युद्धकाल का संकट, राजनीति और नागरिक कर्तव्य

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अमेरिका -इजराइयल और ईरान युद्ध को प्रारंभ हुए 15 दिन का समय व्यतीत हो चुका है और अभी भी युद्ध का दायरा बढ़ ही रहा है। खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध और आक्रामकता के कारण संपूर्ण विश्व में तेल और गैस की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। अन्य आवश्यक उत्पादों के जहाजों की आवाजाही भी प्रभावित हो रही है। विश्व के तमाम देशों की सरकारें एवं विपक्षी दल कदम से कडम मिलाकर तेल, गैस व ऊर्जा संकट, आर्थिक अनिश्चितता तथा कार्यालयों के पलायन के कारण उत्पन्न हो रहे संकट का सामना कर रहे हैं। सभी देशों में सत्तापक्ष व विपक्ष मिलजुल कर कर रहे हैं वहीं भारत में विपक्ष इस संकट का उपयोग अपने ही देश को नीचा दिखाने के लिए कर रहा है।
भारत में इस युद्ध तथा उससे उपजे वैश्विक संकट पर अलग ही राजनीति हो रही है। जब से युद्ध आरम्भ हुआ है भारत में लखनऊ से लेकर श्रीनगर और जम्मू कश्मीर के बडगाम जिले तक अमेरिका -इजराइल के खिलाफ आक्रोश व्यक्त करने के लिए आक्रामक विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। विरोध प्रदर्शन कर रहे इन लोगों ने पहले कभी भारत में होने वाले आतंकवादी हमलों निंदा तक नहीं की है। विपक्ष में बैठे राजनीतिक दल तथा उनके नेता इन प्रदर्शनों को हवा दे रहे हैं। कांग्रेस पार्टी की श्रीमती सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे आदि सरकार की विदेश नीति के खिलाफ अनवरत लेख लिख रहे हैं और किसी न किसी बहाने प्रधानमंत्री मोदी की छवि को नुकसान पहुंचाने के प्रयास कर रहे हैं।
युद्धकाल के कारण पूरी दुनिया में आपूर्ति व्यवस्था बाधित हो जाने के कारण तेल, गैस व अन्य उत्पादों की कीमतों में वृद्धि हो रही है। चीन, जापान, कोरिया जैसे समृद्ध देश और पाकिस्तान ,बांग्लादेश व श्रीलंका जैसे हमारे पड़ोसी देश पेट्रोल व डीजल की कीमतों में 10 प्रतिशत से लेकर 60 प्रतिशत तक की वृद्धि कर चुके हैं। कई देशों में महंगाई चरम सीमा पर पहुंच रही है पड़ोसी पाकिस्तान में तो लाकडाउन जैसे हालात पैदा हो गए हैं जबकि भारत मे पेट्रोल व डीजल के दाम काफी स्थिर हैं। भारत में केवल घरेलू रसोई गैस के दामों में ही 60 रुपए की वृद्धि की गई है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी युद्ध से पैदा हुए संकट पर स्वयं नजर रख रहे हैं। भारत के विदेश मंत्री तथा प्रधानमंत्री मोदी दुनियाभर के नेताओं के साथ संपर्क में हैं तथा आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने के लिए नए मार्ग ढूंढ रहे हैं। अभी तक भारत केवल 27 देशों से ही तेल व गैस की खरीदता था किंतु अब 40 देशों के साथ क्रय सम्बन्ध बनाए जा रहे हैं।
