हॉर्मुज संकट: भारत के लिए निर्भरता ही संकट, आत्मनिर्भरता ही रास्ता

पश्चिम एशिया में जारी ईरान-इजराइल-अमेरिकी संघर्ष ने दुनिया को आर्थिक संकट में डाल दिया है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की जीवनरेखा है, उसका बंद होना एक गंभीर संकट है। भारत पर भी इसका स्पष्ट प्रभाव है। आज देश के सामने एक साथ तीन बड़े संकट खड़े हो गए हैं: पहला, तेल और गैस आपूर्ति बाधित होना, दूसरा, बढ़ती उर्जा कीमतें, और तीसरा रुपये का लगातार कमजोर होना। हालांकि भारत ने अपने कूटनीतिक प्रभाव का उपयोग करते हुए हॉर्मुज से आपूर्ति को फिर से शुरू जरूर कराया है, लेकिन यह अपर्याप्त है। यदि यह संघर्ष लंबा चला तो महंगे तेल और गैस के साथ ही कमजोर रुपये के कारण भारत का भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट) प्रभावित होगा और भारतीय अर्थव्यवस्था महंगाई और सुस्ती के दुष्चक्र में फंस जाएगी।

लेकिन इस तात्कालिक आर्थिक नुकसान से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कोविड-19 महामारी के बाद एक बार फिर हमारी एक गहरी संरचनात्मक कमजोरी उजागर हुई है। भारतीय अर्थव्यवस्था आज भी रणनीतिक आवश्यकताओं (ऊर्जा, उर्वरक, फार्मास्यूटिकल कच्चे माल आदि) के लिए बाहरी दुनिया पर अत्यधिक निर्भर है। नतीजतन, कोई भी वैश्विक संकट अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम बन रहा है। इसीलिए, वर्तमान में चर्चा का एक केंद्र यह होना चाहिए कि भारत अन्य देशों पर कितनी गहराई से निर्भर है।

ऊर्जा निर्भरता

भारत की ऊर्जा सुरक्षा की असली चुनौती उसकी आयात संरचना है। आज देश कुल कच्चे तेल की खपत का तकरीबन 88 प्रतिशत आयात करता है, और अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि यह 2035 तक 90 प्रतिशत से अधिक हो सकता है। एलपीजी के मामले में स्थिति और भी नाजुक है। हम अपनी कुल खपत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करते हैं, जिसमें से करीब 90 प्रतिशत आपूर्ति हॉर्मुज से होकर आती है। तो फिर इस अत्यधिक निर्भरता का समाधान क्या है?

यह सकारात्मक संकेत है कि भारत ने रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों के साथ ऊर्जा समझौतों के माध्यम से तेल आयात का विविधीकरण किया है, जिससे संकट के समय आज संतुलन दिखाई पड़ रहा है। पर हमें यह समझना होगा कि ऊर्जा सुरक्षा केवल आयात के स्रोत बदलने से नहीं, बल्कि पूरी ऊर्जा खपत की संरचना को बदलने से हासिल होगी। इस पूरी रणनीति में परिवहन क्षेत्र की भूमिका निर्णायक है। देश के कुल तेल उपभोग का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा सड़क परिवहन में खपत होता है, जबकि 40 करोड़ से अधिक वाहनों के बेड़े में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी तकरीबन 4 प्रतिशत है। इसलिए यदि निर्भरता घटानी है तो इलेक्ट्रिक वाहनों के विस्तार को प्राथमिकता देनी होगी। लेकिन यह केवल सब्सिडी से संभव नहीं होगा; इसके लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, बैटरी निर्माण और सस्ती वित्तीय पहुंच जैसे व्यापक तंत्र का विकास करना होगा। ऐसे ही एलपीजी के विकल्पों जैसे बायोगैस और इलेक्ट्रिक कुकिंग को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना आवश्यक है। भारत की मजबूत बिजली उत्पादन क्षमता और ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन में बढ़त इस बदलाव को संभव बनाती है। इसलिए अब उपभोग पैटर्न में परिवर्तन जरूरी है, ताकि भारत ऊर्जा निर्भरता से निकलकर एक सुरक्षित और टिकाऊ ऊर्जा भविष्य की ओर बढ़ सके।

