बीते सप्ताह भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी दो महत्वपूर्ण खबरें रहीं। पहला, जीडीपी के आंकड़े और दूसरा, भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक। जीडीपी के आंकड़ों में जहां उत्साह था, वहीं आरबीआई ने अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ महत्वपूर्ण चेतावनियां दीं। सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था की अनुमानित वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत आंकी गई। यह संख्या इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ समय से भारत की विकास क्षमता को लेकर विभिन्न प्रकार की शंकाएं व्यक्त की जा रही थीं। कभी उपभोग में कमजोरी की बात कही गई, तो कभी निजी निवेश की गति पर प्रश्न उठाए गए। ऐसे माहौल में यह वृद्धि इस बात का संकेत देती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी संरचना वैश्विक सुस्ती में भी अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है।
विशेष रूप से जनवरी-मार्च तिमाही का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। इस तिमाही का अंतिम महीना (मार्च) ऐसे समय में था जब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक व्यापार, ऊर्जा बाजारों और आपूर्ति श्रृंखलाओं को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी थीं। इसके बावजूद इस तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि यह दर्शाती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को घरेलू मांग और आंतरिक आर्थिक गतिविधियों से मजबूत समर्थन मिल रहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हाल के वर्षों में भारत ने बाहरी आर्थिक झटकों के प्रति अपनी सहनशीलता (रेजिलिएंस) को काफी मजबूत किया है। लेकिन इसी बिंदु पर आरबीआई का तत्कालीन आकलन ध्यान आकर्षित करता है। जीडीपी के उत्साहजनक आंकड़ों के बावजूद आरबीआई ने आगामी वित्त वर्ष के लिए विकास दर के अनुमान को घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है, जबकि महंगाई के अनुमान को बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया है। यह भविष्य को लेकर केंद्रीय बैंक की बढ़ती चिंताओं का संकेत है।
दरअसल, किसी भी अर्थव्यवस्था का आकलन दो आधारों पर किया जाता है- वह आज कहां खड़ी है और आने वाले समय में किस दिशा में बढ़ रही है। जीडीपी के हालिया आंकड़े हमें बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने बीते वर्ष वैश्विक अनिश्चितताओं और बाहरी दबावों के बावजूद उल्लेखनीय मजबूती दिखाई। वहीं संशोधित आकलन संकेत देता है कि आगे का आर्थिक परिदृश्य चुनौतीपूर्ण हो गया है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और बाहरी मांग में कमजोरी जैसे कारक भारतीय आर्थिकी को प्रभावित कर रहें हैं। इसलिए आज वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछले वर्ष कैसा प्रदर्शन किया, बल्कि यह है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच वह अपनी विकास गति को किस प्रकार बनाए रखे।
बढ़ानी होगी घरेलू मांग
किसी भी अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक मजबूती का आधार अंततः घरेलू मांग ही होती है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार है, लेकिन इसकी क्षमता तभी साकार हो सकती है जब करोड़ों परिवारों की क्रय शक्ति मजबूत बनी रहे। उंची ऊर्जा कीमतें और खाद्य महंगाई यदि आय का बड़ा हिस्सा निगलने लगें, तो उपभोग और मांग दोनों पर दबाव बढ़ता है। मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में ऐसे जोखिम दिखाई भी दे रहे हैं। इसलिए सरकार को समय रहते ऐसे कदमों पर विचार करना होगा जो मांग को सहारा दें। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि आज की स्थिति कोविड जैसी नहीं है; इसलिए समाधान भी उसी प्रकार के व्यापक राहत पैकेज नहीं, बल्कि अधिक ‘लक्षित’ होने चाहिए।
