प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पश्चिम एशिया में तनाव से उभरते संकट के बीच अब नागरिकों से महत्वपूर्ण अपील की है। उन्होंने लोगों से ईंधन बचाने, सोने की खरीद कम करने, स्वदेशी उत्पाद अपनाने, रासायनिक उर्वरकों का उपयोग 50 प्रतिशत तक घटाने और विदेश यात्राओं में संयम बरतने का आग्रह किया है। पहली नजर में यह सामान्य राजनीतिक या नैतिक अपील लग सकती है, क्योंकि प्रधानमंत्री लंबे समय से स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और प्राकृतिक खेती जैसे विषयों पर जोर देते रहे हैं। लेकिन वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में इन अपीलों का अर्थ गहरा है। अर्थशास्त्र की दृष्टि से देखें तो यह भारत के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित रखने की एक व्यापक आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) रणनीति का हिस्सा है। दरअसल, मौजूदा पश्चिम एशिया संकट के बीच सरकार आयात पर निर्भरता कम करके विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को घटाना चाहती है।
अब देश के सर्वोच्च नेतृत्व की ओर से आई इस अपील को सही संदर्भ में समझने के लिए हमें तीन प्रमुख आर्थिक चुनौतियों को समझना आवश्यक है। पहली चुनौती है ‘बाह्य निर्भरता’। भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। यानी ऊर्जा के मामले में भारत की विदेशी निर्भरता बहुत अधिक है। लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि भारत के आयात बिल पर लगभग 13 से 14 अरब डॉलर (लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये) का अतिरिक्त बोझ डालती है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है और रुपये की कीमत घटती है। वर्तमान स्थिति इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि कच्चे तेल की औसत कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी है, जबकि बीते जनवरी तक इसका औसत मूल्य लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल था।
दूसरी बड़ी चुनौती है ‘आयातित महंगाई’। जब वैश्विक बाजार में तेल, गैस और खाद्य तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत को दोहरी मार झेलनी पड़ती है। आयात महंगा होने से ऊर्जा लागत अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित करती है, रुपया कमजोर पड़ता है और नतीजतन घरेलू बाजार में वस्तुओं व सेवाओं की कीमतें बढ़ने लगती हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, रुपये में हर 1 प्रतिशत की गिरावट से थोक महंगाई दर लगभग 0.15 से 0.20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। यानी वैश्विक संकट का असर धीरे-धीरे आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी दिखाई देने लगता है।
इसी क्रम में तीसरी बड़ी चुनौती है ‘राजकोषीय दबाव’। ऊर्जा, उर्वरक और खाद्य पदार्थों पर दी जाने वाली सब्सिडी का बोझ लगातार सरकारी बजट पर बढ़ रहा है। केवल रासायनिक उर्वरकों के लिए ही वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 1.68 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान था। यदि वैश्विक बाजार में तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें और बढ़ती हैं, तो सरकार के लिए राजकोषीय संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाएगा। नतीजतन विकास योजनाओं, सार्वजनिक निवेश और कल्याणकारी खर्चों में कटौती की नौबत आ सकती है। साथ ही कर्ज का बोझ बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे गहरे वित्तीय दबाव में आ सकती है।
लेकिन यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इसका प्रभाव केवल भारत पर नहीं पड़ रहा। यह एक व्यापक वैश्विक संकट है, जिसकी पृष्ठभूमि पिछले कई वर्षों से बन रही थी। पहले डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीतियों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित किया और अब पश्चिम एशिया में जारी युद्ध व तनाव ने दुनिया की महत्वपूर्ण ऊर्जा और व्यापार आपूर्ति व्यवस्था को गंभीर रूप से बाधित कर दिया है। इसी कारण यूरोप से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक कई अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक संकट की दहलीज पर खड़ी हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुसार, इस वर्ष वैश्विक जीडीपी वृद्धि दर 2.8 से 3.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि 2000 से 2019 के बीच इसका औसत लगभग 3.7 प्रतिशत था। सीधे शब्दों में कहें तो दुनिया की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही है, और उभरती अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर भारत, के लिए यह स्थिति बेहद गंभीर है। क्योंकि भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए कम समय में ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना और वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था तैयार करना आसान नहीं है।
इसी पृष्ठभूमि में यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि भारत फिलहाल आर्थिक मंदी की स्थिति में नहीं है। देश की जीडीपी वृद्धि दर अभी भी 6 से 7 प्रतिशत के बीच बनी हुई है। विदेशी मुद्रा भंडार, बाहरी कर्ज, विकास दर और महंगाई नियंत्रण जैसे भारत के व्यापक आर्थिक आधार अभी अपेक्षाकृत स्थिर और मजबूत हैं। लेकिन चिंता यह है कि यदि मौजूदा वैश्विक संकट लंबे समय तक बना रहा, तो आर्थिक स्थिरता पर दबाव बढ़ सकता है। भारत का लगभग 700 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार निश्चित रूप से एक मजबूत सुरक्षा कवच है, लेकिन वह असीमित नहीं है। इसके साथ ही खाड़ी देश, जो भारत के लिए सबसे बड़ा रेमिटेंस स्रोत हैं, वहां की आर्थिक सुस्ती का असर भारत आने वाले धन पर भी पड़ सकता है।