उर्वरक निर्भरता

होर्मुज संकट के बीच उर्वरक निर्भरता पर भी गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है, क्योंकि यह मसला सीधे देश के खाद्य उत्पादन और करोड़ों किसानों की आजीविका से जुड़ा है। आज देश में तीन प्रमुख उर्वरकों की स्थिति अलग-अलग है। यूरिया में भारत अब 87 प्रतिशत स्वावलंबी है। क्योंकि 2019 के बाद गोरखपुर, सिंदरी और बरौनी सहित छह संयंत्रों के पुनरुद्धार/विस्तार/निर्माण से यह संभव हुआ है। परंतु डाई-अमोनियम फॉस्फेट में 60 प्रतिशत और पोटाश में शत-प्रतिशत आयात निर्भरता बनी हुई है। आज यही निर्भरता हमारी कमजोरी है, जो किसी भी वैश्विक उथल-पुथल में हमें असहाय स्थिति में डाल सकती है।

यह जोखिम और गहरा तब हो जाता है जब हम उर्वरक की सप्लाई चेन को देखते हैं। आज रूस कुल उर्वरक आयात का लगभग 30 प्रतिशत पूरा करता है और नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटाश जैसे उर्वरकों में यह हिस्सेदारी 60 प्रतिशत तक है। दूसरी तरफ, चीन पोटाश और फॉस्फेट आपूर्ति के लिए निर्णायक है। इसके अतिरिक्त, खाड़ी देशों जैसे ओमान, सऊदी अरब और कतर से भी भारत आयात करता है, जो हॉर्मुज से होकर आता है। यानी आज जिस संकट ने हमारी उर्जा आपूर्ति बाधित की है, उसी संकट की चपेट में उर्वरक आपूर्ति भी है।

इसलिए अब भारत को यह निर्भरता कम करनी होगी, और इसके लिए संकट के समय नए आयात स्रोत खोजना स्थायी समाधान नहीं है। हमारी कृषि प्रणाली में बड़े सुधार की आवश्यकता है। सब्सिडी आधारित उर्वरकों ने दशकों से आवश्यकता से अधिक इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया है। आज नतीजा यह है कि नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटाश के उपयोग का अनुपात 10.9:4.4:1 पहुंच गया है, जबकि मानक 4:2:1 है। सबसे पहले तो इस असंतुलन को ठीक करना होगा। किसानों को उनकी मृदा रिपोर्ट के आधार पर उर्वरक इस्तेमाल की मात्रा बतानी होगी। इसके अलावा, जैव उर्वरकों को उचित स्थान देना होगा, और यह नीतिगत प्रयास से आएगा। उदाहरण के लिए, किसी किसान को आवंटित कोटे में एक निश्चित हिस्सा जैव उर्वरकों का भी दिया जाए। इसके अलावा युद्ध स्तर पर उर्वरक निर्भरता कम करने के लिए देश में अभियान चलाया जाए, क्योंकि कोई भी भविष्य का संकट देश में बड़ा खाद्य संकट ला सकता है।

यह अच्छी बात है कि मौजूदा सरकार पोटाश जैसे जरूरी उर्वरक को ‘महत्वपूर्ण खनिज’ घोषित कर घरेलू उत्पादन के लिए तेजी से काम कर रही है। यह दीर्घकालिक समाधान की दिशा में सही कदम है, परंतु जब तक देश में उत्पादन रणनीतिक रूप से उपलब्ध नहीं हो जाता, तब तक उर्वरक आपूर्ति के लिए सामरिक भंडारण क्षमता बनाना, आयात स्रोतों का विविधीकरण करना और कृषि में उर्वरक उपयोग में व्यापक बदलाव जैसे प्रयास तेज करने होंगे।

फार्मास्यूटिकल निर्भरता

भारत आज दुनिया की दवाई फैक्ट्री है। डब्ल्यूएचओ द्वारा प्रमाणित दवाओं का लगभग 57 प्रतिशत आपूर्ति अकेले भारत करता है। परंतु इस निर्यात शक्ति में एक विरोधाभास है। इन दवाओं के निर्माण के लिए जिन कच्चे माल, यानी ‘सक्रिय औषधीय तत्व (एपीआई)’, की आवश्यकता होती है, उसका लगभग 70 प्रतिशत आयात अकेले चीन से आता है। यह निर्भरता कुछ महत्वपूर्ण श्रेणियों में और भी तीव्र है, जैसे पेनिसिलिन के लिए 95.8 प्रतिशत, आइबूप्रोफेन में 95.2 प्रतिशत और पैरासिटामॉल के लिए लगभग 91 प्रतिशत। आज 53 ऐसे महत्वपूर्ण एपीआई हैं, जिनमें भारत की चीन पर निर्भरता लगभग 90 प्रतिशत से अधिक है।