विडंबना है कि विपक्ष इस संकट का उपयोग राजनीति के लिए कर रहा है। विपक्षी दल के नेता, आईटी सेल तथा कार्यकर्ता अपने आकाओं की शह पाकर अफवाह बाज बनकर सड़क पर आ गए हैं। बड़े नेता ऊपर संसद ठप कर रहे हैं और छोटे -बड़े जमाखोरों के साथ मिलकर आम जनमानस का पैनिक बटन दबाकर गैस सिलेंडर के लिए लंबी -लंबी कतारें लगवा रहे हैं। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं जबकि प्रधानमंत्री मोदी व उनकी सरकार की पहल का ही परिणाम है कि ईरान -अमेरिका- ईजरायल जंग के बीच होर्मुज स्ट्रेट से दो भारतीय जहाज शिवालिक और नंदादेवी 927000 मीट्रिक टन एलपीजी लेकर भारत आ रहे हैं। भारत सरकार व अधिकारियों के प्रयास से ही फारस की खाड़ी में सभी भारतीय सुरक्षित हैं ।भारत के 253 नाविक अब तक सुरक्षित वापस आ चुके हैं। भारत सरकार ऊर्जा आपूर्ति और नागरिक सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान दे रही है।प्रधानमंत्री मोदी कैबिनेट की बैठक में अपने मंत्रियों से स्पष्ट कर चुके हैं कि युद्ध का असर आम जनता पर नहीं पड़ना चाहिए।
युद्धकाल में जो लोग भारत की विदेश नीति को फेल बताने वालों को स्मरण रखना चाहिए कि कि जब संघर्ष के कारण उड़ानें प्रभावित होने पर कई ईरानी नागरिक भारत में फंस गए थे भारत ने ही उन्हें ईरान की सहायता से उनके देश पहुँचाया । वहीं युद्ध के बीच 1.72लाख भरतीय सकुशल भारत वापस आए हैं।
भारत सरकार युद्धकाल में जनता को कोई समस्या न हो इसके लिए लगातार कार्य कर रही है किंतु क्या हम सभी नागरिक अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं? परिस्थितियां इसका उत्तर नहीं में दे रही हैं। यदि नागरिक भी कर्त्तव्य बोध से बंधे होते तो आज देश में गैस सिलेंडर को लेकर जो पैनिक मचा हुआ है वह न होता। ऊर्जा संकट की आहट मात्र से अफवाह बाज सक्रिय हो गए और ऐसी अफवाहें उड़ाई गई कि जमाखोरी और कालाबाजारी शुरू हो गई है। जिन घरों मे एक या दो भरे हुए एलपीजी सिलिंडर मौजूद हैं वो भी हल्ला मचा रहे हैं । प्रतिदिन होने वाली सिलिंडर बुकिंग 55 लाख से बढ़कर 75 लाख हो गई। देशभर मे अजीब नजारे देखने को मिल रहे हैं। जो परिवार 853 रुपए का गैस सिलेंडर खरीदने में भार का अनुभव करते थे अब वही लोग चोर बाजार से 3500 तक का सिलेंडर खरीदने की हैसियत दिखा रहे हैं।
समाज मे नैतिकता व सदाचार की कमी के कारण ही जमाखोरी व कालाबाजारी एक सामाजिक बुराई का रूप ले चुकी है । युद्धकाल में देशवासियों का एक बहुत बड़ा वर्ग कर्तव्य से विमुख होकर अपने लिए मुनाफे का अवसर खोज रहा है। अभी भारत का युद्ध से कोई सबंध नहीं है और यह युद्ध भारत से बहुत दूर हो रहा है तब भी जिस प्रकार का पैनिक भारत में हुआ है वह कुछ भारतीयों की ही विकृत मानसिकता को प्रदर्शित कर रहा है। संकट है किंतु अगर कुछ भी कर्त्तव्य बोध होता तो हालात बिल्कुल सामान्य ही रहते। अंततः अब सरकार ने जमाखोरों और कालाबाजारियों पर कार्यवाई आरम्भ कर दी है और उसके नतीजे भी सामने आने लगे हैं।
ईरान -अमेरिका इजरायल युद्ध अभी काफी लंबा चलने की आशंका है तथा हालात अभी और भी खराब ही हो सकते हैं किन्तु भारत ही एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जिसके लिए होमुर्ज स्ट्रेट का रास्ता खोला गया है। सरकार अपना काम कर रही है किंतु अब समय आ गया है कि भारतीय नागरिक भी अपने कर्तव्य का पालन करें और पैनिक न हों।


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Mrityunjaya Dixit

Mrityunjaya Dixit is a senior journalist.

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