषाई संघर्ष, जाति-भेद, धार्मिक उथल-पुथल आदि। लेकिन इन चुनौतियों का सामना संविधान के मूलतः समावेशी, न्याय-मूलक, भ्रातृत्व-प्रधान सिद्धांतों के द्वारा किया जाता है। उदाहरण के लिए संविधान की मूल “बुनियादी संरचना” में एकता एवं अखण्डता को स्थान मिला है। नागरिकों में इस राजकीय-सामाजिक धारा की समझ बढ़े, विविधता में एकता का भाव गहरा हो और संविधान-निर्देशित मूल्यों को व्यवहार-स्तर पर अपनाया जाए।
भारतीय संविधान केवल एक शासकीय आदेश मात्र नहीं है, यह भारत की आत्मा से आधुनिक भारत को जोड़ने का एक सेतु है जो प्राचीन मूल्यों (करुणा, समता, भ्रातृत्व, विविधता-स्वीकृति) को आधुनिक भारत की संरचना में प्रतिष्ठित करता है। यही कारण है कि संविधान भारतीय-राष्ट्रीय एकता का स्तंभ होने के साथ वैश्विक दृष्टि से परिपक्वता का उदाहरण बन रहा है। तमाम देशों हेतु भारत का संवैधानिक-मॉडल प्रेरणा-स्त्रोत है। भारतीय संविधान हमारे प्राचीन-आधुनिक दर्शन का प्रतिनिधि, हमारे सामाजिक-शृंखला का अखंड सूत्र और हमारी राष्ट्रीय एकता का अभिभाषक है।