वैश्विक दबाव में भारतीय रुपया, अब नीति नहीं संयम ही रास्ता

आर्थिक मोर्चे पर देश इस समय कई संकटों से घिरा है, लेकिन सबसे बड़ी चिंता भारतीय रुपए में लगातार हो रही रिकॉर्ड गिरावट है। इसकी वजह यह है कि जब भी रुपया कमजोर होता है, उसका असर केवल शेयर बाजार या वित्तीय रिपोर्टों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधी मार आम जनता की जेब पर पड़ती है। रसोई गैस महंगी होती है, पेट्रोल-डीजल, खाद और दूसरी जरूरी वस्तुओं  के दाम बढ़ते हैं। वर्तमान में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 96.50 के स्तर तक गिर चुका है और आशंका है कि यह जल्द ही 100 रुपए प्रति डॉलर के स्तर को भी छू लेगा। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि रुपया कितना गिरा, बल्कि यह है कि इतनी तेज गिरावट क्यों आ रही है और क्या इसे रोका जा सकता है?

असल में कमजोर होते रुपये के पीछे कोई एक कारण नहीं है। कई आर्थिक और वैश्विक कारण एक साथ भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहे हैं। सबसे बड़ा कारण महंगा होता कच्चा तेल और पश्चिम एशिया का तनाव है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और वर्तमान संकट के कारण तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसका असर यह हुआ कि ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत जनवरी 2026 के लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 100-110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। तेल की कीमत बढ़ने का सीधा मतलब है कि भारत को आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ रहा है। इसे ऐसे समझिए कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत पर लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त आयात बोझ पड़ता है।

अब दूसरा बड़ा कारण है डॉलर की वैश्विक मजबूती। दुनिया में जब भी युद्ध, महामारी या आर्थिक संकट जैसी स्थिति आती है तो निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश में डॉलर की ओर भागते हैं। इसी वजह से डॉलर को ‘सेफ हेवन करेंसी’ कहा जाता है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी भी मुद्रा का मूल्य मांग और आपूर्ति से तय होता है इसलिए आज जब पूरी दुनिया में डॉलर की मांग बढ़ी है, तो बाकी मुद्राएं कमजोर पड़ने लगी हैं। सिर्फ भारतीय रूपया नहीं बल्कि जापानी येन, ऑस्ट्रेलियाई डॉलर, चीनी युआन आदि में भी भी गिरावट हुई है।

तीसरा बड़ा कारण विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकालना है। भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों का बड़ा निवेश है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और दक्षिण कोरिया-ताइवान जैसे अन्य उभरते बाजारों में बेहतर अवसरों के कारण विदेशी निवेशक भारत से पूंजी निकाल रहे हैं। जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर या बॉन्ड बेचते हैं, तो उन्हें भारतीय रुपये मिलते हैं। इसके बाद वे इन रुपयों को बेचकर डॉलर खरीदते हैं और पैसा दूसरे देशों में ले जाते हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होने लगता है। वर्ष 2026 में अब तक विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से लगभग 1.92 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं, जो पिछले पूरे वर्ष की कुल निकासी से भी अधिक है।

चौथा बड़ा कारण भारत का भारी आयात बिल है। भारत केवल तेल ही नहीं, बल्कि बड़ी मात्रा में सोना और उर्वरक भी विदेशों से आयात करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का तेल आयात बिल लगभग 12 लाख करोड़ रुपये रहा। वहीं सोने का आयात बढ़कर लगभग 6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसके अलावा उर्वरकों के आयात पर भी भारी खर्च होता है, जो लगभग 18 अरब डॉलर यानी 1.74 लाख करोड़ रुपये के आसपास है। अब किसानों पर इसका बोझ न पड़े, इसलिए केंद्र सरकार सब्सिडी देती है। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में उर्वरक सब्सिडी के लिए 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, लेकिन पश्चिम एशिया संकट और बढ़ती वैश्विक कीमतों के कारण यह खर्च बढ़कर लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।

अब सवाल है कि रुपये की गिरावट को रोका क्यों नहीं जा रहा? वास्तव में सरकार और आरबीआई लगातार इसे संभालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में गिरावट को पूरी तरह रोक पाना आसान नहीं है। हां, इसकी रफ्तार कुछ हद तक धीमी जरूर की जा सकती है। मार्च 2026 में आरबीआई ने बैंकों की दैनिक विदेशी मुद्रा ओपन पोजीशन 100 मिलियन डॉलर तक सीमित कर दी, जिससे कुछ समय के लिए सट्टेबाजी कम हुई और रुपये को राहत मिली। अब कुछ विशेषज्ञ डॉलर या गोल्ड रिजर्व बेचकर रुपये को संभालने की सलाह दे रहे हैं। लेकिन ऐसा लगातार करने से देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट सकता है, जो लंबे समय में अच्छी स्थिति नहीं होगी। हालांकि भारत के पास अभी लगभग 690-700 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में शामिल है, लेकिन यह भी असीमित नहीं है। इसी वजह से अब सरकार नीतिगत मोर्चे पर सक्रिय है। सोना, चांदी जैसी वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाए गए हैं, जबकि प्रधानमंत्री तेल की खपत कम करने और संसाधनों के संतुलित उपयोग की अपील कर रहे हैं। इसका सीधा संदेश है कि देश के लिए विदेशी मुद्रा बचाइए। जितना कम आयात होगा, उतना कम डॉलर देश से बाहर जाएगा और रुपये पर दबाव कम होगा।

अब एक सवाल यह है कि जब भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, तो फिर भारतीय रुपया इतना कमजोर क्यों है? इसका उत्तर यह है कि किसी भी मुद्रा को वैश्विक स्तर पर मजबूत और व्यापक रूप से स्वीकार्य बनने के लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तें होती हैं। पहली, उस देश की वैश्विक व्यापार में बड़ी हिस्सेदारी हो। दूसरी, दुनिया के देशों और निवेशकों को उस मुद्रा पर भरोसा हो। और तीसरी, वह मुद्रा अंतरराष्ट्रीय विदेशी मुद्रा भंडार का महत्वपूर्ण हिस्सा बने। भारत अभी इन सभी पैमानों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता। हालांकि भारत इस दिशा में धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहा है। रुपये में तेल खरीदने के समझौते, डिजिटल रुपये की शुरुआत और यूपीआई  को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने जैसे प्रयास भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि डॉलर जैसी वैश्विक स्थिति हासिल करना अभी भारत के लिए लंबी और कठिन प्रक्रिया है।

Vikrant Nirmala

Vikrant Nirmala, an esteemed alumnus of Banaras Hindu University (BHU), is the Founder and President of the Finance and Economics Think Council. Currently pursuing a PhD at the NIT, Rourkela, he is a distinguished thought scholar in the fields of finance and economics. Vikrant is contributing insightful articles to leading newspapers and prominent digital media platforms, showcasing his expertise in these domains.

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