यही कारण है कि अब भारत के आर्थिक ढांचे पर संभावित दबाव को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हो चुकी है। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ‘आर्थिक संवेदनशीलता’ कहा जाता है। यानी देश औपचारिक रूप से मंदी में नहीं है, लेकिन बाहरी झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है। प्रधानमंत्री की अपीलों को भी इसी व्यापक आर्थिक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।
अब यदि प्रधानमंत्री की इन अपीलों को राजनीतिक नजरिये से हटकर एक अर्थशास्त्री की दृष्टि से देखा जाए, तो इनके पीछे एक स्पष्ट ‘मांग प्रबंधन रणनीति’ दिखाई देती है। इसका मूल उद्देश्य आयात पर निर्भरता घटाकर घरेलू अर्थव्यवस्था और स्थानीय उत्पादन को मजबूत करना है। सबसे पहले सोने की खरीद में कमी की अपील को समझना चाहिए। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातक देशों में है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का स्वर्ण आयात बढ़कर लगभग 72 अरब डॉलर (करीब 6 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 24 प्रतिशत अधिक था। आर्थिक दृष्टि से सोना ऐसी संपत्ति है जो न उत्पादन बढ़ाती है, न बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करती है। इसके विपरीत, सोने पर खर्च होने वाला धन विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव डालता है।
ईंधन बचत की अपील के पीछे भी यही सोच है। भारत प्रतिदिन लगभग 53 लाख बैरल तेल की खपत करता है। यदि सार्वजनिक परिवहन, कार-पूलिंग और ऊर्जा-कुशल वाहनों के उपयोग से इसमें केवल 3 से 5 प्रतिशत की कमी आए, तो प्रतिदिन 1.6 से 2.6 लाख बैरल तेल बचाया जा सकता है। खाद्य तेल के मामले में भी स्थिति गंभीर है। भारत हर वर्ष 15 से 17 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करता है। एफएओ के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति खाद्य तेल की खपत विश्व औसत से अधिक है। ऐसे में संयमित उपभोग से अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है। इसी तरह रासायनिक उर्वरकों के कम उपयोग से सब्सिडी का बोझ घटेगा। वहीं प्राकृतिक खेती, स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा और विदेश यात्राओं में संयम भी इसी आर्थिक सोच का हिस्सा हैं। सरल शब्दों में कहें तो सरकार आयात-आधारित उपभोग को कम करके घरेलू उत्पादन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।
मॉडल आधारित विकास
आर्थिक इतिहास बताता है कि राष्ट्रों के विकास के दो प्रमुख मॉडल रहे हैं। पहला मॉडल ‘आयात आधारित उपभोग और तेज विकास’ का है। इसमें देश आयतित विदेशी ऊर्जा, कच्चे माल और उपभोक्ता वस्तुओं के सहारे अपनी अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। जब तक वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, यह मॉडल आकर्षक दिखाई देता है। लेकिन जैसे ही युद्ध, तेल संकट, व्यापारिक प्रतिबंध या आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा आती है, इसकी कमजोरियां सामने आने लगती हैं। दूसरा मॉडल इससे अलग है। इसमें घरेलू उत्पादन, बचत, निवेश, तकनीकी क्षमता और आत्मनिर्भरता को विकास का आधार बनाया जाता है। ऐसे देश शुरुआत में भले धीमे दिखें, लेकिन लंबे समय में अधिक स्थिर और मजबूत बनते हैं। जापान, दक्षिण कोरिया और चीन ने अलग-अलग रूपों में इसी रणनीति के सहारे अपनी आर्थिक शक्ति विकसित की है।
आज भारत भी एक ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है। यदि भारत को आने वाले दशकों में वास्तविक आर्थिक शक्ति बनना है, तो उसे आयात-निर्भर उपभोग की अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर उत्पादन-आधारित और आत्मनिर्भर आर्थिक ढांचे की ओर बढ़ना होगा। इसके लिए सबसे पहले ऊर्जा सुरक्षा को नए दृष्टिकोण से देखना होगा। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रूस, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के साथ दीर्घकालिक तेल एवं गैस समझौतों के माध्यम से परिस्थितियों को काफी हद तक संतुलित किया है। लेकिन अब केवल आपूर्ति स्रोत बदलना पर्याप्त नहीं होगा; देश को अपनी खपत की संरचना भी बदलनी होगी। सामरिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार, सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता और ऊर्जा दक्षता को राष्ट्रीय अभियान का रूप देना होगा।
इसके साथ ही सरकार को नागरिक संयम को ठोस नीतिगत प्रोत्साहनों से जोड़ना होगा। केवल अपीलों से व्यवहार नहीं बदलता; उसके लिए सस्ती, सुविधाजनक और विश्वसनीय व्यवस्था भी बनानी पड़ती है। इलेक्ट्रिक वाहन, घरेलू तिलहन उत्पादन, प्राकृतिक खेती और स्थानीय विनिर्माण को व्यापक नीति समर्थन देना होगा। मेक इन इंडिया” को अब वास्तविक औद्योगिक परिवर्तन का आधार बनाना होगा। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, बैटरी निर्माण और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में विशाल घरेलू क्षमता निर्माण भारत के लिए अनिवार्य हो चुका है। इसके लिए देश को हर हाल में विशाल गीगा फैक्ट्रियों और उच्च क्षमता वाले औद्योगिक क्लस्टरों का निर्माण करना होगा। आज चीन की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत उसकी कम समय में विशाल स्तर पर उत्पादन करने की क्षमता है। यही क्षमता उसे वैश्विक विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र बनाती है। भारत भी 140 करोड़ से अधिक आबादी वाला देश है, इसलिए यहां छोटे पैमाने की उत्पादन व्यवस्था लंबे समय तक पर्याप्त नहीं रह सकती। देश को ऐसे औद्योगिक ढांचे की जरूरत है, जो संकट के समय घरेलू मांग पूरी कर सके और सामान्य परिस्थितियों में वैश्विक बाजारों के लिए बड़े पैमाने पर निर्यात भी कर सके।