भारत का वित्तीयकरण: बचत से निवेश की लंबी यात्रा

पिछले दिनों वैश्विक वित्तीय बाजारों में स्पेसएक्स के रिकॉर्ड आईपीओ (इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग) की चर्चा खूब हुई। यह चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि भारत में जियो और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के प्रस्तावित रिकॉर्ड आईपीओ ने बाजार का ध्यान आकर्षित किया। वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण पिछले कुछ महीनों में दुनिया भर के शेयर बाजार दबाव में रहे हैं, जिसमें भारतीय बाजार का प्रदर्शन अपेक्षाकृत निराशाजनक रहा। ऐसे चुनौतीपूर्ण माहौल में लगभग 60 हजार करोड़ रुपये के इन दोनों प्रस्तावित आईपीओ ने भारतीय पूंजी बाजार में निवेशकों का भरोसा फिर से मजबूत किया है। साथ ही इन आईपीओ को केवल धन जुटाने के माध्यम के रूप में देखना प्रयाप्त नहीं होगा, बल्कि ये भारत के उस व्यापक, परिपक्व और लगातार विकसित हो रहे निवेशक वर्ग का प्रतिबिंब हैं, जो आज इतने बड़े पैमाने पर निवेश करने की क्षमता रखता है। यह वित्तीय घटना भारत में पिछले दशकों के दौरान हुए एक गहरे परिवर्तन का प्रमाण भी है कि कैसे ‘बचत’ को सर्वोच्च वित्तीय गुण मानने वाला भारतीय समाज अब धीरे-धीरे ‘निवेश’ को आर्थिक प्रगति का माध्यम मानने लगा है। यही नए भारत के ‘वित्तीयकरण’ की कहानी है।

भारतीय वित्तीयकरण के तीन चरण

भारत के वित्तीयकरण को समझने के लिए इसकी यात्रा को तीन चरणों में देखना होगा। ‘पहला चरण’ स्वतंत्रता से लेकर 1990 तक का है। यह वह भारत था जो राजनीतिक रूप से स्वतंत्र तो था, लेकिन आर्थिक रूप से सीमित संसाधनों, कम आय और छोटी बचतों वाली अर्थव्यवस्था था। उस समय अधिकांश भारतीयों के लिए आर्थिक सुरक्षा का अर्थ रोटी, कपड़ा और मकान हुआ करता था। इस दौर की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि घरेलू बचत की दर भी अपेक्षाकृत निम्न स्तर से धीरे-धीरे बढ़ रही थी। 1950-51 में घरेलू बचत सकल राष्ट्रीय आय के लगभग 6 प्रतिशत के आसपास थी, जो 1989-90 तक बढ़कर लगभग 18 प्रतिशत तक पहुंच गई। इन बचतों का बड़ा हिस्सा सोना, भूमि, नकद बचत, डाकघर योजनाओं और बैंक जमाओं में केंद्रित रहा। यानी इन चार दशकों में बचत की संस्कृति तो विकसित हो रही थी, पर वह अभी पूंजी बाजार आधारित निवेश संस्कृति से कोसों दूर थी।

हालांकि यह दौर केवल सीमाओं का नहीं, बल्कि भारत की आधुनिक वित्तीय व्यवस्था की नींव रखे जाने का भी था। 1955 में एसबीआई का गठन, 1956 में जीवन बीमा क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण कर भारतीय जीवन बीमा निगम की स्थापना, तथा 1969 और 1980 में बड़े वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे कदमों ने वित्तीय सेवाओं का विस्तार गांवों और छोटे शहरों तक पहुंचाया। इस दौरान सरकारी नीतियां भी पूंजी बाजार के विस्तार की अपेक्षा वित्तीय समावेशन, बैंकिंग नेटवर्क के निर्माण और लोगों में बचत की आदत विकसित करने पर अधिक केंद्रित रहीं। इसका परिणाम यह हुआ कि 1990 तक भारत में बैंकिंग और बचत की संस्कृति तो विकसित हुई, लेकिन पूंजी बाजार में निवेश की यात्रा अभी बाकी थी।

