भारत चल पड़ा है नई औद्योगिक क्रांति के पथ पर

भारत में आज एक नई औद्योगिक क्रांति प्रारम्भ हो चुकी है, यह विचार अमेरिका की एक जानी मानी निवेश बैंक – जेफ्रीज ने व्यक्त किये हैं। भारत में, विशेष रूप से डाटा केंद्र स्थापित करने के उद्देश्य से करोड़ों अमेरिकी डॉलर का निवेश होता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत में डाटा केंद्र स्थापित करने पर केंद्र सरकार की ओर से टैक्स में भारी भरकम छूट भी प्रदान की जा रही है। अतः भारत में डाटा केंद्र स्थापित करने की तो जैसे होड़ सी मच गई है। पिछले 5 वर्षों के दौरान भारत में डाटा केंद्रों की क्षमता दोगुनी हो चुकी है एवं आगे आने वाले 5 वर्षों के दौरान यह क्षमता बढ़कर 10 GW हो जाने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। वैश्विक स्तर पर डाटा केंद्र अब एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभर रहा है।

साथ ही, भारत में सेमीकंडक्टर उत्पादन इकाईयों को उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत लाभ प्रदान किया जा रहा है, इसके लिए 1,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि निर्धारित की गई है। इसका परिणाम यह है कि सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में विनिर्माण इकाईयों की स्थापना हेतु भारत में 2,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया जा चुका है, और यह आगे भी जारी हैं।

भारत आज उन चुनिंदा देशों में से एक है, जिनके पास स्पेस क्षेत्र से सम्बंधित नवीनतम तकनीकी उपलब्ध है। भारत में स्पेस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था वर्ष 2030 तक 5 गुना तक बढ़ सकती है। वैश्विक स्तर पर एयरो स्पेस के क्षेत्र में मांग एवं आपूर्ति में असंतुलन के चलते भारत लाभ की स्थिति में पहुंच गया है क्योंकि कम लागत और कुशल इंजीनीयरिंग टैलेंट आज भारत में ही सम्भव है।

इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में भारत आज केवल पुर्जों को इकट्ठा कर उत्पाद बनाने का कार्य करने तक सीमित नहीं है बल्कि इस क्षेत्र में उच्चस्तरीय उत्पादों का निर्माण भी करने लगा है। 6 वर्षों में मोबाइल कम्पोनेंट में घरेलू वैल्यू एडीशन लगभग 20 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है।

सोलर के क्षेत्र में भारत आज वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा सोलर पीवी का उत्पादक देश बन गया है। इसका परिणाम यह है कि वर्तमान में भारत की 35 GW की सोलर क्षमता चालू है एवं 100 GW की क्षमता पर निर्माण कार्य चालू है।

एशिया की सबसे बड़ी 100 कम्पनियों की सूची में आज भारत की 34 कम्पनियां शामिल हो चुकी हैं। कुल मिलाकर, पूर्व में भारत केवल फार्मा, टेक्स्टायल, चमड़ा उत्पाद, कृषि उत्पाद (मसाला, आदि) स्टील, ऑटोमोबील एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में ही वैश्विक स्तर पर उक्त उत्पादों का निर्यात करने में सफल हो रहा था परंतु आज स्थितियां बदल गई हैं एवं अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे डाटा केंद्र, सेमीकंडक्टर उत्पादन, स्पेस क्षेत्र, इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र, सोलर क्षेत्र, सुरक्षा क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है।

भारत में उपलब्ध टैलेंट एवं श्रम के भरोसे विश्व की कई बड़ी कम्पनियों के बीच आज भारत में विशाल वैश्विक योग्यता केंद्रों (जीसीसी) की स्थापना करने की होड़ सी लग गई है। ब्रिटेन में फार्मा के क्षेत्र में कार्य करने वाली कम्पनी – एस्ट्रा जेनेका ने चेन्नई में एक विशाल वैश्विक योग्यता केंद्र की स्थापना की है। बैंक ओफ अमेरिका ने अपना सबसे बड़ा बैक ऑफिस कार्यालय पुणे में स्थापित किया है, इस बैंक के पूरे विश्व में बैक ऑफिस में कार्य कर रहे 11,000 कर्मचारी इस केंद्र का ब्रेन बन गए हैं। अमेरिका के सबसे पुराने वित्तीय संस्थानों में से एक बैंक ओफ न्यूयॉर्क, मेलोन ने पुणे एवं चेन्नई में वैश्विक योग्यता केंद्रों की स्थापना की है। आरटीफिशीयल इंटेलिजेन्स के क्षेत्र में कार्य करने वाली बोस्टन की एक कम्पनी ने फरवरी 2026 में हैदराबाद में विशाल स्तर पर अपने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यालय की स्थापना की है।

बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई एवं पुणे में आज 1,700 से अधिक वैश्विक योग्यता केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं, इन केंद्रों में 19 लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। भारत आज आउटसोर्सिंग हब से आगे बढ़कर उच्च स्तरीय टैलेंट केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। भारत में स्थापित किए गए कुल वैश्विक योग्यता केंद्रों में से लगभग 65 प्रतिशत केंद्र अमेरिकी कम्पनियों द्वारा स्थापित किए गए हैं। इन कम्पनियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में की जा रही रीसर्च का कार्य इन केंद्रों पर सम्पन्न हो रहा है एवं टेक्नॉलजी के क्षेत्र में नए नए उत्पादों का निर्माण भी इन्हीं केंद्रों में किया जा रहा है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रही अमेरिका की ही एक कम्पनी ट्रूब्रिज ने भी फरवरी 2026 में मुंबई में वैश्विक योग्यता केंद्र की स्थापना की है, इस केंद्र को आगे आने वाले समय में और अधिक विस्तार दिया जाने वाला है। इसी प्रकार, बीमा, बैंकिंग, स्वास्थ्य, साइबर सिक्युरिटी, फार्मा एवं सुरक्षा के क्षेत्रों में कार्यरत अनेक कंपनियां भारत में अपने वैश्विक योग्यता केंद्रों की स्थापना कर रही हैं।

पूर्व में, अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों को भारत से ब्रेन ड्रेन हो रहा था, परंतु अब परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं एवं अब विशेष रूप से अमेरिका से भारत को रिवर्स ब्रैन ड्रेन होने लगा है क्योंकि ट्रम्प प्रशासन की नीतियों के चलते अन्य देशों से अमेरिका में जाने वाले टैलेंट का अमेरिका में रहना अब मुश्किल हो रहा है। अमेरिका एवं अन्य यूरोपीयन देशों में पूंजीवाद एवं साम्यवाद की नीतियों के चलते इन देशों में जन्म दर भी लगातार कम हो रही है। इन देशों में समाज में प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने आप पर ध्यान केंद्रित किए हुए है। विवाह जैसी अति पवित्र संस्था को पश्चिमी देशों ने केवल मौज मस्ती का माध्यम बना दिया गया है। केवल कामुकता के लिए विवाह नहीं किया जाता है जबकि यह एक सामाजिक जिम्मेदारी है। भारतीय दर्शन में अपने कुल को आगे बढ़ाने के लिए विवाह को एक पवित्र संस्था माना गया है। जबकि, पश्चिमी देशों में आज विवाह को आवश्यक ही नहीं माना जा रहा है बल्कि वहां के नागरिक लिव इन रिलेशनशिप में भी रहने लगे हैं। इन देशों में तलाक की दर में अतुलनीय वृद्धि दर्ज हो रही है। इन देशों में सामान्य जीवन यापन की लागत बहुत अधिक महंगी हो रही है। साथ ही, पश्चिमी दर्शन में पुनर्जन्म में विश्वास नहीं किया जाता है, जो कुछ भी भोगना है केवल इसी जन्म में सम्पन्न करना है। अतः इन देशों में अपनी पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए बच्चे पैदा करना आवश्यक नहीं समझा जा रहा है। इन देशों में समाज की जीवन शैली ही इस प्रकार की बन गई है कि केवल अपने आप पर ध्यान केंद्रित करें एवं अपनी काया को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिए, परिवार पर एवं समाज पर किसी नागरिक का ध्यान बहुत कम है। पश्चिमी देशों में नागरिक, “मैं और केवल मैं” किस प्रकार अधिक से अधिक सुखी रह सकता हूं, इस विषय पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। यह विशेषताएं पूंजीवाद एवं साम्यवाद पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में बहुत मुखर रूप से उभर का सामने आती है। बच्चे पैदा करने का निर्णय भी बचत एवं खर्च की दृष्टि को सामने रखकर लिया जा रहा है। चूंकि मैं अपने बच्चे पर होने वाले खर्च को वहन नहीं कर सकता हूं अतः मुझे बच्चे पैदा ही नहीं करना है। पश्चिमी देशों में सामान्य परिवार चलाने की लागतें बढ़ती जा रही है अतः परिवार में “डबल इनकम नो किड्ज़” (डिंक) का विचार भी जोर पकड़ता जा रहा है। इन देशों में पूंजीवाद एवं साम्यवाद पर आधारित आर्थिक नीतियों ने नागरिकों को दिमागी तौर पर दिवालिया बना दिया है। इन देशों में नागरिकों का पूरा ध्यान केवल भौतिकवादी विकास पर ही केंद्रित हो गया है। परिवार एवं समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास समाप्त सा हो गया है।

आज पश्चिमी देशों के नागरिक, विशेष रूप से प्रौढ़ नागरिक, जीवन के अपने अंतिम पलों को सहज बनाने के उद्देश्य से भारत में शिफ्ट हो रहे हैं। भारत की अध्यात्म नगरी ऋषिकेश, हरिद्वार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड आदि स्थानों पर विकसित देशों के नागरिकों की जैसे बाढ़ सी आ गई है। कुछ देशों के नागरिक गोवा जैसे राज्यों में भी आकर बस रहे हैं। क्योंकि, भारत के इन स्थलों पर उन्हें मानसिक शांति प्राप्त हो रही है। पहिले तो ये विदेशी नागरिक योगा एवं आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से भारत आते हैं परंतु यहां आने के उपरांत उन्हें जो आत्मिक शांति प्राप्त होती है, उसके चलते ये लोग भारत में ही बस जाते हैं।

Prahlad Sabnani

Shri Prahlad Sabanani is a distinguished and experienced personality in the Indian banking sector, having served in various significant positions at the State Bank of India for 40 years. He retired as Deputy General Manager from the Corporate Centre of the State Bank of India in Mumbai. His three books—World Trade Organization: Impact on Indian Banking and Industry, Banking Today, and Banking Update—are highly acclaimed. He is also a prolific writer on economic and social issues of national importance.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!