यहीं भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना एक नई संभावना प्रस्तुत करती है। जनधन, आधार और यूपीआई के रूप में देश ने ऐसा ढांचा विकसित कर लिया है जो सरकार को न्यूनतम लीकेज के साथ लक्षित सहायता पहुंचाने की क्षमता देता है। भविष्य में यदि मांग कमजोर पड़ती है, तो डिजिटल रुपया (सीबीडीसी) आधारित ‘टार्गेटेड कंजम्पशन सपोर्ट’ पर विचार किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, सरकार सीमित अवधि के लिए निम्न आय वर्ग के परिवारों को ‘डिजिटल ट्रैवल कूपन’ उपलब्ध करा सकती है, जिन्हें केवल रेलवे टिकट, होटल, पर्यटन सेवाओं या अन्य निर्धारित क्षेत्रों में ही खर्च किया जा सके। चूंकि यह डिजिटल रुपया प्रोग्रामेबल होगा, इसलिए इसका उपयोग केवल अधिकृत सेवाओं और तय उद्देश्यों तक सीमित रहेगा, जिससे लीकेज और दुरुपयोग की संभावना लगभग शुन्य होगी।
ऐसी योजना का लाभ केवल सहायता प्राप्त करने वाले परिवारों तक सीमित नहीं रहेगा। जब लाखों परिवार यात्रा करेंगे, स्थानीय सेवाओं का उपयोग करेंगे और विभिन्न क्षेत्रों में खर्च बढ़ेगा, तो पर्यटन, आतिथ्य, परिवहन और छोटे व्यवसायों में नई मांग पैदा होगी। इससे आय, रोजगार और उत्पादन को भी बल मिलेगा। अर्थशास्त्र की भाषा में यह एक ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ होगा, जिसमें सरकार द्वारा खर्च किया गया सीमित संसाधन व्यापक आर्थिक गतिविधियों को गति देगा। राजकोषीय दृष्टि से भी इसे ‘फ्रीबी’ नहीं कहा जा सकता। इस तरह की लक्षित सहायता के माध्यम से मांग, उत्पादन और रोजगार को सहारा मिलेगा। इसलिए सरकार को छोटी अवधि में मांग को बल देने के इए ऐसे आर्थिक मॉडल का प्रयोग करना चाहिए।
निवेश और रोजगार का चक्र टूटने न पाए
घरेलू मांग को मजबूत बनाए रखने के साथ यह भी आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था में निवेश की गति कमजोर न पड़े। पिछले पांच वर्षों में केंद्र सरकार ने लगभग 44 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय किया है, जिसने भारत की विकास दर को महत्वपूर्ण सहारा दिया है। सड़क, रेलवे, बंदरगाह, ऊर्जा और शहरी अवसंरचना पर होने वाला यह खर्च केवल रोजगार सृजित नहीं करता, बल्कि एक आर्थिक वृद्धि के लिए एक इकोसिस्टम तैयार करता है। नतीजतन आर्थिकी में उत्पादकता बढ़ती है, लॉजिस्टिक्स लागत घटती है और निजी निवेश को प्रोत्साहन मिलता है। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ‘क्राउडिंग इन’ प्रभाव कहते है, जब सरकारी निवेश निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करता है।
हालांकि केवल पूंजीगत खर्च की रणनीति प्रयाप्त नहीं होगी। विकास की वास्तविक मजबूती छोटे और लघु उद्योग क्षेत्र से आती है, जो रोजगार और आय का सबसे बड़ा आधार है। लेकिन बाहरी झटकों का पहला असर भी इसी क्षेत्र पर पड़ता है। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि, परिवहन लागत में बढ़ोतरी और वैश्विक मांग में कमी का पहला प्रभाव छोटी और मझोली इकाइयों पर ही पड़ता है। ऐसे समय में एमएसएमई को दो चीजों की सबसे अधिक आवश्यकता होती है- पूंजी और बाजार। सस्ती कार्यशील पूंजी और बेहतर ऋण सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है, जबकि बाजार उपलब्ध कराना नागरिकों की भी जिम्मेदारी है। यदि नागरिक स्वदेशी उत्पादों और स्थानीय उद्यमों को प्राथमिकता दें, तो यह क्षेत्र कठिन परिस्थितियों में भी टिक सकता है।
हमें समझना होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब तक वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी मजबूती दिखाने में सफल रही है। लेकिन वास्तविक चुनौती अब शुरू होती है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण ऊर्जा कीमतों पर दबाव बना हुआ है, जबकि अल नीनो का खतरा खाद्य महंगाई को बढ़ा सकता है। ऐसे में आने वाला वित्त वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था की सहनशीलता की नई परीक्षा होगा। इसलिए सरकार को समय रहते ऐसे लक्षित उपायों पर काम करना होगा जो मांग, उपभोग और निवेश के चक्र को सक्रिय बनाए रख सकें।