भारत के वित्तीयकरण के ‘दूसरे चरण’ की शुरुआत 1991 के आर्थिक सुधारों के साथ होती है। इसी दौर में सेबी को पूंजी बाजार का एक मजबूत और सशक्त नियामक बनाया गया, विदेशी निवेशकों के लिए दरवाजे खोले गए और एनएसई की स्थापना हुई। साथ ही, बड़े स्तर पर निजी वित्तीय सेवा कंपनियों का उदय हुआ। पूंजी बाजार को आधुनिक बनाने की दिशा में कई भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। 1996 में नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) और 1999 में सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (सीडीएसएल) की स्थापना के साथ भारत में ‘डीमैट प्रणाली’ (शेयरों को कागज के बजाय इलेक्ट्रॉनिक खाते में सुरक्षित रखना) की शुरुआत हुई। बाद में सेबी ने इलेक्ट्रॉनिक रूप में शेयर रखने को चरणबद्ध तरीके से अनिवार्य कर किया। अंततः 2019 में सेबी ने भौतिक रूप में रखे गए शेयरों के हस्तांतरण पर रोक लगाते हुए उन्हें डीमैट रूप में परिवर्तित करना अनिवार्य कर दिया। इस प्रकार भारत का शेयर बाजार कागज आधारित व्यवस्था से पूरी तरह डिजिटल व्यवस्था में परिवर्तित हो गया।

उदारीकरण के बाद हुए इन बदलावों की झलक शेयर बाजार में भी दिखाई देने लगी। 1990 में सेंसेक्स ने पहली बार 1,000 अंकों के स्तर को पार किया, और फिर अगले ढाई दशकों में यह 26,000 अंकों से ऊपर निकल गया। वर्ष 2000 में 6,000 अंक, 2010 में 20,500 अंक और 2015 में 26,000 अंकों का स्तर पार करना इस बात का संकेत था कि भारत की अर्थव्यवस्था, पूंजी बाजार और निवेशक आधार लगातार विस्तृत हुआ। लेकिन अभी ‘निवेशक भारत’ के उदय की सबसे महत्वपूर्ण कहानी बाकी थी।

भारत की वित्तीय यात्रा का वास्तविक और चमत्कारिक परिवर्तन 2016 के बाद दिखाई देता है। यही भारत के वित्तीयकरण का ‘तीसरा चरण’ है। इस दौर में कई वित्तीय घटनाएं एक साथ घटीं, जिन्होंने शेयर निवेश को अभिजात वर्ग की गतिविधि से निकालकर आम नागरिक तक पहुंचा दिया। पहला बड़ा परिवर्तन जनधन योजना के रूप में आया, जिसने करोड़ों लोगों को पहली बार औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा। इसके बाद आधार और ई-केवाईसी ने वित्तीय पहचान को सरल किया, जबकि यूपीआई क्रांति ने भुगतान व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। यूपीआई का एक बड़ा लाभ यह हुआ कि भारत में डिजिटल साक्षरता चमत्कारिक रूप से बढ़ी और इसने लोगों को वित्तीय रूप से अधिक जागरूक बना दिया। इसी दौरान सस्ते इंटरनेट और स्मार्टफोन के प्रसार ने इस परिवर्तन को नई रफ्तार दी। परिणाम यह हुआ कि डीमैट खाता खोलना किसी सोशल मीडिया अकाउंट बनाने जितना आसान हो गया। बैंक खाता, आधार और पैन कार्ड के माध्यम से अब यह प्रक्रिया कुछ ही मिनटों में पूरी की जा सकती है। नतीजतन शेयर बाजार जो कभी बड़े शहरों तक सीमित था, वह अचानक से देश के छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच गया।

इस डिजिटलकरण ने देश के करोड़ों आम निवेशकों को पूंजी बाजार में ‘वेल्थ क्रिएटर’ बनने की हिम्मत दी। आज किसी छोटे कस्बे का निवेशक भी अपने मोबाइल फोन के माध्यम से वही शेयर खरीद सकता है, जिसमें मुंबई का कोई पेशेवर निवेशक निवेश कर रहा है। यही भारत के वित्तीय लोकतंत्रीकरण की कहानी है। आज भारत में 25 करोड़ से अधिक ट्रेडिंग खाते हैं। म्यूचुअल फंड उद्योग का आकार 80 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। पिछले लगभग सात वर्षों में 1,000 से अधिक आईपीओ के माध्यम से कंपनियों ने पूंजी बाजार से लगभग 6 लाख करोड़ रुपये जुटाए हैं। वहीं, जून 2026 तक सेंसेक्स रिकॉर्ड 77,000 अंकों के आसपास कारोबार कर रहा है। यह प्रमाण है कि कैसे भारत के आम निवेशकों ने अपनी बचत को पूंजी बाजार की ओर मोड़कर भारतीय शेयर बाजार को नई उंचाइयों तक पहुंचाया है।