हालांकि इस निर्भरता को कम करने के लिए आज सरकार प्रतिबद्ध है, लेकिन इसे और तेज करना होगा। सरकार पहले से ही एपीआई उत्पादन के लिए पीएलआई स्कीम के तहत घरेलू निर्माण को बढ़ावा दे रही है। इसी क्रम में बजट 2026 में ‘बायोफार्मा शक्ति अभियान’ के रूप में एक नई राष्ट्रीय पहल की घोषणा भी महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रयास है। इसके तहत कैंसर, डायबिटीज और ऑटो-इम्यून जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़ी दवाओं का उत्पादन भारत में ही किया जाएगा। इसके अलावा तीन नए बायोफार्मा-केंद्रित संस्थान स्थापित किये जा रहे हैं, ताकि देश में फार्मा अनुसंधान को और मजबूत किया जा सके।

वर्तमान में जारी पश्चिम एशिया का यह संकट अंततः बीत जाएगा, लेकिन जो प्रश्न हमारे है वह स्थायी है कि क्या भारत अपनी रणनीतिक जरूरतों में निर्भरता कम कर पाएगा? यह परिवर्तन एकाएक संभव नहीं है, परंतु जिस गति से भारत में प्रयास तेज हुए हैं, वह इस दिशा में संभावना को दर्शाते हैं। अब आवश्यकता है कि इसे एक स्पष्ट राष्ट्रीय लक्ष्य की तरह आगे बढ़ाया जाए।

आत्मनिर्भरता के लिए बदली है भारत की रणनीति

वैश्विक अर्थव्यवस्था में कोई भी देश पूर्ण आत्मनिर्भरता अचानक हासिल नहीं कर सकता। भारत ने भी इस वास्तविकता को समझते हुए एक संतुलित और चरणबद्ध रणनीति अपनाई है। ऊर्जा, उर्वरक और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों को सामरिक प्राथमिकता दी गई है। ऊर्जा क्षेत्र में भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और एथेनॉल ब्लेंडिंग जैसे प्रयासों के माध्यम से बदलाव लाने की कोशिश की है। वहीं, उर्वरक क्षेत्र में बंद पड़े संयंत्रों को दोबारा चालू करना, क्रिटिकल मिनरल के लिए एक विशेष अभियान और कई देशों के साथ ट्रेड एग्रीमेंट के जरिए आपूर्ति में विविधता के प्रयास हुए हैं।

इसके अलावा, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में भारत ने सेमीकंडक्टर मिशन, पीएलआई और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टरों के माध्यम से एक नई औद्योगिक नींव रखी है। नतीजतन, आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माण केंद्र बन चुका है। ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए हाल ही में सरकार ने 2032 तक 100 नए प्लग-एंड-प्ले (पूर्व-निर्मित बुनियादी ढांचा) इंडस्ट्रियल पार्क स्थापित करने के लिए 33,660 करोड़ रुपये की ‘भव्य’ योजना को मंजूरी दी है। आने वाले समय में इस योजना से इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर में व्यापक विस्तार आएगा जससे विभिन्न क्षेत्रों में मैन्युफैक्चरिंग बढ़ेगी और देश के आत्मनिर्भरता अभियान को बल मिलेगा।

भारत की आत्मनिर्भर रणनीती में एक बदलाव विदेश नीति का भी है। आज भारत की विदेश नीति में ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ और ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ का दृष्टिकोण भी और स्पष्ट हुआ है। भारत अब किसी एक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न देशों के साथ अपने हितों के आधार पर संतुलित संबंध बना रहा है। उदाहरण के लिए, रक्षा क्षेत्र में जहां पहले निर्भरता सीमित स्रोतों पर थी, वहीं अब इजराइल, फ्रांस और अमेरिका जैसे साझेदार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आज भारत रूस के साथ नागरिक परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में, अमेरिका के साथ ‘क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी’ में, जापान के साथ बुलेट ट्रेन और औद्योगिक गलियारे के निर्माण में समानांतर रूप से काम कर रहा है।

परंतु यहां एक महत्वपूर्ण यथार्थवादी दृष्टिकोण भी आवश्यक है। ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ की भी अपनी सीमाएं हैं, जो वर्तमान संकट में उजागर हुई हैं। जब महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा तीव्र होती है, तो भारत की इस रणनीति पर दबाव बढ़ता है। इसलिए भारत की वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता उसकी घरेलू उत्पादन क्षमता, तकनीकी दक्षता और पर्याप्त भंडारण क्षमता से ही आएगी। अंततः भारत की रणनीति केवल निर्भरता कम करने तक नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और सक्षम राष्ट्र के निर्माण की दिशा में होनी चाहिए।

Vikrant Nirmala

Vikrant Nirmala, an esteemed alumnus of Banaras Hindu University (BHU), is the Founder and President of the Finance and Economics Think Council. Currently pursuing a PhD at the NIT, Rourkela, he is a distinguished thought scholar in the fields of finance and economics. Vikrant is contributing insightful articles to leading newspapers and prominent digital media platforms, showcasing his expertise in these domains.

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