सन 1991 में जब भारत आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि कुछ दशकों बाद भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होगा और उसका पूंजी बाजार वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा। आज जियो और एनएसई के प्रस्तावित रिकॉर्ड आईपीओ हमें उसी यात्रा की याद दिलाते हैं। यह उस ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक है जिसमें भारत धीरे-धीरे एक ‘सेविंग नेशन’ से ‘इन्वेस्टिंग नेशन’ में बदल चूका है।

भारत के शेयर बाजार का भविष्य

भारत के वित्तीयकरण की यह कहानी जितनी उत्साहजनक है, उतनी ही सावधानी की भी मांग करती है। पिछले कुछ वर्षों में ‘आईपीओ’ भारतीय निवेशकों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हुए हैं। अनेक निवेशकों के लिए वे त्वरित लाभ कमाने का माध्यम बन गए हैं। लेकिन पूंजी बाजार का इतिहास बताता है कि ‘अच्छी कंपनी’ और ‘अच्छा निवेश’ हमेशा एक ही बात नहीं होते। पेटीएम, नायका, ओला इलेक्ट्रिक और फर्स्टक्राइ जैसी कंपनियों के अनुभव बताते हैं कि लोकप्रियता, मीडिया चर्चा और निवेश प्रतिफल के बीच सीधा संबंध नहीं होता। कई कंपनियां सूचीबद्ध होने के बाद अपने ‘लिस्टिंग प्राइस’ से काफी नीचे चली गईं, जबकि कुछ अन्य ने बेहतर प्रतिफल दिया। इसलिए निवेश करते समय केवल कंपनी की कहानी या बाजार में बने उत्साह के आधार पर निर्णय लेना पर्याप्त नहीं है। निवेशक को कंपनी के मूल्यांकन, लाभ, प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति और दीर्घकालिक संभावनाओं को समझना आवश्यक है।

हालांकि इन जोखिमों के बीच भारत के शेयर बाजार के भविष्य को केवल शेयर मूल्यों या सूचकांकों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे भारत की वास्तविक अर्थव्यवस्था में हो रहे परिवर्तन को भी देखना होगा। आज भारत में अभूतपूर्व स्तर पर एक्सप्रेसवे, मालवाहक रेल गलियारे, बंदरगाह, हवाई अड्डे, औद्योगिक कॉरिडोर, डिजिटल अवसंरचना और विनिर्माण क्षमता का विस्तार हो रहा है। एआई, डिजिटल भुगतान, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, रक्षा उत्पादन, हरित ऊर्जा और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ रहा है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक गतिविधियों को नहीं बढ़ा रहे, बल्कि आने वाले दशकों के लिए नई कंपनियों, नए उद्योगों और नए निवेश अवसरों की नींव भी तैयार कर रहे हैं।

यही कारण है कि भारतीय पूंजी बाजार की विकास यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। आज भी भारतीय परिवारों की बचत का बड़ा हिस्सा सोने, अचल संपत्ति और बैंक जमाओं में लगा हुआ है। यदि आने वाले वर्षों में इन बचतों का एक छोटा हिस्सा भी पूंजी बाजार की ओर प्रवाहित होता है, तो भारतीय शेयर बाजार का आकार और गहराई दोनों उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकते हैं। बेशक, अत्यधिक सट्टेबाजी, सोशल मीडिया आधारित निवेश सलाह, डेरिवेटिव कारोबार का विस्तार और वैश्विक आर्थिक झटके भविष्य की चुनौतियां बने रहेंगे। लेकिन इसके बावजूद एक तथ्य निर्विवाद है कि भारत का वित्तीय ढांचा पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत, व्यापक और समावेशी हो चुका है।

Vikrant Nirmala

Vikrant Nirmala, an esteemed alumnus of Banaras Hindu University (BHU), is the Founder and President of the Finance and Economics Think Council. Currently pursuing a PhD at the NIT, Rourkela, he is a distinguished thought scholar in the fields of finance and economics. Vikrant is contributing insightful articles to leading newspapers and prominent digital media platforms, showcasing his expertise in these domains.

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